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Friday, October 14, 2016

...तो अब क्या करें पत्रकार? दलाली करें? राजनीति करें?


...तो अब क्या करें पत्रकार? दलाली करें? राजनीति करें?
आज सत्ता में वे राष्ट्रभक्त हैं जो इंदिरा गांधी के ‘कुशासन और भ्रष्टाचार’ के खिलाफ जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के झंडाबरदार बने थे। भारत की दूसरी आज़ादी की सफल लड़ाई के सिपाही थे आज के ये शासक। ओह! फिर आज ये मीडिया को पंगु क्यों बना रहे हैं? मीडिया पर साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना उन्हें रेंगने को मजबूर क्यों किया जा रहा है? पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों के साथ उन्हें बलात्कार करने को मजबूर क्यों किया जा रहा है? विरोध के स्वर को दबा कर लोकतंत्र की नींव को कमजोर क्यों किया जा रहा है?

...तो अब क्या करें पत्रकार? दलाली करें? राजनीति करें?

‘मीडिया मंडी’ का ताजा शोर बेवजह नहीं। कारण मौजूद हैं। देश के सबसे पुराने खबरिया नेटवर्क एनडीटीवी में अचानक आये परिवर्तन से दर्शक हतप्रभ हैं। एनडीटीवी एक अकेला ऐसा नेटवर्क रहा है, जो टीआरपी की अंधी  दौड़ में कभी शामिल नहीं हुआ। कमोबेश दर्शकों के प्रति ईमानदार इस चैनल ने अपनी पत्रकारीय विश्वसनीयता अब तक कायम रखी थी। अब जब अचानक दिखने लगा कि यह चैनल भी कुछ अन्य चैनलों की तरह एक पक्षीय हो रहा है तो दर्शक निराश हुए। अब चर्चा यह कि आखिर ऐसा हुआ तो क्यों? स्वाभाविक रूप से पक्ष और विपक्ष में टिपण्णियां आ रही हैं, कयास लगाए जा रहे हैं। एक पक्ष कह रहा है कि सरकार के दबाव में आकर अंतत: एनडीटीवी का प्रबंधन भी झुकने को मजबूर हो गया। दूसरा पक्ष कह रहा है कि ‘राष्ट्रविरोधी’ एनडीटीवी अब ‘राष्ट्रभक्त’ होने की राह पर चल पड़ा है। तो क्या मीडिया की विश्वसनीयता अब ‘पक्ष’ और ‘विपक्ष’ के पैमाने पर परखी जाएगी? निष्पक्षता, तटष्ठता हाशिए पर रख दी जाएगी? पत्रकारिता सिर्फ विरोध और समर्थन की होगी? फिर वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और निष्कर्ष क्या होंगे? राष्ट्रीय  सोच को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाली ऐसी नकारात्मक पत्रकारिता को फिर क्यों नहीं दफना ही दिया जाये? सीधे-सीधे राजनीति या दलाली करें पत्रकार और मीडिया संस्थाएं! स्थिति भयावह है।
तब आपातकाल का अंधा युग था। ‘सेंसर’ की तलवार के नीचे प्रेस कराह रही थी। नागरिक मौलिक अधिकार छीन लिए गये थे। प्रेस को झुकने के लिए कहा गया, वह रेंगने लगी। सभी नहीं। कुछ अपवाद थे जिन्होंने सरकारी तानाशाही के आगे झुकने की जगह जेल जाना पसंद किया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काले कानून, तानाशाही को उन पत्रकारों ने अस्वीकार कर जेल के सींखचों का वरण किया। पत्रकारीय मूल्य को जीवित रखने वाले वे अपवाद कालान्तर में आदर्श के रुप में पूज्य हुए। पत्रकारिता के विद्यार्थियों के ‘रोल मॉडल’ बने।
आज आपातकाल नहीं है। सत्ता में वे राष्ट्रभक्त हैं जो इंदिरा गांधी के ‘कुशासन और भ्रष्टाचार’ के खिलाफ जय प्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के झंडाबरदार बने थे। आपातकाल में बंदी बन जेल में रहे। भारत की दूसरी आज़ादी की सफल लड़ाई के सिपाही थे आज के ये शासक। ओह! फिर आज ये प्रेस अर्थात् मीडिया को पंगु क्यों बना रहे हैं? मीडिया पर साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना उन्हें रेंगने को मजबूर क्यों किया जा रहा है? पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों, मान्य सिद्धांत के साथ उन्हें बलात्कार करने को मजबूर क्यों किया जा रहा है? विरोध के स्वर को दबा कर, सच/तथ्य को सतह के नीचे दबा कर लोकतंत्र की नींव को कमजोर क्यों किया जा रहा है? सत्ता-स्तुति, एकपक्षीय जानकारी के लिए मीडिया को मजबूर कर कोई शासक जनता के दिलों पर राज नहीं कर सकता। इतिहास के पन्ने इसके गवाह हैं।
इस शाश्वत सत्य की मौजूदगी के पाश्र्व में अगर वर्तमान सरकार, जे पी के अनुयायियों की सरकार, मीडिया को कुचलने का प्रयास करती है, तो इसे ’विनाश काले, विपरीत बुद्धि’ की अवस्था निरुपित करने को मैं मजबूर हूं। हां, चूंकि अन्य देशवासियों की तरह मैंने भी 2014 में विश्वास व आशा के साथ नरेंद्र मोदी के ‘परिवर्तन’ के आह्वान का साथ दिया था, चाहूंगा कि मेरे इस आकलन, इस आशंका को सत्ता गलत साबित कर दे। क्या देश के’प्रधान सेवक’ पहल करेंगे?
पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना के सफल ‘लक्षित हमले’ (सर्जिकल स्ट्राइक) के बाद शुरू सर्वथा अवांछित, अशोभनीय राजनीतिक बहस को क्रूर विस्तार दिया मीडिया ने। कुछ ऐसा कि अपने घर में ही विभाजन का खतरा पैदा हो गया-सेना के मनोबल को दांव पर लगा दिया गया। पाकिस्तान के खिलाफ राजदलों की एकजुटता के बावजूद मीडिया सन्देश ऐसा मानो विपक्ष देश का दुश्मन है! मुद्दा आधारित टिप्पणी करने वाले, सत्य आधारित विश्लेषण कर निष्पक्ष निष्कर्ष के कतिपय पक्षधरों ने जब कर्तव्य निर्वाह करते हुए सच्चाई प्रस्तुत करने की कोशिश की तो उनके खिलाफ चाणक्य की नीति-साम, दाम, दंड, भेद अपनाई गई।
एनडीटीवी इसी नीति का शिकार हुआ प्रतीत हो रहा है। सच के पक्ष में अपवाद की श्रेणी के इस खबरिया चैनल को झुकता-रेंगता देख पत्रकारिता की आत्मा कराह उठी है। सच जानने को इच्छुक देश तड़प उठा है। पत्रकारिता के विद्यार्थी हतप्रभ हैं, एनडीटीवी के नये बदले चरित्र और चेहरे को देख कर। चैनल ने घोषणा की थी अपनी वरिष्ठ, हाई प्रोफाइल पत्रकार बरखा दत्त द्वारा लिये गए पी. चिदम्बरम के साक्षात्कार के प्रसारण की। अंतिम समय में कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। शर्मनाक तो ये कि चैनल ने ऐसा राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किया। बात यहीं खत्म नहीं होती। चैनल ने घोषणा कर दी कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाली किसी खबर या कार्यक्रम का प्रसारण नहीं करेगा। ‘राष्ट्रभक्त’ और ‘सिद्धांतवादी’ के इस मुखौटे के पीछे का सत्य भयावह है। सच ये कि एनडीटीवी भी झुक गया, एनडीटीवी को भी झुका दिया गया। हां, कड़वा सच यही है। मुलायम सरीखे राजनेता की तरह प्रणब रॉय भी अंतत: टूट गए।
देर-सबेर प्रणब को झुकाने वाले, तोडऩे वाले हाथ-हथियार भी सामने आ जायेंगे। लेकिन, लोकतांत्रिक भारत का स्वाभिमानी मीडिया आज निर्वस्त्र कोठे पर बैठ जिस प्रकार रुदन को विवश है, क्या कोई हाथ उसकी ‘लाज’ के रक्षार्थ अवतरित होगा?
भारत, भारतवासी प्रतीक्षारत हैं कि प्रणब रॉय भी करवट लें!
और, प्रतीक्षा इस बात की भी कि जे पी के शिष्यों की आत्मा भी अंतत: करवट लेने को मजबूर होगी-आजाद मीडिया के हक में।

‘उधार की बुद्धि’ की ये कैसी राष्ट्रीय विडंबना!

‘उधार की बुद्धि’ की ये कैसी राष्ट्रीय विडंबना!
मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अल्पज्ञानी हैं। यह भी मानने को तैयार नहीं कि केंद्रीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर मूर्ख हैं। मानने को मैं यह भी तैयार नहीं कि मीडिया महारथी मूर्ख अथवा षड्यंत्रकारी हैं।
अब सवाल यह कि फिर प्रधानमंत्री मोदी, उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी व मीडिया के नामचीन ऐसी हरकतें क्यों कर रहे हैं, जो उन्हें मूर्खों की पंक्ति में खड़ी कर देती हैं। देश की राजनीति ही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से से भी ऐसी हरकतें असहज स्थिति पैदा कर रही हैं। बात सिर्फ दलगत राजनीतिक लाभ-हानि की होती तो ये क्षम्य हो सकते थे, किंतु जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा व स्वाभिमान से जुड़ जाए तो राष्ट्रीय चिंता स्वाभाविक है।
निष्पक्ष, तटस्थ गहन चिंतन के बाद ईमानदार चिंतक इस दु:खद निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ऐसी दु:अवस्था की जड़ में मामला उधार की बुद्धि का है। गिरवी हुई बुद्धि का है, गुलाम बुद्धि का है। पढऩे-सुनने में कड़वा तो लगेगा, प्रभावित-विचलित भी होंगे, लेकिन वर्तमान का सत्य यही कड़वा सच है।




आलोच्य प्रसंग की शुरुआत कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के ‘जवानों के खून की दलाली’ टिप्पणी के साथ हुई। वितंडावाद के पोषकों, प्रेरकों ने कुछ ऐसा वातावरण निर्मित किया कि राहुल गांधी देश के खलनायक बना दिए गए। 
सत्ता पक्ष की ओर से राहुल को राष्ट्रविरोधी और भारतीय सेना विरोधी ही नहीं बल्कि देश की रक्षा में शहीद हुए जवानों के अपमान का अपराधी भी घोषित कर डाला। क्या सचमुच, राहुल गांधी के शब्दों का आशय वही था, जैसा उनके आलोचक बता रहे हैं? यह संभव नहीं। कोई कुटिल व्यक्ति भी ऐसी मूर्खता नहीं कर सकता। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के नेता राहुल ऐसी गलती कैसे करेंगे?
बात वही बुद्धि, उधार की बुद्धि की है। राहुल गांधी ने जब ‘दलाली’ शब्द का प्रयोग किया, तब उनका आशय ‘राजनीतिक लाभ’ उठाने से था।

 राहुल की हिन्दी वैसी नहीं कि वे दलाली जैसे शब्द का शाब्दिक अर्थ समझते हों।

 हां, यह सच है कि चूंकि दलाली शब्द का इस्तेमाल अत्यंत ही नकारात्मक रूप में लेन-देन को लेकर होता आया है, राहुल यहां फंस गए। राहुल की ओर से सफाई तो दी गई, किंतु सत्तापक्ष भला ऐसे हाथ आए अवसर से क्यों चूके? ‘दलाली’ के दलालों की वैसे भी इस देश में कमी नहीं है।



 राजनीतिक लाभ के लिए राहुल की अज्ञानता का भरपूर इस्तेमाल किया गया। इस बिंदु पर सभी भूल गए कि ऐसा कर वे पूरी की पूरी ‘राष्ट्रीय समझ’ को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। स्वार्थ की ऐसी घृणित राजनीति जो राष्ट्रीय शर्म बन जाए!
राहुल गांधी की हिन्दी समझ के पक्ष में एक दृष्टांत: 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व एक कार्यक्रम में फिल्म अभिनेता सलमान खान तब प्रधानमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के साथ गुजरात में शरीक हुए थे। सलमान और मोदी दोनों पतंग उड़ा रहे थे। एक पत्रकार ने सलमान से पूछा कि, ‘प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए?’ सलमान का जवाब था, ‘बेस्ट (ड्ढद्गह्यह्ल) आदमी होना चाहिए।’ पत्रकार का अगला सवाल था, ‘नरेंद्र मोदी कैसे हैं?’ सलमान का निर्दोष उत्तर था, ‘ये गुड (द्दशशस्र) हैं।’ अब अगर हम उत्तर के शाब्दिक अर्थ में जाएं, तब कहा जाएगा कि सलमान ने तब मोदी की अवमानना की थी-‘बेस्ट’ की जगह ‘गुड’ बताकर। लेकिन, ऐसा नहीं था। अब आप सलमान खान से गुड (द्दशशस्र), बेटर (ड्ढद्गह्लह्लद्गह्म्), बेस्ट (ड्ढद्गह्यह्ल) के बीच के अंतर की जानकारी की अपेक्षा तो कर नहीं सकते! सलमान अपनी ओर से नरेंद्र मोदी को अच्छा ही निरुपित कर रहे थे। लेकिन, भाषायी ज्ञान के अभाव के कारण अपने ही बोले शब्दों का अर्थ वह नहीं समझ पाए। शब्दों के प्रयोग के समय का उनका हावभाव नरेंद्र मोदी के पक्ष, उनकी सराहना के प्रति था। सलमान की तरह राहुल भी ‘दलाली’ का प्रचलित आशय नहीं समझ पाए।
दु:ख तो यह कि राहुल गांधी की नासमझी और भावना को समझने वाले भी सत्ता पक्ष के बड़े राजनेता ही नहीं, मीडिया के बुद्धिजीवी महारथी भी ओछी राजनीति और स्वार्थ का घिनौना खेल खेलने से बाज नहीं आ रहे। राजनीतिज्ञों की ‘दलाली’ तो फिर भी समझ में आने वाली बात है, किंतु मीडिया महारथियों की ‘दलाली’? हां, क्षमा करेंगे, वे विशुद्ध ‘दलाली’ ही कर रहे हैं- सत्ताधारी राजनीतिज्ञों की ‘दलाली’। किसलिए? क्या ये बताने की जरूरत है? विभिन्न खबरिया चैनलों पर इस विषय को लेकर आयोजित कार्यक्रमों को देख लें, आप साफ-साफ देखेंगे कि जानकारी अथवा समझ के बावजूद ये महारथी जान-बूझकर वितंडावाद को हवा दे रहे हैं। ओह! स्वयं को मूर्ख साबित करने की ऐसी अंधी दौड़!
इस प्रकरण में एक और खतरनाक घटनाक्रम सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने जोड़ा। विगत 29 सितंबर को सेना ने अपने शौर्य और बुद्धिमानी का परिचय देते हुए पाक अधिकृत कश्मीर में जारी आतंकी प्रशिक्षण केंद्रों पर सफल लक्षित हमले (सर्जिकल स्ट्राइक) किए। लेकिन, इसे लेकर राजनीतिक लाभ उठाने का जो दौर शुरू हुआ, उसमें पूर्व सेना अधिकारियों ने आपत्तिजनक भूमिका निभा रहे हैं। विभिन्न चैनलों पर उपस्थित हुए ये अधिकारी ठेठ राजनेताओं की तरह राजनीति करने लगे हैं। यही नहीं, गोपनीयता की शपथ लेने वाले ये अधिकारी सार्वजनिक रूप से सेना की कार्यप्रणाली और गतिविधियों का खुलासा कर रहे हैं। आश्चर्य है! राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाली इनकी हरकतों को नजरअंदाज क्यों किया जा रहा है? सेना व शासन को संज्ञान लेते हुए इन पूर्व सैनिक अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करनी चाहिए। युद्धोन्माद, या युद्ध की स्थिति के बीच दलगत एवं अन्य आधार पर मतभेेद भुला जब पूरा देश एकजुट है, तब शर्मनाक रूप से ये चैनल देश की जनता और सेना के बीच मतभेद व विभाजन पैदा करने का मंच प्रदान कर रहे हैं। अगर, ऐसा चैनल अज्ञानतावश कर रहे हैं, तो तत्काल संशोधन कर लें। फिलहाल कोई कह नहीं रहा है, लेकिन कालांतर में ये ‘राष्ट्रद्रोही’ ही निरुपित किए जाएंगे!

Friday, October 7, 2016

‘नियंत्रण रेखा’ तो ठीक, घर के अंदर ‘सीमा रेखा’ क्यों?

‘नियंत्रण रेखा’ तो ठीक, घर के अंदर ‘सीमा रेखा’ क्यों?

इस तर्कपूर्ण निष्कर्ष के विरोध में दलगत राजनीति के पोषक, अनुसरणकर्ता विचारकों की पंक्ति खड़ी हो जाएगी। नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ते हुए अगर यह कह दिया जाये कि सबूत मांगना भी गलत और सबूत नहीं देना भी गलत, तब तोज्ञानीविचारक शोर का ऐसा बवंडर खड़ा कर देंगे जिसमें से सुरक्षित सिर्फ कथितराष्ट्रभक्तही निकल पाएंगे। राष्ट्रीय संकट अथवा राष्ट्रीय आवश्यकता की घड़ी में जब पूरा देश एकजुट हो, देश की अखंडता, सार्वभौमिकता की रक्षार्थ कटिबद्ध हो, वितंडावाद के पोषक अपने घर में हीवाणीयुद्ध में व्यस्त हैं। इस शर्मनाक स्थिति से निकलने के लिए जरूरी है कि आलोच्य मुद्दे की तर्कसंगत विवेचना की जाये। बुद्धिमान भारत इसका आकांक्षी है।
यह स्वागत योग्य है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विषय की गंभीरता और समय की नजाकत  को देखते हुए अपने मंत्रियों को अति उत्साह दिखाते हुए उन्माद से बचने की सलाह दी है।सर्जिकल स्ट्राइकजैसे मुद्दे को लेकर राजनीति से परहेज करने की सलाह देकर प्रधानमंत्री ने निश्चय ही अपनी पार्टी के साथ-साथ विपक्षी दलों को भी संयम बरतने की सलाह दी है। देर से ही सही, प्रधानमंत्री मोदी ने ऐसा कर राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण दिया है लेकिन, सवाल यह कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई? या क्यों कर दी गई? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इन दिनों सत्तापक्ष के साथ-साथ अन्य दलों संगठनों के निशाने पर हैं। आरंभ में दिग्विजय सिंह द्वारा सबूत मांगने पर कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया गया था, किंतु दल की ओर से अधिकारिक रूप से इस घोषणा के बाद कि कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार के साथ है उसे बख्श दिया गया। किंतु, केजरीवाल को बख्शने केमूडमें कोई नहीं दिखता। आखिर केजरीवाल ने कहा तो क्या कहा? केजरीवाल नेसर्जिकल स्ट्राइकपर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया है। उन्होंने इसके लिए मोदी सरकार की प्रशंसा भी की है। लेकिन, केजरीवाल चाहते हैं कि पाकिस्तान के इनकार और उसके द्वारा पूरी दुनिया में झूठ फैलाए जाने का पर्दाफाश करने के लिए जरूरी है कि सरकारसर्जिकल स्ट्राइकके सच के पक्ष में सबूत सार्वजनिक कर दे। अरविंद केजरीवाल संभवत: अपनी जगह गलत नहीं हंै। पाकिस्तान ने केवलसर्जिकल स्ट्राइकको झूठा बताया है कि बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया के प्रतिनिधियों को अपने कब्जेवाले कश्मीर में ले जाकर यह प्रमाणित करने की कोशिश की है कि कोईसर्जिकल स्ट्राइकनहीं हुई। ऐसे में पाकिस्तानी कुप्रचार को नंगा करने के लिए केजरीवाल की मांग तर्कहीन कैसे? इस बिंदु पर केजरीवाल के शब्दों को नहीं, उनकी भावनाओं को समझना होगा। अभिव्यक्ति एक कला है। इसमें पारंगत व्यक्ति ही मधुर-कटु शब्दों का इस्तेमाल कर बच निकलते हैं। इसकी बारीकी नहीं समझ पाने वाले उलझ जाते हैं। केजरीवाल के साथ भी ऐसा ही हुआ है। वे चाहते तो हंै कि पाकिस्तान के दुष्प्रचार का जवाब दिया जाये, किंतु उनकी अभिव्यक्ति कुछ ऐसी रही कि जैसे वेसर्जिकल स्ट्राइककी सच्चाई पर ही संदेह प्रकट करते हुए सबूत मांग रहे हों। हालांकि, केजरीवाल अपनी ओर से स्थिति साफ करने की कोशिश कर रहे हैं, किंतु लगता है विलंब हो चुका है। अब देश को यह समझाना उनके बूते का नहीं कि उनकी मंशा सरकार विरोधी नहीं है। लेकिन, मेरी व्यथा यह है कि देश की जनता को सच्चाई से अवगत कराने के जिम्मेदार मीडिया और अन्य विचारक केजरीवाल के शब्दों के अर्थ को अनर्थ की श्रेणी में क्यों खड़ा कर रहे हैं? राजनीतिज्ञों की राजनीति तो समझ में आती है, किंतु विचारकों के विचार पर दलगत राजनीति का साया क्यों? ऐसा नहीं होना चाहिए।
बात जब राजनीति की आती है तो आलोच्य प्रसंग में राजनीतिकों का आचरण देश की एकता तार-तार करने वाला है। हालांकि, स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने इस मामले में राजनीति से परहेज करने का सुझाव दिया है, किंतु प्रमाण मौजूद हैं कि ऐसे गौरवशाली कृत्यों का अपने हक में राजनीतिक इस्तेमाल समय-समय पर सत्तापक्ष करता आया है। भला उपलब्धियों को कोई सरकार अपने पक्ष में भुनाना क्यों नहीं चाहेगी? पाकिस्तानी हरकतों के जवाब में जब मोदी सरकार ने कड़े जवाबी कदम उठाये, तब सरकार और पार्टी इसे अपनी उपलब्धि बताने से चूकेगी कैसे? हां, इस पूरी कवायद में संयम और शालीनता का परित्याग नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री जब उन्माद से बचने की सलाह देते हंै तो इशारा इसी तरफ है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के अलावा कांग्रेस के संजय निरुपम पर शाब्दिक आक्रमण के दौरान सत्तापक्ष की ओर से जिस प्रकार से अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया गया, उसकी भी भत्र्सना की जानी चाहिए। सत्ता पक्ष की ओर जहां ऐसी कार्रवाई के उद्देश्य और उपलब्धियों को चिन्हित किया जाना चाहिए था, उसकी जगह स्वयं कुछ मंत्रियों ने प्रधानमंत्री की सलाह के ठीक विपरीत उन्माद फैलाने की कोशिश की। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की टिप्पणी किसर्जिकल स्ट्राइकके बाद पाकिस्तान बेहोशी में है और भारतीय सेना हनुमान की तरह अपनी शक्ति को पहचान जाग गई है, शालीनता से दूर दिखती है। इसी प्रकार कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की टिप्पणी कि सरकार और सेना पर सवाल उठाने वाले पाकिस्तान के साथ हैं, आपत्तिजनक है। पाकिस्तान के झूठे प्रचार को पर्दाफाश करने के लिए सबूत की मांग करने वाले पाकिस्तानी कैसे हो सकते हैं? प्रधानमंत्री मोदी ने बिलकुल सही समय पर अपने मंत्रियों को संयम में रहते हुए अनावश्यक टिपण्णी करने से मना कर दिया है।
यह ठीक है कि पूर्व की कांग्रेस नेतृत्व की सरकार ने भी ऐसेसर्जिकल स्ट्राइकको अंजाम दिया था, किंतु उन्होंने सार्वजनिक नहीं किया। कारण रणनीतिक गोपनीयता रही होगी। ताजा पहल और शोरगुल का पाश्र्व भिन्न है। राजनीतिक मजबूरी भी कह सकते हैं। मोदी सरकार को इसका लाभ भी मिला। 26 मई 2014 को सत्ता में आने के बाद संभवत: 27-28 सितंबर 2016 की सैन्य कार्रवाई एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर मोदी सरकार को राष्ट्रव्यापी भरपूर सकारात्मक समर्थन मिला। शायद इसी कारण बेचैन विपक्ष और मोदी-भाजपा विरोधियों ने प्रतिकूल वातावरण बनाने की कोशिश की थी। किंतु, अपनी संस्कृति और प्रकृति के अनुरुप भारत ने एकजुटता प्रदर्शित करते हुए सरकार के इस कदम का साथ दिया।
इस शोरगुल के बीच प्रधानमंत्री मोदी की परिपक्वता भी चिन्हित हुई। देश ने उनमें एक सुखद परिवर्तन देखा। अति उत्साही प्रधानमंत्री मोदी नेअति उत्साहसे पार्टी नेताओं को बचने की सलाह देकर यह चिन्हित कर दिया कि वे अब ताजा अर्जित अनुभव से निर्देशित हो रहे हैं। इसे मैं एक सकारात्मक परिवर्तन  के रूप में देखना चाहूंगा। मुद्दा आधारित टिप्पणी के प्रत्येक पक्षधर इस बिंदु पर प्रधानमंत्री मोदी का समर्थन करेंगे। हां, यह चेतावनी अवश्य कि नियंत्रण रेखा पार कर सबक सिखाना तो ठीक किंतु अपने घर के अंदर सीमा रेखा खींचना गलत होगा। प्रधानमंत्री मोदी, उनकी पार्टी भाजपा और सलाहकारों को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए।