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Friday, March 4, 2011

न्यायपालिका की परवाह नहीं प्रधानमंत्री को!

सुप्रीम कोर्ट के ज़न्नाटेदार तमाचे के बाद भी निर्विकार भारत सरकार के गाल ही नहीं, ललाट के साथ-साथ पूरा का पूरा चेहरा पूर्ववत है। कोई लाज नहीं। कोई शर्म नहीं। कोइ खेद-पछतावा नहीं। सपाट सरकारी प्रतिक्रियाएं और वही कुतर्क। तमाचे की गूंज से देशवासी तो स्तब्ध हैं, किंतु सोनिया-मनमोहन-चिदंबरम की तिकड़ी पूर्णत: सामान्य। चिकने घड़े पर शर्म का पानी ठहरता भी कहां है। देश चीख रहा है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस्तीफा दें, गृहमंत्री चिदंबरम इस्तीफा दें। अभी तक तो खबर नहीं, आगे भी उम्मीद नहीं की देश की मांग का आदर करते हुए नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इस्तीफा देंगे। नैतिकता को हर दिन पोंछा लगा कूड़ेदान में फेंकने का आदी आज का शासन वर्ग भला इसकी परवाह करे तो क्यों?
भारत के मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीबीसी) पद पर जोसफ थॉमस की नियुक्ति के लिए सीधे-सीधे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जिम्मेदार थे। नियुक्ति करनेवाली समिति में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के अलावा लोकसभा में विपक्ष के नेता रहते हैं। नेता विपक्ष सुषमा स्वराज की आपत्ति को रद्दी की टोकरी में डाल थॉमस की नियुक्ति पर मोहर लगानेवाले मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम नैतिक ही नहीं, कानूनी रूप से भी जिम्मेदार हैं। थॉमस की नियुक्ति को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट जब साफ शब्दों में कहता है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें (थॉमस की नियुक्ति के संबंध में) असंवैधानिक थीं, तब शक की गुंजाइश कहां रह जाती है? कथित रूप से ईमानदार छवि के धारक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अगर इस्तीफा नहीं देते तो देश में एक अत्यंत ही गलत संदेश जाएगा। संदेश जाएगा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के प्रधानमंत्री को अपनी ही न्यायपालिका पर विश्वास नहीं है। न्यायपालिका की उन्हें परवाह नहीं। संदेश यह भी जाएगा की भारत के प्रधानमंत्री को लोकतांत्रिक भावना की परवाह नहीं है। ऐसे में उनके मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य क्या ईमानदार और अनुशासित रह पायेंगे? कुतर्क का सहारा ले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रधानमंत्री का बचाव करनेवाले केंद्रीय कानून मंत्री विरप्पा मोईली जब यह कहते हैं की सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है तब हमें यह मान लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए की देश का कानून मंत्रालय एक घोर अयोग्य व्यक्ति के हाथों में है। क्या सुप्रिम कोर्ट ने साफ-साफ यह नहीं कहा कि थॉमस की नियुक्ति संबंधी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें असंवैधानिक थी? लगता है मोइली का कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट से चाहता था कि वह सीधे-सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेकर भत्र्सना करता। सुप्रीम कोर्ट से कानून की भाषा से अलग सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल करनेवाले मोइली ने निश्चय ही अपनी अज्ञानता का परिचय दिया है। थॉमस की सीबीसी पद पर नियुक्ति और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसे रद्द किया जाना वस्तुत: पूरी की पूरी केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी बदनीयती को चिह्नित करता है। भ्रष्टाचार संबंधी अति गंभीर मामलों से घिरी भारत सरकार जब एक दागी और भ्रष्टाचार के जांच की जिम्मेदार सतर्कता आयोग के मुखिया के पद पर नियुक्त करती है तब सरकार की नीयत पर संदेह स्वाभाविक है। थॉमस के मामले में तो यह प्रमाणित हो चुका है कि थॉमस के संदिग्ध पाश्र्व की पूरी जानकारी होने के बावजूद, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनकी नियुक्ति पर स्वीकृति की मोहर लगाई। समिति की एक अन्य सदस्य विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्तियों को नजरअंदाज कर प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र और पारदर्शिता की भावना को ठोकर मारी है। प्रधानमंत्री आज भले ही इस्तीफा न दें, देश उन्हें बख्शेगा नहीं। उन्हें और उनकी पार्टी कॉंग्रेस को इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। थॉमस के इस्तीफा दे देने मात्र से प्रधानमंत्री व उनकी सरकार बरी नहीं हो जाती। सुप्रीम कोर्ट के तमाचे की आवाज के बाद जनता की अदालत की चाबुक की गूंज तो अभी बाकी है।

3 comments:

अरूण साथी said...

सरजी सरकार बेहद बेशर्म हो गई है और इनकी मोटी चमड़ी पर कोई असर नहीं होती। मुझे तो इस तरह के हालात पहले पाक मे देखने को मिलते थे पर अब अपने देश में देखना पड़ा रहा है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

किस किस को रोइये...

अवनीश सिंह said...

लेकिन आज हालात बदल गए हैं। इमरजेंसी और बोफोर्स के बाद एक बार फिर लोगों को लगने लगा है कि ऊंची-ऊंची कुर्सी पर आसीन लोग देश को लूटने के लिए ही बैठे हैं। पूरा तंत्र सिर्फ आम आदमी की कीमत पर अपनी जेब भरने में लगा है। फिर चाहे वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण हों या फिर सुरेश कलमाडी। ए राजा हो या करुणानिधि की बेटी कनिमोड़ी।