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Saturday, May 22, 2010

क्या जेपी की संपूर्ण क्रांति बेमानी थी?

आज राजीव गांधी की याद आ रही है। उनकी पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम व विज्ञापन उनका स्मरण दिला रहे हैं। स्वाभाविक रूप से उनकी याद आई तब इंदिरा गांधी की भी याद आई। और तब याद आए जयप्रकाश नारायण और याद आया आपातकाल अर्थात्ï इमरजन्सी। इन यादों के बीच मुखर हुई संपूर्ण क्रांति। जयप्रकाश आंदोलन को आरंभ से अंत तक अत्यंत ही नजदीक से देखने के कारण देश की वर्तमान दशा-दिशा को लेकर अनेक सवाल मन-मस्तिष्क में हलचल पैदा कर रहे हैं। जयप्रकाश आंदोलन के दिनों की राष्ट्रीय अवस्था बल्कि दुर्दशा के आलोक में वर्तमान अवस्था की तुलना स्वाभाविक है। सवाल इसी बिन्दु पर कुलांचे मारता है। वह पूछता है कि जब उन दिनों की तुलना में आज की अवस्था हजारों गुणा अधिक बदतर है तब समाज व देश सुसुप्तावस्था में कैसे है? कहां है वह युवा वर्ग, कहां है उनका जोश, कहां है क्रांति की वह आग और कहां है समाज से भ्रष्टाचार को समूल नष्ट कर देने का जज्बा, कहां है कुशासन के खिलाफ सड़कों पर निकल नारा बुलंद करने वाले चेहरे? भ्रष्टाचार और कुशासन को मुद्दा बनाकर ही तो जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का बिगुल बजाया था। देशहित में, लोकतंत्र के हित में, आम जनता के हित में विषय की गंभीरता और आंदोलन की जरूरत को स्वीकार करते हुए पूरा देश जयप्रकाश नारायण के जिहाद के साथ हो चला था। आंदोलन के प्रति आम लोगों के जनसमर्थन से भयभीत होकर और जनहित विरोधी, लोकतंत्र विरोधी स्वार्थियों के दबाव में तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश को आंतरिक आपातकाल के हवाले कर दिया था। बाह्य आपातकाल तो पहले से था ही, आंतरिक आपातकाल के दौरान आम जनता को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। न्यायपालिका को झुकने को मजबूर कर दिया गया। प्रेस सेंसरशिप लागू कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म कर दी गई, लोगों को जानने के अधिकार से वंचित कर दिया गया था। लोकतंत्र लगभग खत्म कर दिया गया था। वही सबकुछ हो रहा था जो एक राजतंत्र में ही अपेक्षित हो सकता था। जयप्रकाश नारायण सहित सभी बड़े नेता बंदी बना लिए गए थे। लेकिन अविचलित देश की जनता ने मोर्चा संभाला। गली-मोहल्ले के स्तर पर नए-नए नेतृत्व सामने आए। शासकीय अत्याचार, प्रताडऩा झेलते हुए इन्होंने संपूर्ण क्रांति के अलख को जगाए रखा। वह आम जनता की एकजुटता और कुशासन के खिलाफ अदम्य संघर्ष ही था जिससे प्रभावित होकर पंडित जवाहरलाल नेहरू की सगी बहन अर्थात् प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बुआ विजयालक्ष्मी पंडित भी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर आई थीं। पूरा देश तब जेपी आंदोलनमय हो गया था। स्वतंत्रतापूर्व आजादी की लड़ाई के बाद वस्तुत: वह आजादी की दूसरी लड़ाई ही थी। तब मसीहा महात्मा गांधी थे, इस बार जयप्रकाश नारायण। दोनों नेताओं ने चूंकि कभी भी सत्ता की राजनीति नहीं की थी, लोगों ने इन पर विश्वास किया। इनकी हर आवाज का साथ दिया। अंग्रेज जब वापस चले गए तब इंदिरा गांधी कहां टिकतीं। आपातकाल वापस लिया। लोकतंत्र की पुनस्र्थापना के लिए चुनाव कराने को वे बाध्य हुईं। क्रोधित जनता ने चुनाव में इंदिरा गांधी और उनकी पार्टी को सत्ता से दूर फेंक दिया। केंद्र में पहली बार गैरकांग्रेसी सरकार स्थापित हुई। वामपंथियों को छोड़ अन्य सभी राजनीतिक दल अपनी पहचान का त्याग कर एक झंडे के नीचे आ गए थे। भारत में तब एक नया इतिहास रचा गया था। लेकिन इतिहास ने स्वयं को दोहराया भी। पहली आजादी के बाद अकृतज्ञ की तरह महात्मा गांधी के साथ अविश्वास किया गया। दूसरी आजादी के बाद जयप्रकाश नारायण भी छले गए। जिस प्रकार महात्मा गांधी को उनके ही अनुयायियों ने उपेक्षित किया, उसी प्रकार जयप्रकाश नारायण को भी उनके ही अनुयायियों ने धोखा दिया। लेकिन क्या देश सचमुच उन्हें भूल जाए? प्रचार माध्यमों की चिल्ल-पों के बीच मुद्दे जिस तेजी से सामने आते हैं, उसी तेजी से मौत को भी प्राप्त कर लेते हैं। तो क्या 'संपूर्ण क्रांति' बेमानी थी? नहीं! कदापि नहीं! (जारी)

2 comments:

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

जे पी की सम्पूर्ण क्रान्ति बेमानी नही लेकिन उनके सेनानीयो का चयन गलत था .सिर्फ़ चार पांच साल के संघर्ष के बाद आयी सत्ता ने उन सेनानीयो को पथभ्रष्ट कर दिया . कांग्रेस को जो २५ साल मे आयी बिमारी इन को ढाई साल मे ही लग गई .
उसका एक उधारण जे पी को जिन्दा रहते ही संसद मे श्रधांजली दे दी गई

अरूण साथी said...

आदमी यदि बेईमान हो तो सिधान्त गलत नही होते. गान्धी के चेलो ने भी बेईमानी की तब गांधी बेईमान नही हो जाते.