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Tuesday, May 18, 2010

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बलात्कार!

जवाब चाहिए इन सवालों के। क्या धनबल और बाहुबल सच को कैद कर सकता है? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ बलात्कार कर सकता है? बौद्धिक आजादी के आंदोलन को कुचल सकता है?
पिछले दिनों इस स्तंभ की अनुपस्थिति के दौरान कुछ नकली गांधीवादियों और नकली कांग्रेसियों ने इस अखबार के विरोध का एक भौंडा प्रदर्शन किया। जी हां, इस अखबार की प्रतियां जलानेवाले और निषेध सभा में अपशब्दों का इस्तेमाल करनेवाले, हिंसा की बातें करने वाले निश्चय ही न तो गांधीवादी हो सकते हैं और न ही असली कांग्रेसी। बावजूद इसके मेरा उन लोगों के प्रति आभार कि उन्होंने इस अखबार के घोष वाक्य 'एक आंदोलन बौद्धिक आजादी का' की सार्थकता चिन्हित कर दी है। इस अखबार ने बौद्धिक आजादी का आंदोलन यूं ही नहीं छेड़ा है। ऐसे ही मंद बुद्धिधारकों, भ्रष्ट बुद्धिधारकों और छुटभैये राजनेताओं के कारण आज बौद्धिकता कैद है। तुच्छ निजी स्वार्थ के कारण ऐसे तत्व मूल विषय अथवा समस्या से आम लोगों का ध्यान हटाकर गैरमुद्दों के अंधकूप में लोगों को धकेल देते हैं। मुखौटाधारी ये तत्व गांधी का नाम बेचते हैं और अपने दल-नेतृत्व का नुकसान करते हैं। क्या अचरज कि 1989 में लोकसभा में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद अल्पमत के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सरकार के गठन से इन्कार कर दिया! जनादेश का आदर करते हुए उन्होंने विपक्ष में बैठना पसंद किया था। किंतु आज? क्या बताने की जरूत है कि गैरवफादार नकली कांग्रेसियों की बहुतायत के कारण राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी जोड़-तोड़ कर गठबंधन सरकार के लिए मजबूर कर दी गई हैं। सच को कैद कर गांधी और कांग्रेस के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाने वाले इन तत्वों को चुनौती है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के झंडावरदार महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के पुतलों को जलाकर इस आजादी का निषेध करें। हिम्मत है? नहीं। कायर ये तत्व ऐसा नहीं कर पाएंगे। ऐसा करने से तो उनकी दुकानें ही बंद हो जाएंगी।
कुछ जानकार बता रहे हैं कि असल में निषेध-धरना की पहल करनेवाले लोग स्वयं एक षडय़ंत्र के शिकार बन गए। षडय़ंत्र रचा गया था उन तत्वों के द्वारा जो 'दैनिक 1857' की लोकप्रियता व तेवर से असहज हो उठे हैं। वे चैन की नींद नहीं ले पा रहे। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के अर्थ से अंजान इन तत्वों ने गांधी के नाम पर कुछ कांग्रेसी नताओं-कार्यकर्ताओं को भड़का दिया। हमने तो 'दैनिक 1857' के प्रकाशन के साथ ही ऐलान कर दिया था कि यह दैनिक पाठकों के लिये एक अतिरिक्त समाचार पत्र के रूप में निकाला जा रहा है। किसी से कोई स्पर्धा नहीं। बिल्कुल भिन्न, पृथक। लेकिन पूर्वाग्रही इस भावना को समझें तो कैसे? जिन गांधी के नाम पर इन तत्वों ने चिल्ल-पों ंमचाया, गांधीभक्त होने का नगाड़ा पीटा उन्होंने आज तक विवादित पुस्तक 'गांधी:नेकेड एंबिशन' पुस्तक पर प्रतिबंध लगाने की मांग क्यों नहीं की? विभिन्न वेबसाइट पर गांधीजी की सेक्स लाइफ से संबंधित अनेक घोर आपत्तिजनक सामग्री मौजूद है। कुछ तो सचित्र भी! आज की युवा पीढ़ी 'नेट' से चिपकी रहती है। उनके मन-मस्तिष्क में महात्मा गांधी के चरित्र को लेकर जो संदेह एकत्रित हो रहे हैं उसे रोकने की दिशा में इन कथित गांधीभक्तों ने अब तक क्या किया? इन्हें प्रतिबंधित किये जाने की मांग क्या इन्होंने कभी की? 'दैनिक 1857' के पूर्व बहुप्रसारित अंग्रेजी दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सपे्रस, मिड डे और लोकप्रिय मराठी साप्ताहिक लोकप्रभा जैड एडम्स की पुस्तक 'गांधी : नेकेड एंबिशन' के अंश प्रकाशित कर चुके थे। गांधी भक्तों ने इन अखबारों-पत्रिका का निषेध क्यों नहीं किया? इनकी प्रतियां क्यों नहीं जलाईं? इनकी पाठक संख्या तो लाखों में है। कारण ढूंढने के लिए विशेष व्यायाम की जरूरत नहीं। इन अखबारों-पत्रिका को छेडऩे की हिम्मत ये कर ही नहीं सकते। इनकी पूरी की पूरी दुकानदारी जो बंद हो जाती! साफ है 'दैनिक 1857' को निशाने पर लिए जाने की मंशा कुछ और थी। लेकिन 'दैनिक 1857' अविचलित है। इस दैनिक का रक्षा कवच इसका विशाल पाठक वर्ग है। मुखौटाधारियों के प्रहार का जवाब देने में सक्षम है यह पाठक वर्ग। हमें पहल करने की कोई जरूरत नहीं है। निषेध-धरना और अखबार की होलिका दहन के पश्चात की घटनाओं ने पाठकीय मंच की शक्ति को रेखांकित भी कर दिया है।

3 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

लगे रहें... आपके साथ...

पी.सी.गोदियाल said...

इन्हें इसी बात का तो दर सताने लगा है कि अगर लोग जागरूक हो गए तो इनकी दाल रोटी चलेगी कैसे , और ऐसा नहीं कि सोनिया गांधी यह सब जानती नहीं है कि इससे देश को क्या नुकशान हो रहा है , क्या कीमत चुकानी पद रही है , बस, वह भी बहती गंगा में हाथ धो लेने में मग्न है !

honesty project democracy said...

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन किसी व्यक्ति को जिन्दा लाश बना देता है ,ऐसे लोगों को सख्त से सख्त सजा का प्रावधान होना चाहिए और उस पर अमल की अचूक व्यवस्था भी होनी चाहिए / विनोद जी एक आग्रह है इस पोस्ट को पढ़िए और इंसानियत की हर संभव मदद कीजिये http://jantakifir.blogspot.com/2010/05/blog-post_17.html