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Sunday, September 26, 2010

पत्रकारिता को बिकाऊ निरूपित न करें!

भारतीय पत्रकारिता का एक और कड़वा सच। विडंबना भी कह लें! लोकतंत्र के स्वघोषित चौथे स्तंभ में अयोग्य, अज्ञानी और ग्लैमरपसंद लोगों की भीड़ हो गई है। संपादक-संवाददाता पद पर ऐसे लोगों का कब्जा चिंता का विषय है। ये सब तथा और भी बहुत कुछ बोल गए पत्रकारिता की लंबी यात्रा कर राज्यसभा सदस्य बने तरुण विजय।
भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी की पीड़ा उनके प्रति सहानुभूति पैदा करती है। उनकी व्यथा यह है कि जो वे बोलते नहीं उसे उनके मुंह में डाल दिया जाता है। नागपुर से एक नए हिंदी साप्ताहिक 'भारत-वाणी' के विमोचन के अवसर पर पत्रकार और पत्रकारिता को चुनौती देने का अवसर इन दोनों राजनेताओं को मिला। तरुण विजय कुछ ज्यादा ही आक्रामक दिखे। यहां तक बोल गए कि आज पत्रकारिता बिक रही है। मैं उनके इस विचार से सहमत नहीं हूं। पत्रकारिता में दृढ़ अनुभव प्राप्त तरुण विजय संशोधन कर लें, पत्रकारिता बिकाऊ नहीं है। हां, इससे जुड़े कतिपय पत्रकार अवश्य बिकाऊ हैं। अर्थात् पत्रकारिता नहीं पत्रकार बिक रहे हैं। बिकाऊ वही वर्ग है जिसकी ओर तरुण विजय ने इशारा किया है। 'ग्लैमर, पावर और प्रिविलेज' के आकर्षण से पत्रकारिता में प्रवेश करनेवाला सहज ही भ्रष्ट नेताओं, व्यापारियों और अधिकारियों के चंगुल में फंस जाता है। इनका उपयोग-दुरुपयोग शुरू हो जाता है। तरुण विजय के इस विचार से मैं भी सहमत हूं कि आज संपादक नाम की संस्था धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। उनकी यह बात भी बिल्कुल सही है कि ऊंगलियों पर गिनने लायक संपादकों को छोड़ दें तो शेष संपादक संपादकीय दायित्व छोड़ संस्थान के अन्य हित को प्राथमिकता देते हैं। यह अवस्था निश्चय ही पत्रकारिता के लिए चिंताजनक है। अगर भारतीय पत्रकारिता को अपनी संपूर्णता में जीवित रहना है तो उसे ईमानदार आत्मचिंतन करना होगा। इसके लिए पहली शर्त यह है कि संपादक की सत्ता व उसकी पवित्रता कायम रखी जाए। तर्क दिये जाते हैं कि संपादक की कुर्सियों पर आज मालिकों की मौजूदगी के कारण इसकी पवित्रता खत्म हो रही है, संपादकीय दायित्व हाशिए पर चला गया है। क्योंकि आज का पेशेवर संपादक ही अपना दायित्व गरिमापूर्ण पत्रकारिता की नींव को चोटिल कर रहा है। जब नायक ही दायित्वहीन व भ्रष्ट होगा तब उसके सहयोगियों से ईमानदार दायित्व निर्वाह की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? वह तो अपने संपादक का ही अनुसरण करेगा। तरुण विजय का यह आरोप कि भाषाज्ञान से दूर व्यक्ति संपादक और संवाददाता बन जाता है तो पत्रकारिता की इसी नवीन अवस्था के कारण! अयोग्यता और निष्क्रियता साथ-साथ चलती है। अयोग्य संपादक-संवाददाता निष्क्रिय ही तो साबित होगा। तरुण विजय के अनुसार देश में संभवत: चार-पांच संपादक ही संपादक कहलाने योग्य हैं। तरुण विजय यहां अतिरेक के शिकार प्रतीत हुए। संभवत: उनके जेहन में दिल्ली महानगर रहा होगा। देश के अन्य राज्यों के शहरों व कस्बों से प्रकाशित समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में आज भी अनेक ऐसे संपादक मौजूद हैं जो महानगरीय सुविधाओं-प्रलोभनों से दूर अनेक कठिनाइयों, चुनौतियों का सामना करते हुए स्वस्थ, ईमानदार पत्रकारिता कर रहे हैं। लघु पत्र-पत्रिकाओं के अधिकांश संपादक पत्रकारीय आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं। सच लिखने का साहस अगर है तो इनमें। बल्कि सच तो यह है कि इनकी लेखनी से निकले शब्द, भाषा, तथ्य, निष्पक्षता और निडरता बड़े शहरों में कार्यरत संपादकों को हर पल चुनौती देती है। भारतीय पत्रकारिता का आकलन महानगर की पत्रकारिता के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। वस्तुत: भारतीय लोकतंत्र आज अगर सफल है तो उसका एक मुख्य कारण सशक्त भारतीय पत्रकारिता भी है। इसके पहले भी मैं कह चुका हूं, आज भी कहता हूं कि कृपया पत्रकारिता को कोई बिकाऊ निरूपित न करे।

2 comments:

गजेन्द्र सिंह said...

शानदार प्रस्तुति .......

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
आप ही बताये कैसे पर की जाये नदी ?

lokendra singh rajput said...

मैं भी आपकी बात का समर्थन करता हूं। पत्रकारिता बिकाऊ नहीं हुई है, बल्कि बहुतेक पत्रकार बिक रहे हैं। उनकी पांचो अंगुली घी में और सिर कढ़ाई में रहता है। खबर छापने के भी पैसे और खबर रोकने के भी पैसे मिलते हैं। इन लोगों ने ही पत्रकारिता को बदनाम कर रखा है। यह तो मानना ही पड़ेगा कि ऐसे लोगों की भीड़ अधिक जमा हो गई है और हां कुछ अखबार भी इसीलिए छपते हैं कि अपने काले कारनामे पत्रकारिता की आड़ में छुपा सकें।