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Thursday, August 2, 2012

शिंदे 'दलित' पहचान के मोहताज क्यों?


देश का गृहमंत्री जब 'जातीय पहचान' का मोहताज दिखे तब कोई शांत - सुरक्षित समाज की कल्पना भी कैसे कर सकता है? देश के नए गृहमंत्री की ऐसी पहल से सभी हतप्रभ हैं।
'जातीय पहचान' के साथ नार्थ ब्लाक अर्थात गृह मंत्रालय में प्रवेश करने वाले सुशीलकुमार शिंदे ने जब स्वयम् को कटघरे में खड़ा कर लिया है, तब उनके साथ  'न्याय' कौन करेगा? 1990 में जब लालूप्रसाद यादव पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने जातीयता का न केवल पोषण किया, उसे सींचित भी किया था। तब उन्होंने बिहार प्रदेश में पूरे समाज को जातीय आधार पर विभाजित कर डाला था। स्कूली बच्चों से लेकर शासन-प्रशासन की सर्वोच्च कुर्सियों तक से 'जातीय बदबू' आने लगी थी। लालू-राबड़ी को पंद्रह वर्षो की जातीय-शासन से त्रस्त जनता ने अंतत: उनकी सत्ता को उखाड़ फेंका। अब देश अपने गृहमंत्री शिंदे का क्या करे? एक साधारण चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी के रूप में अपने जीवन की यात्रा शुरू कर राज्य में मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री के पद तक पहुंचने वाले शिंदे की जीवन यात्रा को एक आदर्श के रूप में ग्रहण करने वाले इस देश में अनेक अनुयायी हैं। उनकी सफल संघर्ष-यात्रा का प्रशंसक मैं भी हूं। किंतु, आज देश के करोड़ों लोगों की तरह मैं भी निराश हूं। जिम्मेदारियों के प्रति उनकी कर्मठता, कार्य कुशलता और अनुभव के पाश्र्व में केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में उनके चयन से एक आशा बंधी थी। लेकिन बुधवार 1 अगस्त को गृहमंत्री का कार्यभार संभालने के साथ ही जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कहकर आभार प्रकट किया कि सरदार बूटासिंह के बाद वे दूसरे  'दलित' हंै, जिन्हें महत्वपूर्ण गृहमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई, तब पूरे देश में निराशा फैल गई। इतने अनुभवी शिंदे से ऐसी चूक कैसे हो गई? सभी को समान अवसर दिए जाने की संकल्पना के साथ विकास की ओर कदमताल करता भारतीय समाज तो अब  'जातीय पहचान' से दूर एक 'भारतीयता' को सामने रखता है। और तो और, अब तो जातीय पहचान वाले उपनामों से निजात पाने की मांग भी उठने लगी है। 'दलित' अथवा 'हरिजन' जैसे शब्दों को भारतीय समाज अब अपनी जुबां पर नहीं लाना चाहता। सभी सिर्फ एक  'भारतीय' के रूप में पहचान चाहते हंै। शोषित-प्रताडि़त सूचक कोई शब्द अब स्वीकार नहीं। दलित शब्द में निहित नकारात्मक संदेश लोकतांत्रिक भारत के लिए निश्चय ही अपमान सूचक है। स्कूलों में जाएं, हर जाति-हर वर्ग के बच्चों को बगैर किसी भेदभाव से टिफिन शेयर करते आप देख सकेंगे। ऐसे में देश का गृहमंत्री एक 'दलित' के रूप में अपनी पहचान देते हुए आसन ग्रहण करे और अपने नेताओं के प्रति आभार प्रकट करे कि उन्होंने एक दलित पर विश्वास प्रकट किया, तब हर भारतीय मन अवसाद से तो भर ही जाएगा। आजादी के साढ़े छह दशक बाद सत्ता शीर्ष की दीर्घा से  'दलित' शब्द की गूंज ने आजाद भारत की उपलब्धियों को निश्चय ही हाशिये पर डाल दिया है। सुशीलकुमार शिंदे को ऐसा नहीं करना चाहिए था।

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