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Saturday, January 1, 2011

सदी का सबसे बड़ा झूठ!

पूरा देश आहत है सदी के इस सबसे बड़े झूठ पर। झूठ ही नहीं सदी के सबसे बड़े अपराध के रूप में भी यह चिन्हित किया जाएगा। मैं यहां अभी-अभी समाप्त हुए वर्ष में गुंजायमान भ्रष्टाचार व महाघोटालों की चर्चा नहीं कर रहा। हजारों-लाखों करोड़ के सरकारी खजाने पर डाके की बात नहीं कर रहा। मैं यहां राष्ट्रपिता महात्मा के त्याग और मूल्यों की अवमानना की चर्चा कर रहा हूं। सामथ्र्यवानों द्वारा इतिहास भी लिखवाए जाने के इस युग में ऐसा अपराध किया है केंद्रीय सत्ता की कमान संभालने वाली कांग्रेस ने। अपनी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी की तुलना महात्मा गांधी से कर कांग्रेस ने न केवल महात्मा गांधी बल्कि आजादी की लड़ाई में शहीद हुए राष्ट्रभक्तों और अन्य सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का अपमान किया है। महात्मा गांधी के त्याग की तुलना सोनिया गांधी के कथित त्याग से कोई सिरफिरा ही कर सकता है। सच्चा इतिहासकार ऐसा कभी भी नहीं कर सकता। सोनिया गांधी के कथित त्याग की बात अभी कल की ही है। केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी के संपादन में प्रस्तुत कथित इतिहास 'कांग्रेस एंड द मेकिंग आफ द इंडियन नेशन' चाहे जो दावा कर ले, देशवासी इस सचाई से अच्छी तरह परिचित हैं कि प्रधानमंत्री पद का कथित त्याग सोनिया गांधी की मजबूरी थी। उनकी कायरता थी। परिवार की सुरक्षा को लेकर एक भयभीत मां का कायराना निर्णय था वह। देश में विद्रोह की संभावना से डरी हुई एक पार्टी अध्यक्ष का फैसला था वह। अगर प्रधानमंत्री पद के प्रति उनके मन में कोई मोह नहीं था, वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थीं, तब उन्होंंने स्वयं को कांग्रेस संसदीय दल का नेता क्यों चुने जाने दिया? सभी जानते हैं कि कांग्रेस में संसदीय दल का नेता कैसे और किसकी इच्छा पर चुना जाता है। अगर सोनिया प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थीं तो पार्टी के सांसद उन्हें कभी भी नेता नहीं चुनते। यही नहीं, इससे आगे बढ़ते हुए उन्होंने क्या स्वयं को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का नेता नहीं चुनवाया? यूपीए ने सोनिया को नेता चुना तो उनकी इच्छा से। उस काल में पूरे देश ने टेलीविजन पर देखा था-सुना था ताजा विमोचित इतिहास के संपादक प्रणब मुखर्जी को ऐलान करते हुए कि ''सोनिया गांधी हमारी निर्विवाद नेता हैं और वे राष्ट्रपति के समक्ष सरकार बनाने का दावा करेंगी। ... सोनियाजी ही प्रधानमंत्री बनेंगी।'' उस समय तो सोनिया गांधी की ओर से ऐसा कोई वक्तव्य नहीं आया था कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहतीं। फिर किस त्याग का दावा कांग्रेस कर रही है? वह तो सुषमा स्वराज व उमा भारती के बागी तेवर थे जिससे सोनिया भयभीत हो उठी थीं। सुषमा व उमा ने तब घोषणा कर दी थी कि अगर सोनिया को प्रधानमंत्री बनाया गया तब वे अपने सिर के बाल मुंडवा विधवा के सफेद वस्त्र धारण कर सड़क पर निकल पड़ेंगी। देश में एक राष्ट्रीय आंदोलन छेड़ा जाएगा। अगर ऐसा हो जाता तब देश की भावुक जनता भारत और भारतीयता के पक्ष में बगावत पर उतर जाती। इसी भय ने सोनिया को कदम पीछे लेने पर मजबूर किया और तब त्याग का नाटक रचा गया। सोनिया ने स्वेच्छा से कोई त्याग नहीं किया था। निश्चय ही आने वाली पीढ़ी को गुमराह करने की यह साजिश है। उसी तरह की साजिश जैसी आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने की थी। तब देश के इतिहास को तोड़-मरोड़कर सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार को महिमामंडित करने वाली सामग्री को एक कालपात्र मेें रख लाल किले में गाढ़ दिया गया था। बाद में जनता पार्टी सरकार ने उसे निकलवा फेंक नई पीढ़ी को गुमराह होने से बचा लिया था। प्रणब मुखर्जी संपादित इस इतिहास में भारतीय लोकतंत्र के सर्वाधिक स्याह काल आपातकाल के लिए एक अकेले संजय गांधी को दोषी करार देकर असली अपराधियों को बचाने की कोशिश की गई है। इंदिरा गांधी के शासनकाल में संजय गांधी एक संविधानेतर सत्ता के रूप में उभरे थे तो इंदिरा गांधी के आशीर्वाद से ही। लेकिन आपातकाल का निर्णय क्या संजय ने लिया था? अगर हां तो यह पूछा जाएगा कि फिर उन्हें ऐसा अधिकार किसने प्रदान किया था? सरकार में न होते हुए भी अगर संजय सरकार का संचालन कर रहे थे तो कैसे? अगर आपातकाल में सारी ज्यादतियों के लिए संजय दोषी थे तो उन्हें अधिकार किसने दिए थे? तब संजय के विशेष चहेते प्रणब मुखर्जी और अंबिका सोनी आज केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हैं। इनसे बेहतर तो कोई जान नहीं सकता। प्रणब जहां तब संजय की चाटुकारी किया करते थे वहीं अंबिका सोनी तो हमेशा साये की तरह संजय के साथ रहती थीं। आपातकाल की घोषणा से लेकर जयप्रकाश नारायण सहित सभी बड़े नेताओं व पत्रकारों की गिरफ्तारी के लिए अगर कोई जिम्मेदार था तो वह इंदिरा गांधी थीं। जिस लोकतंत्र की दुहाई आज कांग्रेस दे रही है, उस लोकतंत्र के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों से जनता को वंचित करने वाली इंदिरा गांधी ही थीं। प्रेस सेंसरशिप लागू कर जनता को बेजुबान करने की कोशिश तब इंदिरा गांधी ने ही की थी। देश को दूसरी गुलामी की जंजीरों से जकडऩे वाली इंदिरा गांधी ही थीं। कांग्रेस इतिहास का यह दावा सरासर झूठ है कि आपातकाल के दौरान संजय गांधी की ज्यादतियों से देश की जनता परेशान हुई थी। सच तो यह है कि तब इंदिरा सरकार के कुशासन, भ्रष्टाचार और आपातकाल की ज्यादतियों से विद्रोह कर देश की जनता ने इंदिरा को उखाड़ फेंका था। ब्रिटिश शासन काल की तरह आपातकाल के दौरान लापता आज भी अनेक नाम प्रकाश में नहीं आ पाए। आपातकाल की ज्यादतियों की कथा अनंत है। इन ज्यादतियों के लिए एक अकेले संजय गांधी को कटघरे में खड़ा कर कांग्रेस नेे झूठ तो बोला ही है, राष्ट्रीय अपराध भी किया है। संजय ही क्यों? उत्तर सरल है। संजय गांधी की विधवा मेनका गांधी व पुत्र वरुण गांधी आज प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। वह भाजपा जो कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती बन रही है। चूंकि स्वयं इंदिरा गांधी ने संजय गांधी की असामयिक मौत के बाद अपनी जवान विधवा बहू मेनका और अबोध बालक वरुण को घर से निकाल दिया था, नेहरू-गांधी परिवार उन्हें अछूत मानने लगा है। खेद है कि कांग्रेस के इतिहास ने सोनिया को महिमामंडित करने के क्रम में इन और इन जैसे असहज पहलुओं पर जानबूझकर परदा डाल दिया। इस मुकाम पर मैं चाहूंगा कि, कांग्रेस आपातकाल के अपने 'कालपात्र' की याद कर ले। संभवत: आलोच्य इतिहास का हश्र भी कहीं 'कालपात्र' की तरह न हो जाए।

2 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

कांग्रेस में चाटुकारिता हमेशा रही है, इस किताब से यही पता चलता है.. चीन का आक्रमण सिरे से गोल. लाखों सिखों का कत्ले-आम गायब...
एक पोस्टर लखनऊ में देखा था जिसमें महात्मा का चित्र छोटा सा और अभी के गांधियों के बहुत बड़े.

Piyush Pant said...

त्याग की अधिक सच्चाई इस लिंक पर उपलब्ध है....
http://dialogueindia.in/magazine/Article/Sonia-ka-sach