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Tuesday, July 31, 2012

झूठ बोल रहे हैं नरेंद्र मोदी!


गुजरात और बिहार के बीच कथित अटूट संबंध को हवा में उछालने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत और नीति पर सवाल तो खड़े होंगे ही।  मोदी कुछ बोलने के पूर्व हानि-लाभ को तौल लेते हंै। इतिहास खंगालने की आदत भी है उनमें। कहते है कि वे सावधानी बरतते हैं, ताकि कुछ निरर्थक न बोल जाएं। किंतु इस बार चूक गये। गुजरात और बिहार के बीच ऐतिहासिक संबंध को रेखांकित करते हुए मोदी जब कहते हैं कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद को देश का प्रथम राष्ट्रपति गुजरात के सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया था, और मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बिहार के जयप्रकाश नारायण ने बनवाया था तब तथ्य और मंशा को लेकर समीक्षकों की ललाटों पर पैदा सिकुडऩ स्वाभाविक है।
पहले चर्चा तथ्य की। यह सच है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू कभी नहीं चाहते थे कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बनें। कारण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अतुलनीय विद्वत्ता थी। विद्वत्ता के मामले में डॉ. प्रसाद हर क्षेत्र में नेहरू पर भारी पड़ते थे। इस बिंदु पर घोर कुंठा के शिकार नेहरूजी चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन राष्ट्रपति बनें। किंतु, संविधान सभा के सभापति के रूप में ऐतिहासिक व अतुलनीय योगदान देने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद की न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि विपक्ष सहित राष्ट्रीय स्तर पर जन-जन की व्यापक स्वीकृति के समक्ष नेहरूजी की नहीं चली। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान स्वीकार किए जाने के बाद डॉ. प्रसाद को राष्ट्रपति बनाया गया। प्राय: हर महत्वपूर्ण राजनीतिक, गैर राजनीतिक मामलों में नेहरूजी को चुनौती देने वाले सरदार पटेल ने भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद का साथ दिया था, यह ठीक है। किंतु, यह कहना गलत होगा कि डॉ. प्रसाद की नियुक्ति में पटेल की भूमिका निर्णायक थी। 1950 में ही 15 दिसंबर को सरदार पटेल का निधन हो गया। भारत के नए संविधान के अंतर्गत 1952 में संपन्न प्रथम आम चुनाव के बाद पुन: राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति चुन लिया गया। जानकार पुष्टि करेंगे कि तब भी नेेहरू ने राधाकृष्णन के लिए मन बना रखा था। किंतु राजेंद्र प्रसाद को मिल रहे व्यापक समर्थन के कारण नेहरू सफल नहीं हो पाए। नेहरू को सबसे बड़ा झटका तो 1957 के राष्ट्रपति चुनाव में लगा। नेहरू ने तब राधाकृष्णन के पक्ष में सहमति बनाने कीकोशिश की थी। उन्होंने दक्षिण के चारों प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर दक्षिण के किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाए जाने की इच्छा जाहिर की थी। जाहिर है कि उनका ईशारा राधाकृष्णन की ओर था। नेहरूजी की इच्छा की अनदेखी करते हुए चारों मुख्यमंत्रियों ने जवाब दिया कि जब तक डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपलब्ध हैं, उन्हें ही दोबारा राष्ट्रपति बनाया जाना चाहिए। राजेंद्र बाबू की ऐसी व्यापक स्वीकृति के आगे नतमस्तक, हताश नेहरू कुछ नहीं कर पाए। डॉ. प्रसाद 1957 में दोबारा राष्ट्रपति चुने गए। इन ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में नरेंद्र मोदी का दावा निश्चय ही खोखला लगता है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रपति बने थे तो अपनी योग्यता के कारण-किसी व्यक्ति विशेष के कारण नहीं।
नरेंद्र मोदी का दूसरा दावा भी सच से कोसों दूर है। उनका यह दावा बिल्कुल गलत है कि जयप्रकाश नारायण ने मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बनाया। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि 1977 में कें द्र में  कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बन रही थी तब जयप्रकाश नारायण प्रधानमंत्री के रूप में जगजीवन राम को देखना चाहते थे। जनता पार्टी के तत्कालिन अध्यक्ष चंद्रशेखर भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल थे। किंतु जगजीवन राम और चंद्रशेखर के नामों पर आम सहमति नहीं बन पाने के कारण तीसरे मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री बना दिया गया।
इस सचाई से अच्छी तरह अवगत होने के बावजूद नरेंद्र मोदी अगर इतिहास को झूठला रहे हैं तो निश्चय ही उनकी मंशा संदिग्ध हो उठती है। ये वही नरेंद्र मोदी हैं और वही बिहार है जिसके मुख्यमंत्री नीतीशकुमार ने बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान चुनाव प्रचार के लिए मोदी को बिहार आने से वंचित कर दिया था। अभी हाल ही में नीतीशकुमार ने नरेंद्र मोदी को तगड़ा झटका देते हुए प्रधानमंत्री पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का प्रबल विरोध किया था।  ऐसे में बिहार के साथ गुजरात का कथित रूप से पुराना संबंध रेखांकित करने वाले नरेंद्र मोदी की मंशा साफ है। गुजरात से बाहर निकल राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की कोशिश करने वाले मोदी बिहार के महत्व से अच्छी तरह परिचित हंै। उनके ऐसे प्रयास पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। आपत्ति तो इस बात पर है कि मोदी ने बिहार के साथ संबंध स्थापित करने के लिए लचर क्षेत्रीयता का सहारा लिया। बेहतर हो मोदी ऐसे हथकंड़ों का सहारा न लें। सुकर्मों के द्वारा पहले अपनी छवि को राष्ट्रीय स्वीकृति दिलवाएं।

Monday, July 30, 2012

राहुल पर न्यौछावर लोकतंत्र!


'...विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र...! गौरवशाली लोकतंत्र...!! सफल लोकतंत्र !!!
देश-विदेश में गर्व के साथ इन शब्दों को प्रचारित - प्रसारित किया जाता है। सीना तान कर बताया जाता है कि भारत वह देश है, जहां पिछले छह दशक से अधिक समय से संसदीय लोकतंत्र सफलता पूर्वक चल रहा हैं। व्यस्क मताधिकार द्वारा जनता के द्वारा चुने हुए प्रतीनिधि सत्ता संचालित करते हैं। नि:संदेह ऐसा ही होता हैं। किंतु, यह सब कुछ कागजों पर। व्यवहार के स्तर पर ,लोकतंत्र की आड़ में  छल और सिर्फ छल होता है। विशेषकर जब शीर्ष पद अर्थात प्रधानमंत्री के चयन की बात आती है। तब लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचन नहीं बल्कि नेतृत्व द्वारा 'नामित' किए जाने की परंपरा चल पड़ी है। राजतंत्र में जारी वंशवाद की परंपरा के अनुरूप लोकतंत्र के साथ छल और बलात्कार की बेशर्म गाथा है यह। छल इसलिए कि सब कुछ लोकतंत्र के आवरण में, बलात्कार इसलिए कि परिवार विशेष में तैयार किसी 'खास' की तयशुदा ताजपोशी! बानगी देखना है, तो देख लें- '.....राहुल गांधी को इसलिए केंद्रीय मंत्रि मंडल में शामिल हो जाना चाहिए ताकि वे सरकारी कामकाज के अनुभव प्राप्त कर भविष्य में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाल सके'। नेहरू-गांधी परिवार के खुशामदी कांग्रेसी नेता मंत्री खुलेआम ऐसा बयान दे रहे हैं। क्या यह लोकतंत्र क ी अवधारणा के साथ बलात्कार नहीं? लोकतांत्रिक देश के साथ छल नहीं। बिल्कुल ऐसा ही है। देश के अभिभावक दल के रूप में परिचित कांगे्रस दल की ओर से ऐसे छल पर देश का लोकतंत्र हमेशा शर्मिंदा होता आया है। चाहे देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के चयन का मामला हो, उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के चयन का मामला हो या फिर इंदिरा-पुत्र राजीव गांधी की प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति का मामला हो, हर बार देश के लोकतंत्र के साथ छल किया गया-कपट-खेल खेला गया। और अब वंशवाद के ताजा प्रतीक राहुल गांधी के लिए भी ऐसे ही 'नाटक' के मंचन की तैयारी शुरू हो गई है। बिल्कुल एक 'युवराज' की ताजपोशी की है यह तैयारी! क्या यह लोकतंत्र की मूल भावना के साथ खिलवाड़ नहीं? दु:ख और शर्म इस बात का कि यह सब कुछ होगा लाकेतंत्र के नाम पर। जब कभी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का निर्णय लिया जाएगा, लोगों की आंखों में धूल झोंकते हुए 'लोकतंत्र' का खेल खेला जाएगा। संसदीय दल की बैठक होगी, राहुल का नाम प्रस्तावित होगा और सर्व सम्मान से कथित 'निर्वाचन' की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। राष्ट्रपति को अग्रसारित अनुशंसा पत्र में कहा जाएगा कि सर्व सम्मति से प्रधानमंत्री के लिए राहुल गांधी के नाम मुहर लगाई गई है। लोकतंत्र के नाम पर वंशवाद को सींचित करने की ऐसी परंपरा पर क्या कभी विराम लग पाएगा? यह आश्चर्यजनक है कि लगभग सवा सौ करोड़ आबादी वाले देश में देश के सबसे बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस को नेतृत्व के लिए सिर्फ नेहरू-गांधी परिवार के आंगन में जाना पड़ता है। अगर परिवार की ओर से कोई अदभूत क्षमता या अतुलनीय नेतृत्व वाला कोई सुपात्र सामने लाया जाता है तब किसी को भी आपत्ति नहीं होगी। वंश के नाम पर भी किसी को आपत्ति नहीं होगी। वंश के नाम पर किसी योग्य पात्र को अस्वीकार करना गलत होगा। लेकिन यहां तो 'पात्र' ही लचर है, कमजोर है। कतिपय कांग्रेस नेताओं की ओर से राहुल के पक्ष में उठाई जाने वाली आवाज असुरक्षा की बुनियाद पर चाटुकारिता की अति है। समझ में नहीं आता कि विशाल कांग्रेस के अंदर इन्हें कोई और 'सुयोग्य' पात्र क्यों नहीं मिल रहा। अगर कांग्रेस दल सचमुच लोकतांत्रिक है तब वह 'वंश' के वाड़े से बाहर निकल कुशल, योग्य पात्र की तलाश करे । कांग्रेस के पतन को रोकने का यह एक तरीका होगा।
सिर्फ नेता के चयन में ही कांग्रेस लोकतंत्र को नहीं रौंद रही। अन्य मामलों में भी उसने तानाशाही अलोकतांत्रिक रवैया अपना रखा है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध और लोकपाल की नियुक्ति को लेकर चलाए जा रहे अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रति कांग्रेस का रवैया हर दृष्टि से अहंकार व तानाशाही की श्रेणी का है। एक केंद्रीय मंत्री का वक्तव्य कि, '.....अन्ना टीम अपनी मांगों की पूर्ति के लिए संयुक्त राष्ट्र में जाए', देश के लोकतंत्र का अपमान है। टिप्पणीकार मंत्री इस सचाई को कैसे भूल गए कि वे संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त मंत्री नहीं बल्कि भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा नियुक्त मंत्री हैं।
मंत्री का बोल ठीक वैसा ही है जैसा 70 के दशक में आपात काल के पूर्व जयप्रकाश आंदोलन को लेकर कांग्रेस के मंत्री बोला करते थे। तब कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री ने आंदोलन के प्रणेता जयप्रकाश नारायण के लिए टिप्पणी की थी कि 'उन्हें (जेपी) असली 'मुकाम' पहुंचा दिया जायेगा।' देश जानता है, तथ्य इतिहास में दर्ज हो चुका है कि जनता ने तब कांगे्रस को ही असली 'मुकाम' पर पहूॅंचा दिया था। ऐतिहासिक सबक दी थी। क्या कांग्रेस इतिहास की पुनरावृत्ति चाहती है?

Thursday, July 19, 2012

पश्चिम की नई खतरनाक साजिश !


अब तो हद हो गई! पहले अमेरिकी पत्रिका 'टाइम', फिर अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा और अब इग्लैंड का दैनिक अखबार 'द इंडिपेंडेंट'! ये सभी हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को दिशाहीन, भ्रष्ट मंत्रियों के समूह का मुखिया  और 'सोनिया का गुड्डा' निरूपित कर रहे हंै।  भारत की बढ़ती ताकत व प्रगति से ईष्र्या करने वाले पश्चिमी देशों की ऐसी टिप्पणियों को हमने रद्दी की टोकरियों में फेंक दिया है। हमें अपने प्रधानमंत्री की योग्यता, ईमानदारी और कार्य कुशलता पर इनके प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं। पश्चिम के शासक और उनके पिठ्ठू पत्रकार यह न भूलें कि भारत, वह भारत नहीं जिसकी उदारता का फायदा उठा छल-कपट से उन्होंने लगभग 200 वर्षो तक गुलाम बना रखा था। वह तो भोला 'भारतीय मन' था जिसे  गुमराह करने में अंग्रेज सफल हुए थे। लेकिन असलियत सामने आने पर उठी विद्रोह की ज्वाला में झुलस  अंग्रेजों को सात समंदर पार वापस जाने को मजबूर होना पड़ा था। संभवत: उन दिनों की 'कसक' के वशीभूत, स्वयं को सर्व शक्तिमान मानने वाले पश्चिम के देश हमारे शासकों पर अश्लील टिप्पणि कर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं।  इन भड़ासों की तह में छुपे हैं इनके वे स्वार्थ जो अब भारत पूरा नहीं कर पा रहा। खुदरा बाजार में विदेशी निवेश को अनुमति नहीं दिए जाने से तिलमिलाए अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने अभी हाल में हमारी आर्थिक नीति की आलोचना की थी। अपने अधिकार क्षेत्र की सीमा लांघ हमारे  आंतरिक मामलों में दखल देने वाले ओबामा भूल गए कि  हमारे इसी प्रधानमंत्री मनमोहन ने सन 2008 में परमाणु उर्जा पर अमेरिका के साथ करार के पक्ष में भारत सरकार के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया था। तब देश में मनमोहन सिंह पर अमेरिका परस्त होने के आरोप लगे थे। आज वही मनमोहन अमेरिका-इग्लैंड की नजरों में दिशाहीन हो गए। यह तो भारत का मजबूत लोकतंत्र है, जो किसी को भी मनमानी करने की छूट नहीं देता। चाहे वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों या कांग्रेस अध्यक्ष व सप्रंग प्रमुख सोनिया गांधी ही क्यूं ना हो! अमेरिका-इग्लैंड की पत्रिका, समाचार पत्र व अमेरिकी राष्ट्रपति की टिप्पणियों पर सप्रंग सरकार व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आलोचक तथा विपक्ष खुश न हों। हमारे प्रधानमंत्री नकारा हैं, दिशाहीन हैं, कठपुतली हैं, गुड्डा हैं या भ्रष्ट मंत्री परिषद के मुखिया, इसका फैसला तो समय आने पर देशवासी स्वंय करेंगे।  विचारणीय यह है कि पश्चिमी देशों से अचानक ऐसे आक्रमण क्यों हो रहे हैं। ध्यान रहे, ऐसे सभी आक्रमणों के केंद्र बिंदु एक अकेले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं। वह मनमेाहन सिंह जिनका अपना कोई राजनीतिक आधार नहीं है। अगर वे प्रधानमंत्री पद पर बने हुए हैं तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की कृपा से। यह कड़वा और दु:खद तथ्य भारत के राजनीतिक इतिहास में  मोटी रेखा से  चिंहित है। भारत का बच्चा-बच्चा इस तथ्य से परिचित है। कांग्रेस नेतृत्व की सप्रंग सरकार के घटक दल हों या विपक्षी दल, सुविधानुसार सभी इसे बहस का मुद्दा बनाते रहे हैं। इस खुली सचाई के बावजूद पश्चिमी मीडिया द्वारा इसे तूल दिए जाने का अर्थ है कि कहीं कोई गहरी साजिश रची जा रही है। ऐसी साजिश जिसकी परिणति उनके मनोनुकूल सत्ता परिवर्तन के रूप में हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा ।  इस शंका की गहरी छानबीन के बाद पता चलेगा कि षडयंत्र में हमारे कुछ 'अपने' शामिल हैं। यह संभव है। देश के इतिहास में जयचंदों और मीरजाफरों की उपस्थिति हमेशा दर्ज रही है। अनजाने में ही सही, पश्चिमी मीडिया ने जमीर को जगाने के लिए हर भारतीय का आह््वान कर डाला है। हमारा आग्रह है कि इस मुकाम पर पक्ष-विपक्ष एक हो जाएं। आजादी की लड़ाई के लक्ष्य और इसके लिए प्राणों की आहुति देने वालों को भूल देश के साथ गद्दारी न करंे। हजारों-लाखों कुर्बानियों के बाद हमने लक्ष्य हासिल किया। आज वही पश्चिमी कौम भारत को आर्थिक गुलामी की जंजीरों में जकड़ अपरोक्ष में उस पर शासन करना चाहते हैं। भारतीय प्रधानमंत्री के खिलाफ पश्चिम की ताजा सुगबुगाहट से साफ संकेत मिल रहे हैं कि उन्होंने साजिश को अंजाम तक पहुंचाने के लिए गति बढ़ा दी है। यह एक ऐसा संकट है जिसका मुकाबला दलगत राजनीति का त्याग कर एकजुट हो एक 'भारतीय परिवार' के रूप में करना होगा। यह साजिश अथवा संकट कोई कोरी कल्पना नहीं। इस संभावना के पुख्ता आधार स्पष्टता से दृष्टिगोचर हैं। सत्ता परिवर्तन तो लोकतंात्रिक पद्धति की स्वाभाविक प्रक्रिया है।  किंतु, किसी परिवार विशेष अथवा व्यक्ति विशेष के पक्ष में अगर अंजाम की कोशिश होती है तो इसे सफल नहीं होने दिया जाना चाहिए। चुनौती है सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को और चुनौती है मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलों को भी। और हां, कोई यह न भूले कि इस संघर्ष में उनके योगदान को अंतत: देश की जनता अपनी कसौटी पर कस अंतिम निष्कर्ष निकालेगी।

Sunday, July 15, 2012

शर्मसार तो मीडिया बिरादरी हुई !


क्षमा करेंगे, शर्मसार तो हमारी मीडिया बिरादरी ने भी किया। गुवाहाटी की सड़क पर सरेआम एक किशोरी को बे-आबरू करने वाले मनचलों को उम्रकैद क्या,फांसी दे दो! कोई उफ नहीं करेगा। कानून-व्यवस्था की रखवाली पुलिस के महानिदेशक जयंत चौधरी को भी इस टिप्पणी के लिए दंडित किया जाए कि 'पुलिस कोई 'एटीएम' मशीन नहीं है', तो किसी को गम नहीं होगा। असम सरकार को भी बर्खास्त कर दिया जाए, लोग खुश होंगे। किंतु, इन सबों के साथ घटना-स्थल पर मौजूद, चश्मदीद मीडिया कर्मियों के खिलाफ भी अन्य लोगों के सदृश कड़ी कार्रवाई क्यों न हो? क्या कोई बताएगा कि किसी भी कोने से ऐसी मांग क्यों नहीं उठी? नागरिक अधिकारों की मांग करने वालों को नागरिक कर्तव्य और दायित्व की जानकारी भी होनी चाहिए। लोकतंत्र में जान-माल, आबरू की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य की तो है, किंतु नागरिक कर्तव्य भी चिंहित हैं।
इससे मुंह मोडऩे वालों को अपराधी क्यों न घोषित किया जाए? गुवाहाटी की सड़क पर जब उस किशोरी को एक दर्जन से अधिक दरिंदे नोच-खसोट रहे थे, निर्वस्त्र कर रहे थे,तब मीडिया कर्मियों सहित वहां मौजूद भीड़ ने उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की? तमाशबीन भीड़ का हिस्सा बने मीडिया कर्मी यह तर्क दे नहीं बच सकते कि वो अपनी 'ड्यूटी' कर रहे थे। जब लड़की को नोचा जा रहा था , पीटा जा रहा था, लड़की चीख-चिल्ला रही थी तब घटना को कैमरे में कैद करने की 'ड्यूटी' की सराहना नहीं की जा सकती ।  पीडि़त युवती ने भी आरोप लगाया है कि मिन्नत-चिरौरी करने के बावजूद घटना स्थल पर मौजूद मीडिया कर्मियों ने उसकी मदद नहीं की ।
नागरिक कर्तव्य का निष्पादन करते हुए उन्हें आगे बढ़ उस युवती को दरिंदों के हाथों से छुड़ाना चाहिए था। घटना की जो विडियो किल्पिंग सार्वजनिक हुई उस से साफ पता चलता है कि मीडिया कर्मियों की दिलचस्पी युवती को बचाने में नहीं बल्कि मनचलों की अश्लील हरकतों को कैमरे में कैद करने में थी। कैमरे की आंखें प्रतीक्षा कर रही थीं कि वह युवती कब और कैसे निर्वस्त्र की जाती है।
क्या यह 'ड्यूटी' हुई? बिल्कुल नहीं ! यह तो एक अश्लील कृत्य में भागीदार बनना हुआ। प्रतिदिन हर पल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार की दुहाई देने वाले मीडिया कर्मियों से गुवाहाटी ही नहीं बल्कि पूरा देश जानना चहेगा कि क्या आंखों के सामने हो रहे अपराध को रोकना उनका कर्तव्य नहीं है। अगर मीडिया कर्मियों को अपने नागरिक कर्तव्य का एहसास होता तो वे पहल करते -भीड़ भी उनका साथ देती-और तब निश्चय ही गुंडे युवती के साथ मनमानी नहीं कर पाते। मनचले-गुंडे घटना स्थल पर ही दबोच लिए जाते। मीडिया कर्मियों को 'खबर' तब भी मिल जाती। खेद है कि उन्होंने नपुंसक भीड़ का हिस्सा बनना पसंद किया। सन्  2002 में सूरत दंगों के दौरान भी मीडिया कर्मियों ने पूरी बिरादरी को शर्मशार कर दिया था। तब गुंडों के हाथों निर्वस्त्र हुई युवतियां सड़कों पर भाग रही थीं, गुंडे पीछा कर रहे थे। मीडिया कर्मी तब भी युवतियों को बचाने की जगह निर्वस्त्र युवतियों को कैमरे में कैद करने में मशगूल थे। हो सकता है कि ऐसे मीडिया कर्मी कानून के अपराधी न हों, लेकिन समाज के अपराधी तो वे बन ही जाते हैं। गुवाहाटी की घटना पर तो हमारा सिर शर्म से झुक गया, मीडिया कर्मियों की 'नपुंसकता' पर तो हम बेजुबां बन बैठे हैं। अघोषित विशेषाधिकार से लैस मीडिया जगत क्या इस पर आत्मचिंतन करेगा?

Sunday, July 8, 2012

न्यायपालिका भी हवा के 'रुख' के साथ !


हालांकि टिप्पणि अरुचिकर होगी, संभवत: न्यायालय की अवमानना भी, परंतु, आम लोगों की स्वस्फूर्त पहली प्रतिक्रिया देश के सामने आनी चाहिए। अपने लिए यह कर्तव्य भी है और दायित्व भी। आय से अधिक संपत्ति के मामले में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत को लोग पचा नहीं पा रहे। केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) द्वारा मायावती के खिलाफ दायर एफआईआर को रद्द कर सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी आधार पर भले ही न्याय किया हो, किंतु न्याय होता हुआ नहीं दिख रहा। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश में लोग  'राजनीतिक हस्तक्षेप' की झलक देख रहे हैं। दबी जुबान से नहीं, बल्कि लोग खुलकर कह रहे हैं कि केंद्र, विशेषकर कांग्रेस, के साथ किसी 'समझौते' की ऐवज में मायावती को अदालती राहत मिली है। सत्ता के ईशारे पर नाचने वाली सीबीआई ने भले ही अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर मायावती के खिलाफ मामला दर्ज किया हो, परंतु यह तो पूछा ही जाएगा कि पिछले आठ वर्षों की अवधि में सीबीआई  जांच की अनदेखी क्यों की गई। जबकि, जांच एजेंसी जांच की अद्यतन स्थिति से अदालत को हमेशा अवगत कराती रही। तब अदालत का मौन और अब मायावती को राहत से सीबीआई के साथ-साथ न्यायालय की भूमिका पर भी संदेह पैदा होना स्वाभविक है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आदेश देने वाले विद्वान न्यायधीशों ने अपने एक सहयोगी न्यायधीश की उस टिप्पणी को 'आदर्श' मान लिया जिसमें कहा गया था कि 'बुद्धिमान हमेशा हवा के रुख के साथ चलते हैं'। कांग्रेस को केंद्र में अपनी सत्ता बचाने के लिए मुलायम सिंह यादव के साथ-साथ मायावती की भी जरूरत है, इसे सभी जानते हैं। इतिहास गवाह है कि ऐसी जरूरतें सौदेबाजी से ही पूरी की जाती रही हंै। राजदलों की जरूरतों की पूर्ति में न्यायपालिका की सहभागिता दुखद है । देशभर में न्यायपालिका के खिलाफ व्याप्त ऐसी कुशंका का निराकरण स्वयं न्यायपालिका को करना होगा। अब तो चर्चा यहां तक होने लगी कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद मुंबई का कुख्यात आदर्श घोटाला कांड भी कहीं दफन ना हो जाए। सीबीआई की ओर से महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और कतिपय अन्य प्रभावशाली राजनीतिकों तथा अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने वाले सीबीआई अधिकारी का 24 घंटे के अंदर तबादले में निहित संदेश साफ है। कांग्रेस शासित राज्य सरकार की ओर से अदालत में पहले ही चुनौती दी जा चुकी है कि मामले की जांच सीबीआई के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। एफआईआर दर्ज कराने के बाद  सीबीआई अधिकारी ने संकेत दिया था कि दो अन्य मुख्यमंत्री, जो अब केंद्र में मंत्री हैं, के खिलाफ भी कार्रवाई  हो सकती है। उक्त अधिकारी के तबादले से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि सीबीआई के जो अधिकारी निष्पक्षता, निडरता और ईमानदारी से काम करेंगे उन्हें दंडित होना होगा। कुछ दशक पूर्व बिहार में कुछ प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के घर सीबीआई के छापे पडऩे के बाद सीबीआई के संबंधित अधिकारी अरूल को तत्काल वापस उनके कैडर तमिलनाडू भेज दिया गया था। बोफोर्स कांड, सेंड किट्स मामला, एयर बस, हवाला मामले में जैन बंधुओं की डायरी का रहस्योद्घाटन, झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड, पॉंडेचेरी लायसेन्स घोटाला, लखुभाई पाठक धोखाधड़ी कांड आदि ऐसे अनेक मामले सीबीआई पर 'राजनीतिक प्रभाव' की चुगली करते हंै।  सीबीआई तो खैर एक सरकार नियंत्रित जांच एजेंसी है, चिंता न्यायपालिका को लेकर है। अगर न्यायपालिका भी सत्ता पक्ष के राजनीतिक हित साधने का माध्यम बन जाए तब लोकतंत्र के स्वरूप और भविष्य को लेकर बहस तो छिड़ेगी ही। कहते हंै कि कांग्रेस पर मायावती का दबाव था कि राष्ट्रपति चुनाव के पहले उनके खिलाफ चल रहे भ्रष्टाचार के मामले को खत्म किया जाए। हो सकता है ऐसा नहीं हो, किंतु अदालती फैसले का समय अर्थात 'टाइमिंग' संदेह पैदा करने वाला है। राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ सीबीआई के इस्तेमाल से आगे बढ़ते हैं। जब राजनीतिक विरोधियों के समर्थन के लिए सीबीआई के साथ-साथ न्यायालय का 'उपयोग' होने लगे तब सरकार व न्यायपालिका दोनों अविश्वसनीय बन जाएंगी। चंूकि, लोकतंत्र में सत्ता पर एकाधिकार संभव नहीं, न्यायपालिका को अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखने के साथ-साथ निष्पक्षता को भी चिन्हित करना होगा। 

Monday, July 2, 2012

डॉ. कलाम का सच, डॉ. कलाम का झूठ!


भारतीय राजनीत और समाज का यह कैसा विद्रूप चेहरा जो डॉ. कलाम जैसे सर्वमान्य व्यक्तित्व को कटघरे में खड़ा कर दे! डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम न केवल देश के पूर्व राष्ट्रपति हैं बल्कि, अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक भी हैं। राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल को विवादों से दूर स्वच्छ-निर्मल निरूपित किया जाता रहा है। कोई आश्चर्य नहीं कि देश का बहुमत उन्हें फिर राष्ट्रपति के रूप में देखने का इच्छुक था। वही डॉ. कलाम आज अगर विवादों के घेरे में हैं तो क्यों ? दु:खद तो यह कि इस दु:स्थिति के लिए स्वयं डॉ. कलाम जिम्मेदार हैं। ताजा तथ्य, जो स्वयं डॉ. कलाम ने उपलब्ध करवाये हैं,  इसी बात की चुगली कर रहे हैं।
डॉ. कलाम का यह कहना कि सन् 2005 में जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार विधानसभा भंग करने के निर्णय को असंवैधानिक करार दिया था, तब उन्होंने स्व-विवेक की जगह देश हित को तरजीह दी थी। ऐसा उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के 'गिड़गिड़ाने' पर किया था। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से विचलित राष्ट्रपति कलाम ने तब राष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का मन बना लिया था। अपना त्याग पत्र भी लिख चुके थे। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 'मिन्नत' की कि अगर वे इस्तीफा देंगे तब सरकार गिर जाएगी। राष्ट्रपति कलाम मान गए । क्या कलाम का वह कदम सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का अनादर नहीं था? जब सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार विधानसभा भंग करने की कार्रवाई असंवैधानिक बताया था तो विधानसभा भंग करने के आदेश पर विदेश की धरती पर अर्धरात्रि में हस्ताक्षर करने वाले कलाम को पद पर बने रहने का कोई हक नहीं था। कम से कम नैतिकता की तो यही मांग थी। सरकार गिरती, तो गिरती। बहुमत होने के कारण सरकार तो कांग्रेस नेतृत्व के संप्रग की ही बनती। हां, प्रधानमंत्री बदल जाता । लेकिन, तब डॉ. कलाम अपनी ख्याति के अनुकूल आदर्श पुरुष बन जाते। डॉ. कलाम वहां चूक गए । अपनी पुस्तक में उक्त घटना का वर्णन कर डॉ. कलाम 'नायक' नहीं 'खलनायक' बन गए।
डॉ. कलाम अपनी ताजा पुस्तक 'टर्निंग प्वाइंट्स' में यह भी खुलासा करते हैं कि सन 2004 में उन्होंने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से नहीं रोका था। राजनीतिक दलों के भारी दबाव के बावजूद वे सोनिया को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने के लिए पूरी तरह तैयार थे। ध्यान रहे, तब यह बात सामने आई थी कि कलाम के विरोध के कारण सोनिया ने 'त्याग' करते हुए मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाया था। हमेशा विवादस्पद मुद्दों को उठा चर्चा में रहने वाले सुब्रमह्ण्यम स्वामी के अनुसार कलाम ने गलतबयानी की है। स्वामी का दावा है कि कलाम ने ही सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोका था। स्वामी ने कलाम को चुनौती दी है कि वे17 मई 2004 को सोनिया को लिखी चिट्ठी को सार्वजनिक करें, जिसमें उन्होंने सोनिया के साथ पूर्व निर्धारित मुलाकात को रद्द करते हुए बाद में प्रधानमंत्री के मुद्दे पर चर्चा के लिए बुलाया था। स्वामी यहां तक दावा करते है कि उस दिन स्वयं कलाम ने उन्हें बताया था कि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने में कानूनी अड़चन है। अब, या तो डॉ. कलाम झूठ बोल रहे हैं या फिर डॉ. सुब्रमह्ण्यम स्वामी। एक ओर देश के पूर्व राष्ट्रपति, दूसरी ओर प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिर्वसिटी के पूर्व प्रोफेसर! झूठ और सच के इस भंवर जाल में कौन झूठा और कौन सच्चा? इसका फैसला एक न एक दिन जनता कर ही देगी।

Sunday, July 1, 2012

वरुण के दो टूक पर यह कैसा राष्ट्रीय मौन?


यह कैसा देश, कैसा लोकतंत्र जहां एक निर्वाचित सांसद सार्वजनिक रुप से यह कहता है कि सांसद और विधायक की उम्मीदवारी के लिए 'बैंक बैलेंस' देखा जाता है, पारिवारिक पाश्र्व को अहमियत दी जाती है! क्या सचमुच 'धन' और 'वंश' ने पूरी की पूरी राजनीतिक व्यवस्था को अपने मजबूत आगोश में जकड़ रखा है? अगर यह सच है तो तय मानिए कि आदर्श लोकतंत्र की मौत निकट है। स्वर्गीय इंदिरा गांधी के पौत्र और युवा भाजपा सांसद वरुण गांधी दो टूक शब्दों में जब इन बातों की पुष्टि करते हैं, तब इस पर एक गंभीर राष्ट्रीय बहस होनी ही चाहिए थी। आश्चर्य है कि वरुण के शब्दों को मीडिया ने भी एक सामान्य खबर की तरह छोटा स्थान दिया। क्यों? पड़ताल और बहस इसपर भी होनी चाहिए। कुछ दिनों पूर्व भारत के सर्वाेच्च न्यायालय के एक माननीय न्यायाधीश ने जब भारत के मुख्य सेनापती एक मामले की सुनवाई करते हुए सुझाव दिया था कि 'बुद्धिमान वही होता है, जो हवा के रुख के साथ चलता है', तब भी मीडिया की भूमिका कुछ ऐसी ही थी। जबकि उस पर राष्ट्रीय बहस शुरु कर तार्किक परिणति पर पहुंचा जाना चाहिए था। अभी कुछ दिनों पूर्व निजी बातचीत में एक सांसद ने स्वीकार किया कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने लगभग 10 करोड़ रुपए खर्च किए। इसमें से 2 करोड़ रुपए मीडिया पर खर्च करने पड़े थे। बता दूं, अपनी व्यापक लोकप्रियता के बावजूद उपसांसद को चुनाव में इतनी बड़ी राशि खर्च करनी पडी थी। बहरहाल, बातें वरुण के शब्दों की। 
वरुण शायद गलत नहीं है। उन्होंने तो सांसद के रुप में स्वयं की पात्रता को भी बहस का मुद्दा बना डाला है। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि वे सांसद बने तो सिर्फ इसलिए कि वह नेहरु-गांधी परिवार के वंशज हैं। इस साफगोई के बाद कम से कम उनके शब्दों में निहित किसी अन्य मंशा की बात तो नहीं ही उठाई जा सकती। न केवल बड़े राष्ट्रीय दलों, बल्कि क्षेत्रीय दलों के विधायकों, सांसदों की सूचियों के अध्ययन से वरूण आरोप सही साबित होंगे। आजादी के बाद आरंभिक काल में शुरु इस रोग ने अब विकराल रुप धारण कर लिया है। हाल कि दिनों में संपन्न चुनावों में ऐसे उम्मीदवारों की भरमार रही। अपवाद स्वरूप कुछ नामों को छोड़ दें तो अधिकांश ऐसे ही पाश्र्व के उम्मीदवार देखने को मिलेंगे। राज्यसभा और विधानपरिषद के लिए तो शायद धन और वंश ही पात्रता की पहली शर्त रही। लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में क्षेत्रीय और जातीय मजबूरी को छोड़ दें तो उम्मीदवारी के लिए 'धन' और 'वंश' की योग्यता अनिवार्य रहती है। निश्चय ही हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने ऐसी शर्मनाक अवस्था की कल्पना नहीं की होगी। क्या कोई लोकतंत्र के लिए कलंक और राष्ट्रीय अस्मिता के लिए खतरनाक इस 'रोग' के खिलाफ उठी आवाज को बल प्रदान करेगा? चूकि वरूण गांधी मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं, हमारी पहली अपेक्षा भाजपा नेतृत्व से है। दूसरे राजनीतिक दलों से पृथक चाल-चरित्र का दावा करनेवाली भाजपा के नेतृत्व के लिए यह न केवल चुनौती है बल्कि उसकी परीक्षा भी है। देश की युवा पीढी चूकि भाजपा को राष्ट्रीय विकल्प के रुप में देख रही है, उसे इस कसौटी पर खरा उतरना होगा। विफलता की हालत में वह देश की अपराधी बन जाएगी। सत्ता पक्ष के रुप में कांग्रेस को भी आगे आकर वरूण के आरोंपों का जवाब देना होगा। हाल में संपन्न उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी नेतृत्व पर धन लेकर टिकट बांटने के आरोप लगे थे। चुनाव में शर्मनाक हार के बाद ऐसे उम्मीदवारों को एक कारण बताया गया था। वंशवाद की तो जनक ही कांग्रेस है। आज अगर प्राय: सभी दलों में यह रोग व्याप्त है तो इसके प्रणेता के रुप में कांग्रेस को ही मुख्य अपराधी माना जाएगा।
इस अति गंभीर बहस को किसी एक दल में सीमित कर महत्व को घटाया नहीं जाना चाहिए। अपराधी सभी दल हैं। ऐसे में चुनौती है उन सभी को कि अगर वे सचमुच लोकतंत्र में विश्वास रखते हैं तब दलगत प्रतिबद्धता से पृथक हो इस रोग के विरोध में सामने आएं। अन्यथा, सभी राजदल राष्टीय आक्रोश का सामना करने को तैयार रहें।  देश की युवा पीढ़ी ऐसे राष्ट्रीय शर्म पर 'राष्ट्रीय मौन'\ कभी भी बर्दाश्त नहीं करेगी।

Tuesday, June 26, 2012

दिग्विजय और शिवानंद की राह न चलें बलवीर!


पता नहीं आज के नेताओं को क्या हो गया है! मतिभ्रम के शिकार ये नेता 'छपास' की भूख से आगे बढ़ 'बकवास' के रोग से ग्रसित दिखने लगे हैं। जद यू अध्यक्ष शरद यादव ने अपने दल के प्रवक्ताओं को बकवास करने से तो रोका, किंतु स्वयं दो कदम आगे बढ़ बकवास करने लगे। अपने दल के लिए कायदे-कानून या फिर नीति बनाने के लिए अध्यक्ष के रूप में उन्हें अधिकार प्राप्त हो सकता है। किंतु किसी दूसरे दल के लिए ऐसे फैसले लेने का अधिकार उन्हें किसने दिया। भाजपा अगला लोकसभा चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ेगी और प्रधानमंत्री पद के लिए किसे नामित करेगी, इसका फैसला तो पार्टी नेतृत्व ही कर सकता है। राजग अध्यक्ष होने के बावजूद शरद यादव को ये अधिकार नहीं मिल जाता कि वे भाजपा के आंतरिक मामलों में दखल दें। कुछ दिनों पूर्व जदयू के कद्दावर नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके सहयोगी प्रवक्ता शिवानंद तिवारी ने भी ऐसी गलती की थी। स्वयं शरद यादव को यह नागवार लगा थाौर  उन्होंने अनावश्यक टिप्पणी करने से पार्टी नेताओं को परहेज बरतने का निर्देश दिया था। तब वे सही भी थे। किंतु, अब जब भाजपा के एक प्रवक्ता बलवीर पुंज ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में कुछ बातें कहीं तब, शरद यादव को मिर्ची कैसे लग गई। हांलाकि 2014 अभी दूर है। भाजपा के अंदर प्रधानमंत्री पद की उम्मीद्वारी को लेकर उठा बवंडर निश्वय ही अनावश्यक है। नरेंद्र मोदी को लक्ष्य बनाकर समर्थन  और विरोध में आ रहे बयान किसी भी कोण से राजनीतिक परिपक्वता को रेखांकित नहीं करते। लोकतंत्र की मूल भावना को भी ऐसे विचार चुनौती देते हैं। चुनावी राजनीति में जब रातों-रात मतदाता अपने विचार बदल लेता है, तब दो साल बाद के संभावित परिणाम पर कोई आज प्रधानमंत्री की नियुक्ति करने लगे, क्या हास्यास्पद नहीं? वैसे, राजनीतिक समीक्षक बलवीर पुंज की बातों पर भी संदेह प्रकट कर रहे हैं। पुंज ने जिस प्रकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा आगामी चुनाव लड़े जाने की बात कही और मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीद्वार घोषित कर डाला, निश्चय ही ये पार्टी नेतृत्व द्वारा लिए गए निर्णय नहीं हैं। पेशे से पत्रकार बलवीर पुंज को भी संयम से काम लेना चाहिए। अपनी टिप्पणी के पूर्व उन्होंने पाटी नेतृत्व से अनुमति ली होगी या नेतृत्व को विश्वास में लिया होगा, ऐसा नहीं लगता। पार्टी नेतृत्व पहले ही घोषणा कर चुका है कि उचित समय पर इस संबंध में दल के नेता मिल-जुलकर फैसला लेंगे। इस पाश्र्व में बलवीर पुंज को दिग्विजय सिंह और शिवानंद तिवारी के मार्ग पर चलते देख आश्चर्य तो होगा ही!

Sunday, June 24, 2012

'नीयत' साफ नहीं है नीतीश की!

भाजपा नेतृत्व सावधान हो जाए! कभी बिहार को पूरे संसार की नजरों में 'कुख्यात' बना डालने वाले लालू प्रसाद यादव के पुराने सहयोगी और अब  जदयू के 'लाडले' बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी उसी रणनीति को अंजाम दे रहे हैं जिसकी रूपरेखा उन्होंने पिछले बिहार विधानसभा चुनाव के पहले ही तैयार कर ली थी। तब विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बिहार में नहीं आने देने की शर्त नीतीश ने यूं ही नहीं रखी थी। वे वस्तुत: भाजपा नेतृत्व को भड़का उसकी परीक्षा ले रहे थे। तब की राजनीतिक जरूरत के कारण भाजपा ने नीतीश की शर्त को मान लिया था। ना की हालत में नीतीश कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने वाले थे। अगर चुनाव परिणाम अप्रत्याशित नहीं होते, भाजपा को 91 सीटों के साथ बड़ी सफलता नहीं मिलती, तब नीतीश अपना रंग उसी समय दिखा देते। तब नरेंद्र मोदी को बिहार-प्रवेश से वंचित रखने में सफल नीतीश अब अगर राष्ट्रीय परिदृश्य से मोदी को अलग रखने का मंसूबा पाल रहे हैं, तो अपनी संकुचित अवसरवादी सोच के कारण ही।
दबाव का यह नया खेल क्षेत्रीय राजनीति का कोई तुक्का मात्र नहीं है। राष्ट्रीय दलों को एक सोची-समझी योजना के तहत ये गंभीर चुनौतियां हैं। कांग्रेस नेतृत्व की केंद्रीय सरकार की हर मोर्चे पर विफलता के कारण देश की जनता भाजपा को विकल्प के रूप में देख रही है। चूंकि अनेक राज्यों में जनाधार की कमी के कारण भाजपा अकेले दम पर केंद्र में सरकार का गठन नहीं कर सकती, क्षेत्रीय दलों का सहयोग-समर्थन अपरिहार्य है। भाजपा की इस जरूरत को ध्यान में रखकर ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगी जदयू और शिवसेना ने भाजपा पर अपने दबाव बढ़ा दिए हैं। अब इसे भयादोहन (ब्लैकमेलिंग) कहें या राजनीतिक अवसरवादिता, दोनों दलों ने विशेषकर जदयू ने आक्रामक रूप अपना लिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में इन दोनों ने आक्रमण को प्रहसन भी बना डाला है। जरा गौर करें। जदयू के एकमात्र मुख्यमंत्री बिहार के नीतीश कुमार और उनके प्रवक्ता शिवानंद तिवारी अब धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की न केवल नई परिभाषा गढऩे लगे हैं, बल्कि राजग के सबसे बड़े घटक भाजपा को परामर्श देने लगे हैं कि प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार कैसा हो। एक ताजा सर्वे के अनुसार, भारतीय नेताओं में सर्वाधिक लोकप्रिय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदूवादी नेता निरूपित कर नीतीश और तिवारी ने यहां तक चेतावनी दे डाली थी कि अगर मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया जाता है, तब वे राजग से अलग हो जाएंगे। आरोप और चेतावनी दोनों हास्यास्पद हैं। अव्वल तो यह कि भाजपा ने किसी को भी अपनी ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया  है। लोकसभा चुनाव में अभी दो वर्ष बाकी हैं। दूसरा यह कि 'हिंदूवादी नेता' से नीतीश-तिवारी का आशय क्या है? तीसरा यह कि ऐन राष्ट्रपति चुनाव के मौके पर ऐसे विवादास्पद बयान क्यों आए? इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढऩे से पहले नीतीश कुमार और शिवानंद तिवारी के अतीत के संबंध में जान लेना जरूरी है। ये दोनों कभी बिहार में कुख्यात हो चुके लालूप्रसाद यादव के सहयोगी रहे हैं- बल्कि बिहार में लालू मंत्रिमंडल में मंत्री रह चुके हैं। सच तो यह है कि 1990 में लालू जब पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब मंत्री नीतीश कुमार लालू के 'फ्रेंड-फिलास्फर-गाइड' के रूप में जाने जाते थे। लालू तब कोई भी फैसला बगैर नीतीश को विश्वास में लिये नहीं करते थे। नीतीश की स्वच्छ छवि का पूरा फायदा लालू ने तब उठाया था। ईमानदार और बेबाक नीतीश ने अंतत: स्वयं को लालू से अलग कर लिया। जदयू में गए, केंद्र में राजग सरकार में मंत्री बने, लालू के भ्रष्ट शासन के खिलाफ अभियान छेड़ा और भाजपा का सहयोग ले बिहार में मुख्यमंत्री बने।
अब बात शिवानंद तिवारी की। ब्रिटिश शासनकाल में एक सिपाही (कांस्टेबल), फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, कृपलानी और डा. राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी के सदस्य, बिहार की पहली गैरकांग्रेसी सरकार (1967) के गृहमंत्री, हर दृष्टि से ईमानदार रामानंद तिवारी के पुत्र हैं शिवानंद तिवारी। छात्र जीवन में उनकी गतिविधियों की अनेक रोचक गाथाएं आज भी पटना के गली-मोहल्लों में अक्सर चर्चा का विषय बनती हैं। नीतीश की तरह लालू को छोड़ जदयू में शामिल शिवानंद जब कहते हैं कि प्रधानमंत्री का उम्मीदवार सेक्युलर हो और यह कि जिस प्रकार प्रणब मुखर्जी ने वित्त मंत्री के रूप में महंगाई पर काबू पाया, सत्ता में रहकर भाजपा नहीं कर सकती थी, तब निश्चय ही हास्य-प्रसंग बनता है। राष्ट्रपति के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन की घोषणा करने वाले जदयू के नेता ने प्रणब का हास्यास्पद गुणगान कर दल की नीयत पर सवालिया निशान जड़ दिया है। हर दिन बढ़ रही कमरतोड़ महंगाई पर नियंत्रण का प्रमाणपत्र देकर प्रणब को हीरो बनाने वाले शिवानंद क्या जनता को बताएंगे कि देश के किस भाग में, किस मोहल्ले में, किस गली में, किस नुक्कड़ पर प्रणब ने महंगाई को थाम लिया है! देश की अर्थव्यवस्था को तार-तार कर देने वाली सरकार के अर्थ मंत्री प्रणब मुखर्जी स्वयं भी अपने लिये ऐसे महिमामंडन पर हंस रहे होंगे। रही बात सेक्युलर प्रधानमंत्री की, तो पहले शिवानंद यह बताएं कि सन 2002 में जिस गुजरात दंगे के लिए नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार मानते हुए जदयू मोदी का विरोध कर रहा है, उस समय भाजपा के अटल बिहारी मंत्रिमंडल में शामिल नीतीश कुमार ने विरोध स्वरूप मंत्री पद का त्याग क्यों नहीं कर दिया था? तब तो नीतीश ने एक शब्द भी मोदी के खिलाफ नहीं बोले थे। अगर बात दंगों की ही की जाए तब गुजरात से कहीं अधिक भयावह 1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए जिम्मेदार कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब का समर्थन नीतीश और शिवानंद क्यों कर रहे हैं। ये दोनों क्या भूल गए हैं कि कांग्रेस नेताओं की अगुवाई में हुए सिख विरोधी दंगे में अकेले दिल्ली में 3000 से अधिक सिखों को मौत के घाट उतार दिया गया था। धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता की दुहाई देने वाले ये दोनों नेता आज जब कांग्रेस का साथ दे रहे हैं, तब समय आने पर जनता इनसे जवाब मांगेगी। नीतीश और शिवानंद अभी अपने अभियान के क्रम में लोकतंत्र की दुहाई देने से भी नहीं चूके हैं। जानबूझ कर इतिहास से मुंह मोड़ लेने वाले इन नेताओं  को याद दिलाया जाना चाहिए कि वे उसी कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं जिसने लोकतंत्र को रौंदते हुए देश पर आपातकाल थोपा था और आम जनता को उसके मौलिक लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित कर दिया था। यह वही कांग्रेस पार्टी है जिसने पहले 1982 में बिहार प्रेस बिल के जरिये और फिर 1988 में 'प्रेस अधिनियम' के जरिये प्रेस का मुंह बंद कर संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कैद करने की कोशिशें की थी। तब स्वयं नीतीश और शिवानंद ने कांग्रेस सरकार के इन कदमों का चिल्ला-चिल्ला कर विरोध किया था। जाहिर है कि आज जब ये दोनों न केवल राष्ट्रपति के लिए कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस का गुणगान कर रहे हैं, तब इनकी नीयत संदिग्ध है। कहीं पर निगाहें-कहीं पर निशाना की तर्ज पर ये गठबंधन की राजनीति के फायदे को अपने हित में हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

Tuesday, June 19, 2012

'सौदेबाजी' तो हुई ही है, मुलायम जी!


मुलायम सिंह यादव के इन्कार पर भला कोई विश्वास करे तो कैसे? उनकी सफाई कि राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी को समर्थन के पीछे कोई 'सौदेबाजी' नहीं की गई है, अविश्वसनीय है। कोई और क्या, स्वयं मुलायम सिंह की आत्मा जानती होगी कि वे झूठ बोल रहे हैं। घोर अवसरवादी और वंशवादी राजनीति के प्रेरक-पोषक मुलायम यादव बगैर स्वार्थ के ऐसा कोई कदम उठा ही नहीं सकते। स्वार्थपूर्ति चाहे व्यक्तिगत हो, परिवार की हो या पार्टी की। सौदेबाज मुलायम स्वहित से ही प्रेरित होते हैं।  अब चाहे इनके गुरु स्व. राम मनोहर लोहिया स्वर्ग में बैठे जितना भी आंसू बहा लें, मुलायम-परिवार का 'सुख-सागर' भरता ही जाएगा। ऐसी सौदेबाजी से मुलायम व उनका परिवार सदा लाभान्वित होता रहा है। ताजा राष्ट्रपति चुनाव तो उनके लिए अनेक अवसर लेकर आया है। शत-प्रतिशत अनुभवहीन पुत्र अखिलेश को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद पर बैठा स्वयं केंद्र की राजनीति करने वाले मुलायम जानते हैं कि नदी में रहकर मगर से बैर नहीं किया जा सकता। आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी का हश्र उनके सामने है। जगन ने कांग्रेस को चुनौती दी। आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में आनन-फानन में सीबीआई ने उन्हें जेल में डाल दिया। मुलायम के ऊपर ऐसे अनेक मामले वर्षों से लंबित हैं। लेकिन वे न केवल जेल के बाहर हैं बल्कि हर सत्ता सुख को भोग रहे हैं। राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार के मामले में पहले ममता बनर्जी के कंधे पर हाथ रखा, बाद में ठेंगा दिखा दिया। आशावान ममता को न केवल अकेला छोड़ दिया बल्कि उन्हें 'मेरा' और 'हमारा' के बीच फर्क का पाठ पढ़ाया गया। क्या यह कांग्रेस के साथ हुई सौदेबाजी का अंश नहीं? अखिलेश को उत्तर प्रदेश चलाने के लिए केंद्र का समर्थन चाहिए तो महत्वाकांक्षी मुलायम को ब-रास्ता दिल्ली राष्ट्रीय राजनीति में पैर फैलाने का अवसर। संप्रग और सरकार से ममता के अलग होने पर रिक्त रेल मंत्रालय सहित मंत्रिपरिषद के पांच पदों पर मुलायम की नजरें टिकी हैं। दोनों हाथों से मलाई खाने की इच्छा रखने वाले मुलायम जानते हैं कि फिलहाल सोनिया गांधी का साथ देकर ही वे जेल से बाहर रह सत्ता सुख भोग सकते हैं। अपनी अवसरवादी सौदेबाजी से मुलायम पहले भी लाभान्वित होते रहे हैं। 1995 के जून महीने में जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार अल्पमत में आ गई थी, तब बहुजन समाज पार्टी की मायावती को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेनी थी। शपथ के एक दिन पूर्व 2 जून 1995 की शाम मुलायम सिंह यादव के समर्थकों ने बसपा के कई विधायकों पर कथित रूप से हमले किए और कुछ विधायकों का अपहरण कर लिया। इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने राजस्व बोर्ड के अध्यक्ष को घटना संबंधी जांच का जिम्मा सौंपा। एक महीने बाद जांच रिपोर्ट सौंपी गई। रिपोर्ट में यह कहा गया था कि घटना में मुलायम सिंह यादव और बेनी प्रसाद वर्मा शामिल थे। नैतिकता का तकाजा था कि मुलायम को मंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। ध्यान रहे, तब मुलायम केंद्र में रक्षा मंत्री बन गए थे। लोगों को आज भी याद होगा कि उसी दौरान किस प्रकार देश के रक्षा मंत्री मुलायम ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगी बेनी प्रसाद वर्मा तथा अन्य नेताओं के साथ न केवल विरोधियों को ललकारा और धमकी दी, बल्कि प्रेस को भी नहीं बख्शा। उन्होंने एक लाल दस्ता (रेड ब्रिगेड) के गठन की घोषणा करते हुए ऐलान किया था कि इसके सदस्यों के हाथों में लाठियां होंगी। मुलायम तब केंद्रीय स्तर पर बाहुबल की राजनीति के प्रेरक बने थे। बाद में मामला अदालत में भी गया। रक्षा मंत्री देश की 10 लाख सशस्त्र सेनाओं का नेतृत्व करता है जो देश की क्षेत्रीय अखंडता के लिए जिम्मेदार है। किन्तु तब रक्षा मंत्री मुलायम यादव नैतिकता से दूर इस्तीफे से इन्कार करते हुए अपनी जिद पर अड़े रहे। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी समाजवादी पार्टी की आशातीत सफलता से उनकी महत्वाकांक्षाएं और भी बलवती हो गई हैं। केंद्र में संप्रग सरकार की कमजोरी का भरपूर फायदा उठाते हुए मुलायम यादव सौदेबाजी करने लगे हैं। सरकार को बचाने के लिए मुलायम सिंह यादव की जरूरत के मद्देनजर केंद्र सरकार भी उन्हें चारा डालने को मजबूर है। दोनों पक्षों की जरूरतें ही हैं कि इस ताजा मामले में सौदेबाजी को मूर्त रूप दिया गया। मुलायम चाहे जितना इन्कार कर लें, देश जानता है कि उन्होंने अपने और अपने परिवार के निजी फायदे के लिए ऐसी सौदेबाजी की है। 

''.... मैं देख लूंगी'' से ''.... मैं नहीं डरूंगी'' तक


''.... मैं देख लूंगी!'' ये शब्द हैं तब की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के। लगभग 43 वर्ष पूर्व 1969 में इंदिरा गांधी ने ऐसी शाब्दिक चेतावनी अपनी ही कांग्रेस पार्टी की कार्यकारिणी समिति को दी थी। आज चार दशक बाद केंद्र में कांग्रेस नेतृत्व की गठबंधन सरकार की एक सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी दहाड़ रही हैं कि ''.... मैं किसी से नहीं डरती, मैं किसी के आगे नहीं झुकूंगी।'' विडंबना यह कि ये चेतावनियां दोनों महिला राजनेताओं ने राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी के बीच दी। भारत की आजादी की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ''हम पुराने से नए में प्रवेश करते हैं, जब एक युग समाप्त होता है और लंबे समय से दबी हुई एक देश की आत्मा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती है।'' नेहरू की आत्मा आज निश्चय ही विलाप कर रही होगी, यह देख-सुन कर कि आज 'अभिव्यक्ति' को अवसरवादी संतुलन का हथियार बना दिया गया है। 
सुविधानुसार नैतिकता और मर्यादा की बेडिय़ों से इसे बांध दिया जाता है। सत्तारूढ़ संप्रग द्वारा राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में ममता बनर्जी कांग्रेस व संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलती हैं। बैठक पश्चात जब वह मीडिया को सोनिया की पसंद बताती हैं, तब कांग्रेस की ओर से उन पर मर्यादा भंग करने का आरोप लगता है। कहा गया कि उन्होंने विचाराधीन नामों को सार्वजनिक कर मर्यादा भंग की। ममता की ओर से स्पष्टीकरण आया कि सोनिया की सहमति से ही नाम सार्वजनिक किए गए। कांग्रेस मौन हो गई। साफ है कि आरोप गलत थे। मर्यादा और नैतिकता की बातें ममता के विरुद्ध वातावरण तैयार कर उन्हें नीचा दिखाने के लिए की गई थीं। मर्यादा की दुहाई देने वाले कांग्रेसी नेताओं को 1969 की याद कर लेनी चाहिए थी। आज तो मामला जटिल गठबंधन का है। तब केंद्र में कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार थी। अति महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कांग्रेस संगठन की इच्छा को ठेंगे पर रखते हुए पार्टी द्वारा चयनित राष्ट्रपति उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी के खिलाफ अपनी पसंद वी.वी. गिरी को खड़ा कर दिया था। दलीय अनुशासन और नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हुए इंदिरा गांधी ने तब अपनी ही कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ कथित 'अंतरात्मा की आवाज' पर मतदाता सांसदों और विधायकों से वोट डालने की अपील कर डाली। कांग्रेस इतिहास का वह एक सर्वाधिक काला अध्याय बन गया। सो, कम-अ•ा-कम कांग्रेस नैतिकता और मर्यादा की दुहाई तो न ही दे। पार्टी अनुशासन तोड़ कर मर्यादा का उल्लंघन कर तब इंदिरा गांधी अपने अभियान में सफल रही थीं- अपनी ही कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार को पराजित कर।
आज जब कांग्रेस बल्कि संप्रग के पास अपने उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को जिताने के लिए आवश्यक बहुमत नहीं है, पार्टी और गठबंधन क्या अवसरवादी खेल नहीं खेल रहा? ज्ञात श्रोतों से अधिक आय और संपत्ति के मामले में सीबीआई जांच का सामना कर रहे मुलायम सिंह यादव, ऐसे ही आरोप से जूझ रहीं मायावती और कुख्यात चारा घोटाले के महानायक लालू प्रसाद यादव के सहयोग से अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति भवन में आसीन कराने की कवायद क्या अवसरवादिता और अनैतिक साठगांठ को चिन्हित नहीं करता? निश्चय ही छल-कपट आधारित इस कवायद की परिणति किसी सुखद पवित्रता के रूप में तो नहीं ही होगी। बंगाल की शेरनी के रूप में परिचित ममता बनर्जी जब अपनी 'निडरता' को रेखांकित कर रही हैं, तब यहां भी किसी सुखद अंजाम की अपेक्षा नहीं की जा सकती। संप्रग की ओर से बंगाल के प्रणब मुखर्जी को आगे करना अगर अवसरवादी राजनीति की एक चाल है तो बंगाल की ममता बनर्जी द्वारा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को सामने करना भी सियासी चाल ही है। इस पूरे प्रकरण का सर्वाधिक दुखद पहलू है राष्ट्रपति पद की गरिमा को तार-तार करना। भारत जैसे गणराज्य का राष्ट्रपति तो सर्वमान्य होना चाहिए। इस पद और व्यक्ति को लेकर अवसरवादी सोच और सियासी चाल को स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए। डा. राजेंद्र प्रसाद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जाकिर हुसैन की परंपरा को तोड़ व्यक्तिगत पसंद और नापसंद को महत्व दिये जाने का दुष्परिणाम ही है यह। दुखद रूप से देश ने फखरुद्दीन अली अहमद के रूप में ऐसा राष्ट्रपति भी देखा है जिसने संवैधानिक आवश्यकता को दरकिनार कर देश पर आपातकाल थोपने संबंधी आदेश पर आधी रात को हस्ताक्षर कर दिए थे। तब राष्ट्रपति भूल गए थे कि उनके हस्ताक्षर से आजाद भारत के नागरिकों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। तब आजादी की लड़ाई के लाडले जेलों में बंद कर दिए गए थे। जन अभिव्यक्ति का माध्यम 'प्रेस' की जुबान पर ताले जड़ दिए गये थे। यही नहीं, ज्ञानी जैल सिंह के रूप में भी देश ने एक ऐसे राष्ट्रपति को देखा जिसने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ''अगर इंदिरा गांधी उन्हें राष्ट्रपति भवन में झाड़ू लगाने का काम देतीं तो उसे भी स्वीकार कर लेते।'' राष्ट्रपति और राष्ट्रपति पद की मर्यादा को तब रौंदा गया था।
हम अतीत की याद वर्तमान और भविष्य को सुधारने के लिए करते हैं। मर्यादा और नैतिकता की बातें करने वाले इतिहास के पन्नों को उलट सचाई को जान लें। अभी भी समय है। राष्ट्रपति पद को विवादों से दूर रखने के लिए आम सहमति बनाएं। किसी व्यक्ति विशेष को निशाने पर लेकर राजनीतिक लाभ साधने की कवायद का त्याग करें। और अंत में, महत्वपूर्ण यह भी कि देश फैसला करे कि हमें एक महान राष्ट्र का महान नागरिक बनना है, न कि एक महान राष्ट्र में तुच्छ नागरिक बन कर रहना है।

Monday, June 18, 2012

ममता की व्यथा, राजनीति का सच!


''... राजनीति में नीति और नैतिकता खत्म हो गई है... सिर्फ पैसे का खेल चल रहा है... पैसा, पावर, घोटाले का बोलबाला है। '' पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी की इस व्यथा को क्या कोई चुनौती दे सकता है? संभव ही नहीं! ममता ने वर्तमान राजनीति के कड़वे सच को चिन्हित किया है। ममता की व्यक्तिगत ईमानदारी संदेह से परे है। समाज के प्रति उनका समर्पण और आमजन की सुख-समृद्धि की उनकी चाहत स्पष्टत: दृष्टिगोचर है। लंबे राजनीतिक संघर्ष के दिनों में भी पसीना बहा सड़कों पर आम कार्यकर्ता के साथ जनहित में मोर्चा संभालने वाली ममता पहले केंद्रीय मंत्री और अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बगैर किसी अहंकार के एक सामान्य महिला के रूप में शासन की बागडोर संभाल रही हैं। आलोचक उन्हें भले ही अक्खड़ कह लें, लेकिन ऐसा अक्खड़पन कोई ईमानदार व्यक्ति ही दिखा सकता है। हमेशा दोटूक बोलने वाली ममता ने जब वर्तमान राजनीति के सच को उकेरा है तब निश्चय ही अपने अनुभव के आधार पर ही। बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। आजादी के बाद शासन के आरंभिक दौर को छोड़ दें तब ऐसे आरोप लगाने में कोई भी नहीं हिचकेगा कि वर्तमान राजनीति नैतिकता की पुरानी नींव की जगह अनैतिकता की नई नींव पर खड़ी है। निजी बैठकों में या फिर सार्वजनिक मंच से नैतिकता की दुहाई देने वाले नेता मन ही मन स्वयं पर हंसते हैं। चूंकि वे सचाई से अवगत होते हैं, अपने 'अभिनय' की सराहना में मुदित तो होंगे ही। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी सुविधानुसार नैतिकता की नई परिभाषा गढ़ लेते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि नैतिकता के 'छूत' से बचने के लिए आज प्राय: सभी राजदल छद्म धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता, जातीयता और क्षेत्रीयता जैसी संकीर्ण विचारधारा को ढाल बना लेते हैं। सत्ता वासना के इस खेल में सभी शामिल हैं। किसी एक दल का कोई व्यक्ति विशेष आज किसी दूसरे दल की दृष्टि में अछूत हो सकता है, किन्तु वही व्यक्ति विशेष जब पाला बदल उनके दल में शामिल हो जाता है तब वह पवित्र बन जाता है। निश्चय ही ये सब पैसा, पावर और घोटाले के खेल के ही अंग हैं। देश ने वह काल भी देखा है जब 1996 में लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में विजय पाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में सरकार तो बनाई किन्तु प्रधानमंत्री के रूप में अटलबिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति के होने के बावजूद सरकार 13 दिन में ही गिर गई। तब 'सांप्रदायिक भाजपा' को समर्थन देने कोई दल सामने नहीं आया। किन्तु कुछ महीने बाद ही जब पुन: भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, तब लगभग दो दर्जन दल उसके सहयोगी बने। भाजपा अछूत से पवित्र बन गई। उसी काल में देश ने देखा कि कैसे सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की सरकार को इसलिए गिरा दिया कि उनके मंत्रिमंडल में द्रमुक भी शामिल थी। सोनिया गांधी के अनुसार, द्रमुक उनके पति राजीव गांधी की हत्या के लिए दोषी थी। लेकिन वही द्रमुक सोनिया गांधी के नेतृत्व में गठित संप्रग सरकार में आज भी शामिल है। ममता बिल्कुल सही हैं। नीति और नैतिकता को सभी दलों ने कूड़ेदान में डाल दिया है।
ममता यहां भी बिल्कुल सही हैं जब वे कहती हैं कि राजनीति में आज सिर्फ पैसे का खेल चल रहा है। लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और विधान परिषद के लिए चयनित महानुभावों की सूचियों पर गौर करें। कुछ अपवाद छोड़ दें तो यही तथ्य उभर कर सामने आएगा कि इनके चयन के पीछे पैसा और सिर्फ पैसा का ही खेल रहा है। लोकसभा की तो छोड़ दें, विधान परिषद के चुनावों में भी करोड़ों का खेल होता है। क्या यह बताने की जरूरत है कि ऐसे धन का स्रोत कालाधन ही होता है? क्या यह भी बताने की जरूरत है कि ऐसे कालाधन भ्रष्टाचार द्वारा ही अर्जित किए जाते हैं? फिर ऐसे महान निर्वाचित प्रतिनिधियों से पवित्र लोकतंत्र की सुरक्षा अपेक्षा कोई करे तो कैसे? आज अगर पूरी की पूरी व्यवस्था सड़ कर बदबू पैदा कर रही है तो इसके लिए जिम्मेदार निश्चय ही हमारे ऐसे तथाकथित निर्वाचित प्रतिनिधि ही हैं। वे नाराज होंगे, खफा होंगे, उबलेंगे लेकिन यह कड़वा सच मोटी रेखाओं से चिन्हित रहेगा। और हां, अंत में ऐसे सच को एक सत्ता पक्ष की ओर से रेखांकित करने के लिए ममता बनर्जी को सलाम!

Tuesday, March 8, 2011

आखिर क्यों चाहिए, एक अदद 'विभीषण'

सचमुच यह समझ से परे है कि जनता की नजरों में पूरी तरह गिर चुकी , ढीली हो चुकी गठबंधन की गांठों के बावजूद केंद्र में संप्रग सरकार के पतन के लिए लालकृष्ण आडवाणी को आखिर किसी एक 'विभीषण' की प्रतीक्षा क्यों है? इस जरूरत को चूंकि आडवाणी ने सार्वजनिक किया है, सफाई भी उन्हें ही देनी होगी। जब आडवाणी यह कहते हैं कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह भाग्यशाली हैं कि कांग्रेस के अंदर आज कोई वी.पी सिंह मौजूद नहीं है, तब क्या वे अपरोक्ष में हताशा को चिह्नित नहीं कर रहे? उनकी पार्टी भाजपा के अंदर और बाहर इसे आडवाणी की व्यक्तिगत हताशा निरूपित करेंगे-पार्टी की हर्गिज नहीं। सचमुच, यह एक पहेली ही है कि केंद्र में सत्ता परिर्वतन के लिए सत्तारूढ़ कांग्रेस के अंदर आडवाणी विद्रोह की प्रतीक्षा करें। मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं, कि देश का वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य और भाजपा तथा राजग के उस के सहयोगी दलों में हिलोरे मारते उत्साह के बीच, कहीं किसी कोने में भी हताशा मौजूद है। भ्रष्टाचार के आरोपों से तार-तार और गठबंधन के घटक दलों में व्याप्त घोर असंतोष के बावजूद अगर आडवाणी सरीखा कोई वरिष्ठ नेता सत्तापक्ष के अंदर विद्रोह की प्रतीक्षा करता है, तब लोगों की भौंहें तो तनेंगी ही। निश्चय ही, आडवाणी इस मुकाम पर अकेले हताश लग रहे हैं। एक सामान्य कार्यकर्ता से लेकर वरिष्ठ नेताओं का मंतव्य जानने के बाद यह तो कहा ही जा सकता है कि पार्टी के अंदर उत्साह है, हताशा नहीं। भाजपा अपने और राजग के बलबूते सत्ता-परिवर्तन की ताकत रखती है। 70 के दशक के मध्य में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ 'सम्पूर्ण क्रांति' का झंडा किसी वी.पी सिंह ने नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति से दूर सर्वमान्य जयप्रकाश नारायण ने उठाया था। शासकीय अत्याचारों, निर्ममता और क्रूरता के बावजूद तब विद्रोह कर प्राय: सभी लोकतांत्रिक दलों के नेता जयप्रकाश-आंदोलन की सफलता के माध्यम बने थे। 80 के दशक में बोफोर्स और फेयरफैक्स घोटालों के आरोपों से घिरे तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का साथ उनके सहयोगी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने अवश्य छोड़ा था, किंतु वे 'लोकनायक' नहीं बन पाये थे। जनता ने भ्रष्टाचार के खिलाफ मतदान कर कांग्रेस सरकार को तब अपदस्थ कर दिया था। आडवाणी यह कैसे भूल गए कि तब वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बन पाए थे, भाजपा के सर्मथन पर और उनकी सरकार का पतन हुआ तो भाजपा की समर्थन वापसी के कारण। आज केंद्र की गठबंधन सरकार 70 और 80 के दशकों से कहीं अधिक विषम परिस्थितियों से गुजर रही है। वर्तमान मनमोहन सिंह सरकार के घोटालों के आगे इंदिरा और राजीव की सरकारों के घोटाले बौने दिखने लगे हैं। जनता के बीच असंतोष आज चरम पर है। हजारों, लाखों ,करोड़ों के घोटाले आज आम हो गए हैं। यह ऐसा पहली बार हुआ है, जब केंद्र सरकार का एक मंत्री भ्रष्टाचार के आरोप में जेल के अंदर पड़ा है, एक पूर्व मुख्यमंत्री के खिलाफ सीबीआई चार्जशीट दाखिल कर चुकी है, भारत के एक पूर्र्व मुख्य न्यायधीश व उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ सीबीआई चार्जशीट दाखिल करती है, बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों पर राजकोष लूटने के आरोप लग रहे हैं, खेल-मनोरंजन से लेकर बड़े औद्योगिक घरानों पर छापेमारी हो रही है, सत्तापक्ष का एक सांसद न्यायपालिका के खिलाफ सार्वजनिक आरोप लगा रहा है कि धन लेकर मा$कूल फैसले लिखवाये गये हैं और अनेक केंद्रीय मंत्री एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। देश की लूट का ऐसा आलम पहले कभी नहीं देखा गया। ऐसे में जब हर कोण से सत्ता- परिर्वतन के संकेत परिलक्षित है तब मुख्य विपक्षी दल भाजपा सत्ता घराने के किसी 'विभीषण' के आगमन की प्रतीक्षा क्यों करेगी? पार्टी में नेतृत्व-स्तर पर अब शीर्ष नेतृत्व अर्थात पार्टी अध्यक्ष को कड़े फैसले लेने होंगे। नेतृत्व की कमान स्वयं संभालनी होगी। सभी को साथ लेकर चलने की नीति सराहनीय तो है, किंतु जब अन्य नेताओं का लक्ष्य कुछ और हो, व्यक्तिगत अभिलाषाएं पार्टीहित को चोट पहुंचा रही हों तब अनुशासित करने की जरूरत तो पड़ेगी ही। आडवाणी के ताजा कथन से उत्पन्न भ्रम का निराकरण होना ही चाहिए, जनता की अपेक्षा के अनुरूप परिणाम तभी संभव है, जब पार्टी का आत्मविश्वास मजबूत बना रहे। ध्यान रहे, मैं यहां किसी पार्टी विशेष का विरोध या समर्थन नहीं कर रहा, मै तों केंद्र में सत्तारूढ़ संप्रग सरकार के विरुद्ध व्याप्त, व्यापक असंतोष और परिवर्तन के पक्ष में बह रही बयार को रेखांकित कर रहा हूं। चूंकि विकल्प के रूप में भाजपा नेतृत्व के राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से ही लोग आशा लगाए बैठे हैं, इसे एहसास तो दिलाना ही होगा। इतिहास गवाह है कि जब ऐसे अवसर आएं हैं विजय जनाकांक्षा की ही होती रही है।
बिहार विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गड़करी से देश की अपेक्षाएं बढ़ गयी हैं, गड़करी के लिए यह एक चुनौती है। अब प्रतीक्षा रहेगी इस बात की, कि गड़करी जनाकांक्षा को समझ सार्थक, सकारात्मक नेतृत्व दे पाते हैं या नहीं।

Friday, March 4, 2011

न्यायपालिका की परवाह नहीं प्रधानमंत्री को!

सुप्रीम कोर्ट के ज़न्नाटेदार तमाचे के बाद भी निर्विकार भारत सरकार के गाल ही नहीं, ललाट के साथ-साथ पूरा का पूरा चेहरा पूर्ववत है। कोई लाज नहीं। कोई शर्म नहीं। कोइ खेद-पछतावा नहीं। सपाट सरकारी प्रतिक्रियाएं और वही कुतर्क। तमाचे की गूंज से देशवासी तो स्तब्ध हैं, किंतु सोनिया-मनमोहन-चिदंबरम की तिकड़ी पूर्णत: सामान्य। चिकने घड़े पर शर्म का पानी ठहरता भी कहां है। देश चीख रहा है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस्तीफा दें, गृहमंत्री चिदंबरम इस्तीफा दें। अभी तक तो खबर नहीं, आगे भी उम्मीद नहीं की देश की मांग का आदर करते हुए नैतिकता के आधार पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री इस्तीफा देंगे। नैतिकता को हर दिन पोंछा लगा कूड़ेदान में फेंकने का आदी आज का शासन वर्ग भला इसकी परवाह करे तो क्यों?
भारत के मुख्य सतर्कता आयुक्त (सीबीसी) पद पर जोसफ थॉमस की नियुक्ति के लिए सीधे-सीधे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जिम्मेदार थे। नियुक्ति करनेवाली समिति में प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के अलावा लोकसभा में विपक्ष के नेता रहते हैं। नेता विपक्ष सुषमा स्वराज की आपत्ति को रद्दी की टोकरी में डाल थॉमस की नियुक्ति पर मोहर लगानेवाले मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम नैतिक ही नहीं, कानूनी रूप से भी जिम्मेदार हैं। थॉमस की नियुक्ति को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट जब साफ शब्दों में कहता है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें (थॉमस की नियुक्ति के संबंध में) असंवैधानिक थीं, तब शक की गुंजाइश कहां रह जाती है? कथित रूप से ईमानदार छवि के धारक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अगर इस्तीफा नहीं देते तो देश में एक अत्यंत ही गलत संदेश जाएगा। संदेश जाएगा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के प्रधानमंत्री को अपनी ही न्यायपालिका पर विश्वास नहीं है। न्यायपालिका की उन्हें परवाह नहीं। संदेश यह भी जाएगा की भारत के प्रधानमंत्री को लोकतांत्रिक भावना की परवाह नहीं है। ऐसे में उनके मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य क्या ईमानदार और अनुशासित रह पायेंगे? कुतर्क का सहारा ले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रधानमंत्री का बचाव करनेवाले केंद्रीय कानून मंत्री विरप्पा मोईली जब यह कहते हैं की सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है तब हमें यह मान लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए की देश का कानून मंत्रालय एक घोर अयोग्य व्यक्ति के हाथों में है। क्या सुप्रिम कोर्ट ने साफ-साफ यह नहीं कहा कि थॉमस की नियुक्ति संबंधी प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें असंवैधानिक थी? लगता है मोइली का कानून मंत्रालय सुप्रीम कोर्ट से चाहता था कि वह सीधे-सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का नाम लेकर भत्र्सना करता। सुप्रीम कोर्ट से कानून की भाषा से अलग सड़क छाप भाषा का इस्तेमाल करनेवाले मोइली ने निश्चय ही अपनी अज्ञानता का परिचय दिया है। थॉमस की सीबीसी पद पर नियुक्ति और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उसे रद्द किया जाना वस्तुत: पूरी की पूरी केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी बदनीयती को चिह्नित करता है। भ्रष्टाचार संबंधी अति गंभीर मामलों से घिरी भारत सरकार जब एक दागी और भ्रष्टाचार के जांच की जिम्मेदार सतर्कता आयोग के मुखिया के पद पर नियुक्त करती है तब सरकार की नीयत पर संदेह स्वाभाविक है। थॉमस के मामले में तो यह प्रमाणित हो चुका है कि थॉमस के संदिग्ध पाश्र्व की पूरी जानकारी होने के बावजूद, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उनकी नियुक्ति पर स्वीकृति की मोहर लगाई। समिति की एक अन्य सदस्य विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज की आपत्तियों को नजरअंदाज कर प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र और पारदर्शिता की भावना को ठोकर मारी है। प्रधानमंत्री आज भले ही इस्तीफा न दें, देश उन्हें बख्शेगा नहीं। उन्हें और उनकी पार्टी कॉंग्रेस को इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी। थॉमस के इस्तीफा दे देने मात्र से प्रधानमंत्री व उनकी सरकार बरी नहीं हो जाती। सुप्रीम कोर्ट के तमाचे की आवाज के बाद जनता की अदालत की चाबुक की गूंज तो अभी बाकी है।

Sunday, February 20, 2011

मीडिया के गाल पर यह कैसा तमाचा?

क्या सचमुच, मीडिया इतना दागदार हो चुका है कि जब भी कोई चाहे, उसके मुंह पर थूक दे? 'दलाली' और 'दारू' का यह कैसा दौर, कि मीडिया को सड़क-चौराहों पर निर्वस्त्र किया जाता रहे? यह सवाल अब जनता नहीं कर रही, मीडिया की वह युवा पीढ़ी कर रही है, जो ईमानदारी और मूल्यों की पूंजी ले, सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ मीडिया में आयी है। अपवाद स्वरूप, मौजूद वे वरिष्ठ मीडियाकर्मी, इन सवालों से रू-ब-रू हैं जिन्होंने पत्रकारीय मूल्य और सिद्धांत के साथ कभी समझौते नहीं किए। फिर आज ऐसा क्यों, कि एक समाचारपत्र के मालिक, केंद्रीय मंत्री विलासराव देशमुख ने आरोप लगा दिया कि 'टीवी चैनलों के लोग अपने कार्यालयों में बैठ कर नेताओं को नीचा दिखाने के लिए समूह-चर्चाएं आयोजित कर रहे हैं और यही लोग रात को जमकर शराब पीते हैं'
विलासराव की गिनती सड़क छाप नेताओं में नहीं होती। एक गंभीर राजनीतिक और सुलझे हुए व्यक्ति के रूप में इनकी विशिष्ट पहचान है, चिंतनीय यही है। जब विलासराव मीडिया को नंगा कर रहे हैं तो यह बहस का आग्रही तो है ही। इसके पूर्व, महाराष्ट्र के ही उपमुख्यमंत्री अजित पवार भी सार्वजनिक रूप से 'मीडिया पर अंकुश' की जरूरत बता चुके हैं। विडम्बना यह, कि अजित पवार भी एक समाचारपत्र समूह से जुड़े हुए हैं। ऐसे में, सामान्यजन तो यही कहेगा, कि ये दोनों अपनी बिरादरी अथवा परिवार का 'सच' बयान कर रहे हैं। लेकिन, हमें यह मान्य नहीं।
हां, मीडिया के लिए इसे एक चुनौती के रूप में हम अवश्य स्वीकार करेंगे। चुनौती है विश्वनीयता की। यह एक लांछन है, चरित्र पर दाग है। यह सच है कि एक सड़ी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है, किंतु सच यह भी है कि उसी तालाब में निर्भीक विचरनेवाली मछलियां गंदले-दूषित पानी से ऊपर निकलकर स्वच्छ वायु को ग्रहण भी करती हैं। दलाली संबंधित अतिगंभीर आरोपों के नायिका-नायक बन उभरे बरखा दत्त और वीर संघवी ही मीडिया नहीं है। अल्पसंख्या के बावजूद, पुराने अनुभवी और नये युवा मीडियाकर्मियों की बड़ी पंक्ति, मीडिया के मूल्य व सिंद्धांत की रक्षार्थ चिह्नित की जा सकती है। चूंकि यह वर्ग अंतर्मुखी है, वाचाल नहीं, सुर्खियों में नहीं आ पाता, इनकी उपलब्धियों की चर्चा अपेक्षानुरूप इसलिए भी नहीं हो पाती, क्योंकि महानगरों में लॉबीइंग नहीं हो पाती। इसलिए विलासराव देशमुख के आरोप को या अजित पवार की मांग को हम संपूर्णता में स्वीकार नहीं कर सकते। मैं विलासराव को यह बताना चाहूंगा कि नदी या तालाब की गहराई नापने के लिए उनके तल में पैठने वाले पत्रकार मौजूद है और इन्हीं पत्रकारों के श्रम और निर्भीकता के कारण आज संसार का सबसे बड़ा लोकतंत्र यहां सुरक्षित है। राजनीति के सड़े, गंदले तालाब में उसे खंगालने का काम यही वर्ग तो कर रहा है! लोकतांत्रिक व्यवस्था का दुरुपयोग कर पूरी की पूरी शासकीय व्यवस्था को भ्रष्ट-कलंकित करने वाले चेहरों को बेनकाब यही वर्ग तो कर रहा है? अगर यह नहीं रहते तब निश्चय जानिए भारतीय लोकतंत्र के साथ दिनदहाड़े सड़क-चौराहों पर बलात्कार कर ये राजनीतिक पूरे के पूरे देश को कब का नीलाम कर चुके होते, बेच देते ये भारत देश को। क्योंकि, तब ऐसे बेलगाम शासकों को अंकुश लगानेवाला कोई भी नहीं होता।
मैं यह कह चुका हूं कि मीडिया के तालाब में सड़ी मछलियों की कमी नहीं। लेकिन आभा बिखेरती वैसी स्वच्छ मछलियां भी मौजूद हैं जो पूरी ईमानदारी के साथ लोकतंत्र की अपेक्षा पर खरी उतरती हुई 'वॉच डॉग' की भूमिका में सक्रिय हैं। यह समूह चर्चा आयोजित करते हैं: लोकतंत्र के पायों को मजबूती प्रधान करने के लिए, यह चर्चाएं करते हैं: संविधान बदल नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए, यह चर्चाएं करते हैं अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं। यह चर्चाएं करते है, व्यवस्था को भ्रष्ट बनानेवाली ताकतों यथा-राजनेताओं नौकरशाहों को बेपर्दा करने के लिए। यह वर्ग चर्चा करता है राष्ट्रीय संपत्ति को दोनों हाथों लूटनेवाली राष्ट्रविरोधी ताकतों से मुकाबला करने के लिए। देशमुख या फिर अजित पवार चूंकि मीडिया बिरादरी की उपज हैं, मीडिया समूहों का संचालन करते हैं, वे ऐसे 'सच' से अनभिज्ञ कैसे हो सकते हैंं? किसी मीडियाकर्मी-विशेष या खबर-विशेष से आहत हुआ जा सकता है, किंतु इस कारण मीडिया संसार को लांछित तो नहीं किया जा सकता है। विलासराव देशमुख के शब्दों में व्यक्तिगत पीड़ा का आभास मिलता है उसे दूर किया जाना चाहिए, लेकिन मीडिया की विश्वसनीयता और चरित्र को शराब के एक पेग के कारण संदिग्ध तो नहीं ठहराया जा सकता। बावजूद इसके, आरोप अथवा लांछन पर बहस तो होनी ही चाहिए। विश्वसनीयता की गारंटी तो मीडिया को ही देनी होगी!

Thursday, February 17, 2011

गठबंधन धर्म की आड़ में भ्रष्टाचार, बेईमानी!

जब प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से यह कहे कि गठबंधन धर्म की मजबूरी के कारण वे भ्रष्टाचार को सिंचित करते रहे, अनियमितताओं की अनदेखी करते रहे, हजारों करोड़ों की राष्ट्रीय संपत्ति की लूट को आंख मूंद देखते रहे तो क्या उन्हें पद पर बने रहने का हक है? कतई नहीं। देश ऐसे मजबूर, असहाय व्यक्ति के हाथों में शासन की बागडोर नहीं छोड़ सकता। उन्हें बर्दाश्त करने का अर्थ होगा, भ्रष्टाचार को स्वीकार करना। डॉ. मनमोहन सिंह पर आरंभ से ही कठपुतली और सबसे कमजोर प्रधानमंत्री होने के आरोप लगते रहे हैं। विपक्ष के ऐसे आरोपों को राजनीतिक निरूपित कर मनमोहन सिंह को संदेह का लाभ मिलता रहा। लेकिन अब तो हद हो गई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ऐसा ऐलान करने, स्वीकार करने में तनिक भी संकोच नहीं हुआ कि वे मजबूर है, असहाय हैं। राष्ट्रधर्म की कीमत पर गठबंधन धर्म का पालन करने वाले प्रधानमंत्री भला विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के प्रधानमंत्री कैसे बने रह सकते हैं। व्यक्तिगत रूप से ईमानदार होना, भला होना एक बात है, प्रधानमंत्री के रूप में देश पर शासन करना कुछ और। एक प्रधानमंत्री यह कैसे कह गया कि उसके अपने ही विभाग में लिए गये निर्णय की जानकारी उन्हें नहीं मिली। और जब मिली तब विलंब से। इस विंदु पर पूर्व में जाहिर वह शंका उभर कर सामने आती है कि अनेक महत्त्वपूर्ण संचिकाएं प्रधानमंत्री की जानकारी के बगैर अधिकारी और कतिपय मंत्री कहीं और पहुंचा देते हैं, आदेश या सुझाव वहीं से ले लिए जाते हैं। देवास मल्टीमीडिया को एस बैंड आवंटन की प्रक्रिया में कहीं अधिकारियों ने ऐसा ही कुछ तो नहीं किया। देवास के मुख्य कार्यकारी अधिकारी खुलासा कर चुके हैं कि आवंटन की सारी प्रक्रिया में वरिष्ठ अधिकारी और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री शामिल थे। आश्चर्य है कि इन लोगों ने प्रधानमंत्री को जानकारी क्यों नहीं दी? कहीं वे किसी अदृश्य हाथों के इशारे पर तो नहीं चल रहे थे? भ्रष्टाचार, महंगाई, 2जी स्पेक्ट्रम और एस बैंड आवंटन के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री तक की नियुक्ति में गठबंधन धर्म की आड़ ले स्वयं को मजबूर असहाय बताकर मनमोहन सिंह ने भारत जैसे विशाल देश की शासन व्यवस्था का मजाक उड़ाया है। प्रधानमंत्री पद की गरिमा, मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी की अवधारणा और राष्ट्रहित के साथ खिलवाड़ किया है। हमारा सिर शर्म से झुक गया जब हमने प्रधानमंत्री को गिड़गिड़ाते देखा कि, '...मैंने गलतियां की हैं लेकिन वैसी नहीं, जैसा दिखाया जा रहा है।' शर्म, शर्म! क्षमा करें प्रधानमंत्रीजी!, मीडिया भारत को घोटालों का देश बताकर देश का आत्मविश्वास कम नहीं कर रहा है, बल्कि आत्मनिरीक्षण कर रहा है।
एक तरफ तो आप प्रधानमंत्री को सीजऱ की पत्नी की तरह बेदाग देखे जाने की वकालत करते हैं और दूसरी ओर गलती का इजहार करने के बावजूद पद पर बने रहने की घोषणा भी! आप कैसे प्रधानमंत्री हैं जो नैतिक जिम्मेदारी का एहसास होने की बात तो करते हैं किन्तु अनैतिक कर्मों की पुष्टि के बावजूद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने से साफ इनकार कर जाते हैं। प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लालच का त्याग करने में असमर्थ डॉ. मनमोहन सिंह अपने अतीत के मजबूत पाश्र्व को ही झुठला रहे हैं। अब बहुत हो चुका डॉ. मनमोहन सिंहजी। स्वयं को मजबूर, असहाय प्रधानमंत्री स्वीकार करने के बाद आप को पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं। राष्ट्रधर्म और राजधर्म के पक्ष में या तो मनमोहन सिंह तत्काल इस्तीफा दे दें, या फिर कथित गठबंधन धर्म की मजबूरियों के मुद्दे के साथ जनता की अदालत में जाएं। क्या मनमोहन सिंह इतनी हिम्मत दिखा पाएंगे? शायद नहीं। जो व्यक्ति बगैर जनादेश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर चिपका रह सकता है, उससे ऐसे आदर्श की अपेक्षा ही बेमानी है।

Sunday, February 6, 2011

... तब कोई साबुत नहीं बचेगा!

दु:खद व पीड़ादायक यह नहीं कि केंद्रीय सत्ता का संचालन कर रही यूपीए की भारत सरकार देश की जनता को 'धैर्यवान मूर्ख' मानती है। खतरनाक यह है कि हम अर्थात् भारतवासी स्वयं को पेश ही इसी रूप में कर रहे हैं। फिर क्या आश्चर्य कि भारत सरकार सर्वोच्च न्यायालय में झूठा हलफनामा दायर करती है, संसद में और संसद के बाहर गलत बयानी करती है, महंगाई, भ्रष्टाचार, कालाधन जैसे अतिगंभीर मुद्दों पर देश को गुमराह करती रही है। धिक्कार इस बात पर भी कि केंद्र कि ऐसी चालबाजियों को मदद करनेवाले देश विरोधी लालची हाथ भी समय-समय पर प्रकट हो जाते हैं।
विदेशी बैंकों में जमा भारतीयों के काले धन के मामले में भी केंद्र ऐसे ही राष्ट्रविरोधी खेल को अंजाम दे रही है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कड़ी पूछताछ और कड़ी टिप्पणियों के बाद एक विदेशी बैंक में जमा काले धन के कुछ खाताधारकों के नाम बड़ी धूर्तता के साथ एक पत्रिका के द्वारा 'लीक' करा दिये गये। सर्वाेच्च न्यायालय व देशवासियों की आखों में धूल झोंकते हुए जिस तरह छोटी मछलियों के नाम सार्वजनिक किये गये हैं, उससे यह साबित हो गया कि भारत सरकार बड़ी मछलियोंं को बचाना चाहती है। भारत सरकार का यह कृत्य निश्चयही राष्ट्रविरोधी है। सर्वोच्च न्यायालय यह टिप्पणी कर चुका है कि विदेशी बैंकों में काला धन जमा कराने की कार्रवाई वस्तुत: राष्ट्रीय संपदा की लूट है। अर्थात ऐसे सभी खाताधारक इस लूट के अपराधी हैं। सरकार के ताजा कदम से आम जनता के बीच मौजूद यह शंका और भी बलवती हुई है कि विदेशी बैंकों में बड़े -बड़े राजनेताओं ने काला धन जमा करा रखा है। यह भी कहा जा रहा है कि भारत का वर्तमान शीर्ष राजनीतिक परिवार भी इस अपराध में शामिल है। ऐसे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की क्या हिम्मत कि उनकी सरकार असली अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई कर सके। खेद है कि सरकार की इस कवायद में 'सहयोगी हाथ' (जो मीडिया बिरादरी के हैं) कटघरे में खड़े दिख रहे हैं। यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि जिस पत्रिका में कथित खाताधारकों के नाम प्रकाशित किए हैं, पूर्व के उसके सभी स्टिंग ऑपरेशन कांग्रेस के हित साधनेवाले साबित होते रहे हैं। यह सवाल मौजू है कि वह पत्रिका और उसकी वेब साईट सत्ता में मौजूद व उससे जुड़ी बड़ी मछलियों का स्टिंग क्यों नहीं करती। जब पूरे देश में यह चर्चा जोरों पर है कि नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों ने भी विदेशी बैंकों में खाते खोल रखे हैं तब उनका स्टिंग क्यों नहीं कर रहे हैं वे। रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी के एक पूर्व अधिकारी जब यह सार्वजनिक कर चुके हैं कि स्वयं सोनिया गांधी का विदेशी बैंक में एक पुराना खाता (संभवत: तब अल्प वयस्क राहुल के नाम) मौजूद है , अब तक आरोप की जांच क्यों नहीं हुई। वह पत्रिका क्या इसका कोई स्टिंग करेगी? नीरा राडिया टेप प्रकरण में अनेक बड़े पत्रकारों के नाम दलाल के रूप में सामने आ चुके हैं। इस पाश्र्व में उक्त पत्रिका और वेबसाईट की भूमिका संदिग्ध है। ध्यान रहे देश की युवा पीढ़ी अब सतर्क हो, सभी राष्ट्रविरोधी हरकतों पर नजरें रख रही हैं। देश की वर्तमान विकृत छवि पर यह वर्ग चिंतित है। मिस्त्र की घटना पर उसकी निगाहें हैं। 70 के दशक के जन आंदोलन के पन्नों को वह उलट रही है। जिस दिन वर्तमान भ्रष्टाचार व कुशासन के खिलाफ लडऩे को तैयार कोई 'जननायक' उसे मिल जाएगा, युवापीढ़ी 'जनयुद्ध' का ऐलान कर देगी। और तब निश्चय मानें, राष्ट्रिय शुद्धिकरण की प्रक्रिया में कोई भी 'दागदार' साबुत नहीं बचेगा।

अब ऐलान हो जाए 'जनयुद्ध' का!

यह भी खूब रही! विद्वान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को अब इस बात का एहसास हुआ है कि भ्रष्टाचार से भारत की छवि को नुकसान पहुंचा है। बेचारे प्रधानमंत्री ! जब पूरे देश में शीर्ष सत्ता और नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार पर कोहराम मचादो है, गली-कूचों में आम आदमी भी आक्रोश व्यक्त कर रहा है, भारतीय संसद ठप की जा रही हो, मंत्री और मुख्यमंत्री के खिलाफ मामले दर्ज हो रहे हों, केंद्रीय मंत्रियों से इस्तीफे लिए जा रहे हों, विदेशी बैंको में भारतीयों द्वारा अकूत धनराशी जमा कराई जा रही हो, स्पेक्ट्रम जैसे घोटाले से एक झटके में पौने दो लाख करोड़ के वारे-न्यारे हो जाएं, राष्ट्रमंडल खेलों में दिन दहाड़े लूट की खबरें गुंजायमान हो, तब देश की छवि साबुत कैसे रह सकती है? भ्रष्टाचार संबंधी गतिविधियों पर वर्षों मौन रहनेवाले प्रधानमंत्री के ज्ञानचक्षु अब खुलते हैं और उन्हें समझ में आता है कि भ्रष्टाचार सुशासन की जड़ पर प्रहार करता है, विकास की दिशा में रुकावट है! कारण साफ है। गठबंधन राजनीति के 'अधर्म' को सींचित कर सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से समझौते किए। कहीं उन्होंने आंखे मूंद रखीं, तो कहीं समर्पण कर भ्रष्ट आचरण-निर्णय के भागीदार बनते रहे। ऐसे में उनके मुख से निकले उपदेश उन्हें हास्यास्पद बना देते हैं, बहुरुपिया बना देते हैं। घोर गैर राजनीतिक प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह अगर मजबूर हैं तो अपनी सत्ता वासना की पूर्ति के पक्ष में। सत्ता सुख का त्याग वे करना नहीं चाहते। देश की छवि को रसातल में पहुंचाने के बाद छवि की चिंता! बेहतर हो, सत्य को स्वीकार कर देशहित के पक्ष में वे सत्ता बंधन से मुक्त हो जाएं। अन्यथा ए. राजा और सुरेश कलमाड़ी की तरह एक दिन वे स्वयं को बलिवेदी पर निरीह लेटे पायेंगे।
भारत की विशाल आबादी के साथ सत्तापक्ष का ऐसा छल अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सत्ता की राजनीति करनेवाले इस संभावना की उपेक्षा न करें। केंद्रीय सत्ता का संचालन कर रहे संयुक्त प्रगतीशील गठबंधन (यूपीए)की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी देश के साथ ऐसा ही छल कर रही हैं। सोनिया न तो संत हंै और न ही दार्शनिक! फिर इनके सदृश अभिनय क्यों? उन्होंने सत्ता और धन के लिए अंधी दौड़ पर चिंता जताई है। कहा है कि जीवन में धन ही सबकुछ नहीं होता, सत्ता ही सबसे बड़ा सुख नहीं। गांधी और विवेकानंद के ये शब्द सभी के मुख को अच्छे नहीं लगते। ऐसे में शब्द दमित हो जाते हैं, शब्द अपमानित हो जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि सोनिया गांधी के इन शब्दों का कोई खरीदार सामने नहीं आया। आज देश त्रस्त है, संतप्त है तो भ्रष्टाचार के दानव से। इस दानव की उत्पत्ति नई नहीं, किंतु आजादी के 64 वर्षों में इसे फलने-फूलने के लिए आवश्यक ऊर्जा क्या इन्हीं भ्रष्ट सत्ताधारियों और नौकरशाहों ने नहीं दी? स्वीस बैंक के डायरेक्टर ने जानकारी दी है कि लगभग 280 लाख करोड़ रुपए भारतीयों ने स्वीस बैंकों में जमा करा रखे हैं। क्या यह दोहराने की जरुरत है कि यह विशाल धनराशि राष्ट्रीय संपत्ति की लूट से परिवर्तित काला धन है। जरा गौर करें। 200 साल के शासनकाल के दौरान अंग्रेजों ने 1 लाख करोड़ लूटा था। और अब आजादी के बाद 64 सालों में 280 लाख करोड़! इस मोर्चे पर विदेशी अंग्रेजों को मात देनेवाले आजाद भारत के हमारे शासक, नौकरशाह, उद्योगपति किसी भी दृष्टि से राष्ट्रहित चिंतक नहीं कहे जायेंगे। इतिहास इन्हे राष्ट्रद्रोही के रूप में दर्ज करेगा। मिस्त्र में जारी 'जनयुद्ध' एक संकेत है। 80 के दशक में इरान के शाह को ऐसे ही जनयुद्ध ने सत्ता छोड़ पलायन के लिए मजबूर कर दिया था। मिस्त्र के होस्नी मुबारक को भी संभवत: ऐसे ही हश्र से रुबरु होना पड़े। कुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता जब सड़क पर उतरती है तब राष्ट्रकवि (स्व.)रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां, ''... सिंहासन खाली करो, कि जनता आती है...'' साकार हो उठती हैं। धन और सत्ता की अंधी दौड़ पर चिंता व्यक्त करनेवाली सोनिया को चाटुकारों ने भले ही त्याग मूर्ति बना डाला हो, वास्तविकता से सारा देश परिचित है। आम जनता का धैर्य अब टूटने लगा है। पिछले दिनों, एक दिन के लिए ही सही, भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की जनता सड़कों पर उतरी थी। वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ वह आयोजन 'जनयुद्ध' का पूर्व संकेत था। जनता कालरात्रि की समाप्ति चाहती है। उसे अब इस बात का पुन: एहसास हो गया है कि क्रांति और परिवर्तन की आवश्यकता आज बाहर से नहीं, स्वयं हमारे भीतर है। व्यक्ति का स्थान ले चुके समूह को चुनौतियां मिलनी शुरु हो चुकी हैं। व्यक्ति की अहमियत को रेखांकित करने के लिए समाज अंगड़ाई लेने लगा है। जोड़-तोड़ कर सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे शासक यह न भूलें कि विश्व की प्राय: सभी वैचारिक क्रांतियां मात्र अकेले व्यक्तियों के कारण ही सफल हुई हैं। अब चुनौती है भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर जन का। वे अब और प्रतीक्षा न करें। भ्रष्टाचार के लिए स्वयं को जिम्मेदार मान सत्ता त्याग कर जन अदालत का सामना करने की जगह शासक अब ढोंगी संत-दार्शनिक की भूमिका में आ गए हैं। ऐसे में और विलंब नहीं! निर्णय की घड़ी मान 'जनयुद्ध' का ऐलान कर दिया जाए! परिणति के रुप में तब शासन-समाज निश्चय ही स्वच्छ छवि के साथ अवतरित होगा।'

Sunday, January 30, 2011

नकली नहीं, असली गांधी बनें राहुल!

राहुल गांधी फिर भ्रमित दिख रहें हैं। कारण साफ है। सलाहकार चाहते ही हैं कि राहुल यूं ही भ्रमित दिखते रहें। जी हाँ, कांग्रेस संस्कृति का यह एक ऐसा पीड़ादायक सच है जिससे पूरा देश परिचित है। नेहरु युग के आरंभिक काल में पुत्री इंदिरा गांधी के साथ भी ऐसा ही हुआ था। तब इंदिरा गांधी को सलाहकारों ने लोकतंत्र को हाशिए पर रखकर निर्मम राजनीति का पाठ पढ़ाया था। हश्र इतिहास में दर्ज है। पॉयलट की नौकरी के दौरान स्वयं को राजनीति से कोसों दूर रखने का लगातार ऐलान करते रहनेवाले राजीव गांधी को जब प्रधानमंत्री के रुप में देश पर थोपा गया था, तब उनकी 'मिस्टर क्लीन' की छवि को सलाहकारों ने कुछ ऐसी गति दी कि जनता ने भ्रष्टाचार का मेडल उनके सीने पर जड़ कर अगले ही चुनाव (1989) में सत्ताच्यूत कर दिया था। फिर इंदिरा गांधी की तरह उन्हें भी जान की कुर्बानी देनी पड़ी थी। कांग्रेस दरबार के चाटुकारों ने तब सोनिया गांधी को घेरने की कोशिश की। सास और पति की 'कुर्बानी' से डरी-सहमी सोनिया ने तब सत्ता और संगठन से स्वयं को दूर रखा। चाटुकार फिर भी सक्रिय रहे। नेहरु-गांधी परिवार के अस्तित्व-भविष्य की दुहाई देकर वे सोनिया को कांग्रेस संगठन में लाने में सफल रहे। तब कवायद ऐसी हुई कि कांग्रेस के निर्वाचित अध्यक्ष सीताराम केसरी को बाथरुम में बंद कर सोनिया को अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठा दिया गया था। तब लोकतांत्रिक पद्धति से इतर कांग्रेस की विशिष्ट संस्कृति की विजय हुई थी। आज जब सोनिया पुत्र राहुल गांधी यह कहते फिर रहे हैं कि राजनीतिक दलों में लोकतंत्र नहीं है और कंाग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जहाँ आंतरिक लोकतंत्र है, तब टेढ़ी भौंह के साथ देश सवाल तो पूछेगा ही।
महाराष्ट्र का दौरा कर रहे राहुल गांधी वंशवाद के खिलाफ भी मुखर हैं। ऐलान करते फिर रहे हैं कि पार्टी में अब भाई-भतीजावाद नहीं चलेगा। वंशवाद के कारण योग्य पात्र अवसर से वंचित रह जाते हैं। दल में काम करनेवाले समर्पित लोगों को प्राथमिकता दी जाएगी। इस मुकाम पर स्वाभाविक सवाल यह कि जो राहुल गांधी स्वयं पार्टी में वंशवाद की पौध हैं, क्या वे मजबूती से जड़ जमा चुकी कांग्रेस की इस परंपरा को बदल पायेंगे? वैसे राहुल ने स्वीकार किया है कि वे स्वयं 'मजबूत राजनीतिक पारिवारिक पाश्र्व' के कारण ही इस मुकाम पर पहुंचे हैं। मैं यहां राहुल की नीयत पर संदेह का लाभ देने को तैयार हूं। हां, शर्त यह अवश्य कि वे स्वयं को वचन के प्रति ईमानदार प्रमाणित करें, आदर्श स्थापित करें। इसके लिए उन्हें सोनिया गांधी के 'त्याग' से अलग 'वास्तविक त्याग' करना होगा। सत्ता-शासन से आजीवन दूर रहने की घोषणा करनी होगी। नि:स्वार्थ देश सेवा का व्रत लेना होगा। जिस गांधी शब्द को उन्होंने अपने नाम साथ जोड़ रखा है तब उसकी सार्थकता प्रमाणित हो आदर्श के रुप में स्थापित होगी, पवित्रता कायम रहेगी। क्या राहुल इसके लिए तैयार हैं? भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए जिस तंत्र को बदलने का आह्वान राहुल कर रहे हैं, वर्तमान तंत्र का हिस्सा बनकर कभी नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी इस सचाई को जान लें कि आज उनकी कांग्रेस पार्टी जिस प्रकार वंशवाद की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्हें देश का भावी प्रधानमंत्री के रुप में पेश कर रहीं है, वह स्वयं उनके नए 'अवतार' को चुनौती है।
बावजूद इसके अगर वे सचमुच भ्रष्ट व्यवस्था की समाप्ति चाहते हैं, वंशवाद के खिलाफ लोकतांत्रिक पद्धति को अपनाना चाहते हैं, जाति-धर्म-क्षेत्र-परिवार से अलग सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना चाहते हैं तो उन्हें 'नकली गांधी' नहीं 'असली गांधी' के सच्चे अनुयायी के रुप में सामने आना होगा।
तब देशवासी सभी दु:खद, विरोधाभासी शब्द-प्रसंग भूल जायेंगे। गलती का एहसास कर समझदार सुधार कर लेते हैं। और जब बात व्यापक समुदाय-संगठन की हो तब 'आदर्श पहल' की जाती है। अर्थात् संबंधित व्यक्ति अपने कर्म से पहले स्वयं को नि:स्वार्थ, समाज के प्रति समर्पित साबित कर आदर्श स्थापित करता है। लोगों का विश्वास अर्जित करता है। समाज की नजरों में अगर वह 'सेवक' दिखा तब अनुसरण में करोड़ों पग कदमताल करने लगते हैं। आजादी पूर्व महात्मा गांधी और आजादी पश्चात् जयप्रकाश नारायण ऐसे 'आदर्श पुरुष' के रुप में स्थापित हो चुके हैं। राहुल गांधी अगर मन-वचन-कर्म से स्वयं को आदर्श प्रवर्तक के रुप में स्थापित करना चाहते हैं तो चुनौती है उन्हें कि वे पहले सत्ता-शासन से दूर नि:स्वार्थ देश सेवा का व्रत लें। देशवासी उन्हें अपने कंधों पर बिठा लेंगे। क्या राहुल इसके लिए तैयार होंगे???

Sunday, January 23, 2011

प्रधानमंत्रीजी! धिक्कार है आपके भारतीय होने पर!

क्या हो गया है हमारे देश के विद्वान प्रधानमंत्री को! क्या वे किसी दबाव में हैं? किसी अदृश्य ताकत के हाथों की कठपुतली तो नहीं बन गए हैं? ऐसे असहज सवाल से आज पूरा देश रूबरू है। शंका के आधार मौजूद हैं। भला भारत जैसे लोकतांत्रिक देश का प्रधानमंत्री अपने ही देश के एक प्रदेश में राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराने के उपक्रम को 'राजनीति' से कैसे जोड़ सकता है? गणतंत्र दिवस पर देश के एक भाग में कोई तिरंगा फहराना चाहता है तो वह विभाजनकारी एजेंडा कैसे हो गया? प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को इसका जवाब देना होगा। वे स्पष्ट करें कि उनकी पार्टी और सरकार जम्मू-कश्मीर को भारत का अंग मानती है या नहीं? यह जिज्ञासा दु:खदायी तो है किंतु इसके लिए प्रेरित स्वयं प्रधानमंत्री ने किया है। भारतीय जनता पार्टी की युवा शाखा द्वारा श्रीनगर के लाल चौक पर गणतंत्र दिवस के दिन तिरंगा फहराने के कार्यक्रम पर आपत्ति जड़ प्रधानमंत्री ने राष्ट्रविरोधी अलगाववादी ताकतों का साथ दिया है। डॉ. मनमोहन सिंह जैसा प्रधानमंत्री पद पर आसीन विद्वान व्यक्ति अनजाने में तो ऐसी टिप्पणी नहीं कर सकता। सो इन्हें संदेह का लाभ भी नहीं मिल पाएगा। तिरंगा फहराने के कार्यक्रम को 'राजनीतिक फायदा' निरूपित कर उन्होंने वस्तुत: स्वयं राजनीति की हैं। जम्मू-कश्मीर के मामले में संयम बरतने की उनकी सलाह प्रधानमंत्री पद की गरिमा के विपरित है। इस क्रम में वे अपनी पार्टी द्वारा बार बार देश की एकता और अखंडता के पक्ष में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कुर्बानी की याद दिलाए जाने की बात भूल गए। वे भूल गए कि उनका प्रदेश पंजाब जब अलगाववादी आतंक की आग में झुलस रहा था तब इंदिरा गांधी ने कड़े कदम उठाते हुए अलगाववादियों को कुचल डाला था। परिणति के रूप में उन्हें अपने प्राण गंवाने पड़े थे। शहीद हो गई थीं वे। फिर आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों के समक्ष घुटने क्यों टेक रहे हैं। तिरंगा फहराने का विरोध कर वे जम्मू कश्मीर को भारत से अलग चिन्हित कर रहे हैं। निश्चय ही इससे पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों की बांछें खिल गई होंगी। यही तो चाहते हैं वे। क्या प्रधानमंत्री चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर अंतरराष्ट्रीय विवाद का मुद्दा बन कालांतर में भारत के एक और विभाजन का कारण बने। अगर प्रधानमंत्री की ऐसी नीयत है तब न तो उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने का हक है और न ही भारतीय। क्या वे ऐसी अवस्था के लिए तैयार हैं? अगर हां, तो वे तत्काल प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर किसी और देश में शरण ले लें। अगर नहीं, तो वे देश से क्षमा मांग ले और तिरंगा फहराए जाने का विरोध करने वाले जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार को तुरंत बर्खास्त कर दें। उमर के पिता फारूख अब्दुल्ला को केंद्रिय मंत्रिमंडल से निकाल बाहर कर दोनों पिता-पुत्र को गिरफ्तार कर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाएं। जब विनायक सेन देश के नक्सवादियों से संपर्क रखने के कारण राष्ट्रद्रोही घोषित कर दंडित किए जा सकते हैं, तब विदेशी आतंकवादियों के मनसूबों का साथ देने वाले क्यों नहीं? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो क्षमा करेंगे, देशवासी धिक्कारेंगे प्रधानमंत्री भारतीय होने पर!

Saturday, January 22, 2011

जिसके पास 'बोफोर्स' वही राजा, वही रानी!

पूरे संसार के काले धन अर्थात बेईमानी के धन को अपने यहां सहेजकर रखनेवाला स्वीटजरलैंड धरती के स्वर्ग के रुप में विख्यात है। फिर इस कहावत पर चकित क्या होना कि बेईमानी का धन रखनेवाले ही फलते-फूलते हैं। ईमानदार पसीना बहाते रहें, खून सुखाते रहें, समाज में वे दीन-हीन ही बने रहते हैं। ईमानदार के रूप में कोई अगर चर्चित हुआ, तो पीठ पीछे उसे मूर्ख या विदूषक निरुपित करनेवालों की संख्या गिनी नहीं जा सकती। इस विलाप को किसी ओर ने नहीं स्वयं हमारे महान देश के ईमानदार अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आंमत्रित किया है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 21 लाख हजार करोड़ रुपए काले धन के रुप में हमारे देश के कुछ महान लोगों ने विदेशी बैंकों में जमा करवा रखे हैं। इस धन को भारत वापस लाने और जमाकर्ताओं पर कार्रवाई करने की मांग संबंधी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी से बेचैन केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में चर्चा हुई। कुछ मंत्रियों की जिज्ञासा पर सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामा के अनुरुप ही प्रधानमंत्री ने दो-टूक शब्दों में कह डाला कि सरकार के पास काले धन जमा करानेवालों के नाम तो उपलब्ध हैं किंतु वे बतायेंगे नहीं। दलील वही पुरानी कि खातों के बारे में जानकारी बाहरी सरकारों ने इसी शर्त पर उपलब्ध कराई है कि उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए जायेंगे। अगर उन नामों का खुलासा कर दिया तब भविष्य में विदेश की कोई सरकार हमें ऐसी जानकारी नहीं देगी। हां, सरकार इन लोगों से टैक्स अवश्य वसूलेगी। सरकार की ओर से बार-बार दिए जा रहे तर्क को स्वीकार करने को देश तैयार नहीं। भारत सरकार का रवैया बिल्कुल हास्यास्पद है, बल्कि देशहित के खिलाफ है। विदेशी बैंको में जमा काले धन को टैक्स चोरी के रुप में लेकर भारत सरकार आखिर क्या संदेश देना चाहती है। कहीं यह तो नहीं कि चोरी-डकैती करते रहो, सिर्फ टैक्स भर दो, अपराध माफ !!! यह तो चोरी-डकैती रोकने की जगह उसे बढ़ावा देना हुआ। काले धन को जप्त करने, खाताधारकों को जेल भेजने की जगह उनसे टैक्स मात्र वसूल करने की बात करनेवाली सरकार देश की अर्थव्यवस्था को चौपट नहीं कर रही? जिस कथित संधि की आड़ में सरकार देश को लुटनेवालों का बचाव कर रही है, उस संधि को तोड़ क्यों नहीं दिया जाता? विदेशी बैंक कालाधन जमा करनेवालों की गोपनीयता संबंधी शर्त तब स्वत: तोड़ देंगे, और तब भारत सरकार विदेशी बंैकों को वहां की सरकारों के माध्यम से कह सकती है कि वे भारतीयों के खाते या तो न खोलें या भारत सरकार की पूर्वानुमति ले लें। पारदर्शिता की ऐसी अवस्था में राष्ट्रीय संपत्ति को लूटनेवाले विदेशी बैंकों का सहारा ले ही नहीं पायेंगे। भारत के उपर विदेशी कर्ज से लगभग 13 गुना अधिक विदेशी बैंको में जमा भारतीय काला धन क्या इस बात का आग्रही नहीं कि उसे तत्काल भारत वापस लाया जाए? इस प्रक्रिया में किसी भी तकनीकी अड़चन या संधि को सरकार स्वीकार न करें। बकौल सुप्रीम कोर्ट जब यह विशाल धनराशि राष्ट्रिय संपत्ति है, जिसे लुटा गया है, तब सभी कथित बंधनों को तोड़ यह धन भारत वापस लाया ही जाना चाहिए। भारत सरकार जिस प्रकार काले धन के अपराधियों का बचाव कर रही है उससे अनेक गलत संदेश समाज में जा रहे हैं। पूरे देश में चर्चा गरम है कि विदेशों में जमा काला धन किसी और के नहीं बल्कि राजनीतिक दलों एवं सत्ता से जुड़े बड़े-बड़े नेताओं, नौकरशाहो और बड़े व्यापारियों का है। लोग तो अब खुलकर यह भी कहने लगे हैं कि देश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार सहित विपक्ष के भी बड़े नेताओं ने विदेशों में कालेधन जमा करा रखे हैं। ऐसी अवस्था में देश सचाई जानना चाहेगा। सत्ता-शासन की कमान संभाल रहे लोग लोकप्रतिनिधि हैं, कोई राजा या रानी नहीं। वे सभी लोक अर्थात जनता के प्रति जिम्मेदार हैं। फिर जनता को अंधकार में क्यों रखा जा रहा है? यह सरकार की ढुलमुल व रहस्य पूर्ण आचरण ही है कि लोग-बाग अब यह मान बैठे हैं कि जिसके पास जितना बड़ा 'बोफोर्स', वही राजा और वही रानी! क्या प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इस मंतव्य पर सरकारी मुहर लगाना चाहेंगे? देश को जवाब चाहिए।

Thursday, January 20, 2011

देशद्रोही हैं काले धन के ये व्यापारी !

यह समझ से बिलकुल परे है और अनेक संदेहों का आमंत्रक है। आखिर भारत सरकार देश के खजाने को लूट विदेशी बैंकों में जमा कराने वाले 'डकैतों' के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं करना चाहती? शासन में पारदर्शिता का तो तकाजा है ही, लोकतांत्रिक अपेक्षा भी है कि सरकार उन 'डकैतों' के नाम न केवल सार्वजनिक करे, उन्हें कठोर दंड भी दे। देश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि उनकी खून-पसीने की कमाई को लूटनेवाले कौन है! उनके सफेद धन को काले धन में परिवर्तित कर विदेशी बैंको में जमा करानेवाले राष्ट्रद्रोही कौन हैं? देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करनेवाले नकाबपोश आखिर हैं कौन? पूरे संसार में भारत देश को भ्रष्टतम की श्रेणी में रखनेवाले लोगों के चेहरों को सरकार बेनकाब क्यों नहीं करना चाहती? निश्चय ही केंद्र सरकार का यह रवैया देशहित के विरुद्ध है।
सर्वोच्च न्यायालय में सरकार की ओर से कहा गया कि वह विदेशी बैंकों में पैसे जमा करानेवालों के नाम कोर्ट को तो बता सकती है। मगर सार्वजनिक नहीं कर सकती, देश स्तब्ध रह गया। साफ है कि सरकार की नीयत में खोट है। यह तो सभी समझते हैं कि विदेशी बैंकों में धन कोई साधारण व्यक्ति जमा नहीं करा सकता। ऊंची पहुंच वाले, सामथ्र्यवान ही ऐसा कर सकते हैं। सरकार की हिचक का कारण भी स्पष्टत: यही है। वह ऐसे प्रभावशाली लोगों को बचाना चाहती है। यह न केवल सामथ्र्यवानों का बचाव है बल्कि राष्ट्रद्रोही हरकत भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन राष्ट्रीय संपत्ति की लूट है। ऐसे लुटेरों को आखिर भारत सरकार सामने क्यों नहीं लाना चाहती? सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे काले धन के आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने की आशंका जगाकर मामले को और भी गंभीर बना दिया है। अगर आतंकवादियों द्वारा ऐसे धन के इस्तेमाल की बात पुष्ट होती है, तब क्या स्वयं भारत सरकार आतंकवादियों की सहयोगी नहीं बन जाएगी? वैसी स्थिति में निश्चय ही सरकार सत्ता में बने रहने का हक खो देगी। अपराधी कही जाएगी वह! आरोप है कि स्विस बैंकों में लगभग 21 लाख हजार करोड़ रुपए की राशि कुछ भारतीयों के नाम जमा है। क्या यह बताने की जरूरत है कि इस राशि के भारत में वापस लाए जाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था सकारात्मक करवट ले विकास के क्षेत्र में क्रांति पैदा कर देगी! धनाभाव में रुकी योजनाएं दु्रत गति से अपने लक्ष प्राप्त कर लेंगी! इसी बात का तो अचरज है कि इन सब बातों की जानकारी के बावजूद भारत सरकार काले धन के अपराधियों का अब तक बचाव करती रही है। भारत सरकार की 'सीमा' संबंधी दलीलें किसी के गले उतरने वाली नहीं। देश हित के मार्ग में किसी सीमा, किसी संधि को स्वीकार नहीं किया जा सकता। साफ और सीधी बात यह है कि काले धन के इन व्यापारियों का बचाव कर सरकार देश के साथ छल कर रही है। खोट भरी अपनी नीयत से देश का अहित कर रही है। किसी लोकतांत्रिक देश के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को ऐसा अधिकार कतई नहीं। अब भी समय है, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश-अपेक्षा को राष्ट्रीय भावना समझ भारत सरकार अविलंब राष्ट्रीय संपत्ति को लूटनेवाले चेहरों को बेनकाब कर दे। अन्यथा दुखित-पीडि़त लोकतंत्र ने अगर अंगड़ाई ले ली तो उसके नीचे वे दब-कुचल जायेंगे।

Saturday, January 15, 2011

फिर फिसले मुलायम-बुखारी!

चलो, यह भी खूब रही। राजनीति के अखाड़े में तेजी से हाशिए की ओर बढ़ रहे मुलायम सिंह यादव को फिर बांग देने का मौका मिल गया। दिल्ली में जंगपुरा में अवैध रूप निर्मित नूर मस्जिद को प्रशासन ने ध्वस्त किया नहीं कि मुलायम की धर्मनिरपेक्षता ने जोर मारा और उन्हें अचानक अयोध्या के विवादित बाबरी ढांचे की याद आ गई। बिहार विधानसभा चुनाव में लालू यादव के हश्र को देखते हुए बेचैन मुलायम नूर मस्जिद में अपने लिए नूर ढूंढऩे लगे। ताबड़तोड़ कांग्रेस पर मुस्लिम विरोधी होने का आरोप मढ़ दिया। मरहूम राजीव गांधी को कोस डाला कि उन्होंने वर्षों से बंद अयोध्या राम मंदिर का ताला क्यों खुलवा दिया था और नरसिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में कथित बाबरी मस्जिद कैसे ढहा दी गई। मुसलमानों के मौलिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए मुलायम कट्टरपंथी मौलाना बुखारी की शरण में पहुंच गए। कांग्रेस को संाप्रदायिक सौहार्द्र बिगाडऩे का दोषी करार देने वाले मुलायम के लिए मेरे दिल में सहानुभूति उमड़ रही है। उनके शब्दों का कोई खरीददार जो सामने नहीं आ रहा है। लेकिन देशहित के प्रति यह एक शुभ संकेत है। अयोध्या के राम मंदिर-बावरी मस्जिद विवाद पर अदालती फैसला आने के बाद सभी पूर्व आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए देश की हिंदू-मुस्लिम आबादी ने जिस प्रकार संयम का परिचय दिया था, ठीक इसी प्रकार के संयम का परिचय दिल्लीवासियों ने दिया। अन्यथा मुलायम-बुखारी की मंशा तो दिल्ली ही नहीं, पूरे देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक देने की थी। लेकिन यह ताजा प्रकरण सिर्फ मुलायम-बुखारी तक सीमित नहीं है। स्वयं को धर्मनिरपेक्षता का झंडाबरदार व अल्पसंख्यकों का हितैशी बताने वाली कांगे्रस नेतृत्व से मैं यह पूछना चाहूंगा कि दिल्ली प्रदेश की कांग्रेसी सरकार की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अदालती आदेश पर अवैध मस्जिद को गिराने के बाद भी लोगों को उस जमीन का इस्तेमाल करने और वहां नमाज अदा करने के लिए जामा मस्जिद के शाही इमाम सय्यद अहमद बुखारी के साथ मिलकर लोगों को हिंसक रूप से भड़काने की कोशिश क्यों की? धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के विपरीत क्या शीला सांप्रदायिक राजनीति नहीं कर रही हैं? जंगपुरा क्षेत्र के लोग गवाह हैं शीला दीक्षित की कानून विरोधी हरकत की और सांप्रदायिकता को हवा देने की। अगले वर्ष पड़ोसी उत्तर प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनाव में सांप्रदायिक आधार पर अगर शीला अपनी कांग्रेस पार्टी के लिए जमीन तैयार करने की मंशा रखती हैं तो बेहतर है वे बिहार चुनाव की याद कर लें। बिहार के जागरूक मतदाता ने सभी सांप्रदायिक ताकतों और बाहुबलियों को उनकी औकात बता दी थी। अब का युवा मतदाता तो सांप्रदायिक आधार पर समाज को बांटने वाले तत्वों से घृणा करने लगा है। सभी राजनीतिक दल इस सचाई को जान लें, विशेषकर कांग्रेस। क्योंकि यह कड़वा सच इतिहास में दर्ज है कि आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी मुसलमानों का इस्तेमाल एक वोट बैंक के रूप में करती रही है। पार्टी ने उस वर्ग को राष्ट्र की मुख्यधारा से दूर रखा। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष बता दिखावे के लिए यदा-कदा बड़े ओहदे उन्हें दिए गए लेकिन अल्पसंख्यंकों के उत्थान के लिए न तो कभी गंभीर प्रयास हुए न ही उन्हें अपेक्षित सम्मान मिला। इन तथ्यों की मौजूदगी के बावजूद अगर शीला दीक्षित अल्पसंख्यकों को दिल जीतने के लिए अदालत की अवमानना करती हुईं ढहा दिए गए अवैध मस्जिद के पक्ष में खड़ी होती हैं तो शायद कांग्रेस की चाटुकार नीति से मजबूर होकर ही। संभवत: वे याद कर रही होंगी राहुल गांधी के उस बयान की जो उन्होंने उत्तर प्रदेश के पिछले चुनाव में दिया था। तब कथित चुनाव में दिया था। तब कथित मुस्लिम तुष्टीकरण के उपक्रम को आगे बढ़ाते हुए राहुल गांधी ने कहा डाला था कि अगर नेहरू-गांधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता तो बाबरी विध्वंस नहीं होता। राहुल का वही वक्तव्य शीला की परेशानी का सबब बना है। इस बार मस्जिद उस दिल्ली में गिराई गई जहां सरकार कांग्रेस की है और शीला दीक्षित मुख्यमंत्री हैं। बेचारी शीला अल्पसंख्यक समाज में मौजूद कट्टरपंथियों को यह तो नहीं बता सकतीं कि इसके लिए जिम्मेदार भाजपा-संघ परिवार अथवा शिवसेना है। अब यह कोई न कहे कि बाबरी मस्जिद तो बड़ा था, नूर मस्जिद छोटा है। मस्जिद या मंदिर छोटे-बड़े नहीं होते। आस्थाएं तो सड़क किनारे पड़े एक पत्थर में भी ईश्वर-अल्लाह ढूंढ़ लेती हैं।

काले धन के ये काले संरक्षक!

एक सीधा सवाल देश के हुक्मरानों से! कहां गई उनकी बहुप्रचारित शासन में पारदर्शिता? कथित रूप से पारदर्शिता लाने का श्रेय लेने वाली भारत सरकार जवाब दे कि जब चोर सामने हैं, उनके नाम-पता की पूरी जानकारी उन्हें है, तब फिर उनके पैर-हाथ में हथकडिय़ां क्यों नहीं डाली जा रहीं? उन्हें कटघरे में खड़ा क्यों नहीं किया जा रहा? अगर सचमुच हमारी एक लोकतांत्रिक सरकार है, पारदर्शी सरकार है तब निश्चय ही देश की जनता को इन चोरों के नाम-पते जानने का हक प्राप्त है। भारत सरकार इस अधिकार से जनता को वंचित क्यों कर रही है? देश को विश्वास में क्यों नहीं लिया जा रहा है? हमें जवाब चाहिए। विदेशी बैंकों में कालाधन रखने वाले भारतीयों के खिलाफ कार्रवाई और वैसे धन की भारत वापसी संबंधी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और फिर देश की जनता यह जानकर हतप्रभ रह गई कि कम से कम जर्मन सरकार वहां की बैंकों में काले धन जमा करवाने वाले भारतीयों की सूची तो भारत सरकार को उपलब्ध करा चुकी है, किन्तु सरकार किन्हीं कारणों से उसे सार्वजनिक नहीं कर रही है। क्या यह पारदर्शिता के सिद्धांत के अनुरूप है? कदापि नहीं। स्वयं सुप्रीम कोर्ट हैरान है कि नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जा रहे हैं। उनके नाम सार्वजनिक कर दिए जाने चाहिए। बावजूद इसके भारत सरकार हिचक रही है। उसका कहना है कि जर्मनी के साथ एक संधि के तहत वे उन नामों को सार्वजनिक नहीं कर सकते। सरकार की इस दलील को देश स्वीकार नहीं करेगा। यह कैसी संधि जो अपने देश के पैसे को कालाधन बना विदेशी बैंकों में जमा करवाने वालों को संरक्षण प्रदान करे! यह तो न केवल ऐसे काले धन धारकों का बचाव है बल्कि देश के साथ विश्वासघात भी है। देश के कानून के साथ धोखा भी है यह। पूरी की पूरी न्याय प्रक्रिया को ठेंगा दिखा भारत सरकार इन चोरों को बेनकाब करने से आखिर क्यों हिचकिचा रही है? लगभग 20 लाख करोड़ रुपए को काला धन बना विदेश भेज देने वाले लोग देशद्रोही ही तो हैं। काले धन से समानान्तर अर्थव्यवस्था का संचालन करने वाले ऐसे 'कालिए' ही देश की चरमराती अर्थव्यवस्था के जिम्मेदार हैं। ध्यान रहे, यह मामला केवल टैक्स चोरी का नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को चूर-चूर करने का षड्यंत्र है। यह एक ऐसा गंभीर विषय है जिसका दायरा व्यापक है। फिर इन्हें दंडित किए जाने की जगह सरकार संरक्षण प्रदान क्यों कर रही है? देश के अर्थशाी प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह इस मामले की गंभीरता व दुष्परिणाम से अनजान नहीं हो सकते। चूंकि विदेशी बैंकों में भारतीय खाताधारकों के नाम सरकार को मिल गए हैं, अविलंब मामले दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया जाए। कुछ दिनों पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्रालय की ओर से आश्वासन दिया गया था कि काले धन के राज से पर्दा उठा कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन विगत कल शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जिस प्रकार खाताधारकों को संरक्षण प्रदान करने की कोशिश की, उससे निराशा हुई है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से ऐसी आशा बंधी है कि अंतत: सरकार झुकेगी और काले धन के पोषकों के चेहरों से नकाब उतर जाएंगे। अगर सरकार सचमुच देश की सुदृढ़ अर्थव्यवस्था के पक्ष में विदेशों में जमा काले धन को वापस भारत लाने में सफल रहती है, खाताधारकों को दंडित करती है तब वह देश हित में अपनी अच्छी नीयत को रेखांकित करेगी। अगर ऐसा नहीं हुआ तो शासक वर्ग यह हृदयस्थ कर ले कि देश की जनता वैसे अपराधियों के साथ-साथ उन्हें संरक्षण प्रदान करने वाली सरकार को दंडित करने में भी सक्षम है।

Friday, January 14, 2011

चोरों की बारात का दूल्हा!

पागल न तो राहुल गांधी हैं, न डी.पी. त्रिपाठी हैं और न ही प्रफुल्ल पटेल हैं। मूर्ख भी नहीं हैं ये। दोष राहुल गांधी का है कि उन्हें डी.पी. त्रिपाठी ने 'इटलीÓ की याद दिला दी। राहुल की मां सोनिया गांधी के विदेशी (इटली) मूल को मुद्दा बना कांग्रेस का त्याग करने वाले शरद पवार भले ही राजनीतिक सुविधा अथवा मजबूरी के कारण कांग्रेस के सहयोगी बन गए हों, किंतु उनके सीने का दर्द कम नहीं हुआ है। उनकी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस के अधिकृत प्रवक्ता डी.पी. त्रिपाठी ने जब टिप्पणी की कि गठबंधन धर्म को समझने के लिए राहुल गांधी को कम से कम इटली पर तो नजर डाल लेनी चाहिए थी, तो वस्तुत: शरद पवार के दर्द को ही रेखांकित किया गया था। कांग्रेस छोडऩे और सन् 2004 में कांग्रेस नेतृत्व की संप्रग सरकार में शरद पवार के मंत्री बनने के बाद पहली बार उनकी पार्टी की ओर से इटली शब्द का उच्चारण किया गया। स्वयं को राजनीतिक रूप से परिपक्व घोषित कर चुके राहुल गांधी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वे वस्तुत: अपरिपक्व ही हैं। कमरतोड़ महंगाई और कीर्तिमान स्थापित करते भ्रष्टाचार के आरोपों से भयभीत कांग्रेस अब पूर्णत: बचाव की मुद्रा में आ गई है। कांग्रेस की ओर से अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी तर्क-कुतर्क देकर स्थिति संभालने का असफल प्रयास करते रहे हैं। लेकिन कांग्रेस की ओर से घोषित भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने सब गुडग़ोबर कर दिया। पता नहीं किस मूर्ख की सलाह पर उन्होंने टिप्पणी कर दी कि गठबंधन की मजबूरियों के कारण महंगाई बढ़ी है। यह समझ से परे है कि महंगाई का गठबंधन की राजनीति से क्या संबंध है। गठबंधन की मजबूरियां निश्चय ही नीति निर्धारण को प्रभावित करती रही हैं। किंतु खाद्य पदार्थों सहित अन्य वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण कुछ और ही होते हैं। 1974-75 में तो इंदिरा गांधी नेतृत्व की कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी। क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि तब खाद्य पदार्थों की कीमत आसमान छूने लगी थी। महंगाई के लिए गठबंधन की राजनीति को जिम्मेदार बताने वाले राहुल गांधी को गठबंधन धर्म की परिभाषा और इससे जुड़े उद्धरण की जानकारी लेनी चाहिए। जब भाजपा के अटल बिहारी के नेतृत्व में लगभग 2 दर्जन दलों की गठबंधन सरकार बनी थी, तब स्वयं प्रधानमंत्री वाजपेयी ने देश को बता दिया था कि सरकार जिस एजेंडे को लेकर चल रही है, वह अकेले भाजपा का एजेंडा नहीं है बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का एजेंडा है। संविधान की धारा 370 को हटाने और राम मंदिर निर्माण की मांग पर उन्होंने ऐसा नीतिगत स्पष्टीकरण दिया था। लेकिन राजनीतिक रूप से घोर अपरिपक्व राहुल गांधी चूंकि चाटुकार सलाहकारों से घिरे हैं, जब भी मुंह खोलते हैं, नई-नई दुर्घटनाओं से उनका सामना हो जाता है। विशेषकर जब भी वे राजनीतिक रूप से गंभीर होने का स्वांग रचते हैं, उन्हें मुंह की खानी पड़ती है। इस मामले में भी ऐसा ही हुआ। सरकार की सामूहिक जिम्मेदारी के दर्शन से अनजान राहुल गांधी की ताजा कवायद ने उनकी मां सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे की दबी चिंगारी को ही हवा दे डाली। जिस युवा वर्ग के बलबूते राहुल सत्ता का नेतृत्व हथियाना चाहते हैं, वह युवा वर्ग किसी व्यक्तित्व के करिश्मा या स्टंट से प्रभावित नहीं होता। मैं यहां राहुल गांधी को हतोत्साहित करना नहीं चाहता। उनका श्रम, उनका उत्साह सराहनीय है। किंतु, उन्हें यह समझना होगा कि जिस बारात का नेतृत्व वे करना चाहते हैं, फिलहाल उसमें कतिपय अपवाद छोड़ चोरों की भरमार है। कोई आश्चर्य नहीं कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली केंद्र सरकार है, जिस पर प्राय: हर दिन भ्रष्टाचार में नए-नए आरोप लग रहे हैं। अत्यंत ही शातिर यह जमात अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए (देश हित की कीमत पर ही सही) बैंड-बाजे, रोशनी, आतिशबाजी की व्यवस्था कर एक ऐसे दूल्हे की तलाश में रहती है जो बारात की शोभा बढ़ा सके। बेनकाब ये बाराती नेहरू-गांधी परिवार के सामने नतमस्तक हो चरणवंदना करते हैं तो इस जरूरत की पूर्ति के लिए ही। अब फैसला राहुल गांधी करें कि चोरों की इस बारात का दूल्हा वे बनना चाहेंगे!

Wednesday, January 12, 2011

नौकर थे, नौकर हैं, नौकर ही रहेंगे!

अपने देश के प्रधानमंत्री को ऐसे आपत्तिजनक शब्द से नवाजा जाना सुसंस्कृत कतई नहीं। हमारी संस्कृति-सभ्यता इसकी इजाजत नहीं देती। प्रधानमंत्री के अनादर की ऐसी कवायद को किसी विकृत मस्तिष्क की करतूत भी कह सकते हैं। किन्तु, जब पूरे देश में भ्रष्टाचार और महंगाई को लेकर हाहाकार मचा हो, समाज का हर क्षेत्र अभिशप्त दिख रहा हो, लोकतंत्र के पाये लडख़ड़ा रहे हों, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता जमीन चाटती दिखे, अनुशासनहीनता पराकाष्ठा पर हो, चहुंओर अराजकता का बोलबाला हो, तब जिम्मेदारी सुनिश्चित किये जाने की प्रक्रिया के बीच असहज स्थिति का पैदा होना स्वाभाविक है। फिर असहज, असंस्कृत या फिर असभ्य श्रेणी के शब्दों का इस्तेमाल दिखे तो इसे अस्वाभाविक भी कैसे कह सकते हैं! पिछली रात दिल्ली के एक जिम्मेदार (निश्चय ही इमानदार भी) पत्रकार फोन पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को 'नौकर' के रूप में संबोधित कर रहे थे। तब संस्कृति से इतर उठी पीड़ा के कुछ और भी कारण थे। स्पष्ट कर दूं कि 'नौकर' जनता के नौकर के रूप में प्रतिपादित नहीं था, एक दुखद 'मानसिकता' को चिन्हित किया जा रहा था। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और भारतीय प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार के अलावा विश्व बैंक में काम कर चुके डा. मनमोहन सिंह सचमुच विशुद्ध 'नौकर मानसिकता' को ढोने वाले साबित हो रहे हैं। आज जब उनकी पार्टी कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी महंगाई के मोर्चे पर सरकार की विफलता के लिए गठबंधन की राजनीति पर दोष मढ़ रहे हैं, तो सिर्फ इसलिए कि हर मोर्चे पर विफल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बचाव किया जा सके। बात कड़वी लग सकती है। किन्तु इस कड़वे सच को दोहराना जरूरी है कि सन 2004 से प्रधानमंत्री पद पर आसीन डा. मनमोहन सिंह सिर्फ अपनी नेता के एजेंडे को लागू करने के प्रति गंभीर रहे। व्यक्तिगत रूप से उनकी नीयत, उनकी इमानदारी, उनके देशप्रेम पर संदेह नहीं किया जा सकता। लेकिन वैसी इमानदारी किस काम की, जिससे पूरी की पूरी सरकार भ्रष्टाचार के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित करती दिखे, पूरा देश कमरतोड़ महगाई के तले सिसकने को मजबूर हो। जरा याद कीजिए 1991 के उन दिनों को, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव ने मनमोहन सिंह को देश का वित्तमंत्री नियुक्त किया था। तब उनकी नई उदारवादी आर्थिक नीति का कुछ ऐसा ढिंढोरा पीटा गया था जैसे आर्थिक क्षेत्र की नई क्रांति से आने वाले दिनों में देश में सिर्फ खुशहाली-खुशहाली का आलम होगा। लेकिन तभी गंभीर तटस्थ आर्थिक समीक्षकों ने चेतावनी दी थी कि मनमोहन सिंह की नई आर्थिक नीति से देश में मुद्रा स्फीति बढ़ेगी और आम जनता के सामने परेशानियों का अंबार खड़ा हो जाएगा। अगर मुझे ठीक से याद है तो समीक्षकों ने ऐसी दु:स्थिति के लिए 20 वर्ष की सीमा भी निर्धारित कर दी थी। आज 20 वर्षों बाद क्या हम ऐसी दु:स्थिति से नहीं गुजर रहे! आश्चर्य है कि तब अर्थशास्त्री वित्तमंत्री और अब प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ऐसी स्थिति को क्यों नहीं भांप पाए थे। संदेह इस मुकाम पर प्रगाढ़ हो जाता है। एक अर्थशास्त्री के रूप में डा. मनमोहन सिंह की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। यही कारण है कि आज देश उनकी नीयत पर शक कर रहा है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री निश्चय ही कुशलतापूर्वक अपने गुप्त एजेंडे को अंजाम देते रहे- लागू करने में सफल रहे। दिवंगत प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष मोहन धारिया अनेक अवसरों पर मनमोहन सिंह की नीति और नीयत को कटघरे में खड़ा कर चुके हैं। एक अवसर पर चंद्रशेखर ने झल्लाकर टिप्पणी की थी कि मनमोहन सिंह के सुझावों पर अगर मैं अमल करता तो देश के साथ धोखा होता। खेद है, आज सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सच्चाई से मुंह मोड़ जनता के साथ धोखा कर रहा है। कुछ कारपोरेट घरानों, नौकरशाहों, राजनीतिकों का 'घर' भरने के लिए आम जनता की जेबें खाली की जा रही हैं।

Tuesday, January 11, 2011

... अब कपिल सिब्बल भी इस्तीफा दें!

नैतिकता का तकाजा है कि केंद्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल अविलंब अपने पद से इस्तीफा दे दें। यह सोच पूरे देश की है, जिसे मैं यहां शब्दांकित कर रहा हूं - बगैर किसी पूर्वाग्रह के। यह कोई निजी मांग नहीं, किसी विचारधारा विशेष की उपज नहीं। चूंकि तत्कालीन केंद्रीय संचार मंत्री ए. राजा को इस्तीफा देना पड़ा था 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटाले के आरोप लगने पर, अब जबकि नये संचार मंत्री सिब्बल ऐसे किसी घोटाले से इन्कार कर रहे हैं, उन्हें पद पर बने रहने का अधिकार नहीं। सिब्बल का यह कदम भ्रष्टाचार को संवैधानिक स्वीकृति प्रदान करने के समान है। आजाद भारत के इतिहास में इस सबसे बड़े घोटाले की जांच का आदेश भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है। संसद की लोकलेखा समिति उस 'कैग' रिपोर्ट पर मंथन कर रही है जिसने घोटाले का खुलासा किया था। पूरा का पूरा विपक्ष घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से कराने की मांग पर अड़ा है। संसद में इसे लेकर गतिरोध कायम है। ऐसे में एक जिम्मेदार (?) केंद्रीय मंत्री का ऐसा बयान! यह न केवल सर्वोच्च न्यायालय बल्कि भारतीय संसद की अवमानना का भी मामला है। सिब्बल भले ही तर्क-कुतर्क देते रहें, यह साफ है कि उन्होंने घोटाले की जांच को प्रभावित करने की कोशिश की है, पूर्व मंत्री ए. राजा को बचाने की कोशिश की है। यह तो सर्वोच्च न्यायालय और संसद को चुनौती भी है। एक ऐसा मामला जिसकी सीबीआई जांच सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में किए जाने संबंधी सुझाव स्वयं केंद्र सरकार दे चुकी है, एक मंत्री मामले पर फैसला सुना रहा है।
क्या हम प्रधानंमत्री डा. मनमोहन सिंह से आशा करें कि वे तत्काल कदम उठाते हुए या तो कपिल सिब्बल से इस्तीफा ले लें या फिर उन्हें बरखास्त कर देंगे? इसके पूर्व किसी केंद्रीय मंत्री ने कभी भी भारतीय संसद और सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी अवमानना नहीं की थी। लोकलेखा समिति के अध्यक्ष डा. मुरली मनोहर जोशी और जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने बिल्कुल सही आलोचना की है। यह आश्चर्यजनक है कि दूरसंचार सचिव जब पीएसी के समक्ष पेश हुए थे, तब उन्होंने स्पेक्ट्रम आवंटन में संभावित नुकसान के आंकड़े पर कभी सवाल नहीं उठाया। विभागीय सचिव के विपरीत मंत्री सिब्बल ने नुकसान के आंकड़े को झूठा और काल्पनिक निरूपित कर स्वयं को मंत्री पद के अयोग्य प्रमाणित कर दिया है। इससे साथ ही सिब्बल ने अपने आचरण से केंद्र सरकार और अपनी कांग्रेस पार्टी को भी संदेहो के घेरों में ला दिया है। यह उचित समय है जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह अपनी चुप्पी तोड़ सिब्बल को तो पदमुक्त कर ही दें, स्पेक्ट्रम घोटाले की संयुक्त संसदीय समिति से जांच को भी मंजूरी दे दें।