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Sunday, June 26, 2016

चेत जाएं चेतनाहीन चेतन भगत!


सिनेमा हॉल में बहुविवादित 'उड़ता पंजाब' देख रही एक 23 वर्षीय युवती बीच में ही हॉल में उठ खड़ी हुई और तेजी से बाहर निकल गई। बाहर अपने मोबाइल से उसने अपनी एक सहेली को फोन किया, '.... ओह इतनी गालियां..... ऐसी-ऐसी गालियां... ऐसी फिल्म को प्रदर्शन की अनुमति किसने दी....? बर्दाश्त नहीं हुआ, मैं हॉल से बाहर आ गई...' 
'उड़ता पंजाब' पर वर्तमान युवा पीढ़ी की यह प्रतिक्रिया चिंतन का विषय है। स्वयं को बुद्धिजीवी, चिंतक, लेखक व समाज सुधारक बतानेवाले उपन्यासकार चेतन भगत फिल्म के प्रति इस नकारात्मक प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करेंगे, किंतु सच यही है। आश्चर्य है कि चेतन भगत ने फिल्म को सामाजिक व सराहनीय चिन्हित किया है। एक चिंतक के रूप में चेतन भगत के शब्दों को समाज का एक वर्ग स्वीकार भी कर सकता है, किंतु जब वे 'उड़ता पंजाब' के बहाने सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी को विदा करने की मांग करते हैं तब उनकी घोर पूर्वाग्रही, ओछी, निम्न मानसिकता चिन्हित होती है। पहलाज निहलानी को 'कु-संस्कारी चमचा'  व अयोग्य बता कर चेतन भगत ने वस्तुत: अब तक की अपनी अर्जित उपलब्धियों पर बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
एक हिन्दी दैनिक में 'निहलानी को इसलिए विदा करें' शीर्षक के अंतर्गत चेतन भगत ने निहायत ही भद्दे तरीके से अपनी पूर्वाग्रही सोच को प्रस्तुत करते हुए निहलानी को निकम्मा, नालायक साबित करने की कोशिश की है। विरोधाभास से भरा चेतन का आलेख निहलानी को तो नहीं स्वयं चेतन के ही 'चमचा' होने की चुगली कर रहा है।  युवाओं के समक्ष अश्लीलता परोस पूरे समाज को भ्रष्ट करने सक्रिय गुट का चमचा! निहलानी को अयोग्य और नासमझ बतानेवाले चेतन भगत  इस तथ्य को भूल गए प्रतीत होते हैं कि निहलानी उस समय से फिल्मी दुनिया में मौजूद हैं जब चेतन का जन्म भी नहीं हुआ होगा। अपने उपन्यासों और उनके द्वारा लिखित कहानियों पर बनी एक जोड़ी फिल्म से चर्चा में आए चेतन भगत  यह न भूलें कि 'बेस्ट सेलर' के अपने हथकंडे होते हैं, वर्ग विशेष की पसंद का पाश्र्व होता है।  किसी जमाने में कुशवाहा 'कांत' और प्यारेलाल 'आवारा' की पुस्तकें भीं 'बेस्ट सेलर' हुआ करती थीं। 'महिमामंडन' के आवरण में सच पर पर्दा नहीं डाला जा सकता।  झूठ कभी न कभी अनावृत्त हो ही जाता है। चेतन भगत कोई अपवाद नहीं।
चेतन भगत बताते हैं 'कि उड़ता पंजाब' की काफी सराहना हुई और 'बॉक्स ऑफिस' पर भी प्रदर्शन अच्छा रहा। बिलकुल गलत! सचाई कुछ ओर है। पंजाब और दिल्ली को छोड़कर पूरे देश में 'उड़ता पंजाब' एक 'फ्लॉप' फिल्म साबित हुई। पंजाब और दिल्ली में मिली आंशिक सफलता का कारण 'सेंसर बोर्ड' की आपत्तियों के बाद निर्माता अनुराग कश्यप द्वारा आक्रामक ढंग से प्रचार करना रहा। 'सेंसर' की आपत्तियों वाले दृश्यों को अनुराग कश्यप ने प्रचारित कर पंजाब और सटे दिल्ली के दर्शकों के दिलों में उत्सुकता जागृत कर दी थी। फिल्म प्रदर्शन के बाद यहां के लोग इसी उत्सुकता से प्रेरित हो वास्तविकता जानने के लिए आरम्भ के तीन दिनों शुक्रवार, शनिवार और रविवार को सिनेमा हॉल में पहुंचे। किंतु सोमवार से पंजाब और दिल्ली में भी कुछ दर्शक ही सिनेमा हाल में पहुंचे। 'सक्सेस पार्टी' आयोजित कर किसी फिल्म को 'सक्सेसफुल' नहीं बनाया जा सकता।  और हां, चेतन की जानकारी के लिए कि पड़ोसी पाकिस्तान में भी लगभग 100 'कट्स' के बाद उड़ता पंजाब को प्रदर्शन की अनुमति मिली है। आश्चर्य है कि चेतन भगत इस सचाई से मुंह मोड़ गए।
भगत 'प्रिय सिनेमा' और अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति इंसाफ की दलील देते हैं। वे भूल गए कि 'प्रिय सिनेमा' का अर्थ हॉलीवुड नहीं होता। अभिव्यक्ति की आजादी भद्दे द्विअर्थी संवाद और अश्लील दृश्य परोसना नहीं होता। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम समाज, विशेषकर युवा वर्ग के मन - मस्तिष्क में अश्लील गालियों और द्विअर्थी संवादों का शब्दकोश तैयार नहीं कर सकते।  चेतन भगत जी, अभिव्यक्ति की आजादी देश, समाज को 'संस्कारी' बनाने के लिए प्रयुक्त होती है न कि 'कु-संस्कारी'।
पहलाज निहलानी को स्वयंभू संस्कारी, मोदी चमचा और 'राजनीति की सीढिय़ां' चढऩे के उत्सुक व्यक्ति  के रूप में प्रस्तुत कर चेतन भगत ने खुद को  'कु-संस्कारी' घोषित कर डाला है। भारत देश 'संस्कारी' है और 'संस्कारी' ही बना रहेगा। अनुराग कश्यप सरीखे लोग चाहे जितनी कोशिश कर लें, कानून की कमजोरियों का लाभ उठा अपनी मनमानी कर लें, देश का बहुमत ऐसे लोगों को हमेशा नकारता रहेगा। आश्चर्य है कि चेतन भगत इस तथ्य को भूल गए कि पहलाज निहलानी सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में मौजूदा 'सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952' में निर्धारित नियमों व दिशा-निर्देश के अनुरूप फैसले लेते रहे। क्या किसी अध्यक्ष को इससे इतर फैसले लेने का अधिकार है? कानून सम्मत जायज फैसलों के कारण निहलानी को 'संस्कारी' बता व्यंग करने वाले निश्चय ही परम्परागत 'कु-संस्कारी' होंगे।  स्वयं चेतन भगत आलोच्य आलेख में कहते हैं कि '' मौजूदा सिनेमेटोग्राफ एक्ट 1952 में ऐसी भाषा है जो लगभग किसी भी फिल्म को नैतिकता के नाम पर प्रतिबंधित कर सकती है..... इसमें नैतिक मानदंडों को ठीक-ठीक परिभाषित भी नहीं किया गया है। '' फिर निहलानी दोषी कैसे हो गए? 'राजनीति की सीढिय़ां' चढऩे संबंधी चेतन भगत का आरोप भी हास्यास्पद है। निहलानी 1989 से भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता के रूप में जुड़े रहे हैं। नरेंद्र मोदी की कार्यशैली व व्यक्तित्व के प्रशंसक निहलानी तब से हैं, जब मोदी मुख्यमंत्री भी नहीं बने थे। उनके नेतृत्व में विश्वास प्रकट करते हुए ही उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व हर-घर मोदी, घर-घर मोदी नामक एक 'वीडियो' बनाया था।  'मेरा देश है महान, मेरा देश है जवान , भारत को स्वच्छ बनाना है, जो सपना देखा बापू-मोदी ने उसे मिलजुलकर पूरा करना है।' संदेश वाले इस वीडियो को मशहूर फिल्म  'प्रेमरतन धन पायो' के साथ जोड़ा गया था, जिसकी पूरे देश में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। 'वीडियो' में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यों की सराहना की गई थी। निहलानी ने ये सब किसी राजनीतिक पद प्राप्ति की लालसा से नहीं किया। अगर ऐसी इच्छा होती तो जानकार पुष्टि करेंगे कि पहलाज निहलानी बहुत पहले ही 'पद' प्राप्त कर सकते थे। चेतन भगत की जानकारी के लिए बता दूं कि, सन 2003 में ही जब रविशंकर प्रसाद सूचना प्रसारण मंत्री थे तब निहलानी को 'पद' की पेशकश की गई थी। निहलानी ने ठुकरा दिया था।
चेतन भगत इन वजहों से निहलानी को सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटा दने की मांग करते समय भूल जाते हैं कि इससे भाजपा की छवि धूमिल नहीं हुई बल्कि, आभामंडल में इजाफा हुआ है।  'चमचा' प्रसंग' का उल्लेख कर चेतन भगत ने स्वयं को एक बुद्धिहीन चिंतक के रूप में प्रस्तुत कर डाला है। जिस साक्षात्कार में पहलाज निहलानी को ऐसा कहते हुए दिखलाया गया, क्या उसमें साफ-साफ नहीं दिखता कि 'चमचा' शब्द निहलानी के मुंह में जबरिया डाला गया? महान बुद्धिजीवी, 'बेस्ट सेलर', उपन्यासों के लेखक चेतन भगत जब शब्द के साथ बलात्कार करते दिखें तब निश्चय ही उनकी भत्र्सना की जानी चाहिए। चेतन भगत लिखित कहानियों पर बनी फिल्मों की कहानियां हीं वस्तुत: संदेहों के घेरे में हैंं। उनकी कहानियों पर करन जौहर ने जो फिल्में बनाईं, जानकार बताते हैं कि वे पहले ही बनीं फिल्मों यथा 'एक दूजे के लिए' व 'पहली झलक' से चोरी की गईं थीं। उनके प्रकाशित उपन्यासों की कथावस्तु भी, जानकार बताते हैं कि  बाहर से 'उड़ाई' गई थी। ऐसे चेतन भगत जिसकी विश्वसनीयता स्वयं संदेहों के घेरे में हो पहलाज निहलानी जैसे व्यक्तित्व पर कीचड़ उछालता है तो, उसके छींटे स्वाभाविक रूप से स्वयं उनके चेहरे पर पड़ेंगे। ऐसा होना शुरू भी हो गया है। हां, इस पूरे प्रसंग में चेतन भगत ने समाधान के रूप में 'सिनेमेटोग्राफ एक्ट' में संशोधन का जो सुझाव दिया है उसे मेरे अतिरिक्त अन्य लोग भी स्वीकार करेंगे।

नगालैंड का अलग झंडा और पासपोर्ट वाली सनसनीखेज खबर को पचा गया मीडिया


खतरनाक, अत्यंत ही खतरनाक! मीडिया मंडी के पाठकीय बहिष्कार की पूर्व चेतावनी। अगर ऐसा होता है तो, किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बिरादरी के कुछ सहोदरों के  कु-कर्म ही ऐसे हैं - बाजारू, दलाली, प्रेस्टीच्यूट, चापलूसी के आरोपों से आगे पाठकों के साथ गद्दारी!
पिछले दिनों 3 बड़ी घटनाएं देश में हुईं। पहला देश के एक बड़े व्यावसायिक घराने 'एस्सार' द्वारा कुछ नेताओं, व्यवसायियों, कलाकारों, मीडिया कर्मियों आदि के फोन टेपिंग का मामला। दूसरा भारत के एक राज्य नगालैंड के लिए अलग झंडा और पासपोर्ट पर केंद्र सरकार की सहमति। तीसरा, हरियाणा राज्यसभा चुनाव में 'कलम-स्याही कांड'। ये ऐसी खबरें थीं जिनका राष्ट्रीय महत्व था, पाठकों-दर्शकों को तथ्यों की जानकारी दी जानी चाहिए थी। लोकतंत्र में हर नागरिक का यह अधिकार है। मीडिया का दायित्व है कि वह ऐसी जानकारियों से देश को अवगत कराए। किंतु, स्वार्थ, प्रलोभन और दबाव को आत्मसात कर मीडिया ने इन खबरों से पाठकों-दर्शकों को वंचित करने की कोशिशें कीं। वह तो कुछ 'अपवाद' थे जिन्होंने उपलब्ध सीमित संसाधनों व मंच से जानकारियां पाठकों-दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की। सचमुच मीडिया मंडी के लिए शर्मनाक घटना विकासक्रम है।
'नगालैंड का अलग झंडा और पासपोर्ट होगा'...! ...तमाम अन्य चौंकाने वाली बातों के साथ यह भी उस शांति समझौते का हिस्सा है जो अगस्त 2015 की शुरुआत में केंद्र और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (इज़ाक मुइवा) के बीच हुआ था। पिछले कुछ दिनों से उत्तर पूर्व के अखबारों में इस बात को लेकर काफी चर्चा है, लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में इसका रत्ती भर भी जिक्र नहीं है। योग-तमाशे की चकमक छवियां गढऩे और प्रसारित करने में जुटा मीडिया दरअसल, तमाम जरूरी चीजें छिपाने का उपकरण बन गया है। न सबसे तेज 'आज तक', न आपको आगे रखने वाला 'एबीपी न्यूज' और न ही राष्ट्रवाद के नाम पर नफरत और युद्धोन्माद फैलाने वाला 'टाइम्स नाऊ' और उसके तमाम क्लोन, किसी भी चैनल में इसकी चर्चा नहीं है। हिंदी के अखबारों की तो बात ही जाने दीजिए, 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और 'इंडियन एक्सप्रेस' तक इस मुद्दे पर खामोश हैं जबकि पिछले कुछ दिनों से यह मुद्दा सोशल मीडिया में छाया हुआ है। केंद्र सरकार भी सन्नाटा खींचे हुए थी। बाद में कुछ सकुचाते हुए गृहराज्यमंत्री किरन रिजीजू ने कहा है कि अलग झंडे और पासपोर्ट की मांग अभी मानी नहीं गई हैं, लेकिन समझौते के जानकार इस पर सरकार की सहमति बताने पर अड़े हैं। बहरहाल, असल मुद्दा है कि मीडिया चुप क्यों है ? वह सच्चाई बताने से परहेज क्यों कर रहा है? वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी ने इसे शर्मनाक बताते हुए पूछा है कि क्या ऐसे 'मीडिया' के बहिष्कार का वक्त आ गया है?
पंकज चतुर्वेदी बताते हैं कि जिन दो खबरों को मैं अखबारों में तलाश रहा था, हिंदी के किसी भी अखबार में नहीं मिली, एक है नगालैंड में आतंकवादियों के साथ समझौता कर देश में नई रीत लागू करने की और दूसरी हरियाणा में भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े घोटाले की जांच की। किसी भी अखबार ने इसे स्थान नहीं दिया। मीडिया के यह हालात चिंता का सबब हैं, यह तो आपातकाल से भी बदतर हालात हैं कि योग पर चार चार पेज रंगने वाले देश व समाज के सरोकार की खबरों को पाठकों से ना केवल छुपा कर बेईमानी कर रहे हैं, बल्कि अपनी विश्वसनीयता और स्वत़त्रता को गिरवी रख रहे हैं। ये खबरे हैं-
1. साल 2015 में जिस नगा समझौते को मोदी सरकार ने देख के लिए खुशखबरी बताया था, अब कुछ समाचारों ने उसके प्रावधानों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. समाचारों के अनुसार नगालैंड में शांति समझौते के लिए भारत सरकार और विद्रोही समूह हृस्ष्टहृ-ढ्ढरू के बीच समझौते के अनुसार नगालैंड के लोग अपना अलग झंडा और पासपोर्ट रख सकेंगे.
आश्चर्यजनक रूप से इस बात का खुलासा समझौता होने के लगभग 1 साल बाद हुआ है और भारत सरकार ने भी इस पर चुप्पी साधी है. भारत की मुख्यधारा की मीडिया ने भी इस पर कोई समाचार नहीं प्रकाशित किया है जबकि उत्तर पूर्व के स्थानीय समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है .
हृस्ष्टहृ-ढ्ढरू के स्वघोषित गृह मंत्री किलो किनोंसेर के अनुसार भारत सरकार ने उनकी अलग झंडे और पासपोर्ट की मांग मान ली है और यह 2015 के समझौते का हिस्सा है.
पूर्व विद्रोही समूह के अनुसार हृस्ष्टहृ-ढ्ढरू और भारत सरकार के बीच का यह समझौता नगाओं के अलग राजनीतिक विचारधारा की जीत है.
केंद्र सरकार द्वारा इस समझौते को ऐतिहासिक बताया गया था और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा था कि देश को खुशखबरी मिलने वाली है.
2. राज्यसभा चुनाव में गलत स्याही के कारण रद्द हुए 13 वोट का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी मामले को लेकर हरियाणा कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर, कांग्रेस विधायक किरण चौधरी और कांग्रेस, इनेलो समर्थित उम्मीदवार आरके आनंद चंडीगढ़ के सेक्टर-3 थाने में एफआईआर दर्ज करवाने पहुंचे।
मामले पर एफआईआर दर्ज न होने को लेकर तीनों नेताओं व कांग्रेसियों ने थाने में प्रदर्शन किया। हालांकि इस मामले में पहले ऑनलाइन शिकायत दी जा चुकी है। किरण चौधरी ने आरोप लगया कि पुलिस दबाव में है, इसलिए उनकी शिकायत दर्ज नहीं की जा रही।
गौरतलब है कि आरके आनंद इससे पहले भी चंडीग? आईजी को शिकायत दे चुके हैं। इस बार तीनों ने अंबाला के बीजेपी विधायक असीम गोयल, निर्दलीय विधायक जयप्रकाश, विजयी राज्यसभा उम्मीदवार सुभाष चंद्रा और रिटर्निंग ऑफिसर आरके नांदल के नाम शिकायत दी है।
उल्लेखनीय है कि 11 जून को राज्यसभा के लिए हुए चुनाव में गलत पेन से वोट डालने के कारण 13 वोट रद्द हो गए थे। इनेलो कांग्रेस के कुल 37 वोटों का समर्थन होने पर भी एडवोकेट आरके आनंद हार गए थे। आनंद को कुल 21 'वैलिड' वोट मिले थे। जबकि भाजपा समर्थित सुभाष चंद्रा को 15 वोट ही मिले थे, लेकिन वह दूसरी वरीयता के वोटों की कारण चुनाव जीत गए थे। इस मामले में कांग्रेस और इनेलो ने आरोप लगाया कि सत्तापक्ष और अधिकारियों की मिलीभगत से 'स्याही का खेल' रचा गया था। जिसकी बाद में 13 जून को आर.के. आनंद, अशोक तंवर और कांग्रेस नेता बी.के. हरिप्रसाद ने चुनाव आयोग को दिल्ली में इसकी शिकायत दी। इस के बाद चुनाव आयोग की एक टीम दिल्ली से चंडीगढ़ विधानसभा जांच के लिए पहुंची। इस पूरे घटनाक्रम के बाद 16 जून को चुनाव आयोग ने तीनों प्रत्याशियों को चुनाव की पूरी वीडियो दिखाने का फैसला कर इन्हें वीडियो दिखाई लेकिन जिसके बाद 'इंक कंट्रोवर्सी' ने ओर तूल पकड़ लिया। इसकी जांच में सामने आ गया है कि कतिपय लोगों ने पेन बदला व एक निर्दलीय विधायक ने आनंद समर्थक वोट गिरने के बाद फिर से असली पेन रख दिया.

विदेशी निवेश तो ठीक, सावधानी भी जरूरी !

एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) एक ऐसा अभिशापित शब्द है जिसके उच्चारण के साथ ही नकारात्मक बोध पैदा हो जाता है। इसके लिए जिम्मेदार स्वयं सत्ता में रह चुकी कांग्रेस और आज सत्ता में मौजूद भाजपा रही है। हम इसे एक विडम्बना के रूप में ही लेंगे कि देश के संपूर्ण विकास की रीढ़ आर्थिक विकास को राजनीतिक घालमेल में शामिल कर संदिग्ध बनाया जा रहा है। ऐसा नहीं होना चाहिए। विकास की राजनीति और विकास पर राजनीति के अंतर को समझना होगा। एफडीआई के मुद्दे पर यह और भी जरूरी है।
पिछले दिनों केंद्र सरकार ने रक्षा, उड्डयन, खाद्य सामग्री व 'सिंगल ब्रांड रिटेल' आदि क्षेत्रों में 100 प्रतिशत तक विदेशी निवेश को मंजूरी दे पूरे देश में एक नई बहस छेड़ दी है। बहस इसकी योग्यता से अलग राजनीतिक अधिक है। चूंकि केंद्र में पूर्व की कांग्रेस नेतृत्व की संप्रग सरकार ने जब पहल करते हुए इन क्षेत्रों में आंशिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश  की अनुमति दी थी तब आज की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने कड़ा विरोध प्रकट किया था। विरोध के तेवर तीखे थे। स्वयं नरेंद्र मोदी ने जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, टिप्पणी की थी 'कांग्रेस पूरे देश को विदेशियों को सौंप देना चाहती है।' कद्दावर भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि कांग्रेस पर अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस का दबाव है। वर्तमान केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो आगे बढ़कर घोषणा कर डाली थी कि 'जीवन की आखिरी सांस तक हम एफडीआई का विरोध करते रहेंगे।' इस पाश्र्व में  विपक्ष का हमला स्वाभाविक है।  किंतु यह राजनीति है। यर्थाथ यह कि देश को निवेश चाहिए।  तथ्य यह भी कि कांग्रेस, भाजपा दोनों प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पक्ष में हैं। आंशिक निवेश का कभी विरोध करनेवाली भाजपा आज अगर संपूर्ण निवेश की पक्षधर है तब निश्चय ही इसका कारण देश की वर्तमान जरूरतें हैं। वर्तमान परिस्थितियां हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था के मद्देनजर आर्थिक मोर्चे पर स्थिरता के लिए जूझ रहे भारत को विदेशी निवेश की जरूरत है, इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता। अगर देर से ही सही, भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस सत्य को स्वीकार कर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के पक्ष में फैसला लिया है तब बेहतर होगा कि इसकी आलोचना न कर सकारात्मक पक्ष को देशहित में कैसे उपयोग में लाया जाए, इस पर बहस हो। आलोचना के लिए आलोचना और राजनीति के लिए आलोचना से हमें बचना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने इस निर्णय को 2015 के बाद दूसरा सबसे बड़ा आर्थिक सुधार निरूपित किया है तो बिलकुल ठीक ही है। सरकार का यह दावा भी गलत नहीं कि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को पूरी तरह उदार बना देने से भारत में रोजगार के नये-नये अवसर पैदा होंगे। हां, रक्षा क्षेत्र में शत-प्रतिशत निवेश की अनुमति को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताए जाने को पूर्णत: निराधार भी नहीं बताया जा सकता। सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत ही संवेदनशील इस क्षेत्र में विदेशी प्रवेश पर शंका स्वाभाविक है। किंतु, यह नहीं भूला जाना चाहिए कि भारत  न तो कमजोर है और न ही बुद्धिहीन कि ऐसे खतरों से निपट नहीं सकता। इस पर आवश्यक सावधानी रखने के प्रति भी सरकार ने निर्णय के पूर्व अवश्य विचार-विमर्श किया होगा। सरकार आवश्यक सावधानियां बरतेगी, ऐसी आशा की जा सकती है। इस बात की भी सावधानी बरती जानी चाहिए कि निवेश करनेवाली विदेशी कम्पनियां कहीं 'मालिक' बन रोजगार के माध्यम से हमारे युवाओं को सिर्फ 'नौकर' न बना डालें।

...तो खून-खराबा हो जाएगा! ( सनकी स्वामी की नई सनक! )


अपने चरित्र और राजनीतिक समीक्षकों की शंका के अनुरूप भाजपा के विवादास्पद सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की सनक है कि रुकती ही नहीं। अपनी ही सरकार और पार्टी के कुछ लोगों को निशाने पर रखनेवाले इस घोर अविश्वसनीय स्वामी ने चेतावनी दी है कि अगर उन्होंने अनुसासन तोड़ दिया तो खून-खराबा हो जाएगा। अपने अनुसासन के लिए विख्यात भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी ऐसी दु:स्थिति की कल्पना नहीं की होगी कि जब उनका अपना सांसद शिष्टता और अनुशासन की सारी मर्यादा तोड़ खून-खराबे की बाते करने लगेगा।
पिछले दिनों जब स्वामी ने केंद्र सरकार के मुख्य वित्तीय सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम पर गंभीर तीखे आरोप लगाए थे तब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन्हें अनुशासन की सीमा में रहने की सलाह दी थी। जेटली की इस सलाह से बिफरे सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ऐसा ट्वीट कर दिया जिससे पूरी पार्टी और केंद्र सरकार सकते में आ गई है।
स्वामी ने ट्वीट में लिखा कि 'मुझे बिना मांगे अनुशासन में रहने की सलाह देनेवालों को यह अंदाज नहीं है कि अगर मैंने अनुशासन तोड़ दिया तो खून-खराबा हो जाएगा। ' भाजपा का कोई वरिष्ठ सांसद खून-खराबे की बात करे, यह उसके चाल,चरित्र,चेहरा के घोष वाक्य को सीधी-सीध चुनौती है। भाजपा नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच ताजा टिप्पणी को लेकर घोर असंतोष है। पार्टी के अंदर जो वर्ग किन्हीं कारणों से स्वामी को समर्थन दे रहा है वह भी खून-खराबे वाली बात को पचा नहीं पा रहा है। यह तो बिलकुल सड़कछाप नेता की बात हो गई। लगता है स्वामी अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं अन्यथा स्वयं के सुशिक्षित, सुसंस्कृत होने का दावा करनेवाले 'हार्वर्ड रिटर्न ' सुब्रमण्यम स्वामी ऐसी घटिया बात नहीं करते। भाजपा नेतृत्व और संघ दोनों स्वामी की ताजा सनक से चिंतित हैं।
 स्वामी ने अपने ट्वीट में किसी का नाम तो नहीं लिया, लेकिन साफ है कि उनका इशारा जेटली की ओर ही था। यह तब और साफ हो गया जब एक दूसरे ट्वीट में स्वामी ने लिखा कि ' विदेश यात्रा के दौरान मंत्रियों को पारम्परिक आधुनिक भारतीय ड्रेस पहनना चाहिए। कोट-टाई में वे वेटर जैसे दिखते हैं।' चूकि स्वामी के ट्वीट वाले दिन ही अखबारों में अपनी विदेश यात्रा में अरुण जेटली की कोट -टाई पहने तस्वीर छपी है, स्वामी का इशारा साफ है।
रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन, वित्तीय सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और आर्थिक मामलों के सचिव शशिकांत दास के खिलाफ गंभीर आरोप लगानेवाले स्वामी के खिलाफ केंद्र सरकार के बड़े अधिकार लामबंद होने लगे हैं। इन अधिकारियों ने साफ कह दिया है कि अगर स्वामी पर अंकुश नहीं लगा तो वे भारत सरकार को मुश्किल में डाल देंगे। सरकारी अधिकारियों का यह रुख चिंताजनक है। पूरे प्रसंग में सर्वाधिक विस्मयकारी प्रश्न यह पूछा जा रहा है कि आखिर स्वामी किसकी शह पर इतना उछल रहे हैं? यह सवाल तब गंभीरता से पूछा गया जब स्वामी ने जेटली को उनकी औकात बताते हुए कह डाला कि 'जेटली से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।  जरूरत पडऩे पर मैं प्रधानमंत्री मोदी या पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से बात करुंगा।' राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पार्टी का एक वर्ग अपने किसी खास मकसद की पूर्ति के लिए स्वामी का 'उपयोग' कर रहा है। उन्हें सत्ताशीर्ष का ही नहीं बल्कि संघ का भी समर्थन प्राप्त है। कतिपय आर्थिक मुद्दों पर सरकार की नीति निर्णयों से क्षुब्ध संघ आर्थिक क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन चाहता है। इधर स्वामी भी अर्थव्यवस्था व वित्त मंत्रालय को लेकर आक्रामक हैं। स्वामी के कदमों से विपक्ष को केंद्र सरकार को घेरने का अवसर मिल गया है। कारण और संभावित परिणाम से पृथक यह तो तय है कि केंद्र सरकार और भाजपा संगठन में समानांतर शक्ति केंद्र के पैदा होने के संकेत मिलने लगे हैं। मात्र दो वर्ष पूर्व ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में आई भाजपा की यह स्थिति हानिकारक सिद्ध होगी। भाजपा व केंद्र की मोदी सरकार से लोगों ने बड़ी-बड़ी आशाएं लगा रखी हैं। आम जनता की अपेक्षा है कि पूर्व की कांग्रेस नेतृत्व की सरकारों के विपरीत मोदी सरकार सत्ता में परिवर्तन ला भ्रष्टाचार मुक्त काम करनेवाली सरकार के रूप में पहचान बनाएगी। ऐसे में स्वामी जैसे विघटनकारी तत्वों को अगर समर्थन, प्रश्रय मिलता है तो मोदी सरकार लोगों की आकाक्षांओं को पूरा कर पाएगी इसमें संदेह है। अगर आरोप सही है कि किसी विशेष 'योजना' को क्रियान्वित करने के लिए स्वामी का उपयोग किया जा रहा है तो यह एक अत्यंत ही गलत हथकंडा साबित होगा। गलत परम्परा की नींव पड़ेगी। देश की जनता सरल व पारदर्शी सत्ता की आकांक्षी है। 'योजना' व  'लक्ष्य' की पूर्ति के लिए अन्य सरल उपाय भी निश्चय ही उपलब्ध होंगे। स्वामी कदापि ऐसे लक्ष्यपूर्ति के लिए उपयोगी नहीं हो सकते।

Friday, June 17, 2016

राजनीतिक स्वार्थ पर कुर्बान विशिष्ट उपलब्धियां !


'क्या भूख न लगने की कोई दवाई है? '
बाल मजदूर के रूप में कार्यरत एक छोटी सी बच्ची ने जब एक डॉक्टर से यह पूछा, तब स्वयं डॉक्टर भी फफक पड़े।
यह है वर्तमान भारत का वर्तमान कड़वा सच! मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसी स्थिति आज ही पैदा हुई है। यह तो प्रतिफल है दशकों पुरानी अनुपयोगी अथवा साजिश आधारित नीतियों का। हमारी प्राथामिकताओं का जो कभी भी वास्तविक आवश्यकता अनुरूप निर्धारित न की गई। राजनीतिक स्वार्थवश अवसरवादी नीतियां बनीं, बनाई जाती रही हैं। सच से मुंह मोड़ काल्पनिक सफलता के ढिंढोरे पीटे गए। ऐसे में आज भी जब कोई बच्ची भूख मारने की दवा ढूंढती है तब निश्चय ही यह अवस्था देश की तथाकथित उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाती है। हर शासनकाल में ऐसा हुआ, आज भी हो रहा है।  राजनीतिक स्वार्थ ने हमारी प्राथमिकताएं बदल डाली हैं। निर्णय-नीतियां राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के पक्ष में जब तैयार की जाएं तब सामान्यजन तो भूखा रहेगा ही। खेद है परिवर्तन की लहर को साथ दे समाज-देश में आमूल-चूल परिवर्तन का स्वप्न देखनेवाली जनता के पाले में निराशा और निराशा ही आ रही है। क्या राजनीतिक स्वार्थ से ईतर, सत्ता सुख से ईतर, जाति- धर्म व संप्रदाय से ईतर वृहत्तर सामाजिक हित में निर्णय नहीं लिए जा सकते?  नीतियां नहीं बनाई जा सकतीं? कहने-दिखाने को तो सभी ऐसा प्रदर्शित करते हैं किंतु, उनका अंतर्मन राजनीतिक स्वार्थ और सत्ता साधना के वशीभूत निरंतर समाज-देश को ठगता रहता है। क्या कोई इस सत्य को, इस तथ्य को चुनौती दे सकता है? ईमानदार, नि:स्वार्थ चुनौती तो कभी सामने नहीं आएगी। अगर लगभग साठ दशक की आजादी की यही उपलब्धि है तो धिक्कार है ऐसी आजादी पर!
विशिष्ट क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित  अथवा पुरस्कृत किए जाने की एक परम्परा रही है। ऐसे सम्मान पा लोग गौरवान्वित होते रहे हैं। समाज में इनकी एक विशिष्ट पहचान रही है। किंतु, राजनेताओं, राजदलों ने इनकी 'उपयोगिता' का भी राजनीतिकरण कर डाला।  इनकी विशिष्ट पहचान का उपयोग राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए किया जाने लगा। भला राजनीतिकों को यह कैसे बर्दाश्त होता कि समाज में उनके अतिरिक्त किसी और की  विशिष्ट पहचान हो? चतुर राजनीतिकों ने खेल खेला और दुर्भाग्य कि ये 'विशिष्ट' उनके जाल में फंसते चले गए।  संभवत: जान-बूझकर भी । संभवत:, कारण इनकी अपनी स्वार्थ पूर्ति भी !
पिछले दिनों उच्च सदन अर्थात राज्य सभा के लिए महाराष्ट्र से सत्ता पक्ष ने दो विभूतियों का चयन किया। एक डॉक्टर विकास महात्मे और दूसरे छत्रपति संभाजी राजे। कहा गया कि चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने के कारण डॉ. महात्मे को उच्च सदन में भेजा गया। डॉ. महात्मे ने नेत्र विशेषज्ञ के रूप में गरीबों की नि:शुल्क चिकित्सा कर समाज में काफी सम्मान प्राप्त किया।  एक अच्छे कुशल नेत्र विशेषज्ञ के साथ-साथ डॉ. महात्मे एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में समाज को हमेशा उपलब्ध रहे हैं। विगत दिनों इनके ऐसे योगदान के लिए ही भारत सरकार ने इन्हें पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया था।  कोई आश्चर्य नहीं कि राज्यसभा में भेजे जाने की खबर से प्रशंसक प्रसन्न हुए थे।  किंतु, तब सभी स्तब्ध रह गए, दुखी हुए जब उन्हें यह जानकारी मिली कि डॉ. महात्मे को राज्यसभा का सम्मान चिकित्सा एवं सामाजिक क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए नहीं बल्कि, उनकी जाति 'धनगर' के कारण मिला। धनगर जाति के लोग पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र में आरक्षण के लिए संघर्षरत हैं। मांग के पक्ष में धरना-प्रदर्शन भी होते रहे हैं। सच कि स्वयं डॉ. विकास महात्मे भी इनका नेतृत्व करते रहे हैं। डॉक्टर महात्मे की सामाजिक प्रतिष्ठा को देखते हुए इन्हें व्यापक समर्थन भी मिला और एक अवसर पर स्वयं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस भी धनगर समाज के एक आयोजन में सम्मिलित हुए। धनगर आरक्षण के पक्ष में आंदोलन ने पिछले दिनों महाराष्ट्र में गति प्राप्त कर ली है। किंतु, राजनीतिक मजबूरी ऐसी कि शाब्दिक सहानुभूति से अलग शासन फिलहाल आरक्षण देने में असमर्थ है।  राजनीतिक पंडित बताते हैं कि धनगर समाज की मांग की तीव्रता को कम करने के उद्देश्य से डॉक्टर महात्मे को धनगर प्रतिनिधि के रूप में राज्य सभा के लिए चयन किया गया।  इसकी पुष्टि भी तब हो गई जब स्वयं डॉक्टर महात्मे ने घोषणा की, कि जरूरत पड़ी तो धनगर समाज के आरक्षण के पक्ष में वे राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे सकते हैं। ध्यान रहे, अभी राज्यसभा के सदस्य के रूप में शपथ लेना शेष है। ऐसे में इस्तीफे की बात कहकर स्वयं डॉक्टर महात्मे ने अपने चयन के महत्व को कम कर डाला। इस बिंदू पर डॉक्टर विकास महात्मे एक सफल चिकित्सक अथवा लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता नहीं बल्कि, एक जातीय नेता के रूप में प्रकट हुए हैं। राजनीतिक स्वार्थ का यही पक्ष विशिष्ट क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलिब्धयों को हाशिए पर रख देता है।
दूसरे नामित संभाजी राजे छत्रपति के साथ भी ऐसा ही हुआ। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के वंशज और समाजसेवी के रूप में उन्हें राष्ट्रपति की ओर से तब नामित किया गया जब हरिद्वार के अखिल विश्व गायित्री परिवार के प्रमुख डॉक्टर प्रणव पंड्या ने अपना मनोनयन ठुकरा दिया था। तब डा. पंड्या की टिप्पणी थी कि राज्यसभा का माहौल उनके अनुकूल नहीं है। डा. पंड्या की भरपाई के रूप में संभाजी राजे का मनोननय किया गया। सामाजिक क्षेत्र में  उनकी उपलब्धियां रेखांकित की गईं किंतु, इस सच के उभरने में विलंब नहीं हुआ कि संभाजी राजे के मनोनयन का कारण भी उनकी जाति मराठा रही। राज्य का मराठा समाज भी अपने लिए आरक्षण के लिए संघर्षरत है। कांग्रेस नेतृत्व की पिछली महाराष्ट्र सरकार ने मराठा आरक्षण की घोषणा की भी थी किंतु, न्यायालय ने उसे अवैध घोषित कर दिया।  मराठा आरक्षण को वर्तमान सरकार का भी समर्थन प्राप्त है, इसके लिए कानून पड़ताल जारी है। कहते हैं धनगर डॉक्टर महात्मे की तरह मराठा संभाजी राजे छत्रपति का राज्यसभा के लिए मनोनयन कर मराठा जाति को संतुष्ट करने की कोशिश की गई है।
आरक्षण का मुद्दा अपनी जगह, मेरी चिंता का कारण यह कि क्या ये उपक्रम विशिष्ट क्षेत्रों में विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा अर्जित विशिष्ट उपलब्धियों का 'राजनीतिक दैत्य' के समक्ष 'बौनाकरण' नहीं है? इनका अपमान नहीं है? दुख और चिंता यह भी कि ऐसे व्यक्ति स्वयं भी राजनीतिक स्वार्थ की बलि चढऩे को तत्पर दिख रहे हैं। राजनीतिक स्वार्थ की सीढिय़ां चढ़ सत्ता सुख भोगने की यह कैसी वासना, जो अपनी ही अर्जित उपलब्धियों को अग्निकुंड में स्वाहा कर दे।
क्या आश्यर्च कि पूरा देश, पूरा समाज राजनीति, राजनीति और सिर्फराजनीति प्रभावित है!

पक्ष-विपक्ष की तरह विभाजित मीडियाकर्मी


कैराना तो एक उदाहरण है। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जो मीडिया मंडी को बाजार में निर्वस्त्र कर देंगे। दुख तो इस बात का है कि अल्पसंख्या में होने के बावजूद 'मीडिया मंडी' के ये तत्व इसलिए निडरतापूर्वक खुलकर बेशर्मों की तरह अपने कु-कृत्यों को अंजाम दे पाते हैं, क्योंकि शालीन, ईमानदार पत्रकारीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध मीडियाकर्मी खुलकर इन्हें बेनकाब करने सामने नहीं आ रहे। अगर ये मामला संपादकों, पत्रकारों अथवा संचालकों की तुच्छ स्वार्थपूर्ति  के लिए निष्पादित हुआ होता तो संभवत: देश इनका संज्ञान नहीं लेता।  किंतु, यह 'स्वार्थ' विभिन्न राजदलों की लोकतंत्र विरोधी कतिपय साजिशों को अंजाम देने के लिए पूरे किये जाते हैं। ये निश्चय ही राष्ट्रविरोधी, लोकतंत्र विरोधी हैं।
'मीडिया मंडी' में ऐसा कभी नहीं हुआ था! शोरगुल तो पहले भी होते थे, किंतु शेयर दलालों की तरह गला फाड़ चीखने-चिल्लाने सदृश नजारा, वह भी पक्षपातपूर्ण  बिरले ही देखने को मिलते थे। अब हालत यह है कि, कभी समाचार पत्रों में मुद्रित शब्दों को 'ईश्वरीय शब्द' मानने वाले पाठक हतप्रभ हैं कि टेलीविजनों पर प्रसारित समाचारों, विचारों से निकले शब्दों को 'दल्ला' के शब्द क्यों बताए जाने लगे?  ' सोशल मीडिया' जिसके माध्यम से आम जनता अपने विचार, अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करती हैं जरा उस पर एक नजर डाल लें। टीवी के मालिकों, संपादकों, संवाददाताओं व एंकरों को घोर अविश्वसनीय निरूपित करते हुए उन्हें ' दलाल और बिकाऊ' बताती हुई टिप्पणियों की भरमार मिलेगी। गाली-गलौच की सामान्य भाषा से आगे बढ़ते हुए अश्लील शब्दों के इस्तेमाल भी इन महान विभूतियों के खिलाफ आम बात हो गई है। मर्यादा असीमित। यह ठीक है कि इन टिप्पणियों को आम लोगों के विचार के रूप में दस्तावेज नहीं माना जा सकता। अमूमन ऐसी टिप्पणियां प्रायोजित होती हैं। चूंकि सोशल मीडिया पर कोई बंधन नहीं, कोई प्रबंधन, कोई संपादक नहीं, अपनी सुविधा अनुसार राजदल से लेकर मीडिया से जुड़ी संस्थाएं या लोग इसका उपयोग-दुरुपयोग करते रहते हैं। बावजूद इसके, यह सत्य भी अपनी जगह मौजूद है कि चिनगारी ही आग की लपटों में परिविर्तत होती हैं। हां, 'मीडिया मंडी' में ऐसी चिनगारियां स्पष्टत: परिलक्षित हैं। आग में घी डालने का काम स्वार्थी तत्व आसानी से कर जाते हैं।
अभी ताजातरीन उत्तर प्रदेश के कैराना की घटना लें। इलाहाबाद में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के अवसर पर भाजपा के एक सांसद ने कथित रूप से346 ऐसे हिंदुओं की सूची जारी की, जो राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक किंतु कैराना में बहुसंख्यक संप्रदाय के लोगों के खौफ से कैराना से पलायन कर चुके थे। एक जनसभा को संबोधित करते हुए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस कथित घटना को गंभीर चिन्हित करते हुए कह डाला कि, इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। अर्थात इसका गंभीरता से संज्ञान लिया गया। सूची जारी होने के साथ ही कुछ टेलीविजन कार्यक्रमों व समाचारों ने इसकी तुलना कश्मीर में पंडितों के पलायन से करते हुए अल्पसंख्यक समुदाय पर हल्ला बोल दिया।    उन पर आयोजित चर्चा कार्यक्रमों में इस कथित घटना के लिए राज्य सरकार और कतिपय राजदलों को दोषी ठहराया गया। घटना को सनसनीखेज बनाते हुए बताया गया कि, प्रदेश में बहुसंख्यक समुदाय स्वयं को असुरक्षित महूसस कर रहा है। लेकिन तभी दूसरी ओर कुछ अन्य टेलीविजन के संवाददाताओं ने मौके पर पुहंचकर छानबीन की, सांसद द्वारा जारी सूची में बताए गए नाम- पते पर पहुंचे और रहस्योद्घाटन किया कि सूची में अंकित कई लोगों की वर्षों पहले मृत्यु हो चुकी है, अनेक लोग वर्षों पहले बेहतर भविष्य और रोजगार की तलाश में कैराना छोड़ चुके थे। मजे की बात तो यह कि इस तथ्य के उजागर होने के बावजूद विभिन्न टेलीविजन कार्यक्रमों में पक्ष-विपक्ष की तरह द्वंद हुए और एक-दूसरे की जानकारियों को प्रायोजित निरूपित करने लगे। कार्यक्रमों में पूछा जाने लगा कि कैराना में संप्रदाय विशेष का बचाव क्यों किया जा रहा है? बताया यह भी गया कि कैराना पहुंच छानबीन करने वाले पत्रकार गलत गवाह, गलत तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं। गांव के लोगों को टेलीविजन के पर्दे पर लाकर जबरिया कहलाया गया कि फंला व्यक्ति की बहुत पहले मृत्यु हो चुकी है और फंला परिवार वर्षों पहले ही गांव छोड़ चुका है, तब उस टेलीविजन संस्थान की मंशा पर संदेह प्रकट होता है। लेकिन आरम्भ में कश्मीरी पंडितों से तुलना करते हुए खबर को सनसनीखेज बनाने वाले टेलीविजन के संपादक , पत्रकार अपनी बातों पर अड़े रहे और गलत सूची पेश करने वाले सांसद का बचाव करते रहे। वे भूल गए कि उनकी खबरों से न केवल प्रदेश बल्कि पूरे देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। वे यह भी भूल गए कि, उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक दल ऐसे मुद्दे उठा राजनीतिक लाभ लेना चाह रहे हैं।  मीडिया संस्थान यह भी भूल गए कि राजदल अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए उनका 'उपयोग' कर रहे हैं। क्या 'मीडिया मंडी' से जुड़े संपादक, पत्रकार इतने नासमझ अथवा भोले हैं कि, राजदल उनका आसानी से 'उपयोग ' कर ले? नहीं बिलकुल नहीं। ये तो स्वेच्छा से राजदलों की गोद में जा बैठे हैं। उनसे आलिंगनबद्ध हो पत्रकारीय दुराचार का मंचन कर रहे हैं। यह कृत्य न केवल मीडिया जगत बल्कि संपूर्ण राष्ट्र को शर्मसार करने वाला है। बल्कि अगर दो टूक शब्दों में कहा जाए तो 'मीडिया मंडी' के ऐसे कृत्य ने उन राजनेताओं के शब्दों को सच साबित कर दिया जिन्होंने समय-समय पर मीडिया को 'बाजारू और वेश्या' निरूपित किया था।
कैराना तो एक उदाहरण है। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जो मीडिया मंडी को बाजार में निर्वस्त्र कर देंगे। दुख तो इस बात का है कि अल्पसंख्या में होने के बावजूद 'मीडिया मंडी' के ये तत्व इसलिए निडरतापूर्वक खुलकर बेशर्मों की तरह अपने कु-कृत्यों को अंजाम दे पाते हैं, क्योंकि शालीन, ईमानदार पत्रकारीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध मीडियाकर्मी खुलकर इन्हें बेनकाब करने सामने नहीं आ रहे। अगर ये मामला संपादकों, पत्रकारों अथवा संचालकों की तुच्छ स्वार्थपूर्ति  के लिए निष्पादित हुआ होता तो संभवत: देश इनका संज्ञान नहीं लेता। किंतु, यह 'स्वार्थ' विभिन्न राजदलों की लोकतंत्र विरोधी कतिपय साजिशों को अंजाम देने के लिए पूरे किये जाते हैं। ये निश्चय ही राष्ट्रविरोधी, लोकतंत्र विरोधी हैं।

Tuesday, June 14, 2016

... राष्ट्रद्रोह है 'मुसलमान मुक्त भारत' का आह्वान!

साध्वी?
नहीं ! मैं साध्वी संबोधन नहीं कर सकता। किसी बदजुबान के लिए यह विशेषण पाप होगा। सिर्फप्राची। संत या साध्वी किसी धर्म, संप्रदाय, जाति, वर्ग या समाज के विरुद्ध और इनसे आगे बढ़ते हुए किसी संप्रदाय विशेष को   'खत्म' किए जाने की वकालत कैसे कर सकते हैं? हिंदू संस्कृति और धर्म इस बात की अनुमति नहीं देता है, बल्कि  चर्चा ही नहीं करता। फिर ऐसे किसी बदजुबान को साध्वी कहलाने का हक कैसे दे दिया जाए?
यह पहली बार नहीं है जब प्राची ने अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध विष वमन किया हो। अनेक मौकों पर वह अल्पसंख्यकों को राष्ट्रद्रोही निरूपित करते हुए उनके सफाए का आह्वान कर चुकी हैं। ऐसे -ऐसे कड़वे बोल उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बोले, जो   देश के वर्तमान कानून के अनुसार ही उन्हें राष्ट्रद्रोही घोषित कर डालेंगे। समाज में सांप्रदायिक आधार पर विभिन्न समुदायों के बीच वैमनस्य फैलानेवाला राष्ट्रद्रोही ही तो हो सकता है। ये वही प्राची है, जिन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अंग्रेजों का एजेंट करार दिया था। यह कहने से नहीं चुकी थी कि देश को आजादी महात्मा गांधी के तकली कातने से नहीं मिली थी। इसी प्राची ने आरोप लगाया था कि अंग्रेजों के जमाने में पूरे देश में जहां सिर्फ 300 कत्लगाह थे अब वे बढ़कर 30,000 हो गए हैं। इस आरोप के क्रम में प्राची यह भूल गई थी कि देश का सबसे बड़ा कत्लगाह गुजरात में है। और यह भी कि न केवल इस कत्लगाह का मालिक बल्कि देश के अधिकांश कत्लगाहों के मालिक कोई और नहीं हिंदू ही हैं।  जब दादरी कांड में अखलाक की हत्या हुई तो तत्काल बोल पड़ी थीं कि गौ-मांस खानेवालों का यही हश्र होना चाहिए। यहां भी प्राची भूल गईं कि स्वयं केंद्र सरकार में एक ऐसे मंत्री मौजूद हैं जिन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि ''हां, मैं 'बीफ' खाता हूं, कौन रोकेगा मुझे?'' संभवत: प्राची को अभी भी इनकी हत्या की प्रतीक्षा हो। जम्मू में अमरनाथ और वैष्णोदेवी जानेवाले यात्रियों पर हमले की संभावना के बीच प्राची ने चेतावनी दी थी कि अगर ऐसा हुआ तो हज यात्रियों को इसका खामियाजा भुगतना होगा। और तो और, पठानकोट हमले के बाद उनका विवादित बयान आया कि सेना में बैठे मुस्लिम अफसरों की जांच हो कि कहीं उनके तार पाकिस्तान से तो जुड़े नहीं हैं। मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या के जवाब में प्राची ने हिंदू महिलाओं से आह्वान किया था कि वे भी पांच-पांच बच्चे पैदा करें।
सभी बोल कानून विरोधी, संविधान विरोधी और राष्ट्र विरोधी। फिर भी साध्वी के मुलम्मे के साथ समाज के नेतृत्व करने का दावा करनेवाली प्राची कानून को ठेंगा दिखाते हुए, देश के शासकों को ठेंगा दिखाते हुए बेखौफ छुट्टा घूम रही हैं, समाज और देश को सांप्रदायिक आग में झोंकने वाले बयान देती जा रही हैं और देती ही जा रही हैं। और आश्चर्य कि कोई रोकनेवाला नहीं, कोई कानूनी कार्रवाई नहीं। 'राजनीति' करते हुए उनके बयानों को निजी बताते हुए लोग पल्ला तो झाड़ लेते हैं किंतु  अपेक्षित कार्रवाई नहीं की जाती। फिर प्राची 'उत्साहित' हो तो क्यों नहीं?
इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी। प्राची ने रुडकी में कहा कि '' हमने 'कांग्रेस मुक्त' भारत का स्वप्न  पूरा कर लिया है। अब समय है मुसलमान मुक्त भारत बनाने का। ''  क्या यह देशद्रोह नहीं? कथित रूप से पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगानेवाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर राजद्रोह का मुकदमा दायर कर जेल भेज दिया गया था। गुजरात में आरक्षण के पक्ष में पाटीदार आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले युवा हार्दिक पटेल को भी राजद्रोही निरूपित करते हुए जेल भेज दिया गया। फिर देश में पूरे संवैधानिक अधिकार के साथ रहनेवाले करोड़ों मुलमानों के खिलाफ, उनसे भारत को मुक्त करने का आह्वान करनेवाली प्राची पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा क्यों नहीं? क्या धर्म-संप्रदाय के आधार पर समाज में वैमनस्य फैलाना कानूनन अपराध नहीं है? क्या एक संप्रदाय विशेष के लोगों से देश को 'मुक्त' किए जाने का आह्वान अलगाववाद और आतंकवाद को प्रोत्साहित नहीं करता? क्या यह आह्वान देश के एक और विभाजन का आगाज नहीं देता? बिलकुल शत प्रतिशत ! इन आरोपों की अपराधी प्राची हैं। आश्चर्य है कि देश के कानून की नजरों में ये क्यों नहीं आ पा रहीं? यहां उल्लेखनीय यह कि प्राची कांग्रेस मुक्त भारत का लक्ष्य प्राप्त कर लेने की बात कह रही है। और चूंकि 'कांग्रेस मुक्त' भारत का नारा स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिया था, क्या देश यह मान ले कि प्राची प्रधानमंत्री के ही किसी लक्ष्य को आगे बढ़ा रही हैं? सामाजिक और राष्ट्रीय सद्भाव के पक्ष में हर धर्म, संप्रदाय के लोगों को साथ ले विकास मार्ग पर कदमताल करने का आह्वान, बल्कि संकल्प लेने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा चाहेंगे इस पर देश विश्वास करने को तैयार नहीं। इस पाश्र्व में प्राची का अपराध और गुरूतर हो जाता है, क्योंकि उनके शब्दों से स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि के दागदार होने का खतरा है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने प्राची के वक्तव्य से दूरी बनाते हुए यह अवश्य कहा है कि पार्टी प्राची के बयान से इत्तेफाक नहीं रखती है, यह सवाल पूछा जाएगा कि तब प्राची के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? वैश्वीकरण के वर्तमान युग में जब भारत और विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं, प्राची का बड़बोलापन भारत को विश्व की नजरों में संदिग्ध बनाता रहेगा। सत्तापक्ष, विशेषकर प्रधानमंत्री मोदी को प्राची के बड़बोलेपन का उचित संज्ञान लेना ही होगा। अन्यथा यह खतरा मौजूद रहेगा कि लोगबाग  कहीं प्राची के शब्दों को 'सत्ता-प्रेरित' न मान लें। अगर ऐसी 'दुर्घटना' हुई तो तय मानिए कि विकास संबंधी भारत के सभी कार्यक्रम -योजनाएं अपेक्षित परिणाम कभी भी नहीं दे पाएंगी। क्या प्रधानमंत्री मोदी ऐसा चाहेंगे?
दो वर्ष पूर्व केंद्र में सत्ता परिवर्तन के पश्चात 'राष्ट्रीय परिवर्तन' की जो बयार बह रही है उसके सकारात्मक परिणाम तभी मिलेंगे जब 'सबका साथ, सबका विकास' की अवधारणा को ईमानदारी के साथ क्रियान्वित किया जाए।  इसके लिए जरूरी है कि प्राची व उनके जैसी साध्वियों व संतों के राष्ट्रद्रोही क्रिया-कलापों पर अंकुश लगाया जाए। कानून सबके लिए समान है। इसके पालन के मार्ग में 'भगवा' को अपवाद न बनाया जाए। कानून और न्याय जब तक पक्षपात व पूर्वाग्रह से मुक्त रहेंगे लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा। विकासपथ पर भारत को अभी लंबा मार्ग तय करना है। मार्ग में अवरोधक स्वत: प्रकट होंगे, कुछ नैसर्गिक , कुछ राजनीतिक। ऐसे में अगर 'परिवार' ही अवरोधक बन सामने खड़े होते रहेंगे तब विकास तो दूर अराजकता का ऐसा झंझावात पैदा होगा जो व्यवस्था के साथ-साथ प्राचीन मान्यताओं को भी तार-तार कर डालेगा। मैं नहीं समझता कि साफ नीयत प्रधानमंत्री व उनके सहयोगी कुछ ऐसी आपदा को आमंत्रित करना चाहेंगे।

Friday, June 3, 2016

जश्न, जश्न और जश्न !

एक होता है भरे पेट का चिंतन। दूसरा, पेट भरने के लिए चिंतन। दोनों में फर्क उत्तर-दक्षिण की भाँति है। वर्तमान, पूर्व और भावी शासक इसे याद रखें। जश्न के वर्तमान दौर में जनता इन्हें इस कसौटी पर भी कसेगी।
मोदी सरकार के दो वर्ष पूरे हुए और सरकार तथा संगठन के स्तर पर शृंखलाबद्ध जश्न मनाया गया।  एक ऐसा जश्न जो आजादी के बाद कभी भी किसी सरकार ने 5 वर्ष, 10 वर्ष या 15 वर्ष पूरे होने के बाद भी नहीं मनाया था। पूरे देश को मीडिया के सहयोग से जश्नमय कर दिया गया। सरकारी खजाने से बताते हैं कि 1,000 करोड़ से अधिक इन जश्नों पर खर्च कर दिए गए। बिल्कुल राष्ट्रीय पर्व की तरह विकासपर्व के रूप में ये जश्न मनाया गया। भारत में घोषित राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के प्रचार - प्रसार पर भी कभी इस राशि का अंशमात्र भी व्यय नहीं हुआ। फिर ऐसा क्या चमत्कारिक हो गया था कि किसी एक केंद्र सरकार के कार्यकाल की अवधि के दो वर्ष पूरा होने पर ऐसे जश्न मनाए जाएं? चूंकि यह देश, भारत देश, किसी एक व्यक्ति या संगठन की बपौती नहीं है, जनता का ऐसे जश्नपर सवाल उठाना उनका हक है। फिर क्यों हुआ ऐसा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कहा था कि यह 'हाईप' का युग है। सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री ने यह बात कही थी। तो क्या प्रधानमंत्री उवाचित इसी शब्द से प्रेरित हो सरकार और संगठन ने 'हाईप' निर्माण हेतु अघोषित राष्ट्रीय उत्सव मनाया? शायद सच यही है। लेकिन इस प्रक्रिया में रणनीतिकार इस अकाट्य तथ्य को भूल गए कि ऐसे जश्न की प्रासंगिकता तभी प्रमाणित होती है जब सामान्य जन की सहभागिता हो। आलोच्य प्रसंग में ऐसी सहभागिता संदिग्ध है। इन जश्नों के माध्यम से सरकार की ओर से लोगों को यह बताने की कोशिश की गई कि सरकार अपने वादों के अनुरूप देश को विकास के रास्ते ले जा रही है और उपलब्धियों का सिलसिला शुरू हो चुका है। बताने की कोशिश की गई कि, लोकसभा चुनाव के दौरान दल ने, विशेषकर नरेंद्र मोदी ने जो वादे किए थे, सत्ता में आने के बाद पार्टी उन्हें पूरी शिद्दत के साथ पूरा कर रही है। उपलब्धियों के नाम पर आर्थिक मोर्चे पर कथित सफलता और विदेशों में भारत की गूंज को पेश किया गया।  सरकार की ओर से बताया गया कि विनिर्माण, ऊर्जा, सॉफ्टवेयर आयात जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त की गई हैं और किसानों व युवाओं के कल्याण के लिए ऐसे कदम उठाए गए जो पहले उपक्षित रहे। दावा किया गया कि यह इकलौती सरकार है जिसने हर दिन एक नई पहल की है।
अब राष्ट्रीय बहस छिड़ गई है कि क्या सचमुच मोदी सरकार की दो वर्ष की कथित उपलब्धियां भविष्य की सफलता की सूचक हैं? सवाल किए जा रहे हैं कि क्या मोदी सरकार ने अपने चुनावी वादों को पूरा किया? सप्रमाण यह कहा जाने लगा है कि आरम्भिक दो वर्ष का कार्यकाल निराशा और विफलतापूर्ण रहा है। आंकड़ों के साथ प्रमाणित किया जाने लगा है कि जीवनोपयोगी उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों में इस दौरान कई गुणा वृद्धि हुई है। महंगाई इतनी कि ऐसी वस्तुएं अब सामान्य जन की पहुंच से बाहर की हो गई हैं। रोजगार के मोर्चे पर भी स्पष्टत: अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए हैं। युवा इससे आक्रोशित हैं। कृषि से लेकर अन्य औद्योगिक उत्पादनों में भी गिरावट सामने है। निर्यात में भी गिरावट के संकेत हैं। दावों के अनुरूप विदेशी पूंजी निवेश अभी संदिग्ध है। बैंकिंग क्षेत्र खतरनाक रूप से पतन की ओर जाता दिख रहा है। तकनीकी बाजीगरी के आधार पर प्रस्तुत तर्क चाहे जितना दे लें, जो खतरनाक रूप से दृष्टिगोचर है वह यह कि, एक ओर जहां छोटे -छोटे कर्जदार वसूली की यंत्रणा से आक्रांत हो आत्महत्या तक करने को मजबूर हो रहे हैं, वहीं बड़े पूंजीपतियों के हजारों-लाखों करोड़ के कर्ज एक झटके में माफ कर दिए जा रहे हैं। फिर क्या आश्चर्य कि इतिहास में पहली बार बड़े बैंक हजारों करोड़ के घाटे का सामना कर रहे हैं। यह एक ऐसा कड़वा सच है जिसकी सफाई सरकार को देनी ही होगी।
जश्न मना रहे हैं, जरूर मनाएं। लेकिन जब ईमानदार आत्मपरीक्षण को तरजीह देंगे तब सत्ता पक्ष को चिंतन-मनन करना चाहिए कि कथित तमाम उपलब्धियों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'कर्मवीर' की जगह 'भाषणवीर' से क्यों नवाजा जा रहा है? 'जुमले' का जुमला क्यों चर्चित है? देश का अल्पायु बच्चा भी आज सशंकित , आतंकित क्यों है? इतने 'हाईप' के बावजूद पूरे देश में अनिश्चितता का वातावरण कैसे कायम हो गया? किसान आत्महत्या की संख्या में निरंतर वृद्धि क्यों हो रही है? धर्म, जाति, संप्रदाय के नाम पर समाज में विभाजन की रेखाएं क्यों खिंचती जा रही हैं? गलत ही सही लेकिन विचारधारा विशेष को आम जनता पर थोपने के आरोप क्यों लग रहे हैं? अंग्रेजों की गुलामी से देश को मुक्त करवाने वाले  राष्ट्रपुरुषों के अपमान का सिलसिला कैसे शुरू हो गया? पिछले 6 दशक की जिन उपलब्धियों के कारण भारत को पूरे संसार में एक विशिष्ट मान्यता प्राप्त हुई, भारत का लोकतंत्र पूरे संसार के लिए अनुकरणीय बना, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए उन्हें नकारात्मकता की स्याही से क्यों रेखांकित किया जा रहा है? निर्माण क्षेत्र में प्रगति का दावा करनेवालों को यह भी बताना होगा कि, पिछले दो वर्षों के दौरान सीमेंट और लोहे का उपयोग लगभग आधा क्यों हो गया? आदि-आदि ! ऐसे अनेक सवाल हैं जिन पर सत्ता पक्ष को आत्मचिंतन करना होगा। लोगों की स्मरण शक्ति इतनी कमजोर नहीं कि वे अतीत को भूल जाएं। वर्तमान की सफलता का आकलन अतीत के साथ तुलना से ही संभव हो पाता है। 'हाईप' पैदा कर अतीत पर काली चादर डाल वर्तमान को सफेद प्रमाणित नहीं किया जा सकता।
मोदी सरकार अगर सचमुच एक निर्णायक सरकार के रूप में स्थापित हो जनस्वीकृति प्राप्त करना चाहती है तो, उसे हीन-घृणित दलीय संघर्ष से ऊपर उठ व्यापक राष्ट्रहित में पूरी ईमानदारी के साथ अपने घोषित वाक्य 'सबका साथ सबका विकास' पर अमल करना होगा। इतिहास अगर बदलना ही है तो उस इतिहास को बदल दें जिसने हर सदी -काल में समानता की जगह विषमता को ऊर्जा प्रदान की है। भारत एक संसाधनपूर्ण समृद्ध देश है, इस पर कोई बहस नहीं। इसकी लोकतांत्रिक नीवं बहुत ही मजबूत है।  लेकिन 'मन की बात' करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 'भारतीय मन' से अपरिचित नहीं हो सकते। और यह 'भारतीय मन' ही है जो ईमानदार कर्मठ नेतृत्व को तो सिर आखों पर तो बिठाता है, किंतु भ्रष्ट, अयोग्य को गटर में फेंकने से नहीं हिचकता। 2014 का आम चुनाव परिणाम इसका प्रमाण है। लेकिन प्रधानमंत्री जी! सत्य यह भी कि आप के कुनबे में भी अब 2014 के पूर्व के रोगों के कीटाणु प्रवेश करने लगे हैं। एक सही चिकित्सक के रूप में उनको मौत देने की जिम्मेदारी आप पर है। अन्यथा इतिहास दोहाराया जाने की कु-परम्परा से आप परिचित तो होंगे ही!

आधुनिकता के वरण को तैयार पत्रकारिता, किन्तु...?

''पत्रकारों के पैरों के छालों से आज का इतिहास लिखा जाएगा।''
महादेवी वर्मा के इन शब्दों में निहित विश्वास और अपेक्षा स्पष्टत: दृष्टिगोचर है। इन शब्दों के माध्यम से महादेवी वर्मा ने पत्रकारों से जो अपेक्षा व्यक्त की थी, क्या वे पूरी हुईं? विगत 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस पर यह सवाल खड़ा हुआ। वैसे देश के अधिकांश पत्रकारों, मीडिया समूहों और संस्थाओं को इस दिवस की याद नहीं आई। जिन लोगों ने याद रखा वे चिंतन की मुद्रा में अवश्य आए। आतिशी शीशे लेकर वे पत्रकारों के पैरों के छालों को ढूंढने निकले। वैसे छालों को जिनसे महादेवी वर्मा ने आज का इतिहास लिखे जाने की कल्पना की थी। खोजी निराश हुए। छालेयुक्त पैरोंवाले पत्रकार तो नहीं मिले, 'ब्रांडेड' जूतों से सुरक्षित पैरधारक पत्रकार ही उन्हें मिल पाए। हो सकता है कहीं दूर-दराज स्थल में कोई 'अपवाद' मौजूद हो, किंतु खोजी वहां पहुंच नहीं पाए। फिर महादेवी वर्मा की इच्छा की पूर्ति करने वाले इतिहास लेखक करें तो क्या करें?
तो क्या सचमुच पत्रकार और पत्रकारिता इतिहास प्रेरक के योग्य नहीं बन पा रहे? पूर्णत: अविश्वसनीय बन चुके हैं? इतने सुविधाभोगी बन गए हैं कि शपथपूर्वक उनकी ईमानदारी को उद्धृत कर इतिहास में दर्ज करने योग्य कोई नाम न मिले? हां, कड़वा सच यही है! कतिपय राजनेता व अन्य आज अगर पत्रकारों और पत्रकारिता को कोठे पर बैठा देखने लगे हैं, तो दोष इनकी आंखों का नहीं है। दोष हमारे चरित्र का है, हमारे कृत्य का है। पाठकीय अपेक्षा के बिल्कुल उलट आज हम जब सुविधा के सागर में तैरते हुए सत्ता व व्यवस्था का कल्पित स्तुतिगान करते रहेंगे तो हम पर कोई विश्वास करे तो कैसे? भ्रष्ट राजनेता, उद्योगपति व नौकरशाह तो चाहेंगे ही कि हमारी सफेद पोशाक को दागदार बना हमें मुंह छुपाने को विवश कर दें। तभी उनकी सत्ता सुरक्षित रह पाएगी, विस्तार होता रहेगा। पहले भी ऐसा होता था, किंतु एक सीमा के अंदर। आज यह एक विस्तारित कु-प्रथा के रूप में सर्वत्र उपस्थित है। हजारों, लाखों, करोड़ों के भ्रष्टाचार पर परदा डालने के लिए सैकड़ा में करोड़ों उपलब्ध कर गौरवशाली पत्रकारिता के पवित्र मंदिर को भ्रष्ट किया जाना अब कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता। भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में पत्रकारिता के बड़े-बड़े हस्ताक्षर बेनकाब हो चुके हैं।  टेलीविजन पत्रकारिता के उदय के साथ इस रोग ने कैंसर का रूप ले लिया है। अब मामला सिर्फ संपादकीय कक्ष तक सीमित नहीं है। इनके ऊपर प्रबंधन की बड़ी मांग हॉवी है। संपादकीय कक्ष को पंगु बना प्रबंधन पत्रकारिता को बाजारू बनाने में हिचकता नहीं। स्वार्थ और लोभवश संपादक और उसके अधीनस्थ प्रबंधन के इस खेल के भागीदार बन जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि आज की पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। सूचना अर्थात सही खबर और निष्पक्ष विश्लेषण की जगह प्रायोजित खबरें और पक्ष-विशेष के लाभार्थ तैयार विश्लेषण प्रस्तुत किए जाने लगे हैं। निश्चय ही यह पाठकों, समाज व देश के साथ छल है, विश्वासघात है।
समाचार पत्रों -पत्रिकाओं में इन दिनों  जो घटिया सामग्री परोसी जा रही है, उसके लिए प्रबंधन और उसकी हां में हां मिलाने वाला संपादकीय कक्ष पाठकीय रुचि और मांग की दुहाई देता है। इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता । सच तो यह है कि अच्छी, स्वस्थ पाठकीय रुचि जागृत करने की जिम्मेदारी भी समाचार पत्रों-पत्रिकाओं पर है। पाठकीय रुचि का बहाना तो वे तत्व बनाते हैं जो एक सर्वथा अरुचिकर भ्रष्ट समाज की स्थापना के पक्षधर हैं। अपनी तुच्छ स्वार्थसिद्धि के लिए वे पूरे समाज को भ्रष्ट देखना चाहते हैं। पिछले दिनों एक बड़े अंग्रेजी दैनिक के स्थानीय संपादक यह कहते हुए पाए गए थे कि, 'हां! हम पाठकों को 'करप्ट' करने के लिए आए हैं।' इस मानसिकता का न केवल विरोध हो बल्कि इस पर पूर्णविराम सुनिश्चित किया जाना चाहिए। पाठकों की रुचि के सवाल पहले भी खड़े होते रहे हैं। लेकिन समाज-देश के प्रति समर्पित संपादकों ने इस तर्क पर कभी भी समझौते नहीं किए। 19 वीं शताब्दी में पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी के संपादन में 'विशाल भारत' ने जो उंचाइयां प्राप्त की थी, जो पाठकीय स्वीकृति उसे मिली थी,वह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। पंडित चतुर्वेदी ने कथित पाठकीय रुचि के तर्क की चर्चा करते हुए एक बार लिखा था कि,'पाठकों की रुचि को प्रधानता मैंने कभी नहीं दी, सात्विक मानसिक भोजन तैयार करना ही हम लोगों ने अपना परम कर्तव्य समझा। पाठकों को यह रुचता है या नहीं, इसे हमने कभी सामने नहीं रखा। और इसीलिए 'विशाल भारत' को सस्ती लोकप्रियता कभी नहीं मिली। 'विशाल भारत' ने गंभीर पाठकों और गंभीर लेखकों को सदैव आकर्षित किया।' निश्चय ही पंडित चतुर्वेदी का आशय 'अरूचिकर' रूचि से रहा होगा। यह सस्ती लोकप्रियता ही है, जिसे अर्जित कर पत्र-पत्रकार व संचालक स्वयं को महिमामंडित करते हैं। खेद है कि वे सस्तेपन की लज्जा से उठनेवाली दुर्गंध को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में अगर पत्रकारीय वातावरण दुर्गंधमय हो जाए तो आश्चर्य क्या?
विलंब अभी भी नहीं हुआ। आधुनिक पत्रकारिता के नाम पर आधुनिकता के लबादा धारक सचेत हो जाएं। पतन की गहराई में पहुंचने के बावजूद आज भी देश-समाज पत्र और पत्रकारों की ओर आशाभरी दृष्टि लगाए बैठा है। उनके विश्वास के साथ कोई घात न हो, कोई छल न हो।
आधुनिक पत्रकारिता के मायने बदल जाने की दुहाई देनेवाले ये न भूलें कि पत्रकारिता के मूल्यों को कोई बदल नहीं सकता। वह अक्षुण्ण है। इसे रौंदने की मंशा रखनेवाले अपनी तात्कालिक सफलता के गुमान में न रहें। अंतत: वे गिरेंगे, नष्ट हो जाएंगे। आधुनिक पत्रकारिता, आधुनिकता का वरण तो करेगी किंतु उसके सकारात्मक पहलुओं को, विद्रूप स्वरूप को कदापि नहीं!  

कांग्रेस : वंश मंजूर, अयोग्यता नहीं !

पुरानी मान्यता है कि  'अवसर' कभी भी किसी को वंचित नहीं रखता। समय व अवसर देख 'अवसर' कभी न कभी, सभी के समक्ष उपस्थित अवश्य होता है। तब निर्भर करता है कि उसका उपयोग कौन, कब, कैसे करता है? समयानुसार सदुपयोग की दशा में अनुकूल परिणाम मिलते हैं, दुरुपयोग की दशा में विपरीत हानिकारक प्रमाण। हर काल में यह प्रमाणित होता आया है। बावजूद इसके जब जान-बूझकर, मंदबुद्धि कारण या फिर निज स्वार्थवश अगर उपलब्ध 'अवसर' को नजरअंदाज किया जाता है तब परिणाम के खाते में विफलता और सिर्फ विफलता ही आती है।
ताजा राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृष्य में, विडम्बनावश देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कुछ ऐसी ही अवस्था को प्राप्त है। अवसर सामने है, तथापि नेतृत्व समय की मांग के अनुरूप इसका सदुपयोग करने में हिचकिचा रहा है। नेतृत्व इस तथ्य को भूल जा रहा है कि सत्ताच्युत होने के बाद भी देश की निगाहें कांग्रेस पर टिकी हैं। 'परिवर्तन' के पक्ष में प्रयोगवश देश के बहुमत ने जिस भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी है, उस पर निगरानी व अंकुश की अपेक्षा जनता एक सशक्त विपक्ष के रूप में कांग्रेस से कर रही है। लोकसभा में अल्पसंख्या के बावजूद पिछले 2 वर्ष के कार्यकाल में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में सफल तो रही है, किंतु एक राष्ट्रीय दल के रूप में जनमानस के बीच अपेक्षित स्वीकृति प्राप्त करने में विफल रही है।
समीक्षक एकमत हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी की मौजूदगी के बावजूद पूरा देश अभी भी उन पर पूरी 'आस्था' प्रकट नहीं कर पा रहा है। राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें अध्यक्ष पद के लिए तैयार करने की कोशिशें की गईं। कुछ परिलक्षित परिवर्तन और प्रगति के पश्चात भी राहुल गांधी स्वयं पार्टी के अंदर एकमेव पसंद नहीं बन पा रहे हैं। यह एक सच है और इस तथ्य के आधार पर ही कांग्रेस को भविष्य के लिए नेतृत्व और रणनीति पर निर्णय लेना होगा। पुत्रमोह व वंशमोह से इतर व्यापक दलहित में फैसले लेने होंगे। इस सचाई को ध्यान में रखते हुए कि इस बिंदू पर गलत निर्णय न केवल कांग्रेस दल बल्कि भारत और भारत के लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होगा। विकल्प मौजूद है। वंश के भीतर भी, वंश के बाहर भी।
गलत ही सही, यह धारणा अभी भी आधारहीन नहीं हुई है कि कांग्रेस को 'गांधी -नेहरू' का मुलम्मा चाहिए ही। आजादी के बाद से मतदाता के बीच 'गांधी-नेहरू' अपनी पैठ बना चुका है। पिछले चुनाव में पराजय का कारण इसके प्रति मोहभंग नहीं, बल्कि भष्टाचार था। जिस प्रकार 1977 में कुशासन और भ्रष्टाचार के कारण जनता ने कांग्रेस को अस्वीकार कर दिया था उसी प्रकार 2014 में भी जनता ने कांग्रेस के खिलाफ मत प्रकट कर भ्रष्टाचार के विरूद्ध अपना फैसला सुनाया था। अर्थात जनता को गांधी-नेहरू परिवार तो स्वीकार्य है किंतु भ्रष्टाचार नहीं। परिवार में भी 'योग्यता' पसंद करेगी जनता। कड़वा सच कि इस कसौटी पर राहुल गांधी खरे नहीं उतर रहे। फिर क्यों नहीं परिवार में मौजूद अन्य योग्य व स्वीकार्य चेहरे को सामने ला कांग्रेस नया प्रयोग करे। हां, यहां एक और सिर्फ एक चेहरा प्रियंका गांधी के रूप में सामने है। प्रयोग के तौर पर अगले वर्ष होनेवाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की कमान प्रियंका को सौंप पार्टी उनकी उपयोगिता की परीक्षा ले सकती है। निर्णय सिर्फ कांग्रेस दल के हित हेतु न हो, वृहत्तर राष्ट्रीय हित संबंधी हो। 

Monday, May 30, 2016

... तो 'पाषाण पुरुष' बन जाएं नितिन गडकरी!



कोई ठकुरसुहाती नहीं, अर्थात व्यक्तिवंदना नहीं।
एक सच, यथार्थ का रेखांकन मात्र।
वह भी इसलिए कि आधुनिक तकनीकी से तेज रफ्तार दौड़ती जिंदगी और सत्ता सिंहासन के मोह से कोसों दूर देश और समाज के प्रति जनहित में पूर्णत: समर्पित व्यक्तित्व को सामान्य लोगों के बीच उसकी संपूर्णता में पहुंचाने का अहम दायित्व भी हमारी बिरादरी को निभाना है। विघ्नसंतोषी इसे संभवत: स्वार्थ अथवा अवसरवादिता के चश्मे से देख सकते हैं, किंतु जानकार पुष्टि करेंगे कि जब बात बेबाकपन और विकास की हो तब -तब मैंने कलम उठाई है और नि:संकोच सच को चिन्हित किया है। शपथपूर्वक कह दूं कि यहां शब्दांकित सभी तथ्य जनहित में एक ऐसे  व्यावहारिक विकास पुरुष को समर्पित हैं जिससे देश और समाज को काफी अपेक्षाएं हैं।  दोहरा यह भी दूं कि आलोच्य व्यक्तित्व को ऐसे किसी 'मंच' की जरूरत नहीं किंतु कर्तव्य निष्पादन के स्मरणार्थ और कुछ-कुछ प्रोत्साहनार्थ भी यह प्रयास अंतत: जनहित में सहयोगी साबित होगा।
हां, मैं चर्चा कर रहा हूं केंद्रीय राजमार्ग, परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी की जिन्होंने विगत 27 मई को जीवन के 59वें वर्ष में प्रवेश किया। एक ओर जब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी 'विकास पर्व' के रूप में सत्ता के दो वर्ष का जश्न मना रही है तब देश के इस 'विकास पुरुष' की चर्चा न्यायोचित है। क्योंकि यह तथ्य देश के सामने मौजूद है कि मोदी सरकार  अब तक की अपनी उपलब्धियों पर अगर गर्व कर रही है तो इसका अधिकांश श्रेय नितिन गडकरी द्वारा अपने मंत्रालयों के माध्यम से  निष्पादित विकास कार्य ही हैं। पूरे देश का दौरा कर लें, हर जगह नितिन गडकरी के कार्यों की छाप आपको मिलेगी। चाहे राजमार्गों के विस्तार का काम हो, नई सड़कों के निर्माण का काम हो, पुलों के निर्माण का कार्य हो अथवा बंदरगाह और नौवहन के मोर्चे पर भारत की विशाल क्षमता के दोहन का दायित्व हो, इस विकास पुरुष गडकरी की सूझ-बूझ, कर्मठता और संपूर्ण समर्पण की चमक हर जगह प्रस्फुटित है। भारत देश पहली बार एक ऐसी 'नीली क्रांति' के लिए तत्पर हुआ जिससे कम से कम दो करोड़ नये रोजगार के अवसर बेरोजगारों को मिलेंगे। यह दूरदृष्टा गडकरी के सोच की परिणति है कि सागरमाला के जरिए एक करोड़ रोजगार के अवसरों के सृजन के अलावा जहाजरानी, राजमार्ग और अन्य क्षेत्रों में सफलतापूर्वक एक करोड़ से अधिक और रोजगार के अवसरों का सृजन संभव हो पाएगा। बंदरगाह, सड़क और जहाजरानी जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजन की व्यापक संभावनाओं की पड़ताल कर उन्हें साकार करने के प्रति दृढ़ संकल्प गडकरी देश के बेरोजगार युवाओं के लिए एक प्रकाश पुंज के रूप में अवतरित हुए हैं।
क्या इस बात से कोई इनकार करेगा कि यह नितिन गडकरी हैं जिन्होंने विश्व की सभी महान सभ्यताओं के नदियों और समुद्रों के आस-पास समृद्ध होने के तथ्य को रेखांकित करते हुए देश के विकासमार्ग पर कदमताल किया है? देश में 8 नये बंदरगाहों की स्थापना का उनका निर्णय भी रोजगार की संभावनाओं से परिपूर्ण है। क्या यह दोहराने की जरूरत है कि यह रोजगार ही है जिसकी उपलब्धता देश की समृद्धि को चिन्हित करती है? व्यावहारिक नितिन गडकरी ने आरम्भ से ही इस आवश्यकता को पहचान योजनाएं बनाईं और दृढ़तापूर्वक इनके क्रियान्वयन के लिए सक्रिय हुए। इनकी कार्यशैली के कायल अधिकारी वर्ग का भरपूर सहयोग गडकरी को इसीलिए मिलता है क्योंकि इनके प्रयास स्वार्थ से दूर जनहित आधारित होते हैं। इस बिंदु पर मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साधुवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने नितिन गडकरी में निहित क्षमता को पहचान उनके अनुकूल मंत्रालय सौंपे।
एक पुरानी कहावत है कि 'आलोचना व ईष्र्या के शिकार वही होते हैं जो काम करते हैं।' निकम्मों पर भला कौन ध्यान देता है? पहले से उपेक्षित यह वर्ग सर्वदा उपेक्षित की अवस्था में रहता है।  हां, काम करनेवालों को समाज का एक खास वर्ग जिसमें न केवल बाहरी ईष्र्यालु बल्कि कुछ अपने भी शामिल होते हैं, हमेशा निशाने पर लेते हैं। गडकरी भी ऐसी 'नियति' के शिकार हो चुके हैं। 53 वर्ष की अवस्था में जब गडकरी भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तब दिल्ली  दरबार की एक चौकड़ी इन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। कुछ वार सामने से किए गए, कुछ पीठ पीछे। लेकिन अविचल गडकरी ने पार्टी हित में जब परिणाम देने शुरू किए तब आलोचक शिथिल पड़ गए। पार्टी अध्यक्ष के रूप में इनकी पहली परीक्षा बिहार विधानसभा चुनाव थी। नीतीश कुमार के साथ गठबंधन की सरकार में शामिल भाजपा के लिए नकारात्मक भविष्यवाणियां राजनीतिक पंडित कर रहे थे। लेकिन गडकरी की रणनीति से जब 102 सीटों पर चुनाव लडऩेवाली भाारतीय जनता पार्टी के 93 उम्मीदवार विजयी हुए तब सभी चौंक गए। चूंकि सफलता का प्रतिशत नीतीश कुमार की जदयू से अधिक था, आलोचकों के मुंह पर ताला जड़ गया। इसके बाद 2013 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में भी गडकरी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। गडकरी ने अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ और कार्यशैली से पार्टी के सामान्य कार्यकर्ताओं का दिल जीत लिया था। लेकिन महाराष्ट्र के नागपुर जैसे छोटे शहर से राजनीति के राष्ट्रीय क्षितिज पर नितिन गडकरी के चमकदार अवतरण को कतिपय स्वघोषित राजनेता पचा नहीं पा रहे थे। जबकि पार्टी का बहुमत नितिन गडकरी का प्रशंसक बन चुका था। यही कारण था कि इन्हें दोबारा अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी थी, लेकिन गडकरी की मौजूदगी के कारण भविष्य की राजनीति में अपनी संभावनाओं को लेकर चिंतित विघ्नसंतोषी सक्रिय हुए, साजिशें रची गईं और ऐसी स्थिति पैदा की गई कि स्वयं नितिन गडकरी ने अंतिम क्षण में भारतीय जनता पार्टी का दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया। हालांकि गडकरी के निर्णय को मैं एक राजनीतिक भूल मानता हूं, क्योंकि गडकरी का फैसला आवेश आधारित था। हाल ही में गडकरी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि तब उनके खिलाफ साजिश रची गई थी। गडकरी ने दो टूक शब्दों में कहा था कि जिस दिन 'मुझे साजिशकर्ताओं की जानकारी मिल जाएगी, मैं उन्हें छोड़ूंगा नहीं।'  चूंकि भाजपा की वर्तमान केंद्र सरकार से देश की आम जनता को भारी आशाएं हैं, मैं चाहूंगा कि अब  नितन गडकरी  आवेश और भावना से इतर वृहत् दल, देश व जनहित में जररूरत पड़े तो व्यावहारिक विकास पुरुष के साथ-साथ 'पाषाण पुरुष की भूमिका में भी आ जाएं। देश उन्हें सिर आंखों पर बिठा लेगा।

Friday, May 20, 2016

चुनाव परिणाम के मायने


यहां चर्चा असम की, चूंकि उत्तर-पूर्व के इसी राज्य ने भारतीय जना पार्टी को ताजा संजीवनी प्रदान की है। पांच राज्य विधानसभाओं के चुनाव में एक असम ही है जहां भाजपा को अप्रत्याशित बहुमत मिला है। चुनाव पूर्व राजनीति विश्लेषक और चुनावी विशेषज्ञ एकमत थे कि असम में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। गठबंधन के कारण भाजपा को बढ़त मिल रही है। किसी को भी ऐसे परिणाम की आशा नहीं थी। कैसे संभव हुआ यह?
2014 के लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद महाराष्ट्र, हरियाणा,  झारखंड के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मोदी लहर का भरपूर लाभ मिला था। इन तीनों राज्यों की चुनाव कमान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभाल रखी थी। मोदी के चेहरे को आगे कर ही चुनाव लड़े गए और विजयश्री मिली। यह आम धारणा बन गई थी कि 'मोदी लहर' व्याप्त है और भाजपा इस लहर के सहारे अजेय अवस्था में पहुंच चुकी है।
भाजपा की रणनीति भी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी के 'पर्याय' के रूप में स्थापित कर दिया जाए। पार्टी के नेता-कार्यकर्ता भी इसे स्वीकार कर चुके थे। पूरे देश में हर-हर मोदी , घर-घर मोदी का नारा बुलंद किया जा रहा था।  भाजपा को चुनाव जितानेवाला 'हीरो' मिल चुका था। वह आश्वस्त हो चुकी थी कि अब भारत को कांग्रेस मुक्त कर भाजपा और एक अकेले भाजपा के अधीन कर दिया जाएगा। लेकिन पिछले वर्ष दिल्ली और बिहार ने भारतीय जनता पार्टी के विजयी मोदी रथ को रोक दिया।
मोदी लहर पर सवार भाजपा दिल्ली और बिहार में जनता के मूड को समझने में भी विफल रही। दिल्ली और बिहार में भी भाजपा ने मोदी को आगे कर चुनाव लड़ा। मोदी को पार्टी का 'चेहरा' बना इन दोनों राज्यों में पार्टी ने मोदी के लिए बड़ी-बड़ी रैलियां आयोजित कीं। प्रधानमंत्री मोदी भी अपने खास अंदाज में जनता के बीच पहुंचते रहे और भाजपा विजय की भविष्यवाणी करते रहे। लोकसभा चुनाव की तरह इन राज्यों में भी चुनावी वादों के पहाड़ मोदी ने खड़े कर दिए। मोदी ने आश्वासन दिया कि भाजपा की विजय के बाद 'स्वर्ण युग' आ जाएगा। लेकिन मोदी के अथक प्रयासों के बावजूद इन दोनों राज्यों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। बिहार में नीतीश-लालू और कांग्रेस ने मिलकर मोदी को धूल चटा दी। साफ है कि एकमात्र मोदी लहर पर सवारी और स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।
असम में दिल्ली -बिहार से सीख लेते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति पहले ही बदल ली थी। प्रधानमंत्री मोदी को न तो अपना 'स्टार प्रचारक' बनाया और न ही पार्टी के 'चेहरे' के रूप में सामने किया। वहां पहले से लोकप्रिय सर्वानंद सोनोवाल को सामने कर उनके नेतृत्व में चुनाव लडऩे की घोषणा कर डाली। मुख्यमंत्री के रूप में उनका चेहरा सामने कर भाजपा ने स्थानीय क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन भी कर डाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए नाममात्र की रैलियों का आयोजन हुआ। चुनावी वादों का पिटारा खोलने से भी भाजपा वहां बची। बांग्लादेशी घुसपैठ जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को उसने कांग्रेस से छीन लिया। जिसका लाभ पार्टी को मिला।
सर्वाधिक महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने निभाई। उत्तर -पूर्वी राज्यों में अपनी मजबूत पैठ के लिए बेचैन संघ लगभग एक वर्ष पूर्व से ही असम में सक्रीय हो उठा था। उसके कार्यकर्ता पूरे असम में फैल कर कांग्रेस विरोधी अभियान में जुट गए थे। बांग्लादेशी घुसपैठ को मुद्दा बना संघ के कार्यकर्ता इसके दूरगामी परिणाम को भुनाने में जुटे हुए थे। संघ की विशेष कार्यशैली ने वहां आम जनता को अपने अर्थात भाजपा के पक्ष में कर लिया। 15 वर्षों के कांग्रेस शासन से उत्पन्न असंतोष को संघ ने भाजपा के पक्ष में बखूबी भुनाया। लोगों ने भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया।
लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद एक कड़ा संदेश पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं के बीच में चला गया कि अब चुनाव में भाजपा को विजय तभी मिल सकती है जब 'चेहरे' के रूप में या 'स्टार प्रचारक' के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह स्थानीय नेताओं को वरीयता दी जाए। इस संदेश में अनेक संदेश निहित हैं। एक तो भविष्य में अब पार्टी सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निर्भर रहने का खतरा मोल नहीं ले सकती। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात और कर्नाटक की विधानसभाओं के चुनाव में असम चुनाव परिणाम की छाप देखने को मिलेगी। मजबूरन ही सही भाजपा इन राज्यों में भी चुनाव पूर्व स्थानीय चेहरों को छांट कर सामने प्रस्तुत करेगी।  प्रधानमंत्री पर निर्भरता के दौर को पूर्ण विराम लग जाएगा।
भाजपा की रणनीति भी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी के 'पर्याय' के रूप में स्थापित कर दिया जाए। पार्टी के नेता-कार्यकर्ता भी इसे स्वीकार कर चुके थे। पूरे देश में हर-हर मोदी , घर-घर मोदी का नारा बुलंद किया जा रहा था।  भाजपा को चुनाव जितानेवाला 'हीरो' मिल चुका था। वह आश्वस्त हो चुकी थी कि अब भारत को कांग्रेस मुक्त कर भाजपा और एक अकेले भाजपा के अधीन कर दिया जाएगा। लेकिन पिछले वर्ष दिल्ली और बिहार ने भारतीय जनता पार्टी के विजयी मोदी रथ को रोक दिया।
मोदी लहर पर सवार भाजपा दिल्ली और बिहार में जनता के मूड को समझने में भी विफल रही। दिल्ली और बिहार में भी भाजपा ने मोदी को आगे कर चुनाव लड़ा। मोदी को पार्टी का 'चेहरा' बना इन दोनों राज्यों में पार्टी ने मोदी के लिए बड़ी-बड़ी रैलियां आयोजित कीं। प्रधानमंत्री मोदी भी अपने खास अंदाज में जनता के बीच पहुंचते रहे और भाजपा विजय की भविष्यवाणी करते रहे। लोकसभा चुनाव की तरह इन राज्यों में भी चुनावी वादों के पहाड़ मोदी ने खड़े कर दिए। मोदी ने आश्वासन दिया कि भाजपा की विजय के बाद 'स्वर्ण युग' आ जाएगा। लेकिन मोदी के अथक प्रयासों के बावजूद इन दोनों राज्यों में भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। बिहार में नीतीश-लालू और कांग्रेस ने मिलकर मोदी को धूल चटा दी। साफ है कि एकमात्र मोदी लहर पर सवारी और स्थानीय नेतृत्व की उपेक्षा का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।
असम में दिल्ली -बिहार से सीख लेते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति पहले ही बदल ली थी। प्रधानमंत्री मोदी को न तो अपना 'स्टार प्रचारक' बनाया और न ही पार्टी के 'चेहरे' के रूप में सामने किया। वहां पहले से लोकप्रिय सर्वानंद सोनोवाल को सामने कर उनके नेतृत्व में चुनाव लडऩे की घोषणा कर डाली। मुख्यमंत्री के रूप में उनका चेहरा सामने कर भाजपा ने स्थानीय क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन भी कर डाला। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए नाममात्र की रैलियों का आयोजन हुआ। चुनावी वादों का पिटारा खोलने से भी भाजपा वहां बची। बांग्लादेशी घुसपैठ जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को उसने कांग्रेस से छीन लिया। जिसका लाभ पार्टी को मिला।
सर्वाधिक महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने निभाई। उत्तर -पूर्वी राज्यों में अपनी मजबूत पैठ के लिए बेचैन संघ लगभग एक वर्ष पूर्व से ही असम में सक्रीय हो उठा था। उसके कार्यकर्ता पूरे असम में फैल कर कांग्रेस विरोधी अभियान में जुट गए थे। बांग्लादेशी घुसपैठ को मुद्दा बना संघ के कार्यकर्ता इसके दूरगामी परिणाम को भुनाने में जुटे हुए थे। संघ की विशेष कार्यशैली ने वहां आम जनता को अपने अर्थात भाजपा के पक्ष में कर लिया। 15 वर्षों के कांग्रेस शासन से उत्पन्न असंतोष को संघ ने भाजपा के पक्ष में बखूबी भुनाया। लोगों ने भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया।
लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद एक कड़ा संदेश पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं के बीच में चला गया कि अब चुनाव में भाजपा को विजय तभी मिल सकती है जब 'चेहरे' के रूप में या 'स्टार प्रचारक' के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जगह स्थानीय नेताओं को वरीयता दी जाए। इस संदेश में अनेक संदेश निहित हैं। एक तो भविष्य में अब पार्टी सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निर्भर रहने का खतरा मोल नहीं ले सकती। उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात और कर्नाटक की विधानसभाओं के चुनाव में असम चुनाव परिणाम की छाप देखने को मिलेगी। मजबूरन ही सही भाजपा इन राज्यों में भी चुनाव पूर्व स्थानीय चेहरों को छांट कर सामने प्रस्तुत करेगी।  प्रधानमंत्री पर निर्भरता के दौर को पूर्ण विराम लग जाएगा। 

सच, सच ही रहेगा झूठ, झूठ ही रहेगा


और,
सच यह कि भारत और भारत के लोकतंत्र की हत्या कोई नहीं कर सकता। बहुत मजबूत है यह।
और,
झूठ यह कि न्याय पालिका के कारण देश का विकास बाधित हो रहा है। झूठ बोल रहे हैं अरुण जेटली।
और,
सपाट सच यह भी कि अगर भारत की न्यायपालिका मजबूत नहीं होती तो लोकतंत्र भी मजबूत नहीं होता। और तब न तो जनादेश का आदर-सम्मान होता और न ही देश में सरल-शांत सत्ता हस्तांतरण होता। न मोरारजी देसाई कभी प्रधानमंत्री बनते और न ही नरेंद्र दामोदरदास मोदी। यह तो हमारे अत्याधिक सुदृढ़ लोकतंत्र की सफलता है कि विविधता से परिपूर्ण भारत में लोकवाणी अर्थात जनादेश को सम्मान मिलता है, जनता इच्छानुसार अपने शासक का चुनाव करती है, कार्यों के आधार पर मूल्यांकन कर शासकों को पुरस्कृत करती है या फिर दंडित करती है। और यह जटिल कार्य सफल-संपन्न होता है तो स्वतंत्र-मजबूत न्यायपालिका की मौजूदगी के कारण।
कोई आश्चर्य नहीं कि राजनीतिक रूप से अत्याधिक महत्वाकांक्षी राजदल अथवा राजनेता समय-समय पर हथकंडे अपना अर्थात गलत व असंवैधानिक मार्ग का चयन कर न्यायपालिका पर कब्जे का कुत्सित प्रयास करते रहे हैं।  इस प्रक्रिया में टकराव तो दिखे किंतु कतिपय अस्थायी जख्मों के बावजूद न्यायपालिका की नींव को कोई क्षति नहीं पहुंचा पाया है। दबाव और प्रलोभन की शिकार कभी-कभी कुछ मामलों में न्यायपालिका हुई अवश्य है, किंतु जब-जब जनता के मौलिक अधिकारों पर प्रहार हुये असंवैधानिक कदमों द्वारा लोकतंत्र को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने की कोशिशें की गईं, जनहित में न्यायपालिका ने लोकतंत्र और समाज के पक्ष में फैसलों द्वारा अपनी निष्पक्षता दिखाई। यही कारण है कि कुछ राजनेताओं या यूं कह लें कि शासक वर्ग की ओर से प्रहार के बावजूद भारतीय न्यायपालिका के समक्ष सत्ताधारियों के मंसूबे धराशायी होते रहे हैं। निरंकुशता की लालसा पर लगाम लगाने का काम न्यायपालिका सफलतापूर्वक करती आई है। क्या आश्चर्य कि आज पूरे विश्व में भारतीय लोकतंत्र को शीर्ष स्थान प्राप्त है।
फिर ऐसा क्यों कि देश के वित्तमंत्री, स्वयं एक सुख्यात वकील, अरुण जेटली न्यायपालिका की न्यायिक सक्रियता पर चिंता प्रकट करते हुए उसे 'लक्ष्मण रेखा' के अंदर रहने की सलाह देते हैं। जेटली यह आरोप क्यों लगाते हैं कि न्यायपालिका के हस्तक्षेप के कारण देश के विकास कार्यक्रमों का क्रियान्वयन बाधित हो रहा है? जेटली का यह कथन भी राष्ट्रीय बहस का आग्रही है कि अदालतें कार्यपालिका का स्थान नहीं ले सकती यह नहीं कह सकती कि वह कार्यकारी शक्ति का उपयोग करेगी।
जेटली के पूर्व अनेक राजनेता न्यायपालिका के विरुद्ध ऐसी भावना प्रकट कर चुके है। न्यायिक सक्रियता उन्हें नहीं भाती। किंतु क्या यह सच नहीं कि विधायिका और कार्यपालिका की शर्मनाक विफलताओं के कारण ही पीडि़त अथवा प्रभावित अदालतों के दरवाजों पर दस्तक देते हैं और तब जनहित में संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत अदालतें हस्तक्षेप को बाध्य हो जाती हैं? यह सच है और शत-प्रतिशत सच है। न्यायपालिका को 'लक्ष्मण रेखा' का अतिक्रमण नहीं करने की सलाह देने वाले अरुण जेटली कहते हैं कि अगर कोई सरकारी निर्णय कार्यपालिका लेती है तब विभिन्न स्तरों पर उसकी जवाबदेही तय की जा सकती है। इससे चुनौती भी आ सकती है, इसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है और अगर जनता इसे जनहित विरोधी पाती है तो वोट के माध्यम से सरकार के खिलाफ जनादेश दे सकती है। कहीं हास्य तो नहीं कर रहे जेटली? जनता जनहित विरोधी निर्णयों के खिलाफ फैसला देने के लिए पांच वर्षों तक प्रतीक्षा करे और इस बीच जनता लुटती रहे, शोषित होती रहे और शासक लूटते रहें! जेटली जैसे विधितज्ञ से ऐसी उम्मीद नहीं थी। जनता को पांच वर्षों तक शासकों द्वारा लूटते रहने पर धैर्य धारण करने की सलाह कोई लुटेरा ही दे सकता है।
जनादेश के महत्व को रेखांकित करने वाले अरुण जेटली क्या बताएंगे कि जनादेश के आधार पर गठित कतिपय राज्य सरकारों को संविधान के अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर बर्खास्त क्यों किया गया? दरवाजा खटखटाए जाने पर जब न्यायालय ने संवैधानिक प्रावधानों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित पूर्व के आदेशों के अनुरुप सरकार के ऐसे कदम को असंवैधानिक घोषित किया तो क्या इसे न्यायिक सक्रियता के नाम पर जनता गलत करार दे? कदापि नहीं। न्यायपालिका पर हाल में आरोप लगाए गए कि वह हर क्षेत्र में कार्यकारी शक्तियों का उपयोग कर शासन को निरीह कर रही है। यह आरोप भी गलत है। यह दुखद अवश्य है कि आज मामला चाहे पेयजल आपूर्ति का हो, स्कूल-कालेज में दाखिले का हो, सड़क निर्माण का हो, सरकारी व सार्वजनिक संस्थानों में नियुक्ति का हो, लोगों के लिए चिकित्सा सुविधा का हो, खाद्य पदार्थों में मिलावट का हो, उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्य निर्धारण अथवा उपलब्धता का हो, आपराधिक जांच प्रक्रिया में घालमेल का हो या उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार का, हर मामले में अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। यहां तक कि सत्ता पक्ष द्वारा संवैधानिक प्रावधानों के साथ छेड़छाड़ कर सत्ता के दुरुपयोग पर भी अदालतों के दरवाजों पर दस्तक पड़ रही है। उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को जब उच्च न्यायालय ने लोकतंत्र की हत्या और शासकों का 'पाप' निरूपित किया तब देश की जनता आश्वस्त हुई कि सशक्त न्यायपालिका की मौजूदगी में लोकतंत्र के हत्यारे अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सकते। जेटली यह क्यों भूल जाते हैं कि विधायिका को जहां कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, वहीं इनकी समीक्षा का अधिकार भी न्यायपालिका को प्राप्त है। अगर जनता को उससे मौलिक अधिकारों से वंचित किये जाने संबंधी सरकार कोई कदम उठाती है तब न्यायपालिका उस पर अंकुश लगाने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकृत है। जनहित विरोधी किसी भी कानून की समीक्षा कर निरस्त करने का अधिकार न्यायापालिका को प्राप्त है। ऐसे में न्यायपालिका की आलोचना अथवा उसे 'लक्ष्मण रेखा' नहीं लांघने की सलाह देने की जगह बेहतर हो सरकार सुनिश्चित करे कि विधायिका और कार्यपालिका संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत जनहित में ही कानून बनाए और उनका क्रियान्वयन करे।
लोकतंत्र में बहुदलीय प्रणाली के अंतर्गत वैचारिक मतभेद या विचारधाराओं के बीच द्वंद्व स्वभाविक है। प्रत्येक राजदल अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरुप जनता व समाज को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। किंतु, इस प्रक्रिया में सत्ता का दुरुपयोग एक अपराध है। विचारधाराओं को सामाजिक स्वीकृति के लिए जनता को शांतिपूर्ण ढंग से योग्यता के आधार पर शिक्षित किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति समूह या समाज पर विचारधारा थोपना गलत है। विवेक व ग्राहता के आधार पर जनता प्रस्तुत विचारधारा का विवेचन कर उसे स्वीकार या अस्वीकार करेगी। सत्ता के मद में शासक अगर जबरिया विचारधारा थोपेंगे तो याचिका प्रस्तुत होने पर न्यायपालिका अपना निर्णय सुनाएगी। हो सकता है,न्यायपालिका के निर्णय सत्तापक्ष के लिए असहज हों। तथापि, उन्हें न्यायपालिका का सम्मान करते हुए आदेश को शिरोधार्य करना चाहिए। न्यायपालिका के साथ टकराव की किसी भी संभावना को तत्काल जमींदोज कर न्यायपालिका की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रहने दिया जाये। लोकतंत्र और स्वयं लोकप्रतिनिधि तभी सुरक्षित रहेंगे।
एक असहज संभावना भी। 'न्यायियक सक्रियता', का 'न्यायिक दुस्साहस' का रुप लेने की संभावना भी यदा-कदा दृष्टिगोचर हुई है। अतीत के कुछ असहज न्यायिक फैसले इस आरोप की चुगली करते हैं। बोफोर्स, सेंट किट्स कांड, सांसद रिश्वत कांड, उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालयों में कतिपय न्यायाधीशों की नियुक्तियों के अलावा पूर्व में राजधानी दिल्ली में बढ़ते अपराधों पर काबू पाने और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेना के इस्तेमाल के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का दिल्ली पुलिस को दिया गया निर्देश एक खतरनाक मिसाल है। भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. ए. एस. आनंद ने इस 'न्यायिक दुस्साहस' के फंदे के खिलाफ चेतावनी दी थी। न्यायमूर्ति आनंद ने कहा था कि जो क्षेत्र कार्यपालिका के दायरे में आते हैं, उनमें उच्च न्यायलयों द्वारा दिये जाने वाले निर्देशों के तहत बड़े पैमाने पर की जाने वाली दखल से विधायिका में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है और उसके दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। इस बिंदू पर सत्ता पक्ष की चिंता जायज हो सकती है, किंतु तब जब कथित चिंता पूर्वाग्रह के कब्जे से मुक्त रहे। आज जबकि भ्रष्टाचार, अपराधीकरण व निरंकुशता हमारे जीवन के मूल्य बनते जा रहे हैं यह सुनिश्चित करना अतिआवश्यक है कि न्याय प्रणाली व्यवस्था का ईमानदार हिस्सा बने, समस्या का हिस्सा नहीं। चूंकि, अरुण जेटली  की शंका और मांग में निरंकुशता और सत्ता की नाजायज चाहत की बू आ रही है, उनका समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन साथ ही 'न्यायिक सक्रियता' कालांतर में 'न्यायिक दुस्साहस' न बने इसे सुनिश्चित करने का अहम दायित्व विधायिका का ही है। यह संभव है। शर्त यह कि सत्तापक्ष जनहित की सोचे, दलहित की नहीं। 

शहीद करकरे पर वार? नहीं है स्वीकार !


सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक आधार पर बदले की कार्रवाईयों में नेताओं को कटघरे में खड़ा करने के दृष्टांत मौजूद हैं। कितुं, मरणोपरांत एक निडर, ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को ऐसी भावना के अंतर्गत सूली पर चढ़ाने की घटना संभवत: पहली बार सामने आई है। निडरता, कर्तव्यनिष्ठता और ईमानदारी को ऐसे 'पुरस्कार' की हम निंदा करते हैं।
हां, शहीद हेमंत करकरेएक ऐसे निडर, कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने जान की परवाह किए बगैर हमलावर विदेशी आतंकियों का सामना किया। शहीद हो गए। वैसे शहीद करकरे की कर्तव्यनिष्ठता पर सवालिया निशान? उनकी निष्पक्षता पर वार? पूरा देश अस्वीकार करता है ऐसे लांछन को। धिक्कार है उस भ्रष्ट, चापलूस व्यवस्था को जो पूर्वाग्रही शासकों की कुत्सित इच्छाओं की पूर्ति के लिए करकरे जैसे शहीद का अपमान करने तत्पर हो जाएं। धिक्कार है उस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का जो जांच की दिशा को सत्ता की इच्छानुसार परिवर्तित कर डाले।
मालेगांव विस्फोट जांच की परिणति तभी संदिग्ध हो गई थी, जब विशेष सरकारी अभियोजक रोहिणी सालियान ने पिछले वर्ष सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद एनआईए के अधिकारी उन पर हिंदुत्व के पक्षधर आरोपियों पर नरमी बरतने का दबाव बना रहे हैं। बाद में रोहिणी ने दबाव बनानेवाले अधिकारी का नाम भी सार्वजनिक किया था। तभी यह प्रतीत होने लगा था कि आरोपी छूट जाएंगे। लेकिन ऐसी आशा किसी ने नहीं की थी कि उन्हें छोडऩे की प्रक्रिया में हेमंत करकरे जैसे आतंक विरोधी दस्ता (एटीएस)  के मुखिया की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठता को लांछित किया जाएगा। मुंबई पुलिस के आयुक्त तथा गुजरात और पंजाब पुलिस के महानिदेशक रह चूके सुविख्यात पूर्व पुलिस अधिकारी जूलियो रिबेरो ने करकरे को सत्य की प्रतिमूर्ति निरूपित करते हुए दुखी मन से टिप्पणी की है कि 'ये शासक भी वस्त्रहीन निकले। ' करकरे की याद करते हुए रिबेरो कहते हैं कि सच्चे न्याय की चाहत रखने वाले लोग करकरे की ओर आशा की दृष्टि रखते थे। उनकी धमनियों में, उनकी हड्डियों में सच और सिर्फ सच था। करकरे जैसे अधिकारी पर सबूतों के साथ छेड़छाड़ या सबूत गढ़े जाने का आरोप लगाना सचाई को कटघरे में खड़ा करना है। ऐसा नहीं होना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी को देश अभी भी नहीं भूला है जिसमें देश की सबसे बड़ी खुफिया जांच एजेंसी सीबीआई को अदालत ने 'पिंजरे में कैद तोता' निरूपित किया था। क्या एनआईए स्वयं को ऐसी अवस्था में खड़ा करना चाहती है? ऐसे दृष्टांत मौजूद हैं जब सीबीआई एक दूसरी एजेंसी आईबी के अधिकारियों पर षड्यंत्र रचने के आरोप लगा चुकी है। इशरत जहां का मामला एक उदाहरण है। लेकिन यह पहला अवसर है जब एनआईए ने एक राज्य की एटीएस पर मालेगांव सरीखे संवेदनशील मामले में पूरी की पूरी जांच प्रक्रिया को न केवल कटघरे में खड़ा किया, बल्कि एटीएस पर षड्यंत्र रच आरोपियों के खिलाफ सबूत गढऩे के आरोप भी लगाए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। देश के पूरे पुलिसबल का मनोबल इस घटना के बाद प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ है।  आपराधिक मामलों में अगर सत्ता पक्ष सत्ता का दुरुपयोग करते हुए जांच एजेंसियों को यूं ही प्रभावित करता रहा तो इनकी विश्वसनीयिता को लोग कूड़ेदान में फेंक देंगे। क्या हम आशा करें कि  'देर आयद दुरुस्त आयद' को चरितार्थ करते हुए अभी भी शासन अपने व्यवहार में संशोधन कर लेगा? 

Monday, May 16, 2016

पत्रकार हत्या, सुरक्षा और उठते सवाल

मृत्यु !
प्रकृति की एक सामान्य प्रक्रिया!
धर्मावलंबी इसे ईश्वर इच्छा निरुपित करते है।
जबरिया मृत्यु हत्या होती है, प्रकृति की प्रक्रिया को चुनौती देने वाली। धर्मावलंबी इसे भी ईश्वर ईच्छा की श्रेणी में डाल देते हैं।
किंतु ऐसी जबरिया मृत्यु अर्थात हत्या को हम समाज के लोग स्वीकार या बर्दाश्त करने को तैयार नहीं। प्रकृति व ईश्वर ईच्छा से आगे यह एक ऐसा कुकृत्य है जो सीधे-सीधे हमारी सत्ता, हमारी व्यवस्था व हमारी सोच पर वार करता है। और जब षडय़ंत्र के तहत ऐसी घटना को अंजाम दिया जाए तब देश समाज की कानून व्यवस्था की चूलें हिल जाती हैं। अक्षम्य अपराध की ऐसी घटना पर बहस छिडऩा भी स्वाभाविक है।
बिहार व पड़ोसी झारखंड में 24 घंटों के अंदर दो पत्रकारों की निर्मम हत्या ने अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक विरोधियों ने पहले से विभूषित 'जंगल राज” बिहार को इस घटना के बाद 'महाजंगलराज’ से महाविभूषित कर डाला।  बिहार से सटे झारखंड में पत्रकार की हत्या पर भी शोर तो मच रहा है किंतु वेग में बिहार आगे है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से इतर हमारी चिंता ईमानदारी से कर्तव्य निष्पादन करने वाले पत्रकारों की निर्मम हत्या और मीडिया बिरादरी की प्रतिक्रियाओं को लेकर है। पत्रकारों पर हमले और हत्याओं की घटनाओं में हाल के दिनों में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। पत्रकार प्रताडऩा के मामले भी सामने आए हैं। प्रताडऩा ऐसी कि पिछले दिनों दिल्ली में कार्यरत युवा पत्रकार पूजा तिवारी को आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ा। मरते-मरते वह संदेश दे गई थी कि ''कोई पत्रकार ना बने!” क्या सचमुच पत्रकार और पत्रकारिता ऐसी 'खतरनाक’ अवस्था में पहुंच चुकी है?
बिहार के सिवान में दैनिक 'हिन्दुस्तान’ से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार राजदेव रंजन की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 42 वर्षीय राजदेव की पहचान एक निर्भीक पत्रकार की थी। निडरतापूर्वक अपने क्षेत्र से वे राजनीति से लेकर सामाजिक विषयों पर बेबाक लिखा करते थे। खबर मिली है कि राजदेव की हत्या के पिछे उन बाहुबलियों का हाथ है जिनकी पहुंच सत्ता में उपर तक है। जिस प्रकार बाइक सवार बदमाशों ने उन्हें गोली मारी उससे साफ है कि हत्या एक पूर्वनियोजित साजिश के तहत की गई है।
दूसरी घटना झारखंड के चतरा जिलांतर्गत देवरिया में एक न्यूज चैनल के 35 वर्षीय पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह उर्फइंद्रदेव यादव की हत्या की है। हांलाकि इनकी हत्या के कारण की जानकारी अभी नहीं मिल पायी है, संभावना पत्रकारिता से इतर की है। बिहार के राजदेव की हत्या की तरह इनकी हत्या में किसी राजनीति की संभावना फिलहाल व्यक्त नहीं की जा रही हैं। मूलत: बिहार के गया जिलांतर्गत बाराचट्टी के धनगाय गांव के रहनेवाले इंद्रदेव 10 वर्षपूर्व चतरा पहुंचे थे। कहते हैं कि पहले ये एक शिक्षक के रुप में अपने गांव में कार्यरत थे और इनका संबंध उग्रवादी संगठन एमसीसी से रहा था। पिछले पांच वर्ष से ये कलकत्ता के एक न्यूज चैनल के प्रतिनिधि के रुप में चतरा में कार्यरत थे। बहरहाल मामल हत्या का है तो जांच परिणाम के बाद ही कारण की जानकारी मिल पाएगी। फिलहाल क्षेत्र के पत्रकार भी एकमत हे कि इंद्रदेव की हत्या का कारण निजी हो सकता है।
पत्रकारों की हत्या इस क्षेत्र के लिए नई बात नहीं है। 70 के दशक के आरंभ में एक साप्ताहिक 'नया रास्ता’ पत्र के माध्यम से जमशेदपुर में 'यूरेनियम’  की तस्करी व इसमें लिप्त माफिया गिरोह पर निडरतापूर्वक लिखनेवाले एक पत्रकार शंकरलाल खीरवाल की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी गई थी। इसी प्रकार 80 के दशक में जमशेदपुर में 'अमृत बाजार पत्रिका’ के संवाददाता इलियास की हत्या राजनीतिक कारणों से कर दी गई थी। 80 के दशक में 'नयी राह’ के पत्रकार पवन शर्मा और 1995 में  पीटीआई के संवाददाता डी. पी. शर्मा की हत्या चाईबासा में कर दी गई थी।
कारण जो भी हो, बिहार और झारखंड के पत्रकारों की हत्याओं ने एक बार फिर सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए है। जो पत्रकार अपने कर्तव्य निष्पादन के लिए जान जोखिम में डालने को तत्पर रहते हैं उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कोन लेगा? सिवान के राजदेव रंजन नि:संदेह पत्रकारीय कर्तव्य निष्पादन के दौरान मारे गये। इनकी हत्या के पीछे चॅूकि बाहुबली राजनेताओं के नाम आ रहे हैं, बिहार सरकार को चुनौती हे कि बगैर किसी भय अथवा दबाव के वह असली अपराधी को पकड़ दंड सुनिश्चित करे। यह सुखद है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव सहित राजद प्रमुख लालूप्रसाद यादव ने भी अपराधियों को पकड़ दंडित किये जाने की बात कही है।   मुख्यमंत्री नीतीश सीबीआई जॉच की अनुशंसा भी कर चुके है। उन्हें यह सुनिश्चित करना ही होगा। तभी जंगल अथवा महाजंगलराज के आरोप से वे बिहार को बचा पाएंगे। और इसी बहाने ईमानदार पत्रकारों की सुरक्षा संबंधी पुख्ता यंत्रणा की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाये। घोर अस्थिर राजनीतिक वातावरण में मीडिया की निर्णायक भूमिका के मद्देनजर कर्तव्यनिष्ठ पत्रकारों को सुरक्षा कवच मुहैया करने की जिम्मेदारी शासन की ही है।

Thursday, May 12, 2016

अक्षम्य अपराध है इतिहास से छेड़छाड़!

कोई तर्क-वितर्क, कुतर्कनहीं ! जिस प्रकार प्रकृति अपने साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करती, उसी प्रकार इतिहास भी स्वयं के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करता। देश समाज के विभिन्न कालखंडों में हर विधा के क्रियाकलापों, घटनाओं  का प्रमाणित दस्तावेज होता है इतिहास। इतिहास से छेड़छाड़ का सीधा अर्थ होता है सचाई अथवा यथार्थ के साथ छेड़छाड़। इतिहास का विस्तार तो स्वभाविक है, किन्तु इतिहास में परिवर्तन बाध्यकारी परिस्थितियों में अपवाद स्वरूप ही हो सकते हैं। सत्ता परिवर्तन अथवा वैचारिक मतभेद के आधार पर इतिहास में परिवर्तन अपराध है। देश व समाज के साथ छल करने वाले ऐसे कदमों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इतिहास एक ऐसा दस्तावेज होता है जो बगैर कांट-छांट, संशोधन के घटनाओं और व्यक्तियों को प्रस्तुत करता है। ऐसी घटनाओं और व्यक्तियों की समीक्षा व आकलन का कार्य देश स्वयं करता है। शोधकर्ता तथ्यों के आधार पर विश्लेषण करते हैं और निष्कर्ष से समाज को अवगत कराते हैं। ऐसे निष्पादन न किसी पूर्वाग्रह से और न ही किसी राजनीति अथवा विचारधारा से प्रभावित होते हैं। सिर्फ यथार्थ की तटस्थ व निष्पक्ष प्रस्तुति होती है ऐसे विश्लेषणों से।
खबर मर्माहत करने वाली है कि राजस्थान की स्कूली पाठ्यपुस्तकों से देश के प्रथम प्रधानमंत्री, स्वतंत्रता संग्राम के अग्रिम नेताओं में से एक पंडित जवाहरलाल नेहरू का नाम हटा दिया गया है। अर्थात स्कूली छात्रों को इस जानकारी से वंचित कर दिया गया है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री कौन थे?  यही नहीं, छात्र अब उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में भी नहीं जान पाएंगे। जबकि पं. नेहरू उन अग्रज नेताओं में रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजों की गुलामी से भारत को मुक्त कराने में निर्णायक भूमिका अदा की थी। जिस पं. नेहरु का नाम इतिहास में अन्य महान विभूतियों के साथ स्वर्णाक्षरों में लिखा गया, उस नाम को इतिहास से हटाने का मकसद राजनीति और सिर्फ राजनीति ही हो सकती है। सच पर झूठ का ऐसा मुलम्मा! कोई राजनीति नहीं, कोई दुराग्रह नहीं, मैं  इस टिप्पणी के लिए मजबूर हूं कि इस 'पाप’ को अंजाम देने वाले राष्ट्रभक्त तो नहीं ही हो सकते। मैं व्यक्तिगत रूप से पं. नेहरूकी अनेक नीतियों से इत्तेफाक नहीं रखता, बल्कि अनेक मामलों में देश की वर्तमान दुर्दशा के लिए उनकी कतिपय नीतियों को दोषी मानता हूं। मामला कश्मीर का हो, तिब्बत का हो या फिर 1962 के चीनी आक्रमण का हो, पं. नेहरू की गलत नीतियों व निर्णयों के कारण भारत को शर्मिंदा होना पड़ा। बावजूद इसके स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान व उनके त्याग को इतिहास कैसे भूल सकता है? पं. जवाहरलाल नेहरू नाम का व्यक्ति भारत देश का प्रधानमंत्री था, इस तथ्य को इतिहास के पन्नों से कैसे बाहर निकाला जा सकता है? इतिहास देश-समाज को शिक्षित करता है, अशिक्षित नहीं। ज्ञानी बनाता है अज्ञानी नहीं। इस पाश्र्व में राजस्थान सरकार का नेहरू विरोधी कदम एक अक्षम्य राष्ट्रीय अपराध माना जाएगा। निर्णयकर्ता किसी भ्रम में ना रहें। एक राज्य की पाठ्यपुस्तक से पं. नेहरू का नाम हटा देने से भारत देश पं. नेहरू को भूल नहीं जाएगा। विलंब अभी नहीं हुआ है। राज्य सरकार संशोधन कर लें ।
 इतिहास में परिवर्तन सिर्फ पं. नेहरु के नाम के साथ नहीं हुआ है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में पं. मदन मोहन मालवीय और सरोजनी नायडू जैसी महान विभूतियों के नाम भी हटा दिये गये हैं। क्या पं. मालवीय और सरोजनी नायडू महान स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे? क्या उनके योगदान सुभाषचंद्र बोस, लाला लाजपतराय, बालगंगाधर तिलक और हेमू कालानी से कम थे? डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम देश के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में तो शामिल किया गया है, किंतु स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में उनके अतुल्य योगदान की उपेक्षा की गई है। ध्यान रहे वह डॉ. राजेंद्र प्रसाद ही थे, जिनकी इच्छा और प्रयास से डॉ. भीमराव आम्बेडकर न केवल संविधान सभा के सदस्य बन पाये बल्कि संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष भी बने। वह डॉ. राजेंद्र प्रसाद ही थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह की नींव रखी थी। वही चम्पारण सत्याग्रह जिसने महात्मा गांधी को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए जमीन तैयार कर दी थी। स्वतंत्रता आंदोलन, भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष और राष्ट्रपति के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद के योगदान को कैसे विस्मृत कर सकते हैं? इतिहासकार देश के साथ गद्दारी करेंगे अगर ऐसे योगदान को इतिहास में शामिल नहीं किया गया। सरदार वल्लभभाई पटेल के योगदान को विस्तार में दर्ज कर उनके साथ न्याय तो किया गया किंतु उनकी पंक्ति में उनके समकक्ष कुछ अन्य नेताओं को शामिल करने पर सवाल खड़े होंगे।
सर्वाधिक आपत्तिजनक प्रसंग महात्मा गांधी के हत्यारे के रूप में नाथूराम गोडसे के नाम को हटाया जाना है। क्या राजस्थान सरकार चाहती है कि उनके छात्रों को इस सत्य की जानकारी से वंचित कर दिया जाए कि नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या की थी? गुलाम भारत को निर्णायक आजादी दिलवाने वाले महात्मा गांधी की हत्या देश को आजादी मिलने के छह माह के अंदर नाथूराम गोडसे ने कर दी थी। इस सचाई पर परदा डालने वाले भारत देश और भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सचाई पर परदा डालने का कुप्रयास कर रहे हैं। यह भी एक अक्षम्य अपराध है। राजस्थान सरकार तत्काल संशोधन कर ले।
यह ठीक है कि इतिहास लिखने- लिखवाने, तोडऩे-मरोडऩे का एक दुखद बल्कि आपराधिक  दौर चल पड़ा है। लोकतंत्र में सरकारें आती हैं, जाती हैं । विचारधाराओं में संघर्ष होते हैं, थोपने के प्रयास होते हैं। विचारधाराओं के अनुरुप राजदल समाज को प्रभावित करने की कोशिशें करते हैं। लोकतंत्र की यह एक सामान्य प्रक्रिया है। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। किंतु सत्य के आइने के रुप में स्थापित इतिहास को विद्रूप करने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती। तथ्यानुसार सत्ता चाहे तो अपनी विभूतियों को इतिहास में समुचित स्थान दे दे, महिमामंडित भी कर दे, किंतु किसी अन्य को इतिहास के पन्नों से बाहर करने का दुष्कर्म न करे। जैसा कि मैने पहले कहा है, देश सक्षम है इतिहास पुरुषों के व्यक्तित्व, चरित्र का विश्लेषण कर निष्कर्ष निकालने में। इतिहास तो वह कच्चा पदार्थ होता है जिसमें कोई मिलावट नहीं होती। विभिन्न कालखंड में उनका मूल्यांकन देश स्वयं करता है। मिलावटी पदार्थ तो भ्रम पैदा करते हैं। सत्य पर काली चादर डाल देते हैं।
ऐसे 'पाप’  की अपराधी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी बन चुकी हैं। वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ही थीं जिन्होंने आपातकाल के दौरान लाल किले के प्रांगण में एक 'कालपात्र’ गड़वाकर भविष्य में इतिहास को प्रभावित करने की कोशिश की थी। 'कालपात्र’ में  एक पक्षीय जानकारियां डाल नेहरु परिवार को ही भारत की आजादी के पाश्र्व में महिमामंडित करने की कोशिश की गई थी। 'कालपात्र’ में तब दी गई जानकारियों से डॉ. राजेंद्र प्रसाद सहित अनेक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों के नाम नदारद थे। 1977 में जनता पार्टी ने सत्तारूढ़ होने के बाद खुदाई कर 'कालपात्र’ को बाहर निकलवाया था। तब इंदिरा गांधी के नापाक मंसूबे का पर्दापाश हुआ था। एक वह और ताजातरीन राजस्थान का उदाहरण चुगली करता है उस हकीकत की, कि इतिहास को तोडऩे-मरोडऩे के प्रयास पहले भी हुए हैं और आज भी हो रहे हैं।
क्या राजदल या राजनेता ऐसे 'पाप’ से स्वयं को पृथक नहीं रख सकते? फैसला इस सच के आलोक में करें कि देश, इतिहास बदलने या तोडऩे-मरोडऩे के किसी भी प्रयास को कभी बर्दाश्त या स्वीकार नहीं करेगा। 

रिहा करें छत्तीसगढ़ के गिरफ्तार पत्रकारों को!

कोई लाग-लपेट नहीं!
'मीडिया मंडी’ छत्तीसगढ़ के उन पत्रकारों की मांग के साथ है, कि जुल्मी पुलिसिया कार्रवाई  लिए कुख्यात बस्तर के पुलिस आईजी एसआरपी कल्लूरी के खिलाफ कार्रवाई की जाए, बस्तर से तबादला कर दिया जाए। सुदूर ग्रामीण इलाकों, नक्सल प्रभावित संवेदनशील क्षेत्रों में प्राणों की बाजी लगा दायित्व निर्वाह कर रहे पत्रकारों को धमका कर प्रताडि़त कर शासन के अनुकूल एकपक्षीय खबर लिखने को मजबूर करने संबंधी किसी भी कदम का समर्थन नहीं किया जा सकता। अनेक कारणों से पहले से ही दबे-सहमे इन पत्रकारों के खिलाफ जब ऐसी शासकीय कार्रवाई होती है, तो यह राज्य सरकार का दायित्व हो जाता है कि पत्रकारों को संरक्षण प्रदान करे। खेद है, इस मोर्चे पर छत्तीसगढ़ सरकार अब तक विफल रही है। मजबूरन वहां के पत्रकार राजधानी दिल्ली में दस्तक देने पहुंच गये।
ये सचमुच छत्तीसगढ़ सरकार के लिए शर्म की बात है कि ऐसे पत्रकारों को संरक्षण की जगह उसकी यंत्रणा पत्रकारों को नक्सली बता गिरफ्तार करने लगी है। पत्रकारों से मधुर संबंध रखने वाले मुख्यमंत्री डा रमनसिंह  से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। यह वहीं छत्तीसगढ़ है जहां पूर्व में नक्सलियों ने सार्इं रेड्डी और नेमीचंद जैन जैसे पत्रकारों को मौत के घाट उतार दिया था। मुख्यमंत्री ने तब कड़ी कार्रवाई का आश्वासन भी दिया था। लेकिन सुधार की जगह स्थिति और बदतर होती चली गई है। पत्रकारों के लिए उन संवेदनशील इलाकों में काम करना मुश्किल हो गया है। अगर आफत नक्सलियों अथवा अन्य अपराधी गिरोह की ओर से आती है तब क्या यह सरकार का दायित्व नहीं होता कि वह पत्रकारों को संरक्षण प्रदान करे? परंतु विडंबना यह कि छत्तीसगढ़ में स्वयं प्रशासन ही पत्रकारों को प्रताडि़त करने लगा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वयं पुलिस प्रशासन और नक्सली तथा आपराधिक तत्वों की मिलीभगत है। जिस प्रकार नक्सलियों तथा उन क्षेत्रों में बड़े 'कार्पोरेट घरानों’ को लाभान्वित करने के लिए जबरिया जमीन का अधिग्रहण कर उन्हें आबंटित करने के मामले पत्रकार उजागर कर रहे हैं, इसमें निहित जोखिम को देखते हुए स्थानीय प्रशासन को चाहिए कि वे पत्रकारों को उचित सुरक्षा प्रदान करे। लेकिन जब स्वयं पुलिस पत्रकारों को ही आरोपी बना गिरफ्तार करने लगे, उन्हें धमकाने लगे तब पूरी की पूरी राज्य सरकार की नीयत पर संदेह तो उठेंगे ही। समय रहते मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ऐसे आरोपों और पुलिसिया कार्रवाई का निराकरण करें अन्यथा विकास के मार्ग पर तेजी से अग्रसर छत्तीसगढ़ राज्य नक्सलियों और अपराधियों के समक्ष नपुंसक की मुद्रा में खड़ी दिखेगी।
'मीडिया मंडी’ पूरी तरह से राज्य के पत्रकारों के साथ है। 'मीडिया मंडी’ हर दिन राजधानी दिल्ली सहित  देश के विभिन्न बड़े शहरों की सड़कों पर कुछ पत्रकारों को सुरक्षा के घेरे में विचरण करते देखता है। हर तरह से सुविधा संपन्न इन पत्रकारों के लिए सुरक्षा कवच वस्तुत: राजनेताओं की तरह 'प्रतिष्ठा सूचक’ ही होते हैं। वास्तविक सुरक्षा की जरुरत तो बस्तर व इस जैसे असुरक्षित क्षेत्रों के उन पत्रकारों को हैं, जिनके प्राण हमेशा जोखिम में होते हैं। वे कर्तव्य निर्वाह के लिए घर से बाहर निकलते हैं, वापस लौटने तक परिवार भयभीत रहते हैं। ऐसे में नक्सल प्रभावित बस्तर में पत्रकारों के खिलाफ गिरफ्तारी जैसी पुलिसिया कार्रवाई की न सिर्फ भत्र्सना, ऐसी कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई हो। पिछले वर्ष मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने आश्वासन दिया था कि निप्पक्ष और स्वतंत्र पत्रकारिता के पक्ष में सरकार सभी आवश्यक कदम उठाएगी। पत्रकारों की गिरफ्तारी संबंधी मामलों की पुर्नसमीक्षा का आश्वासन भी मुख्यमंत्री ने दिया था। बावजूद इसके महीनों बीत गये आजतक कोई सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई।
यह किसी भी सरकार के लिए शर्मनाक है कि उनके राज्य के पत्रकारों को दमनात्मक कार्रवाई के खिलाफ राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाना पड़े। यह स्वयं मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के लिए शर्म की बात है कि बस्तर में चार पत्रकारों सोमारु नाग, संतोष यादव, प्रभात सिंह व दीपक जैस्वाल को फर्जी मामलों में फंसा जेल में डाल दिया गया है। सर्वाधिक शर्मनाक यह कि बस्तर में पदस्थ आईजी कल्लूरी पत्रकारों को फोन कर धमकाने लगे हैं।
चुनौती है मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह को कि वे  इस आईजी कल्लूरी के खिलाफ प्रशासकीय कार्रवाई करते हुए गिरफ्तार पत्रकारों के मामलों की पुर्नसमीक्षा का तत्काल आदेश जारी करें। मुख्यमंत्री ध्यान रखें, फिलहाल यह मामला एक बस्तर का है। अगर पत्रकारों के खिलाफ ऐसी दमनात्मक कार्रवाई पर अंकुश नहीं लगाए जाते तो बस्तर की चिंगारी दावानल का रूप ले पूरे छत्तीसगढ़ राज्य को अपनी चपेट में ले लेगी। लालफीताशाही के पक्षधर ऐसे अधिकारी हमेशा निर्वाचित सरकार की मजबूत पांव के नीचे की जमीन खोदने का काम करते हैं। इनकी प्रवृति ही लोकतंत्र विरोधी होती है। इनका चरित्र ही चरित्रवानों की सफेदी पर दाम लगाने का होता है। अपराध और अपराधियों के मध्य विचरने को प्राथमिकता देने वाला यह वर्ग कभी भी इनकी समाप्ति नहीं चाहेगा। आजादी के बाद का लगभग सात दशक इनकी अभी भी मौजूदगी से कलंकित है। लालफीताशाह के ये 'लाल’ जब तक निर्बाध फलते-फूलते रहेंगे, अपराध और अपराधियों का भी विस्तार होता रहेगा। इन दोनों पर निगरानी और अंकुश रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पत्रकारों को फिर सुरक्षा क्यों नहीं? अभी समय बीता नहीं है। मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह कृपया तत्काल हरकत में आएं। गिरफ्तार पत्रकारों की रिहाई सुनिशित करे और कल्लूरी जैसे अधिकारी को दंडित करें। 

लोकतंत्र की हत्या का अनधुला 'पाप'!

उत्तराखंड में उठा राजनीतिक बवंडर हरीश रावत द्वारा शक्ति परीक्षण में विजय हासिल करने के साथ ही शांत तो हो गया किंतु यक्ष प्रश्न अभी भी अपने विकराल रूप में मौजूद है कि क्या वहां हुई लोकतंत्र की हत्या का 'पाप' धुल गया? चूंकि प्रदेश में तब थोपे गए राष्ट्रपति शासन को स्वयं उच्च न्यायालय ने अलोकतांत्रिक करार देते हुए टिप्पणी की थी कि राष्ट्रपति शासन वस्तुत: लोकतंत्र की हत्या का पाप है, भारत का लोकतंत्र अपने हत्यारे की पहचान भी जरूर चाहेगा। जनधारणा भी यही है। किसी भी निर्वाचित सरकार को आपत्तिजनक हथकंडे अपना बर्खास्त कर दिया जाना निश्चय ही जनादेश का अपमान और लोकतंत्र के गालों पर तमाचा है। नैनीताल उच्च न्यायालय ने इसे हत्या निरूपित किया था तो कुछ गलत नहीं।
अब जबकि कांग्रेस के हरीश रावत सर्वोच्च न्यायलय के आदेशानुसार बहुमत साबित कर पुन: सत्तासीन हो गए हैं, सवाल तो बरकरार ही रहेगा कि क्या हत्या के दोषी की पहचान कर उसे दंडित किया जाएगा? प्रश्न स्वाभाविक है, किंतु उत्तर अधर में ही रहेगा। यह हमारे लोकतंत्र का एक स्याह पहलू है कि विभिन्न राजदल अपने शासनकाल में संविधान की धारा 356 का कथित उपयोग अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति हेतु करते रहे हैं।  केंद्र व राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता के साथ यह प्रवृत्ति बढ़ती चली गई। केंद्र में सत्तारूढ़ शासकदल में एकाधिकार की इच्छा ने भी इस प्रवृत्ति को शक्ति प्रदान की है।  दुर्भाग्यवश लोकतंत्र विरोधी इस प्रवृत्ति को सींचित किया लोकतांत्रिक राजदलों ने ही। लोकतंत्र के कथित पहरुओं ने लोकतंत्र विरोधी ऐसे हथकंडों को मजबूत किया।
सर्वाधिक दुखद पहलू तो यह कि संविधान की धारा 356 का पहला दुरुपयोग किसी और ने नहीं लोकतंत्र के एक प्रतीक  प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ही किया था।  तब पंजाब के मुख्यमंत्री गोपीचंद भार्गव के बहुमत की सरकार को केंद्र सरकार ने सिर्फ इसलिए बर्खास्त कर दिया था कि प्रधानमंत्री नेहरू मुख्यमंत्री भार्गव से किसी कारणवश नाराज थे।  पुन: 1954 में नेहरू सरकार ने ही आंध्र प्रदेश की निर्वाचित बहुमत की सरकार को इस शंका के आधार पर बर्खास्त कर दिया था कि वहां 'कम्युनिस्ट' के अवतरण का भय पैदा हो गया था।  फिर 1959 में केरल की निर्वाचित 'कम्युनिस्ट' सरकार भी केंद्र की नाखुशी के कारण बर्खास्त कर दी गई थी। कहने का तात्पर्य यह कि संविधान की धारा 356 के दुरुपयोग की कहानी पुरानी है। नंगा दुरुपयोग 1977 और 1980 में हुआ। तब जनता पार्टी और कांग्रेस ने केंद्र में सत्तारूढ़ होने के बाद दूसरे दलों की राज्य सरकारों को बगैर किसी पर्याप्त कारण के बर्खास्त कर दिया था। एक संवैधानिक प्रावधान के साथ ऐसी घटनाएं अनाचार की हैं।
उत्तराखंड के मामले में चूंकि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने लोकतंत्र के पक्ष में तीखी टिप्पणियां की हैं और केंद्र सरकार का दोहरा चरित्र सामने आया है, जरूरी है कि पूरा देश इस पर वैचारिक मंथन करे। लोकतंत्र में जनता की पसंद पर सरकारें आती हैं, जाती हैं। बहुदलीय लोकतंत्र का यह एक सुखद पहलू है कि देश की जनता जरूरतों और परिस्थितियों के अनुरूप केंद्र व विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दलों को सत्ता सौंपती रही है। ऐसे जनादेश देश के संघीय ढांचे की मजबूती को मोटी रेखाओं से चिन्हित करते रहे हैं। केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप परस्पर सहयोगात्मक संबंधों की जरूरतें बार-बार चिन्हित हुई हैं।
दुखद है कि केंद्र की वर्तमान भाजपा सरकार पर हाल के दिनों में आरोप लगे हैं कि वह येन-केन प्रकारेण  गैर भाजपाई राज्य सरकारों को अपदस्थ करना चाहती है। अरुणाचल के बाद उत्तराखंड में ऐसी कोशिश हुई। यह तो हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा निर्धारित प्रावधान हैं जिस कारण लोकतंत्र के रक्षार्थ न्यायपालिका दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है। उत्तराखंड के मामले में भी राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति की दिशा में उठाए गए केंद्र सरकार के अनैतिक कदम को न्यायपालिका ने रोक दिया। इस प्रक्रिया में न्यायपालिका ने जो कठोर टिप्पणियां की है उसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। राजनीति में स्वच्छता और शुचिता की पक्षधर भारतीय जनता पार्टी से अपेक्षा है कि वह न्यायपालिका की टिप्पणियों को सकारात्मक रूप में ग्रहण करते हुए संशोधनात्मक प्रयास शुरु करे। लोकतंत्र के सभी पायों को मजबूती प्रदान करना निर्वाचित सरकार का दायित्व होता है। उत्तराखंड के बहाने भाजपा की केंद्र सरकार समुचित कदम उठाकर यह सुनिश्चित करे कि लोकतंत्र में लोकभावना का आदर करते हुए किसी भी निर्वाचित सरकार को षड्यंत्रवश अपदस्थ करने की कोशिश नहीं की जाएगी।

Thursday, May 5, 2016

राम नाईक, गोविंदा और राजनीति का अपराधीकरण !


क्या राम नाईक झूठ बोल रहे हैं? राजनीतिक विरोधी भले ही उत्तर 'हां' में दें, मैं पूरे विश्वास के साथ अपना उत्तर 'ना' में अंकित कर रहा हूं। कानूनी अखाड़े में जरूरी प्रमाण भले ही राम नाईक उपलब्ध न करा पाएं, उनके शब्दों को चुनौती नहीं दी जा सकती। जानकार जब अपना हृदय टटोलेंगे तो वहां से भी उत्तर राम नाईक के आरोप की पुष्टि करनेवाले ही मिलेंगे।
वैसे महाराष्ट्र के एक दिग्गज नेता, वर्तमान में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल, राम नाईक अपने अनेक वक्तव्य को लेकर विवादों में घिरते रहे हैं। किंतु सहज-सरल राम नाईक पर कोई भी झूठ बोलने का आरोप नहीं लगा सकता। आलोच्य प्रसंग में भी नहीं।
राम नाईक ने अपनी ताजा प्रकाशित पुस्तक 'चरैवेति-चरैवेति' में आरोप लगाया है कि उत्तर मुंबई लोकसभा सीट से चुनाव में उन्हें हराने के लिए कांगे्रस के अभिनेता उम्मीदवार गोविंदा ने 'अंडरवल्र्ड डॉन' दाऊद इब्राहिम और बिल्डर हितेंद्र ठाकुर की मदद ली थी। उल्लेखनीय है उस चुनाव में गोविंदा ने राम नाईक को 11,000 मतों से पराजित किया था। स्वाभाविक रूप से कांग्रेस और स्वयं गोविंदा ने आरोप को झूठा करार दिया है। कांग्रेस का कहना है कि अपनी पुस्तक की बिक्री में इजाफा करने के लिए राम नाईक ने सनसनी का सहारा लिया है। मैं नहीं समझता कि धीर-गंभीर राम नाईक पुस्तक की बिक्री के लिए ऐसे हथखंडे अपना सकते हैं।
राम नाईक के इस खुलासे ने एक बार फिर राजनीति में नेताओं और अपराधियों के बीच गठजोड़ पर बहस छेड़ दी है। मुंबई में ऐसे गठजोड़ को लेकर नेताओं पर आरोप पहले भी लगते रहे हैं। स्वयं मराठा छत्रक शरद पवार को भी ऐसे आरोपों से जूझना पड़ा हैं। पवार पर भी 'अंडरवर्ल्ड' बल्कि दाऊद के साथ संबध होने के आरोप लग चुके हैं। बताया जाता है कि 'वोरा आयोग' ने अपनी 'रिपोर्ट' में ऐसे संबधों की पुष्टि की थी। आयोग ने राजनीतिकों और  'अंडरवर्ल्ड' के बीच संबधों की पड़ताल की थी। चूंकि आयोग की 'रिपोर्ट' कभी सार्वजनिक नहीं की गयी दावे के साथ कुछ कहा नहीं जा सकता, किंतु चर्चा जोरों पर रही कि शरद पवार के दाऊद के साथ संबधों की पुष्टि हुई थी। मुंबई में तब एक कथित घटना की चर्चा जोर-शोर से हुई थी। जिसमें पवार और दाऊद के संबंधों को लेकर चटखारे लिए गए थे। घटना 90 के दशक के आरंभ की है जब शरद पवार भारत के रक्षामंत्री थे। कहते हैं कि एक पांच सितारा होटल में तब के एक बड़े बिल्डर सपत्नीक रात्रि भोजन पर गए थे। तब व्याप्त चर्चा के अनुसार होटल के लॉबी में एक व्यक्ति ने बिल्डर की पत्नी को छेड़ दिया। स्वाभाविक रुप से बिल्डर ने आवेश में उस व्यक्ति का कॉलर पकड़ लिया। तत्काल चारों और से कई 'स्टेनगन' धारियों ने बिल्डर और उसकी पत्नी को निशाने पर ले लिया। बताते हैं वह व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि दाऊद का भाई इकबाल था। होटल प्रबंधन ने बीच-बचाव कर मामले को शांत किया। उक्त बिल्डर पत्नी के साथ वापस घर चले गए। घर पर उन्हें एक फोन आता है। फोन पर बिल्डर को निर्देश मिलता है, वह सुबह आठ बजे अपनी पत्नी को लेकर 'इकबाल साहब' के पास पहुंच जाए, अन्यथा दोनों को गोली मार दी जाएगी। बिल्डर के पवार के साथ नजदीकी संबंध थे। उसने पवार को इस घटना की जानकारी दी। लेकिन शरद पवार अर्थात भारत के रक्षामंत्री भी लाचार साबित हुए, बिल्डर की मदद नहीं कर पाए। कहते हैं कि उक्त बिल्डर निर्धारित समय पर इकबाल के पास पहुंचा, माफी मांगी, एक बड़ी राशि का भुगतान किया और तब जाकर उन्हें मुक्ति मिली।
नेताओं और  'अंडरवर्ल्ड' के बीच रिश्तों तथा  'अंडरवर्ल्ड' के दबदबे को बताने के लिए यह एक उदाहरण काफी है। बताते हैं कि 'वोरा आयोग' की 'रिपोर्ट' में नेताओं और  'अंडरवर्ल्ड' के बीच मधुर रिश्तों की विस्तार से चर्चा की गई है। अनेक बार रिपोर्ट को सार्वजनिक किए जाने की  मांग तो उठी, किंतु रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। यह अपने आप में एक शोध का विषय है कि जिस रिपोर्ट को जनहित में सार्वजनिक किया जाना था उस पर स्वयं विभिन्न सरकारें क्यों कुंडली मार बैठी हैं?
राम नाईक के दावे को झुठलाने की कोशिश करनेवाले पहले अपने गिरेबान में झांके। क्या वे इस बात से इंकार कर सकते हैं कि मुंबई पर वास्तविक नियंत्रण आज भी 'अंडरवर्ल्ड' का ही है?  'अंडरवर्ल्ड' के साथ नेताओं की सांठगांठ के किस्से आम हैं। पुलिस प्रशासन की सहभागिता भी हमेशा चर्चा का विषय बनती रही है।  राजनीति में भ्रष्टाचार और अपराधीकरण का मेल अगर खतरनाक साबित हो रहा है, तो दोषी वह 'व्यवस्था' है जो वर्तमान राजनीति की देन है और जिसे नकारात्मक ऊर्जा राजनीतिक उपलब्ध कराते रहे हैं। जनप्रतिनिधि के रुप में संविधान की शपथ लेने वाले ये राजनीतिक अपराध और बाहुबलियों को संरक्षण देते समय भूल जाते हैं कि भ्रष्टाचार और अपराधीकरण का बेरोजगारी, अशिक्षा, क्षीण स्वास्थय सेवाओं आदि जैसी गंभीर समस्याओं पर सीधा प्रतिकूल असर पड़ता है। राजनीति के इस अपराधीकरण ने प्रशासन और पुलिस को अपने शिकंजे में कस इतना पंगु बना डाला कि  'अंडरवर्ल्ड' के रुप में एक पृथक साम्राज्य निर्मित हो गया। बंबई अर्थात मुंबई इसका एक गंभीर शिकार हुआ है। राम नाईक गलत नहीं हैं। मुझे आज भी याद है भारत के पूर्व कैबिनेट सचिव डी. जी. देशमुख की वह टिप्पणी, जिसमें उन्होंने इस महानगर को लेकर गंभीर चेतावनी दी थी। देशमुख ने टिप्पणी की है कि, ' यदि गैंगों (गिरोह) द्वारा की जा रही हत्याओं को रोकने के लिए शीघ्र सख्त कदम नहीं उठाये गये तो आशंका है कि मुंबई 30 के दशक के शिकागो जैसा बन जाएगा। उस समय इस अमेरिकी शहर पर माफिया गिरोह राज करते थे। हममें से कई लोग तो हमेशा सोचते रहे हैं कि मुंबई सबसे सुरक्षित शहर है। यहां की पुलिस की गौरवपू़र्ण परंपरा और प्रतिष्ठा रही है, फिर इसे क्या हो गया कि यहां माफिया गैंग सरेआम लोगों की हत्या कर रहे हैं।  इसे कई कारण है मगर सबसे महत्पवूर्ण है राजनीति का अपराधीकरण'।
फिर राम नाईक गलत कैसे हो सकते हैं। बगैर किसी पुख्ता जानकारी के राम नाईक प्रसिद्ध अभिनेता गोविंदा पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकते। प्रत्युत्तर में गोविंदा जिस 'जनसमर्थन' की दुहाई दे चुनाव में जीत का दावा कर रहे हैं, वह लचर है। अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जिसमें जेलों में बंद बाहुबली चुनाव लड़ते रहे हैं और विशाल बहुमत से जीतते रहे हैं। वह बहुमत बाहुबली की लोकप्रियता अथवा जनसमर्थन को चिन्हित नहीं करता बल्कि उसके आतंक अथवा भय की परीणति को चिन्हित करता है। विजय हासिल करने वाले बाहुबलियों के दावों से इतर सच यही है कि बेचारा आम मतदाता उनके कहर के डर से अपना मत उसके पक्ष में डाल देता है। सच यही है। गोविंदा की लोकप्रियता संबंधी लचर दलील को मुंबईवासी स्वीकार नहीं करेंगे। समस्या अत्याधिक गंभीर व खतरनाक है। राम नाईक ने विषय छेड़ा है तो उन्हें चुनौती देने की जगह निदान के उपाय ढूंढे जाने चाहिए।