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Friday, April 3, 2009

कसौटी पर धर्मनिरपेक्षता और आस्था!


शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे बेचैन न हों. सरकार ने भले ही हिन्दुत्व की बात करने वाले वरुण गांधी पर रासुका लगा दिया हो किन्तु भारत के राष्ट्रपति ने हिन्दुत्व पर मुहर लगा दी है. जी हां, ऐसा ही हुआ है. राष्ट्रपति के कृत्य से धर्म, धर्मनिरपेक्षता और आस्था एक बार फिर शासकीय कसौटी पर है. विगत बुधवार को देशवासियों ने टेलीविजन के पर्दों पर देखा कि किस प्रकार राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने वायुसेना के एक अत्याधुनिक वीवीआईपी जेट विमान में प्रवेश के पूर्व हिन्दू पंडित की मौजूदगी में पूजा-अर्चना की. सामान्य दिनों में शायद इसकी चर्चा नहीं होती. यह एक निहायत निजी आस्था का मामला है. किन्तु जब चुनावी सरगरर्मियों के बीच ऐसी गतिविधियों के खिलाफ चुनाव आयोग कड़े कदम उठा रहा हो तब राष्ट्रपति द्वारा की गई पूजा-अर्चना पर सवालिया निशान लग रहे हैं, तो बिल्कुल ठीक ही. ध्यान रहे कि अवसर व्यक्तिगत अनुष्ठान का नहीं था. हर व्यक्ति अपनी-अपनी आस्था के अनुरूप पूजा-पाठ के लिए इस देश में स्वतंत्र है. किन्तु यह मामला अलग है. राष्ट्रपति उस संविधान की संरक्षक हैं जिसमें भारत देश को हिन्दू राष्ट्र नहीं बल्कि एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया है. इस तथ्य से सारा देश परिचित है, दोहराने की जरूरत नहीं. जिस विमान के समक्ष राष्ट्रपति नारियल फोड़ रही थीं, तिलक लगा रही थीं, पंडि़त मंत्रोच्चार कर रहा था, वह विमान उनकी निजी संपत्ति नहीं थी. विमान भारत सरकार का था अर्थात उस सरकार का जो धर्म निरपेक्ष है. अगर विमान के लिए पूजा ही आयोजित करनी थी तो वहां पर सिर्फ हिन्दू पंडित को क्यों बुलाया गया? मुस्लिम मौलवी, ईसाई पादरी और सिख ग्रंथी क्यों नहीं बुलाए गए? किसी सरकारी संपत्ति की पूजा सिर्फ हिन्दू पंडित से क्यों कराई गई? यह जिज्ञासा तमाम धर्मनिरपेक्ष भारतीयों की है. बगैर किसी पूर्वाग्रह के हमें प्रतिभा पाटिल से कोई शिकायत नहीं. वहां मौजूद हिंदू पंडित से भी नहीं. हम चर्चा कर रहे हैं धर्मनिरपेक्ष भारत के राष्ट्रपति के एक व्यवहार की. प्रसंगवश मैं याद दिला दूं कि जब एक बार भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन हेतु बनारस गए थे, वहां उन्होंने अपनी आस्था व श्रद्धा के अनुरूप जल से पुजारी के पांव धोए थे. इस बात की खबर मिलने पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति के आचरण पर कड़ा विरोध जताया था. प्रधानमंत्री नेहरू ने पत्र लिखकर डॉ. प्रसाद को याद दिलाया था कि वे देश के राष्ट्रपति हैं, उन्हें पुजारी के पैर नहीं धोने चाहिए थे. डॉ. प्रसाद नेहरूजी की बातों से सहमत नहीं हुए. उन्होंने भी पत्र लिखकर नेहरूजी को स्पष्ट शब्दों में बता दिया था कि काशी विश्वनाथ मंदिर की उनकी यात्रा और पूजा निहायत निजी मामला होने के कारण राष्ट्रपति पद से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. बेशक डॉ. प्रसाद का वह निजी मामला था बावजूद इसके प्रधानमंत्री नेहरू ने आपत्ति दर्ज की थी. वर्तमान मामले में तो मामला सरकारी था. तब देशवासियों की जिज्ञासा अथवा आपत्ति के औचित्य पर क्या कोई सवालिया निशान लगा सकता है?
3 अप्रैल 2009

6 comments:

BS said...

जब मंत्री लोग चादर चढ़ाने अजमेर जाते हैं तब भी क्या आप इतने जोर से लेख लिखते हैं और विरोध दर्ज कराते है?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

राष्ट्रपति ने तो एक परंपरा निभाई है, आप चुनाव के माहोल में यह लिख कर राजनीति को धर्म से जोड़ रहे हैं।

हिटलर said...

अभी कुछ दिनों पहले शिवराज पाटिल नामक गृहमंत्री केरल और गोवा के दौरे में विशिष्ट आर्चबिशपों के साथ एक मंच पर उपस्थित थे…और उन्होंने उनका सरेआम आशीर्वाद भी लिया, अब आप ही बतायें कि क्या यह शिवराज की आस्था(?) का सवाल था, या वे किसी और काम(?) से उस मंच पर थे? तुम जैसे जयचन्द ही हिन्दुओं को चोट पहुँचाते हो, शर्मनिरपेक्षता के नाम पर… लानत है… हिन्दुस्तान में हिन्दू रीति से पूजा करना भी गुनाह हो गया?

निशाचर said...

संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन किसी की आस्था और परपराओं पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई गई है. राष्ट्रपति भले ही एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की मुखिया हैं परन्तु उनकी कुछ धार्मिक आस्थाएँ भी हैं. उन्होंने अपने लिए मंगवाएं गए विमान की पूजा अर्चना कर कोई गलत कार्य नहीं किया. यह एक मांगलिक कार्य था जिसमें परम्पराओं के अनुरूप विघ्न- दोषों को दूर करने के लिए उन्होंने अपनी आस्था के तहत यह कार्य किया था. आपको "उलेमा एक्सप्रेस" को सरकारी खर्चे पर हरे रंग से पुतवाने पर कोई आपत्ति नहीं लेकिन संविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का अपनी निजी आस्था के तहत किया गया मांगलिक कार्य अखर रहा है. आपको मालूम होगा कि आजादी के बाद (यहाँ तक कि आजादी से पहले भी) भारत में बनी हुई कोई भी सरकारी इमारत, परियोजना आदि बगैर भूमिपूजन के नहीं बनी है और सभी हिन्दू विधि विधान से होते हैं.आज तक किसी ने आपत्ति नहीं उठाई क्योंकि इसका उद्देश्य मांगलिक होता है. आज आप इस पर संविधान की आड़ लेकर ऐसा कर रहे हैं तो यह आपकी दूषित मानसिकता का ही परिचायक है. अगर आपको इतना ही ऐतराज है तो राष्ट्रपति को लिखें कि वह किसी मौलाना को बुलाकर उनसे भी कुछ कर्मकांड करवा लें. शायद आपका अहम् तुष्ट हो जायेगा.

Dinesh said...

कुछ कमेंट्स पढ़े. घोर पूर्वाग्रह कमेंट्स हैं ये. आलेख में कहीं भी हिंदू धर्म या आस्था पर विरोध नहीं जताया गया है. बल्कि डा. राजेंद्र प्रसाद का उदाहरण दे कर श्री विनोद ने व्यक्तिगत आस्था, धार्मिक अनुष्ठान को उचित ही ठहराया है. आपत्ति नेहरूजी के तब के विरोध पर है. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की व्यक्तिगत आस्था का सवाल नहीं है. किसी भी धर्म को मानने, पूजा-अर्चना के लिए सभी स्वतंत्र हैं. मजार पर कोई मंत्री चादर चढ़ाता है, या शिवराज पाटिल आर्कबिशपों के साथ मंच पर बैठते हैं, इस पर किसी को भी आपत्ति नहीं होगी. ये सब कुतर्क हैं. विनोदजी का आलेख किसी धर्म का विरोध नहीं करता. लेकिन राष्ट्रपति के रूप में सरकारी संपत्ति की पूजा एक धर्म विशेष की विधि से कर राष्ट्रपति ने निश्चय ही एक गलत परंपरा की शुरूआत की है. मैं हिन्दू हूं. मुझे इसका गर्व भी है. मैं पूजा-पाठ हिन्दू रीति से करता हूं. लेकिन जब बात एक देश के रूप में भारत के धर्म की आती है, तब धर्मनिरपेक्षता को चुनौती नहीं दे सकता. अगर विमान राष्ट्रपति का निजी होता, तब उनकी पूजा पर सवाल नहीं उठते. राष्ट्रपति के रूप में वायुसेना के एक विमान की एक धर्म विशेष रीति से पूजा निश्चय ही अपित्तिजनक है.
-अविनाश चंद्र

निशाचर said...

राष्ट्रपति महोदया अगर कलमा पढ़कर गंडा बंधवा रहीं होती तो यह जरूर धर्मनिरपेक्षता का शशक्त उदाहरण होता.