centeral observer

centeral observer

To read

To read
click here

Tuesday, April 7, 2009

बिसात राहुल की, चाल पवार की!


प्रधानमंत्री पद के लिए आधा दर्जन से अधिक इच्छुकों की मौजूदगी के बीच शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में लगता है कि एक अलग प्रकार की खिचड़ी पक रही है. एक ऐसी खिचड़ी जिसकी सुगंध योजनाबद्ध तरीके से सोनिया गांधी के खेमे में पहुंचाई जा रही है. निगाहें और निशाने तय हैं. चतुर पवार का आज्ञाकारी खेमा योजना की सफलता को लेकर आश्वस्त है. अन्यथा पवार की पार्टी के लोग कांग्रेस के युवा महासचिव सोनिया पुत्र राहुल गांधी को देश का वर्तमान व भविष्य निरूपित नहीं करते. याद दिला दूं कि यह वही शरद पवार हैं, जिन्होंने 1999 में सोनिया गांधी के नेतृत्व को चुनौती देते हुए विद्रोह का बिगुल बजाया था. 15 मई 1999 को कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए पवार ने सोनिया को संबोधित करते हुए कहा था, 'कांग्रेस आपके विदेशी मूल के मुद्दे पर भाजपा के प्रचार का जवाब देने में सफल नहीं हो पाई है, हमें इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए.' पवार की इस बात को आगे बढ़ाते हुए उसी बैठक में पी.ए. संगमा ने कहा था, 'जब लोग पूछते हैं कि भारत में 98 करोड़ नागरिक होने के बावजूद कांग्रेस प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में एक भी योग्य भारतीय को क्यों नहीं खोज पाई तो हमारे पास कोई जवाब नहीं होता. मुझे लगता है कि वे सही हैं.' इसके बाद के घटनाक्रम से देश परिचित है. पवार, संगमा कांग्रेस से अलग हुए और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया. ध्यान रहे, विदेशी मूल के साथ-साथ पवार समर्थक तब 'परिवारवाद' का भी विरोध कर रहे थे. ऐसे में जब पवार की पार्टी राहुल गांधी को देश का वर्तमान और भविष्य बता रही है तो क्या अकारण? बिल्कुल नहीं! राहुल में 'भविष्य' देखने वाले शरद पवार के करीबी यह भी बताने से नहीं चूक रहे हैं कि राकांपा प्रमुख में प्रधानमंत्री बनने की पूरी क्षमता है. चंद्रशेखर और गुजराल मु_ी भर सांसदों के सहयोग से अगर प्रधानमंत्री बन सकते थे तो पवार क्यों नहीं? इस मुकाम पर पवार खेमा अपनी योजना पर से आवरण हटाता दिख रहा है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अर्जुन सिंह, प्रणब मुखर्जी और दिग्विजय सिंह पहले ही राहुल गांधी में प्रधानमंत्री की पात्रता के लिए आवश्यक सभी गुण देश को बता चुके हैं. यह निर्विवादित है कि कांग्रेस की इस मंडली ने शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बाद ही राहुल का नाम उछाला है. कांग्रेस संस्कृति से परिचित लोगों को इसमें कोई अजूबा नहीं दिखेगा. स्वार्थपरक, अवसरवादी राजनीति के ऐसे किस्से आम हैं. लोगों को आश्चर्य पवार की पार्टी की इस पहल पर है. राकांपा को राहुल में देश का वर्तमान और भविष्य कैसे नजर आने लगा? प्रधानमंत्री बनने की पवार की महत्वाकांक्षा पहले से जगजाहिर है. इसके लिए पवार खुद सभी संभावनाओं पर काम भी कर रहे हैं, लेकिन यह तो तय है कि अकेले राकांपा के बलबूते पवार कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते. उनकी पार्टी की ओर से चंद्रशेखर और इंद्रकुमार गुजराल का उद्धरण पेश करना महत्वपूर्ण है. इन दोनों को कांग्रेस का बाहर से समर्थन प्राप्त था. सच यह भी है कि कुछ महीनों के अंदर कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर इन्हें भूतपूर्व बना दिया था. कहीं शरद पवार चंद्रशेखर-गुजराल की 'गति' प्राप्त करना तो नहीं चाहते? शायद सच यही है. लोकसभा चुनाव के संभावित परिणाम को भांप कर पवार प्रधानमंत्री बनने संबंधी अपनी अधूरी इच्छा को पूरी करना चाहते हैं. अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ तो- चुनावी पंडितों के अनुसार- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों प्रमुख दलों के सांसदों की संख्या घटेगी. ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय दलों की शक्ति में इजाफा होगा.
वामदल, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियां तब सौदेबाजी को तत्पर दिखेंगी. कांग्रेस से नाराज वामदलों पर पवार की दृष्टि लगी हुई है. मुलायम सिंह, लालू प्रसाद से उनके मधुर संबंध रहे हैं. मायावती, जयललिता को साधने में उन्हें दिक्कत नहीं होगी. अर्थात् प्रधानमंत्री पद के लिए तीसरे विकल्प के रूप में पवार अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं. परंतु तब जरूरत पड़ेगी कांग्रेस व भाजपा में से एक के समर्थन की. कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन और यूपीए का अंग होने के कारण पवार कांग्रेस का समर्थन चाहेंगे. जाहिर है राहुल गांधी को 'भविष्य' बताकर पवार 'वर्तमान' पर सौदेबाजी करेंगे. अपने राजनीतिक जीवन में पोषित स्वप्न को अल्पावधि के लिए ही सही, पूरा करने को व्यग्र शरद पवार की चिंता अपनी राजनीतिक विरासत को लेकर भी है. पुत्री सुप्रिया सुले को अपने निर्वाचन क्षेत्र बारामती से चुनाव लड़वाने की घोषणा यूं ही नहीं की गई है. कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्य में राहुल गांधी की एक विश्वसनीय सलाहकार के रूप में सुप्रिया स्थापित हो जाएं. भारतीय लोकतंत्र के इस 'रंग' पर तब आप अचंभित होंगे?
8 अप्रैल 2009

1 comment:

Abhishek Mishra said...

Rajniti par aapki paini najar ki parichayak post.