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Sunday, February 14, 2010

तुष्टिकरण की यह कैसी राजनीति!

काठियावाड़ा (गुजरात) के मोहनदास करमचंद गांधी जी को देश ने महात्मा कहकर संबोधित किया, उन्हें भारत रत्न क्यों नहीं? यह सवाल इन दिनों बार-बार पूछा जा रहा है। इसका जवाब क्यों नहीं आ रहा? निजी बातचीत में सत्तारूढ़ नेता फुसफुसा देते हैं कि यह जिम्मेदारी तो आजादी के बाद पं. जवाहरलाल नेहरु की सरकार की ही थी। ब्रिटिश शासकों के चंगुल से देश को आजादी दिलाने वाले और फिर 6 माह के अंदर आजाद हिन्दुस्तान के एक हिन्दू की गोली खाकर शहीद हो जाने वाले महात्मा को तो प्रथम भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए था। पंडित नेहरु तो महात्मा के प्रिय शिष्य थे। कांग्रेस पार्टी सहित पूरा देश महात्मा गांधी का ऋणी था। सैंकड़ों वर्षों की गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले महात्मा गांधी को पार्टी या सरकार कैसे भूल गई? पिछले दिनों शासकीय अलंकरणों पर उठे कतिपय विवादों के बीच उस बिंदु पर महात्मा की उपेक्षा को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं। चूंकि पिछले 6 दशक से सत्ता की ओर से इस सवाल का जवाब नहीं आया, अब उम्मीद करना बेकार है। तो क्या सवाल को अनुत्तरित छोड़ देना चाहिए? देश की जिज्ञासा को मौत देने के पक्ष में हम नहीं।सत्तापक्ष के मौन से विस्मित समीक्षक अपने अनुमान के लिए स्वतंत्र हैं। इस प्रक्रिया में संभावित गलतियों के लिए दोषी उन्हें नहीं ठहराया जा सकता। कहते हैं कि आजादी के बाद देश के कर्णधारों ने जिस धर्म निरपेक्षता को संविधान में शामिल किया वह सत्तापक्ष का चुनावी हथियार बन गया। सत्तापक्ष इस हथियार को सुरक्षित रखना चाहते थे। गांधी की हत्या का सच यह था कि उनके हत्यारे हिन्दू थे। विभाजन की शर्तों व वायदों सेे पीछे हटते हुए नेहरु की सरकार ने पाकिस्तान को न केवल तयशुदा राशि देने से इंकार कर दिया था बल्कि पाकिस्तान को सैन्य सामग्री की आपूर्ति भी बंद कर दी। इससे नाराज महात्मा गांधी ने अनिश्चितकालीन अनशन की घोषणा कर दी थी। नेहरु की सरकार जहां इससे परेशान हुई, देश चकित था। उन्हीं दिनों अफवाह फैली कि गांधी चाहते हैं कि पाकिस्तान से हिन्दुस्तान आए लगभग 70 लाख शरणार्थी वापस पाकिस्तान अपने घरों को लौट जाएं ताकि जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए वे वापस हिन्दुस्तान लौटकर हिन्दुओं के साथ शांतिपूर्वक रहे। वह काल एक अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण काल के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ। गांधी, जो महात्मा बन चुके थे, देश के रक्षक थे, स्वतंत्रता सेनानी थे, संत थे और जो कभी कुछ गलत नहीं कर सकते थे, अचानक शरणार्थियों की नजरों में हिन्दुओं के प्रति घृणा करने वाले और मुसलमानों को प्यार करने वाले बन गए। रोटी और छत की तलाश में जब पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थी दिल्ली की गलियों में भटकते रहे थे तब उन्होंने विस्मित नेत्रों से बड़ी संख्या में अल्पसंख्यकों को साधिकार मोहल्लों में रहते देखा। उन दिनों सत्ता में, व्यवसाय में, सरकारी कार्यालयों में प्रभावशाली अल्पसंख्यक मौजूद थे। गांधी उन शरणार्थी शिविरों में स्वयं जाकर अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहित करते थे। गांधी ने तब नेहरु और पटेल पर दबाव डाला था कि हिन्दुओं और सिखों को हथियारों से वंचित कर दिया जाए ताकि अल्पसंख्यक मुस्लिम निर्भय वहां रह सकें। महात्मा गांधी की हत्या का एक बड़ा कारण अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पन्न आक्रोश था। तो क्या वर्ग विशेष की नाराजगी के भय से देश के नवशासकों ने महात्मा गांधी को भारत रत्न से अलंकृत नहीं किया। तुष्टिकरण व वोट की राजनीति पर आज चिल्ल-पों करने वाले इतिहास के इन पन्नों पर गौर करें। इस 'राजनीतिÓ के जन्म को याद रखें। जब महात्मा गांधी को इस 'राजनीतिÓ का शिकार बनाने से शासक नहीं चूके तब औरों की क्या बिसात! आजाद भारत की कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीति बदले हुए स्वरूप में आज भी देश, समाज को बांट रही है। तुष्टिकरण का बेशर्म खेल चुनावी राजनीति का खतरनाक किंतु मजबूत हथियार बन गया है। बाल ठाकरे ने शाहरुख खान को निशाने पर इसलिए नहीं लिया कि शाहरुख ने पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाडिय़ों के हक में दो शब्द बोले थे, ठाकरे की परेशानी का सबब वह 'खानÓ शब्द बना जो पूरे संसार में अचानक लोकप्रिय बन बैठा। फिल्म में किरदार शाहरुख गर्व से कहते हैं कि हां, मेरा नाम खान है, किन्तु मैं आतंकवादी नहीं। पूरे संसार में संदेश गया कि सभी मुस्लिम आतंकवादी नहीं हैं। मुस्लिम विरोध की सांप्रदायिक राजनीति करने वाले बाल ठाकरे को भला यह कैसे बर्दाश्त होता? यह वोट की ही राजनीति है, जिसमें सत्ता पक्ष को शाहरुख का बचाव करना पड़ा। यही आज की राजनीति का कड़वा सच है। और यही कारण है राजनीति के प्रति सभ्य-शिक्षित युवा वर्ग की घृणा का। किसी ने ठीक कहा है कि मछली पकडऩे और राजनीति करने में कोई फर्क नहीं है। ------------------------

2 comments:

Suresh Chiplunkar said...

प्रिय पाठकों, इस लेख का सार यह है कि महात्मा गाँधी घृणा के पात्र नहीं हैं, सिर्फ़ बाल ठाकरे हैं…

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

असल मुद्दा तो कहीं गुम हो गया. गांधी जी से चलता लेख के अंत की यह कल्पना मैंने नहीं की थी.