शाबास ममता! भारतीय रेल सेवा को व्यवसाय की जगह लोकोपयोगी सेवा चिन्हित करने के लिए। यही तो वह जरूरत है जो स'चे अर्थ में आज जनता के हक में लोकतंत्र का परचम लहराती है। लोकतंत्र के इस पहलू की अनदेखी कर आंकड़ों की बाजीगरी से संतुष्ट राजनेता देश का अहित करते आए हैं। हालिया कमरतोड़ महंगाई इन्हीं की देन है। आंकड़ों और शब्दों की लफ्फाजी को हाशिये पर रख रेल मंत्री ममता बनर्जी ने व्यवहार के स्तर पर आम जन की सुध लेने की कोशिश की है।
रेल बजट को टेलीविजन पर देख रहा था। अनेक महान विशेषज्ञ अपनी विषय विद्वत्ता प्रदर्शित कर रहे थे। किसी ने कहा, यह तो आम बजट है। किसी ने कहा रेल मंत्री को आम बजट के आर्थिक पक्ष की जानकारी नहीं। कोई कह रहा था, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर बजट तैयार किया गया है। कोई टिप्पणी कर रहा था कि ममता द्वारा प्रस्तुत बजट अलग रेल बजट की मूल कल्पना के विपरीत है। अत: रेल मंत्रालय को भी आम बजट में शामिल कर लिया जाना चाहिए। टिप्पणी ऐसी भी आई कि, ममता बजट को लेकर गंभीर नहीं हैं, क्योंकि उनकी निगाहें रेल मंत्रालय से दूर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी हैं। इन कथित विशेषज्ञों की राय कोई नई नहीं है। सच तो यह है कुछ अपवाद छोड़ दें तो ऐसे विशेषज्ञ ही देश के विकास के प्रति अगंभीर है। किसी भी विशेषज्ञ ने यह याद दिलाने की कोशिश नहीं की कि वस्तुत: रेल सेवा एक लोकोपयोगी सेवा है- व्यावसायिक नहीं। रेल सेवाएं यातायात की धुरी हैं। भारत की 9& प्र.श. जनता इस सेवा का उपयोग करती है। रेल सेवा का सुखद पहलू यह कि यह भारत, भारतीय और भारतीयता को जोड़ती है। इनका दर्शन कराती है। विशेषज्ञ बेचैन थे कि मालभाड़ा और यात्री किराये में वृद्धि नहीं होने से घोषित परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए धन कहां से आएगा? आम जनता पर भाड़े का बोझ लादकर धन अर्जित करने की कल्पना ही जनविरोधी है। भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में रेल जैसी लोकोपयोगी सेवा के महत्व को पहचाना जाना चाहिए। कोष के लिए अन्य संभावनाएं खंगाली जाएं। रेलवे के पास अनेक ऐसी संपत्ति हैं जिनसे अधिकतम प्रतिफल हासिल किया जा सकता है। सार्वजनिक निजी साझेदारी (पीपीपी) का प्रस्ताव कर ममता ने संकेत दे भी दिए हैं। और अगर जरूरत पड़े ही तो उद्योगों और व्यवसाय का वर्गीकरण कर इस रूप में मालभाड़ा और यात्री किराये में वृद्धि की जाए जिससे आम जन प्रभावित न हो। खाद एवं अन्य जीवनोपयोगी वस्तुओं की कीमतें इस कारण बढऩे न पाएं। विशेषज्ञों का उपयोग इस हेतु किया जाए।
जहां तक राजनीतिक लाभ की बात है, लोकतंत्र में यह एक सामान्य प्रक्रिया है। सत्तारूढ़ दल हमेशा ऐसा करता आया है। इसके लिए रेलमंत्री की आलोचना करना उचित नहीं। हां, इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी अन्य राज्य का वाजिब हक छीनकर किसी राज्य विशेष को लाभ न पहुंचाया जाए। रेल सेवा को संपूर्णता में भारतीय रेल सेवा की पहचान मिले। यह भी जरूरी है।
Thursday, February 25, 2010
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1 comment:
नाकारा कर्मचारियों को हटाया जाये, रिक्त पदों को भरा जाये तथा रेलवे में सुविधायें बढ़ाई जायें और समय पर चलाना सुनिश्चित किया जाये.
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