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Monday, February 8, 2010

प्रधानमंत्री देशहित की सोंचे, विदेशहित की नहीं!

क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारत को 'कल के ईस्ट इंडिया कंपनियों' का हब बना देना चाहते हैं? खुदरा कारोबार के द्वार को विदेशी निवेश के लिए खोल दिए जाने संबंधी उनके सुझाव क्या इस संभावना को चिन्हित नहीं कर रहे? अत्यंत ही खतरनाक सुझाव है यह। शत प्रतिशत देश हित के खिलाफ। क्या चाहते हैं प्रधानमंत्री? कहीं वे अपने किसी छुपे एजेन्डे को अमल में तो नहीं ला रहे हैं। मामला सीधा नहीं। कहीं न कहीं दाल में काला है अवश्य। बैंक, इंश्योरेन्स, शिक्षा, चिकित्सा, व्यापार आदि क्षेत्रों के द्वार विदेशियों के लिए खोल दिए जाने के बाद प्रतिस्पर्धा के नाम पर खुदरा बाजार को भी विदेशियों के हवाले कर प्रधानमंत्री भारत का कौन सा हित साधना चाहते हैं? लोगों की स्मरणशक्ति कमजोर नहीं है। 1991 में जब मनमोहन सिंह को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने देश का वित्त मंत्री बनाया था तब यह कहा गया था कि मनमोहन सिंह वस्तुत: अमेरिका द्वारा नामित हैं। उसी काल में पाकिस्तान के वित्त मंत्री पद पर भी मनमोहन सिंह की तरह विश्व बैंक के एक पूर्व अधिकारी की नियुक्ति हुई थी। प्रचारित हुआ था कि दोनों की नियुक्ति अमेरिका की इच्छा पर हुई थी। दोनों को अमेरिकी प्रतिनिधि के रूप में निरूपित किया गया था। पिछली सरकार में जिस प्रकार प्रधानमंत्री ने अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा करार के मुद्दे पर सरकार के अस्तित्व को ही दांव पर लगा दिया था, तब भी अमेरिकी हित साधने का आरोप उन पर लगा था। कार्यकाल के अंतिम दिनों में जिस गति से मनमोहन सिंह ने करार संबंधी प्रस्ताव को संसद में पारित करवाया था, उससे अनेक संदेह पैदा हुए थे। निश्चय ही वह करार डॉ. मनमोहन सिंह का एजेंडा था। आज जब वे खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश की वकालत कर रहे हैं तब कहीं ऐसा तो नहीं कि प्रधानमंत्री इसके लिए किसी से प्रतिबद्ध हैं, उनके गुप्त एजेंडों में से ही यह निकला है। उनकी यह दलील कि अगर कीमतों पर काबू पाना है तो खुदरा व्यापार के द्वार विदेशियों के लिए खोल देने चाहिए, आपत्तिजनक है। अगर सरकार कीमतों पर काबू पाने में असमर्थ है तो अपनी गलत नीतियों के कारण, व्यवस्था में प्रविष्ट भ्रष्टाचार के कारण, राजनेताओं, व्यापारियों, नौकरशाहों के नापाक गठबंधन के कारण। इस व्यापार में विदेशियों के प्रवेश से क्या इन पर अंकुश लग जाएगा? प्रतिस्पर्धा के लिए विदेशी मौजूदगी की दलील अनुचित है। यह तो अपने लोगों के बीच में भी हो सकती है। निर्भरता अपने संसाधनों, अपनी मानव शक्ति, अपनी पूंजी और अपनी व्यवस्था पर हो, न कि फिरंगियों पर। अभी पिछले दिनों खबर आई थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय में स्थापित कम्प्युटरों से चीन महत्वपूर्ण जानकारियां उड़ा ले गया था। तो क्या प्रधानमंत्री कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था विदेशियों को सौंप देनी चाहिए? सीमा पर घुसपैठ रोकने में विफल हमारे जवानों को हटाकर विदेशियों को तैनात कर देना चाहिए? आतंकी हमलों को रोकने में विफल हमारी सुरक्षा बलों को हटाकर विदेशी बलों को तैनात कर देना चाहिए? ऐसे सुझाव हास्यास्पद एवं आत्मघाती हैं। विदेशी प्रतिस्पर्धा के द्वारा कीमतों में कमी नहीं हो सकती। जिन-जिन क्षेत्रों में विदेशी निवेश हुए हैं उनकी स्थिति पर गौर करें। उदाहरण के लिए एक चिकित्सा क्षेत्र को ही लें। जीवनरक्षक दवाओं की कीमतें आम आदमी की पहुंच के बाहर है। महंगी चिकित्सा के कारण अनेक मरीज बिना इलाज समयपूर्व दम तोड़ देते हैं। खुदरा बाजार के बड़े खिलाड़ी बनकर विदेशी अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को और चौड़ा कर देंगे। कल-कारखाने स्थापित करने, उत्पादन करने, की अनुमति के बाद विदेशी कंपनियों को उपभोक्ता बाजार में प्रवेश दिया जाना किसी भी दृष्टि से देश हित में नहीं होगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भारत के प्रति संदिग्ध निष्ठा के कारण अनेक सवाल खड़े हो गए हैं। इस आरोप पर कि उनकी मूल निष्ठा अमेरिका, यूरोप और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की अर्थ व्यवस्था एवं वैश्वीकरण में है, को चुनौती देने वाले कम ही मिलेंगे। अगर प्रधानमंत्री विदेश हित में अपने एजेंडों को भारत में लागू करने में सफल हो गए तब शायद एक दिन ऐसा भी आएगा जब भारतीय राजनीति के सूत्र विदेशी पूंजी धारकों के हाथों में होंगे। ब्रिटिश शासन प्रणाली का गुणगान करने वाले भारतीय प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ऐसे विदेशियों को दावत देकर भारत को आखिर कहां ले जाना चाहते हैं? पीड़ा तो हो रही है किन्तु एक प्रतिबद्ध भारतीय नागरिक होने के कारण सच को सामने रखना अपना कर्तव्य समझता हूँ। भय लगता है इतिहास के उन पन्नों को पलटने में जिनमें भारत के गद्दार सामंतों का वर्णन है। मुगल और ब्रिटिश शासकों को भारत में राजपाट संभालने के लिए आमंत्रण उन्हीं गद्दार सामंतों ने ही तो दिए थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इतिहास के उस काले अध्याय को दोहराने की कोशिश न करें। महंगाई रोकने के लिए देसी उपाय करें, विदेशी नहीं। यह संभव है-शत प्रतिशत संभव है। शर्त यह है कि निज स्वार्थ से ऊपर उठ, भ्रष्टाचार का त्याग कर, ईमानदार प्रयास किए जाएं। गद्दारी संबंधी इतिहास के काले अध्यायों को कैद ही रखा जाए, मुक्त करने पर पुनरावृत्ति देश को फिर से गुलाम बना देगी।

2 comments:

अरूण साथी said...

कोई फर्क नहीं पड़ता, कांग्रेस के सुपरपावर सोनीया गांधी प्रोफेशनल तरीके से देश को चला रही है। उन्हें पता है कि भारत पर अंग्रेजों ने 200 साल तक कैसे ंशासन किया। वही आज किया जा रहा है। प्रधानमन्त्री मुखौटा है। देशहित कहीं नहीं मिलता। और आगे के लिए राहुल गांधी को प्रोजेक्ट किया जा रहा है। सबकुद प्रोफेशन तरीके से।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बढ़िया हो कि देश की कानून व्यवस्था ही ठेके पर दे दी जाये.