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Friday, February 5, 2010

ठाकरे पर सरकार की रहस्यमय बेबसी!

जब दिल- दिमाग असंतुलित हो जाए तब स्मरणशक्ति भी कमजोर हो जाती है। अपने ही उगले शब्दों की याद नहीं रहती। नतीजतन नए वाचित शब्द अपने पूर्व के शब्दों अर्थात बातों को झूठा साबित कर देते हैं। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है।
यह निष्कर्ष गलत नहीं है। पता नहीं बाल ठाकरे 'मी मराठी' की जगह 'मी मुंबईकर' के पार्टी आंदोलन को कैसे भूल गए? पहले मराठी भाषियों को आकर्षित करने के लिए 'मी मराठी' आंदोलन उन्होंने खुद चलाया था। बाद में सन 2003 में जब पार्टी की कमान पुत्र उद्धव ठाकरे को सौंपी तब सरलचित्त उद्धव ठाकरे ने उत्तर भारतीयों को आकर्षित करने के लिए 'मी मुंबईकर' आंदोलन की शुरूआत की। उद्धव ने मुंबई में रस-बस जाने के लिए उत्तर- भारतीयों का आह्वान किया कि वे मराठी सीखें, महाराष्ट्र का सम्मान करें और 'मुंबईकर' बन जाएं। यहां तक कि संजय निरूपम द्वारा आयोजित उत्तर भारतीयों के छठ-पर्व कार्यक्रम में उद्धव ठाकरे उत्साह के साथ शामिल हुए थे। उद्धव के इस अभियान को बाल ठाकरे ने आशीर्वाद दिया था। अगर बाल ठाकरे यह भूल गए हैं तब मैं उन्हें याद दिलाना चाहूंगा कि सन 2007 में स्वयं बाल ठाकरे ने गति देने के लिए शिवसेना कार्यकर्ताओं और उत्तर भारतीयों का आह्वान किया था। ठाकरे ने तब कहा था कि हिंदुओं को चाहिए कि वे भाषा की दीवार तोड़ मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ एकजुट हो जाएं। क्या यह बताने की जरूरत है कि ठाकरे किस भाषा की दीवार तोडऩे की बात कर रहे हैं। अब जबकि ठाकरे मुंबई पर सिर्फ मराठियों के अधिकार की बात कर रहे हैं तब निश्चय ही लोगों की यह आशंका सच साबित हो रही है कि ठाकरे अपना दिमागी संतुलन खो चुके हैं, उनकी स्मरणशक्ति कमजोर पड़ गई है।
कोई आश्चर्य नहीं कि तब ऐसी अवस्था में बाल ठाकरे सभ्यता, शिष्टाचार भूल जाएं। उत्तर भारतीयों को समर्थन से राहुल गांधी पर वार करते हुए उन पर दिमागी संतुलन खो देने का जुमला तब तो ठीक था किंतु विवाह सरीखे निहायत निजी मामले पर वार कर ठाकरे ने घोर असभ्यता का परिचय दिया है।
इसके पूर्व बाल ठाकरे कभी भी इतना नीचे नहीं गिरे थे। उनकी यह टिप्पणी कि जब किसी का विवाह एक खास आयु तक नहीं हुआ तब वह व्यक्ति असंतुलित हो जाता है...और इसी पागलपन के कारण राहुल ने महाराष्ट्र का अपमान किया है, श्लीलता की सीमा पार कर गई है। बुजुर्ग बाल ठाकरे से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।
'हिंदु सम्राट' के विशेषण से विभूषित बाल ठाकरे यह भी भूल गए कि हिंदु संस्कृति में किसी के नाम, रूप, धर्म, जाति और व्यवसाय को लेकर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की जाती। लेकिन बाल ठाकरे पता नहीं किस रौ में ऐसी टिप्पणी कर गए कि मुंबई राहुल की 'इटालियन मां' की नहीं है। यह हिंदु संस्कृति ही नहीं, पूरी भारतीय संस्कृति और भारतीयता का अपमान है। ऐसा नहीं होना चाहिए था। समझ से परे यह भी है कि एक व्यक्ति व उसका परिवार बेखौफ महाराष्ट्र का अपमान कर रहा है, भारतीय संविधान को चुनौती दे रहा है किंतु सरकार कानूनी कार्रवाई करने की जगह सिर्फ वक्तव्यों से जवाब दे रही है। क्या ठाकरे कानून से उपर हैं? आखिर राज्य सरकार उनसे भयभीत क्यों है? मुंबई के बड़े से बड़े अंडरवल्र्ड और माफियाओं पर अंकुश लगाने में सफल राज्य सरकार की ठाकरे के मामले में बेबसी रहस्यमय है।

3 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

भारत का इतिहास इसी तरह के विभाजन और आपसी लड़ाई झगड़ों की दास्ताँ लिए हुए है
२०१० का समय भी ये धर्म, क्षेत्रीयतावाद ,
जात पांत के भेद भावों को मिटा न पाया उसका
बहुत अफ़सोस है -
-- हर देश भक्त को नमन --
भारतीय जनता कब संगठित होगी ?
बातें करने का समय कब का बीत चूका है ...
अब तो , कायरता का त्याग करो ...
नेता क्या करेंगें ? सिर्फ टेक्स लेंगें आपसे ..
जनता जनार्दन कब जागेगी ?
- लावण्या

M VERMA said...

सरकार में भी तो हैं ठाकरे
बेबस सरकार क्या करे

काजल कुमार Kajal Kumar said...

मीडिया ने इस तरह के लोगों को हीरो बना रखा वर्ना जनता इन्हें कितना भाव देती है ये तो चुनावों में दिखता ही चला आ रहा है.