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Monday, February 22, 2010

मीडिया पर जेठमलानी की अनुचित खीज!

राम जेठमलानी नाराज हैं कि मीडिया उच्च न्यायालय बन गया है। वैसे वे अपने पेशे वकालत से भी नाराज हैं। वकीलों के लिए उनका कहना है कि समाज में उनकी छवि खराब हो गई है। किसी वकील को कोई पड़ोसी के रूप में देखना नहीं चाहता। उनकी छवि समाज में उत्पातियों की बन गई है। जेठमलानी की इस खीज को समझना कठिन नहीं है। मीडिया पर प्रहार करने के साथ-साथ अपने सहयोगी वकीलों को आड़े हाथों लेकर जेठमलानी ने वस्तुत: अपने लिए सुरक्षा कवच ढूंढने की कोशिश की है। ये वही जेठमलानी हैं जो एक बार पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के आवास के बाहर एक उत्पाती की तरह धरने पर बैठने के कारण पिट चुके हैं। हालांकि वह घटना पुरानी हो गई किन्तु जेठमलानी की ताजा खीज के संदर्भ में यह बताना जरूरी है कि तब वे वकील के पेशे से संबंधित किसी मुद्दे को लेकर चंद्रशेखर के घर के बाहर धरने पर नहीं बैठे थे। कारण निहायत निजी थे। आज देश की समस्याओं की जड़ में क्या एक कारण यह नहीं कि कतिपय लोग अपने घोषित दायित्व से हटकर आचरण करने लगे हैं? जेठमलानी तब पिटे थे तो इसी कारण। केंद्रीय मंत्री रह चुके जेठमलानी की मीडिया से नाराजगी के कारण भी व्यक्तिगत हैं। उनकी शिकायत है कि अदालत द्वारा बाइज्जत बरी हो जाने के बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ केवल मीडिया के दबाव पर अपराध दर्ज हो जाता है। जेठमलानी यह भी खुलासा करते हैं कि उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन में ऐसा पहले नहीं देखा है। अव्वल तो जेठमलानी इस बिंदु पर बिल्कुल गलत हैं। दूसरा यह कि जेठमलानी ने उन मामलों की तरफ इशारा किया है जिनकी पैरवी अदालत में उन्होंने की थी। यह ठीक है कि कुछ मामलों में बरी होने के बावजूद मीडिया की सतर्कता के कारण मामले की खामियां और साथ ही दबाव-प्रलोभन उजागर हुए। नतीजतन बड़ी अदालतों ने पुन: मामला दायर कर नए सिरे से मामले की सुनवाई शुरू करवाई। अपराध साबित भी हुए, अपराधी दंडित किए गए। आश्चर्य है कि ऐसे मामले में मीडिया की सराहना करने की जगह जेठमलानी उसकी आलोचना कर रहे हैं। मैं मीडिया के संपूर्ण आचरण का बचाव नहीं कर रहा। बगैर नाम लिए जेठमलानी ने जिन मामलों की ओर इशारा किया है, उस संबंध में यह जरूर कहना चाहूंगा कि मीडिया ने वस्तुत: लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के दायित्व का निर्वाह किया है। जेठमलानी ऐसे किसी हाई प्रोफाइल मामले को व्यक्तिगत न बनाएं। वकील के रूप में अच्छे तर्क और छिद्रों से भरे कमजोर कानून का लाभ उठा अपने मुवक्किलों को बरी करवा लेना तो आसान है किन्तु जब न्याय संदिग्ध दिखेगा तब मीडिया उन्हें बेपर्दा तो करेगा ही। यह उसका कर्तव्य भी है और समाज के प्रति दायित्व भी। बड़ी अदालतें ऐसे अनावृत नए तथ्यों का संज्ञान लेकर जब नए सिरे से अपराध दर्ज करने का आदेश देती हैं तो न्याय के पक्ष में ही, न्याय की पवित्रता और निष्पक्षता कायम रखने के लिए। बेहतर हो, जेठमलानी न्याय की इस जरूरत को समझते हुए कुछ मुकदमों में अपनी हार के लिए मीडिया को दोषी ठहराने की जगह उसकी कर्तव्य परायणता की सराहना करें। कथित 'मीडिया ट्रायलÓ कभी-कभी पूर्वाग्रह ग्रसित होते हैं। इससे मैं इन्कार नहीं कर सकता। किन्तु सच-झूठ का फैसला करने के लिए अदालतें तो हैं ही। सिर्फ कुशाग्र बुद्धि और सच को झूठ तथा झूठ को सच बनाने में माहिर वकील 'न्यायÓ नहीं दिलवा सकते। उन्हें संवेदनशील भी होना पड़ेगा। पेशे को कलंकित करने वाले वकीलों की फौज के बीच से सही न्याय के पक्षधर किसी वकील को ढूंढ निकालना मुवक्किलों के लिए आसान नहीं होता। कानून की किताबें वास्तविक न्याय की आग्रही हैं न कि जोड़तोड़ और कुतर्क की।

2 comments:

अरूण साथी said...

yahi baat logon ko samajh nahi aati. media NE JHOOTH KO UNGLI DIKHAE TO BHARK GAYE.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अरुण जी से सहमत. अंतिम पंक्तियों में आपने समस्याओं का हल भी लिख दिया है. प्रशासन-वकील और चिकित्सक काश संवेदनशील हो जायें.