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Friday, April 9, 2010

मानवाधिकार का चैम्पियन 'गिरोह'!

सवाल मौजूं है, चुनौती भी बिल्कुल जायज है। अब देश यह जानना चाह रहा है कि छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में लगभग 6 दर्जन से अधिक निर्दोष सीआरपीएफ के जवानों को मौत के घाट उतारने वाले नक्सलियों के खिलाफ स्वयंभू मानवाधिकार संरक्षक, महिमामंडित सामाजिक कार्यकर्ता, संसदीय लोकतंत्र के कथित पुरोधा मौन क्यों हैं? चुनौती है उन्हें यह, कि वे सामने आएं, मुंह न छुपाएं। क्या शहीद हुए 6 दर्जन से अधिक जवान मानवाधिकार संरक्षण की श्रेणी में नहीं आते? जो शहीद हुए उनकी विधवाओं, उनके बच्चों, उनके भाई-बहनों, माता-पिताओं के आंसू इन्हें द्रवित क्यों नहीं कर पा रहे? क्या शहीदों का खून पानी और उनके परिजनों के आंसू मात्र खारा पानी हैं? पुलिस, अर्धसैनिक बलों द्वारा नक्सल विरोधी कार्रवाई के दौरान 2-4-10 नक्सलियों की मौत पर मानवाधिकार के नाम पर चीख-चीख कर आसमान को सिर पर उठा लेने वाले इन कथित समाजसेवियों-बुद्धिजीवियों ने दंतेवाड़ा की घटना पर मौन साध स्वयं को नंगा खड़ा कर लिया है। आखिर इनके कथित मानवाधिकार के न्याय के तराजू के पलड़ों के वजन में फर्क क्यों? अपने घर-परिवार से दूर अनुशासन की वर्दी पहन देश-समाज में कानून-व्यवस्था के पक्ष में समर्पित इन जवानों की कुर्बानियां तो स्वर्णाक्षरों में लिखी जानी चाहिए। लेकिन मानवाधिकार के कथित संरक्षक ऐसा नहीं करेंगे। इन्होंने तो एक 'गिरोह' बनाकर, षडय़ंत्र रचकर संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली का ऐलानिया विरोध करने वाले नक्सलियों-माओवादियों को महिमामंडित करने की ठान ली है। लोकतंत्र विरोधी इन तत्वों के लिए मानवीय जीवन और मूल्य कोई मायने नहीं रखते। फिर इनका समर्थन क्यों? इनका महिमामंडन क्यों? और इन पर काबू पाने की प्रक्रिया में शहीद हुए जवानों पर इनका मौन क्यों? सच मानिए, अत्यंत ही पीड़ा के साथ मैं इन्हें एक 'गिरोह' के रूप में प्रस्तुत कर रहा हंू। अपने पत्रकारीय दायित्व के निर्वाह के दौरान प्राय: प्रतिदिन इनसे दो-चार होना पड़ता है। अनेक बार नजदीक से इन्हें नंगा भी देख चुका हूं। अपने ही सिर के बाल नोच लेने की इच्छा होती है इन मुखौटाधारियों की हरकतों को देख-सुनकर। कोफ्त होती है जब इन्हें घोर साम्प्रदायिक, विकृत मकबूल फिदा हुसैन के समर्थन में सड़कों पर निकलते देखता हूं। पीड़ा होती है बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन के अश्लील शब्दों पर इन्हें परदा डालते देख। समाज के यथार्थ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अश्लील-आपत्तिजनक फिल्म बनानेवाली दीपा शाह के बचाव में यही वर्ग सामने आया था। 'सोशल एक्टिविस्ट' अर्थात्ï सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में महिमा मंडित अरुंधति राय और मेधा पाटकर का मैं सम्मान करता हूं। किन्तु दंतेवाड़ा नरसंहार पर इनका मौन क्या विस्मयकारी नहीं! ये चुप हैं तो क्यों? कहां गईं इनकी सामाजिक मानवीय संवेदनाएं? जवानों की विधवाओं एवं परिजनों के आंसुओं पर इनकी आंखों के कोर नम क्यों नहीं हुए? पाषाण दिल तो ये हैं नहीं, तब क्यों नहीं यह मान लिया जाए कि ये 'सोशल' हैं तो सिर्फ अपने स्वार्थवश, और स्वार्थ ऐसा जो शहीदों का सौदा करने में भी नहीं हिचके। एक हैं तीस्ता सीतलवाड़। मानवाधिकार के नाम पर ये भी विभिन्न अदालतों में, आयोगों में याचिकाएं दायर करती रहती हैं। लेकिन इनकी सारी मशक्कत एक सम्प्रदाय विशेष के इर्दगिर्द ही घूमती रहती है। वैसे, गवाहों और कथित पीडि़त पक्षों को प्रलोभन देने, प्रभावित करने के आरोप इन पर लग चुके हैं। लेकिन, 'गिरोह' इनके महिमामंडन में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है। फिर क्या आश्चर्य कि तीस्ता सीतलवाड़ भी दंतेवाड़ा नरसंहार पर चुप हैं! यह 'गिरोह' का आतंक ही है जो ऐसे कठोर सच को सतह पर आने से रोकता रहता है। लेकिन अब और नहीं। दंतेवाड़ा की घटना पर इस 'गिरोह' के मौन ने इन्हें बेपर्दा कर दिया है। दंतेवाड़ा नरसंहार के शहीद भी मानवाधिकार के आकांक्षी हैं। इनके परिजनों को भी न्याय चाहिए। अन्यथा निश्चय मानिए, एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब देश में सुरक्षा प्रहरियों का अकाल पड़ जाए! और तब इन स्वयंभू मानवाधिकार संरक्षकों की रक्षा कौन करेगा?

5 comments:

Suman said...

sri vinod ji namaskar,
aap ka yah lekh aap ki samvedan heenta ko pradarshit karta hai. chaurahe par khade paan ki dukaan par time pass karne vaale vyakti jo ulti seedhi baatcheet karte hain usi prakaar ka aapka yah alekh hai manavadhikaar karykarta pidit vyaktiyo k liye ladai karte hain jinke marne par shaheed ka pramaan patr jaari nahi hota hai jabki ve vashtvik shaheed hote hain jinka sab kuch loot liya jata hai. shaheed mratak ashrit naukari, family pension, muvaavja, anudaan lene vaale ho gaye hain. naukariyo mein jo log ja rahe hain jara unke krityo ki taraf gaur kijiye multinationals desi poonjipatiyo ki loot par adharit vyavastha ko banaye rakhne vaale mritko ko aap koi badhiya sa shabd likhe to accha lagega

sadar
aapka hi
suman

Ratan Singh Shekhawat said...

स्वयंभू मानवाधिकार संरक्षक, महिमामंडित सामाजिक कार्यकर्ता, संसदीय लोकतंत्र के कथित पुरोधा मौन क्यों हैं?

@ ये सब इन्ही नक्सलियों के दलाल है , इन्ही नक्सलियों के बचाव के मुखौटे है | इसलिए ये सिर्फ तभी चिल्लपों करेंगे जब सुरक्षा बल इनके ऊपर दबाव बनायेंगे | ऐसे कार्यकर्त्ता देश में ,समाज में एक तरह से कोढ़ के समान है |

Ratan Singh Shekhawat said...

एक संवेदनशील लेख में भी इन Mr. Nice को संवेदना नहीं दिखाई दे रही ! लगता है ये भी कोई महान पहुंचे हुए मानवाधिकार कार्यकर्त्ता है !!

उम्दा सोच said...

@ आदरणीय सुमन जी nice नही है आप का ऐसा सोचना !

निशाचर said...

सुमन जी काला कोट पहनकर कानून की पैरवी(??) करते हुए आप भी व्यवस्था का हिस्सा ही हैं. जो दंतेवाडा में शहीद हुए वह भी अपना फर्ज निभा रहे थे. हुजूर, आप भी इसी प्रकार अपनी जान दे दें, मैं वादा करता हूँ आपको भी मुआवजा, पेंशन आदि दिलवा दूंगा............ चले आते हैं कहाँ- कहाँ से....