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Monday, December 15, 2008

नारायण राणे से पुलिसिया पूछताछ क्यों नहीं?


मेरा यह सीधा सवाल राज्य के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण, गृहमंत्री जयंत पाटिल, पुलिस महासंचालक अनामी रॉय और आतंकवाद निरोधक दस्ता (एटीएस) प्रमुख के.पी. रघुवंशी से है. बता दूं कि यह सवाल जनभावना से प्रेरित है. सवाल यह कि जब सार्वजनिक रूप से राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे घोषणा कर रहे हैं कि कतिपय कांग्रेसी नेताओं के अंडरवल्र्ड सरगना दाऊद इब्राहिम के सहयोगियों से घनिष्ठ संबंध हैं तब अभी तक राणे से इस संबंध में पूछताछ क्यों नहीं हुई? एटीएस ने उनसे अब तक नाम जानने की कोशिश क्यों नहीं की? आखिर पुलिस किस अवसर की प्रतीक्षा कर रही है? मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद राणे द्वारा लगाए गए आरोप अत्यंत ही गंभीर हैं. अब तक के जांच परिणाम से यह प्रमाणित हो चुका है कि मुंबई पर आतंकी हमलों के पीछे न केवल पाकिस्तान में संरक्षित आतंकवादी संगठनों का हाथ है, बल्कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का सहयोग व समर्थन प्राप्त दाऊद इब्राहिम का भी हाथ है. ध्यान रहे, मुंबई पर आतंकी हमले की जांच के लिए अमेरिका व इजराइल की खुफिया एजेंसियां भारत का दौरा कर चुकी हैं. ऐसे में क्या आतंकवादियों के साथ नेताओं की घनिष्ठता का आरोप लगाने वाले नारायण राणे से पूछताछ नहीं की जानी चाहिए थी? यह तो पुलिस का कर्तव्य है कि वह सुराग देने वाले या सबूत होने की बात करने वाले हर व्यक्ति से पूछताछ करे. राणे तो एक अत्यंत ही जिम्मेदार व्यक्ति हैं. उन्होंने जब ऐसा आरोप लगाया तब वे विलासराव देशमुख मंत्रिमंडल के एक वरिष्ठ सदस्य थे. चूंकि विलासराव के शासनकाल में मुंबई पर आतंकी हमला हुआ, उस सरकार के कैबिनेट मंत्री राणे के आरोप को गंभीरता से लिया जाना चाहिए था. खेद है, ऐसा नहीं हुआ. सरकार चुप रही. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ, जिसे 'वॉच डॉग' के रूप में जाना जाता है, वह मीडिया भी प्रतीक्षारत है कि राणे अपनी ओर से कथित आरोपियों का नाम बतायें. निश्चय ही यह दायित्व के प्रति घोर लापरवाही का मामला है. ऐसा नहीं होना चाहिए. समय अभी भी शेष है. सरकार व पुलिस पहल करे और नारायण राणे से उनके द्वारा लगाये गये आरोपों की सत्यता की जांच करे. क्या एटीएस प्रमुख को यह याद दिलाने की जरूरत है कि आतंकवाद और अंडरवल्र्ड से संबंधित किसी भी सुराग की जानकारी प्राप्त होने पर त्वरित कार्रवाई की जानी चाहिए? जब किसी गुमनाम टेलीफोन कॉल पर पुलिस आनन-फानन में कॉल करने वाले का पता लगा उससे पूछताछ करती है तब ऐलानिया आरोप लगाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री जैसे जिम्मेदार व्यक्ति से पूछताछ क्यों नहीं? क्या पुलिस राणे के आरोप को सच मानने से इन्कार करेगी? तब नारायण राणे गलतबयानी कर सनसनी फैलाने के दोषी हैं. क्या यह आचरण भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं को आकर्षित नहीं करता? अनेक उदाहरण हैं जब ऐसे झूठ बोलने वालों को पुलिस ने गिरफ्त में ले दंडित किया है. लेकिन नारायण राणे के झूठ-सच का फैसला वस्तुत: पुलिस और जांच एजेंसियों को करना है. आतंकवादियों और अंडरवल्र्ड के साथ राजनेताओं की घनिष्ठता के आरोप सामान्य नहीं हैं. यही नहीं, पूरे महाराष्ट्र प्रदेश की प्रतिष्ठा का मामला है यह. राणे के आरोपों को ठंडे बस्ते में डाल देने से अनेक संदेह उत्पन्न होंगे. शासन ही नहीं, महाराष्ट्र प्रदेश की निष्कलंक छवि पर आंच आयेगी. प्रदेश की जनता इसके लिए तैयार नहीं है. बेहतर हो, शासन अविलंब कार्रवाई करते हुए झूठ- सच को जनता के सामने ला दे. अगर राणे के आरोप सही साबित होते हैं, तब आरोपियों को गिरफ्त में ले दंडित किया जाये. अगर आरोप गलत साबित होते हैं, तब नारायण राणे दंडित किये जायें.
एस. एन. विनोद
14 दिसंबर 2008

1 comment:

कमल शर्मा said...

गोलमोल है भाई सब गोलमोल है।