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Tuesday, December 23, 2008

गलत है 'मुस्लिम वोट-बैंक' का संबोधन


शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के इस कथन को क्या कोई चुनौती दे सकता है कि मुस्लिम 'वोट-बैंक' को फिर से बटोरने के प्रयास में कांग्रेस पार्टी, केन्द्रीय मंत्री ए. आर. अंतुले को बर्खास्त करने से कतरा रही है? सभी राष्ट्रभक्त चाहेंगे कि उद्धव की यह आशंका निर्मूल साबित हो. किन्तु यह कड़वा सच मुखर है कि देश का बहुमत उद्धव की सोच के साथ है. बात सिर्फ कांग्रेस तक ही सीमित नहीं है. वोट के लिए समाज व देश-हित को हाशिये पर रखते रहने वाले नेताओं के चेहरे बेनकाब होने लगे हैं. लालूप्रसाद यादव, रामविलास पासवान और मुलायमसिंह यादव द्वारा अंतुले का समर्थन किसी सिद्धांत पर आधारित कतई नहीं है. दर्शन की बात तो छोड़ ही दें!
अंतुले तो कम-अज-कम 'अल्लाह' से डरने की बात स्वीकारते हैं, किन्तु हमारे ये तीनों 'कथित समाजवादी' इस बिन्दु पर अंतुले की तरह ईमानदार नहीं हैं. अंतुले के खिलाफ कार्रवाई के मामले में कांग्रेस नेतृत्व की हिचकिचाहट ने उसे कटघरे में खड़ा कर दिया है. ''चुनाव नहीं, देशहित सर्वोपरि'' की घोषणा करने वाले कांग्रेस के युवा महासचिव राहुल गांधी अब क्या कहेंगे? कहीं 'कथित मुस्लिम वोट-बैंक' की खातिर राहुल भी मौन-धारण तो नहीं कर लेंगे! सर्वेक्षण करालें, देश का मुस्लिम समाज स्वयं को 'बैंक' कहे जाने पर अपमानित महसूस करता है. वोट की गंदी राजनीति ने इसके पहले भी राजनीति के आवश्यक सिद्धांत-मूल्य, आदर्श और चरित्र की हत्या की है. अनेक प्रतिभाएं इस कालिमा की शिकार हो असमय काल-कवलित हो चुकी हैं. मुझे ही नहीं, देश के एक बहुत बड़े वर्ग को राहुल से देशहित में ईमानदार व नि:स्वार्थ नेतृत्व की आशा है. क्या वे निराश करेंगे? कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी को भाँप कर ही अंतुले ने ताजातरीन बयान में राष्टï्रीय जाँच एजेंसी (एन.आई.ए.) के गठन के औचित्य पर सवाल खड़े कर दिये हैं.
अंतुले के अनुसार इस एजेंसी का गठन कर सरकार ने यह साबित कर दिया कि वह गलत दिशा में जा रही है. क्या अभी भी किसी को शक है कि अंतुले पागल नहीं हो गये है? कोई भी सरकारी फैसला मंत्रिमंडल का सामूहिक निर्णय माना जाता है. क्या अंतुले ने मंत्रिमंडल में इस एजेंसी के गठन पर आपत्ति उठाई थी? अगर, आपत्ति के बावजूद सरकार ने एजेंसी गठन को हरी झंडी दी, तब नैतिकता का तकाजा था कि अंतुले अपने पद से इस्तीफा दे देते! लेकिन बैरिस्टर अंतुले ने ऐसा नहीं किया. क्यों? यह स्वयं में एक शोध का विषय है.
देश चिन्तित हैं 'मुस्लिम वोट-बैंक' के लिए विभिन्न राजदलों में जारी छीना-झपटी को लेकर. मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि देश का प्रबुद्ध मुस्लिम मतदाता 'बैंक' बन कर ऐसे राजदलों को अपने यहां खाता खोलने के लिए आमंत्रित करेगा. द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर विभाजन की पीड़ा के धारक समान रूप से हिन्दू-मुसलमान दोनों हैं. लगभग 10 लाख लोगों की मौत का इतिहास अभी पुराना नहीं पड़ा है. अंग्रजों की साजि़श के उस खेल की याद से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. कोई उस भूल को दोहराने की सोचे भी नहीं! क्या यह बताने की जरूरत है कि स्वयं कायदे-आज़म जिन्ना, विभाजन पर अपने जिन्दगी के अंतिम दिनों में सौ-सौ आंसू बहाते रहे! जिन्ना के चिकित्सक डॉ. कर्नल इलाहीबख्श ने अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक में लिखा था कि जिन्ना ने मृत्युपूर्व उनसे कहा था, ''डॉक्टर, पाकिस्तान इज दि ग्रेटेस्ट ब्लंडर ऑफ माई लाइफ!'' अर्थात् ''पाकिस्तान मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी भूल है!'' निश्चय ही ये शब्द जिन्ना के अपराध-बोध को चिन्हित करते हैं!
आज़ादी के छह दशक बाद वोटों के लिए हिन्दू-मुसलमान के बीच विभाजन रेखा खींचने की कोशिश करने वाला देशहित चिंतक तो कदापि हो नहीं सकता! मुझे खुशी है कि अल्पसंख्यक संगठन मुस्लिम फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी ने आगे बढ़ते हुए अंतुले के बयान की न केवल निन्दा की है, बल्कि उनसे इस्तीफे की मांग भी की है. लालू-मुलायम-पासवान चेत जाएं इस संगठन से सबक लें. अगर सचमुच इनके दिलों में मुस्लिम-प्रेम है, तब वे राष्टï्रीय मुख्यधारा से मुसलमानों को अलग करने की कोशिश न करें. हिन्दू व अन्य भारतीयों की तरह मुसलमानों का भी भारत देश पर समान अधिकार है. आतंकवाद को लेकर जारी वैश्विक तनाव के बीच साम्प्रदायिकता को हवा देना आत्मघाती होगा. कोई भारतीय इसे सहन नहीं करेगा.
एस. एन. विनोद
22 दिसंबर 2008

4 comments:

manoj dwivedi said...

SIR, RAJNITI AB SIRF 'RAJ' KARNE KI 'NITI' BAN CHUKI HAI..JAB TAK AAM AADAMI APNE 'PRAJA' 'TANTRA' KO NAHI SAMJHEGA TAB TAK YE NETA AISE HI JANTA KO BEWKOOF BANATE RAHENGE..INKA SIDHA ILAJ HAI KI INHE KISI BHI KIMAT PAR 'POWER' NA DIYA JAYE..TABHI KUCHH KALYAN HOGA..

भीमसिंह मीणा said...
This comment has been removed by the author.
भीमसिंह मीणा said...

'कथित मुस्लिम वोट-बैंक' की खातिर राहुल भी मौन-धारण तो नहीं कर लेंगे! bilkul sach hai or n kewal aam bhartiya balki poora hindustan(tathakathit logo ko chhodkar) is baat ke khilaf hoga ki muslim samaj ko vote benk kyon kaha jaaye. me to ye khta hun ki muslim hi kyon balki kisi bhi samaj ko vote bank nahi kaha jaana chahiye.
bsmeena.reporter@gmail.com

कमल शर्मा said...

'पाकिस्तान मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी भूल है!' जिन्‍ना ने आखिर में सच्‍चाई स्‍वीकार कर ली। पाकिस्‍तान का बना और पहले दिन से आज तक वह हमारे लिए सबसे बडा सरदर्द है। इस दर्द को खत्‍म करना आसान भी नहीं है। इस दर्द का इलाज करने का वैसे यह सही समय है।