centeral observer

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Tuesday, December 30, 2008

अब हर नागरिक सिर्फ 'भारतीय' है!

सन् 2008 का आज अंतिम दिन है. वह 2008, जिसने विभिन्न क्षेत्रों में विकास एवं उपलब्धियों के आकाश चूमे. वह 2008, जिसने युवा-प्रतिभाओं को मुखर किया. वह 2008, जिसने शहादत की मिसालें कायम की. वह 2008, जिसने भविष्य में भारत के विश्वगुरु का दर्जा प्राप्त करने के लक्ष्य को मजबूती दी, गति प्रदान की. भविष्य के लिए संयोजित सपनों के सच होने के प्रति विश्वास दिला कर विदा हो रहा है सन् 2008. लेकिन इन सब मनमुदित करने वाली सकारात्मक बातों के बीच यह सचाई भी रेखांकित हुई कि यह 2008 आतंकवाद की घनघोर कालिमा से आच्छादित भी रहा. ऐसे में यह संभव नहीं कि सन् 2008 की अच्छी-बुरी घटनाओं को कुछ शब्दों में बांध मंथन कर लिया जाए.
सन् 2008 में घटित घटनाओं और सन् 2009 की संभावनाओं पर मैं कोई उपदेश देना नहीं चाहूंगा. कभी किसी ने कहा था कि उपदेश एक ऐसा माल है, जिसके खरीदार से अधिक विक्रेता होते हैं. मैं विक्रेता नहीं बनना चाहता. तथापि मैं इस अपेक्षा को अवश्य चिह्नित करना चाहूंगा कि राजनीति, धार्मिक आस्था और शासन में दु:खद विभाजन की भयावहता को पहचान हम 'भारतीय' और सिर्फ भारतीय बनें. धर्म के नाम पर 'राजनीति' के लिए राजनीतिक दल तो विभाजित होते ही रहे हैं, पिछले दिनों यह देखकर आघात पहुंचा कि शासन भी ऐसी तुच्छता का शिकार हो गया. आतंकवादी घटनाओं की छानबीन के दौरान कतिपय हिन्दू संतों-साध्वी और हिन्दू संगठनों से जुड़े कुछ लोगों की गिरफ्तारियों पर ऐसा विभाजन खतरनाक हद तक दृष्टिगोचर हुआ. किन्तु अशांत जम्मू-कश्मीर में जम्हूरियत की ऐतिहासिक जीत ने न केवल आतंकवाद के पड़ोसी पाकिस्तान, बल्कि घाटी में सक्रिय अलगाववादी तत्वों और उनके समर्थकों को साफ शब्दों में जता दिया कि कश्मीर भारत का और सिर्फ भारत का अविभाज्य अंग है. अब हम यह आशा कर सकते हैं कि वहां की नई लोकतांत्रिक सरकार क्षेत्र में अशांति-दहशत पैदा करने वाले तत्वों को उनकी औकात बता देगी.
पिछले दिनों मुंबई सहित देश के अनेक भागों में आतंक का खूनी खेल खेलने वाले अब चेत जाएं. भारत जाग चुका है. यहां का प्रत्येक नागरिक अब सिर्फ भारतीय है- पंजाबी, मराठी, बंगाली, गुजराती, उडिय़ा, उत्तर-पूर्वी या उत्तर-दक्षिणी नहीं! पहले संसद और अब मुंबई पर हमला कर पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादियों ने हमारी राष्ट्रीय चेतना को सही अर्थांे में जागृत कर दिया है. निश्चय ही आगामी कल आने वाले सन् 2009 में ज्ञानेश्वरी के वचन 'हे विश्वची माझे घर' को आत्मसात करते हुए भारत वैश्विक ग्राम के मुखिया पद पर अपना दावा ठोक देगा. प्रांतीयता, भाषा, धर्म और जाति की संकीर्णता का त्याग कर समाज में खड़ी कृत्रिम दीवारों को हम धराशायी कर देंगे. अब देश इन कृत्रिम दीवारों की चुनौतियों से इतर सिद्धांतों और विचारों की चुनौती का सामना करने को तैयार है. अब हम विश्व को यह बता देंगे कि भारत अपने ही सिद्धांतों व नीतियों पर चलेगा - आयातित या थोपे गए सिद्धांतों पर नहीं!
इस बार नव-वर्ष का हमारा संकल्प मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यवहार की कसौटी पर उत्तीर्ण दृढ़ संकल्प होगा. और वह संकल्प होगा - शांति और अतुलनीय प्रगति का. साहस और सम्मान की शक्ति के साथ भारत संकल्प को मूर्तरूप देगा, इस विश्वास के प्रति मैं देशवासियों को आश्वस्त कर देना चाहूंगा.

5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

नव वर्ष की आप और आपके समस्त परिवार को शुभकामनाएं....
नीरज

Dipendra said...

WISH YOU A HAPPY NEW YEAR. - DIPENDRA SINGH CHILWAL, MEDIASOLUTION.in

अल्पना वर्मा said...

इस बार नव-वर्ष का हमारा संकल्प मात्र औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यवहार की कसौटी पर उत्तीर्ण दृढ़ संकल्प होगा. ---
ameen!
आप तथा आपके पूरे परिवार को आने वाले वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये !

dharmendra said...

nav varsh ki aapko dher sari badhai. mai bokaro se belong karta hun aur aaj bedil sahar delhi ke dil kahe jane wale cannaught palace me ek akhbar ke office mai subeditor hun. two year se is field mey hun lekin udas hun. puri tarah profesion ban gaya hai aapki yeh duniya.

कमल शर्मा said...

नए वर्ष की आपको और आपके परिवार को ढ़ेर सारी शुभकामनाएं। इस वर्ष आप अपनी परियोजना राष्‍ट्रप्रकाश का प्रकाश पहले नागपुर और फिर समस्‍त भारत में फैलाने में कामयाब हों, यही मेरी हार्दिक शुभकामना।
आपने सही कहा अब हर नागरिक सिर्फ भारतीय है..असल में सरकार को चाहिए कि वह जाति और प्रांतवाद को समाप्‍त कर यह अनिवार्य कर दें कि हर कोई यहां भारतीय है। हम सब एक हैं।