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Friday, December 26, 2008

नासूर बन चुके 'घाव' से मुक्ति क्यों नहीं?


इन दिनों बुद्धिजीवियों के बीच एक रोचक बहस छिड़ी हुई है- भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध को लेकर. मैं जानबूझकर यहाँ 'युद्ध' के पहले संभावित शब्द से परहेज कर रहा हूँ. क्योंकि बहस ही इस पर केंद्रित है कि युद्ध होगा या नहीं! समझदार-विवेकी तर्कयुक्त भविष्यवाणी कर रहे हैं कि युद्ध नहीं होगा. अतिउत्साही, जोशीले युद्ध होने के पक्ष में हैं. किसी युद्ध के नफा-नुकसान को समझ पाने में असमर्थ वर्ग तटस्थ है. मीडिया भी इस मुद्दे पर विभाजित है. विवेक के आधार पर संभावना तलाशने की प्रक्रिया में मैं पहुँच जाता हूँ सच के उस सागर में, जहां 'युद्धोन्माद' हिलोरें मारता दिखता है. और तब अवतरित होता है समान-बिंदु पर आरोप-प्रत्यारोप का सैलाब. सोचने को मजबूर हो उठता हूं कि आखिर ऐसे झूठ पर सच का मुलम्मा हम क्यों चढ़ाएँ! यह पीड़ा अकारण नहीं है.
पाकिस्तान के हुक्मरानों का आरोप है कि भारत युद्ध का उन्माद पैदा कर रहा है. पाकिस्तानी संसद प्रस्ताव पारित करती है कि भारत, अपने आतंकवादी अड्डों को खत्म करें. इसके पूर्व भारतीय शासक बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि पाकिस्तान न केवल अपने यहां मौजूद आतंकवादी अड्डों को खत्म करे, बल्कि भारत में हुए आतंकवादी हमलों के दोषियों को हमारे हवाले करे. पूरा संसार इस सचाई से परिचित है कि पाकिस्तान विश्व-आतंकवाद का पोषक है, आतंकवादियों की शरणस्थली है. साफ है कि विश्व-समुदाय के दबाव से पाकिस्तान अब झूठ का सहारा ले भारत को ही दोषी ठहराने की बेशर्म कोशिश करने लगा है. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का ताजा बयान प्रमाण है.
अभी कुछ दिन पहले ही शरीफ ने इस बात की पुष्टि की थी कि मुंबई हमले में गिरफ्तार आतंकी अजमल आमिर कसाब पाकिस्तान के फरीदकोट का रहने वाला है. अब इससे पलटते हुए वे भारत से सबूत मांग रहे हैं. खैर, पाकिस्तान से ईमानदारी और सकारात्मक सोच की अपेक्षा हम नहीं कर रहे. मैं यहाँ सचाई की कसौटी पर भारतीय शासकों को कसना चाहूँगा. और अनुरोध करूँगा मीडिया से कि वह युद्धोन्माद के सच को चिह्नित करे. मुंबई पर आतंकी हमले के बाद क्या भारत सरकार के मंत्रियों ने पाकिस्तान को चेतावनी देते हुए उसे 'अल्टीमेटम' नहीं दिया था? क्या हर 'विकल्प' खुला रहने की बात नहीं की थी? अर्थात् अगर बात युद्धोन्माद की, की जाए तो इसकी शुरुआत पर अब बहस क्यों? क्या यह राजनीतिक विवशता की माँग है?
यह तो जगजाहिर है कि भारत सरकार के कड़े, किंतु बिल्कुल उचित रुख के बाद पूरे भारत देश में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्रों को नेस्तनाबूद करने की आवाजें उठने लगी थीं. फिर जब झूठे-बेईमान पाकिस्तानी शासकों ने भारत पर ही तोहमत लगाना शुरू किया, तब सरकार यह कह कर कि 'पाक युद्धोन्माद पैदा न करे' बचाव की मुद्रा में क्यों आ गई? शासक क्षमा करेंगे, यह कायरपन है. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की शांति-अपील से हम सहमत हैं. लेकिन पूर्व की भाँति शासकगण कृपया चौराहे पर खड़े होकर दिशाभूल के अपराधी न बनें. लक्ष्य-दिशा पहले तय कर लें.
पाकिस्तान के दोगलेपन से पूरा संसार परिचित है. 1947 में विभाजन के बाद से लेकर अब तक भारत उसके झूठ-फरेब का शिकार होता रहा है. पाकिस्तान प्रशिक्षित या यूँ कहें कि पाकिस्तानी आतंकवादियों के कारण अब तक हजारों भारतवासी अपनी जान गंवा चुके हैं. भारत की अर्थव्यवस्था इनके कारण ही प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती रही है. पाकिस्तान की करतूतों का खामियाजा भारत के प्रत्येक नागरिक को भुगतना पड़ा है. 1965 व 1971 के युद्ध के बाद पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था की वापसी के लिए प्राय: हर उपयोगी वस्तु पर लगाये गये सरचार्ज की पीड़ा वर्षों तक देश के लोग सहते रहे. इस पाश्र्व में युद्ध से परहेज करने का सुझाव तर्कसंगत तो है, किंतु जब 'घाव' छह दशक पुराना हो जाए तब उसके स्थायी इलाज के लिए शल्यक्रिया तो करनी ही होगी.
हम बुद्धिजीवियों के एक वर्ग की इस सोच पर सहमत हैं कि युद्ध किसी भी पक्ष के लिए हितकारी साबित नहीं होगा, किंतु क्या कोई अन्य विकल्प उपलब्ध है? अमेरिका-चीन के हस्तक्षेप के बाद भी अगर पाकिस्तान, भारत की माँगों के अनुरूप आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्रों को खत्म नहीं करता, आतंकी हमलों के दोषियों को नहीं सौंपता, भविष्य में ऐसी हरकतों से बाज आने की गारंटी नहीं देता, तब भारतीय शासक दृढ़-इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए 'निर्णायक कदम' उठाने से नहीं हिचकें. यह समय की माँग है, यह भारतवासियों की माँग है. यह कदम शांति और अहिंसा का प्रचारक भारत इसलिए उठाएगा, ताकि न केवल भारत बल्कि विश्व में आतंकवाद समूल नष्ट हो, शांति स्थापित हो. 'घाव' से मुक्ति के लिए शल्य चिकित्सक औजार उठाता है, तो मरीज के हक में ही. यहाँ तो घाव, 'नासूर' की शक्ल अख्तियार कर चुका है. उससे मुक्ति के लिए हिचकिचाहट क्यों?

एस.एन. विनोद
26-12-2008

1 comment:

कमल शर्मा said...

पाकिस्तानी शासकों ने भारत पर ही तोहमत लगाना शुरू किया, तब सरकार यह कह कर कि 'पाक युद्धोन्माद पैदा न करे' बचाव की मुद्रा में क्यों आ गई? 1965 व 1971 के युद्ध के बाद पटरी से उतरी अर्थव्यवस्था की वापसी के लिए प्राय: हर उपयोगी वस्तु पर लगाये गये सरचार्ज की पीड़ा वर्षों तक देश के लोग सहते रहे. इस पाश्र्व में युद्ध से परहेज करने का सुझाव तर्कसंगत तो है, किंतु जब 'घाव' छह दशक पुराना हो जाए तब उसके स्थायी इलाज के लिए शल्यक्रिया तो करनी ही होगी. आपने ये दो बातें बिल्‍कुल सही कही हैं। हमारी सरकार को सोचना होगा कि यदि इस बीमारी का आज इलाज नहीं किया गया तो पाकिस्‍तान और वहां बैठे आतंककारियों की हिम्‍मत बढ़ेगी जिससे वे और हमले हम पर कर सकते हैं यह जानकर कि भारतीय नेता करेंगे कुछ नहीं केवल बयान बाजी करेंगे। जिस दिन वे संसद या किसी विधानसभा को उड़ा देंगे तब शायद सरकार कार्रवाई करें क्‍योंकि वह उन नेताओं पर हमला होगा जो आम आदमी का भविष्‍य तय कर रहे हैं। अफसोस है आज हमारे पास सरदार वल्‍लभ भाई पटेल या लाल बहादुर शास्‍त्री जैसा एक भी नेता नहीं है। सब मुस्लिम वोट की चिंता में हैं। इजरायल ने कई बार हमें आफर दिया कि वह पाकिस्‍तान के परमाणु संयंत्रों को नष्‍ट कर सकता है बशर्ते भारत सहायता के लिए आगे बढ़े। हमें यह करना चाहिए और क्‍यों मुस्लिम वोट के लिए इजरायल से संबंध विकसित नहीं करना चाहते। एक सच्‍चा भारतीय मुस्लिम भी पाकिस्‍तान को सबक सीखाने के पक्ष में है। यह नेताओं का झूठा दुष्‍प्रचार है कि मुस्लिम नाराज हो जाएंगे। मैं तो यही कह सकता हूं अब तो जागो मोहन प्‍यारे।