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Saturday, January 3, 2009

'अंकल सैम' के दोगलेपन से सावधान !


अमेरिका के 'यू टर्न' पर आश्चर्य व्यक्त करने वालों के प्रति मुझे सहानुभूति है. वैसे इनका भोलापन क्षम्य है. इसी स्तंभ में अभी कुछ दिनों पूर्व मैंने साफ-साफ लिखा था कि ''अमेरिका कभी भी भारत का मित्र नहीं हो सकता.'' किन्हीं कारणों से भारत की मौजूदा सरकार अगर उस पर विश्वास कर रही है, तो धोखा खाने के लिए तैयार रहे. 'अंकल सैम' के दोगलेपन से पूरा संसार परिचित है. हथियारों और लाशों के सौदागर अमेरिकी शासक आरंभ से ही पाकिस्तान के पक्ष में भारत को धोखा देते रहे हैं. चाहे पाकिस्तान के साथ सन् 1971 का युद्ध हो, या आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात; अमेरिका ने पाकिस्तान का ही साथ दिया. हां, समय-समय पर शब्दों की चाशनी से हमें भरमाने की कोशिश अवश्य करता रहा है. सन् 1971 में तो उसने अपने सातवें जंगी बेड़े को पाकिस्तानी मदद के लिए भेज भी दिया था. वह तो तत्कालीन दूसरी महाशक्ति सोवियत संघ था, जिसके भारत के पक्ष में कड़े तेवर के कारण अमेरिका ने अपने जंगी बेड़े को आधे रास्ते से वापस बुला लिया था. सन् 1962 में जब चीन ने हम पर आक्रमण किया था, तब बड़ी आशा के साथ पं. जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन केनेडी से मदद मांगी थी. केनेडी ने तब सिर्फ 'ना' ही नहीं कहा, बल्कि आहत नेहरू को यह कहने से भी नहीं चूके थे कि ''हमारे नागरिक भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते हैं क्योंकि उन्होंने आपके मंत्रियों को अमेरिका में 'वेश्यालय' से बाहर आते देखा है.'' नेहरू के दिल पर तब पहुंची चोट की कल्पना सहज है. आज जब अभी कुछ दिनों पूर्व तक भारत के पक्ष में कायम पाकिस्तान विरोधी रुख से पलटते हुए अमेरिका अब यह कह रहा है कि ''मुंबई हमले के संदिग्धों पर पाकिस्तान मुकदमा अपने यहां ही चलाये.'' अर्थात् उन अपराधियों को भारत को सौंपने की जरूरत नहीं है! इसे क्या माना जाए? सिर्फ 'यू टर्न' के रूप में चिह्नित कर शोक मनाने से काम नहीं चलेगा. चिंतन करें, अमेरिकी 'नीयत' साफ दिख जाएगी. अमेरिका न तो भारत-पाकिस्तान के बीच मित्रता देखना चाहता है और न ही इस क्षेत्र में शांति. आतंकवाद के खिलाफ जंग की आड़ में वह अपनी सुरक्षा और एशिया के इस क्षेत्र में अशांति का षडय़ंत्र रचता रहा है.
जरा गौर करें, 11 सितंबर 2001 को अमेरिका स्थित वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के बाद उस देश में आज तक कोई दूसरा हमला नहीं हुआ है. उसने तालिबानियों के खिलाफ निर्णायक सैनिक कार्रवाई करने की कोशिश की. पाकिस्तानी भूभाग में आतंकवादियों के खिलाफ कथित जंग के लिए सैनिक अड्डे बनाये. अत्याधुनिक हथियारों के साथ बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक वहां मौजूद हैं. बीच-बीच में उनके युद्धक विमान पाकिस्तान- अफगानिस्तान की सीमा पर गोले बरसाते रहते हैं. लेकिन यह सच भी उभर कर सामने आया है कि इस बीच भारत में भी और पाकिस्तान में भी खूनी तांडव को आतंकवादियों ने बखूबी अंजाम दिये. दोनों देशों में हजारों लोग इस तांडव की बलि चढ़े. दोनों देश के शासक एक-दूसरे को दोषी ठहराते रहे.
पाकिस्तानी शासक सिर्फ इस बात पर मुदित होते रहे कि आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर अमेरिका उसे खरबों डॉलर की मदद देता रहा. विश्व में पाकिस्तान की छवि अमेरिका के पिछलग्गू के रूप में स्थापित हुई. पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में अमेरिकी हस्तक्षेप की बातें अब सुर्खियां नहीं बनतीं. दूसरी ओर भारत की संप्रग सरकार ने परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर खुलेआम अमेरिका के पक्ष में राग अलापा, उससे ऐसी धारणा बनी थी कि संकट के समय वह हमारा साथ देगा. बल्कि संप्रग सरकार ने देश को कुछ इस रूप में आश्वस्त भी किया था. लेकिन क्या हुआ? उनके आरंभिक समर्थन से उत्साहित भारत ने जब पाकिस्तान पर दबाव बनाया कि वह मुंबई हमले के दोषियों को सौंप दे, तब ऐन मौके पर अमेरिका पलट गया. अमेरिका की इस कुटिलता को पहचानने में भूल नहीं करनी चाहिए. इस बिंदु पर हम सीधे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को कठघरे में खड़ा करना चाहेंगे. अमेरिका के साथ परमाणु करार को लेकर देशवासियों के प्रचंड विरोध को रद्दी की टोकरी में डाल समझौता संपन्न करने वाले मनमोहन सिंह अब देश को क्या बताएंगे?
डॉ. मनमोहन सिंह के इस ताजा बयान पर कि ''आतंकवाद के खिलाफ सरकार किसी भी हद तक जाने को तैयार है'', मैं कोई प्रफुल्लित टिप्पणी करना नहीं चाहूंगा. 'आर-पार' या 'निर्णायक' के उदघोष से यह कहीं एक नरम बयान ही है. प्रधानमंत्री अमेरिका के 'यू टर्न' पर मौन धारण करते हुए आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात कह कर दिलासा देने की कोशिश न करें. एक सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाला भारत देश किसी 'मनमोहनी दिलासे' के भ्रम में पडऩे वाला नहीं. अगर हम सचमुच सक्षम हैं, तब आतंकवाद की पोषण-स्थली पाकिस्तान को मजबूर करें कि वह हमारे अपराधियों को हमें सौंप दे! प्रत्यर्पण संधि या 'अमेरिकी आदेश' इसके आड़े न आये. अगर अमेरिका का अनुसरण करना ही है तो 9/11 हमले के बाद उसके द्वारा तालिबान के खिलाफ उठाये गए कदमों का अनुसरण करें. अमेरिका की तरह भारत भी तब आतंकवादी हमले से शायद निजात पा जाये. और अब तो पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे 'मिसाइल मैन' भी कह रहे हैं कि ''हमला करो, आतंकवादी ठिकानों को नेस्तनाबूद करो!'' फिर...???

5 comments:

Pragati Mehta said...

Bilkul Sahi Kaha apne...

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

केनेडी ने तब सिर्फ 'ना' ही नहीं कहा, बल्कि आहत नेहरू को यह कहने से भी नहीं चूके थे कि ''हमारे नागरिक भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते हैं क्योंकि उन्होंने आपके मंत्रियों को अमेरिका में 'वेश्यालय' से बाहर आते देखा है.''
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बहुत अचरज होता है जब केनेडी महाशय भारतीय मँत्रियोँ के व्याभिचार के बारे मेँ नेहरु जी को डपटते हैँ और वे लज्जित होते हैँ !! क्या केनेडी स्वयम दूध के धुले थे? मदद कोई नहीँ करता - भारत को स्वयम अपनी सुरक्षा का इँतेजाम और उसपर ठोस कार्यवाही करनी होगी - जिस प्रकार इज़राइल जैसा देश आतँकीयोँ के खिलाफ उठा है - अब्दुल कलाम के कहने से क्या होगा जब तक सोनिया जी के हाथ मेँ समूचे भारत की बागडोर है -समय आ गया है कि प्रत्येक भारतवासी, अपने अपने क्षेत्र से चुने मँत्री और केन्द्र पर जोर डालेँ और अगले आतँक से पहले, सुरक्षा का कडा प्रबँध करे
जब जब किसी नेता का काफिला जाता है, आम जनता के लिये सडकेँ रोक दीँ जातीँ हैँ - उनकी सुरक्षा जितनी सही है हरेक आम आदमी के लिये भी वैसी ही कडी सुरक्षा जरुरी है ये जनता की माँग हो और उसके लिये माँग पूरी करना सरकार का प्रथम काम हो - ये उन्हेँ समझाना जरुरी है जन जागरण का समय आ गया है अब -अमरीका मेँ स्थिति, किस ओर जायेँगीँ वह अनिस्चित है ( I'm in USA )
- लावण्या

Vivek Gupta said...

बात अमेरिका की नहीं है, बल्कि हमारी विदेश नीति की है अगर हथियार कभी चलने ही नहीं है तो सरकार को १०-२०% जी डी पी का इस पर नहीं लगाना चाहिए |

satyoday said...

जरा गौर करें, 11 सितंबर 2001 को अमेरिका स्थित वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमले के बाद उस देश में आज तक कोई दूसरा हमला नहीं हुआ है. उसने तालिबानियों के खिलाफ निर्णायक सैनिक कार्रवाई करने की कोशिश की. पाकिस्तानी भूभाग में आतंकवादियों के खिलाफ कथित जंग के लिए सैनिक अड्डे बनाये. अत्याधुनिक हथियारों के साथ बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक वहां मौजूद हैं. बीच-बीच में उनके युद्धक विमान पाकिस्तान- अफगानिस्तान की सीमा पर गोले बरसाते रहते हैं
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Namaskar Sir!
it is great moment to see you on blog.
It the fine example of root cause analysis. we should take lesson out of it and step forword to cure it.
Thanking you for such a nice thought provoking blog.
Regards
Satish

कमल शर्मा said...

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी चिदंबरम और योजना आयोग के उपाध्‍यक्ष मोंटेक सिंह को जितनी चिंता जीडीपी की है यदि उसकी 30 फीसदी चिंता वे देश पर हमला करने वालों को सब‍क सीखाने की कर लें तो हमें अमरीका और पाकिस्‍तान को कोई सबूत देने की जरुरत नहीं है। हमारी किस्‍मत का फैसला करने वाले ये तीनों सज्‍जन उन देशों में ही पले बढ़े और पढ़े हैं जहां के संस्‍कार यह सीखाते हैं कि केवल बयान देते रहना कि हम बर्दाशत नहीं करेंगे और केवल केवल जीडीपी और महंगाई दर की चिंता में अपने को जलाते रहना। देश का हित सर्वोपरि होना चाहिए। भाड़ में जाए ऐसी जीडीपी और महंगाई दर जिससे आम नागरिक अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करता हो। मुझे लगता है पाकिस्‍तान के खिलाफ भारत हथियार उठाएगा लेकिन तब जब देश के आम आदमी का भविष्‍य तय करने वाले नेताओं को कोई नुकसान होगा। आम आदमी मर रहा है तो मरने दो, इस देश में वैसे भी हर मिनट खूब बच्‍चे पैदा हो रहे हैं। कुछ तो सीखो सरदार वल्‍लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्‍त्री, इंदिरा गांधी से।

रही बात अमरीका की तो, अमरीकनों से बड़ा इस दुनिया के घटिया स्‍वार्थी कोई हो ही नहीं सकता। वह केवल अपने बारे में सोचता है। अमरीका भारत को दुनिया के एक बड़े उपभोक्‍ता देश के रुप में यूज कर रहा है इससे ज्‍यादा कुछ नहीं। वह हमेशा पाकिस्‍तान का दोस्‍त रहेगा और भारत को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं देगा। चिदंबरम साहब अमरीका जा रहे हैं सबूत देने लेकिन मैं आज ही इस दौरे का भविष्‍य बता देता हूं कि कुछ नहीं होगा चाहे रिपब्लिकन सत्ता में रहे या डेमोक्रेट। भारत को अमरीका के साथ अपने संबंधों को लेकर समीक्षा करनी चाहिए और उसकी चापलूसी के बजाय एक दूरी वाला रिश्‍ता तय करना चाहिए। कहावत है जो अपनी मदद खुद नहीं करता उसकी भगवान भी मदद नहीं करता। भारत अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ना चाहता तो अमरीका भी उसके पक्ष में क्‍यों खड़ा होगा। खुद शस्‍त्र उठाओं और कार्रवाई करों तो अपने आप दुनिया पक्ष में आ जाएगी लेकिन केवल चमड़े की जबान हिताने से कुछ नहीं होगा।