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Thursday, January 15, 2009

न्यायदेवता कठघरे में क्यों...?


न्यायपालिका और न्यायाधीश दोनों ऐसे संवेदनशील संबोधन हैं, जिन पर प्रतिकूल टिप्पणी को 'अवमानना' के दायरे में डाल दिया जाता है. अमूमन इन पर टिप्पणी करने से परहेज कर लिया जाता है. लेकिन लोकहित में खतरा उठा अनेक समीक्षक अपनी दृष्टि में 'सच' को सार्वजनिक कर देते हैं. कुछ मामलों में ऐसे लोगों ने न्यायपालिका की नाराजगी भी झेली है. कुछ दण्डित हुए हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तब कोष्ठक की टोकरी में डाल दी जाती रही. लेकिन यह अपेक्षा तो अपनी जगह आज भी मजबूती से कायम है कि न्यायाधीश को 'सीज़र की पत्नी' की तरह शक-ओ-शुबहा से परे होना चाहिए. फिर ऐसा क्यों कि आए दिन कतिपय न्यायाधीशों पर कथित रूप से भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं? उनके खिलाफ जांच की कार्रवाई की जा रही है, पदोन्नति रोकी जा रही है. न्यायमंदिर में न्याय की कुर्सी पर बैठे न्यायाधीश को भगवान मानने वाला यह देश ऐसी घटनाओं से आहत है. ऐसे अनेक मामलों के बीच 'गाजियाबाद पीएफ घोटाला' न्यायपालिका के लिए एक बड़े शर्म के रूप में सामने आया है. हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने कहा है कि इस भविष्य निधि घोटाले में किसी न्यायाधीश को अभियुक्त नहीं बनाया गया है. तथापि मामले की सीबीआई जांच से न्यायप्रणाली की गरिमा तार-तार हुई है.
23 करोड़ रु. के पीएफ घोटाले की शुरुआती जांच रिपोर्ट से लोकतंत्र के इस तीसरे स्तंभ में प्रविष्ट भ्रष्टाचार अथवा अनियमितता की पुष्टि होती है. न्यायपालिका से जुड़े लगभग तीन दर्जन लोगों का नाम इस घोटाले में आना ही पूरी न्याय व्यवस्था के लिए शर्मनाक है. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की प्रशंसा करनी होगी, जिसने इस संवेदनशील मामले की जांच सीबीआई को सौंपी थी. यह मामला अकेला नहीं है. हाल के दिनों में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें न्यायाधीश शक के घेरे में आए- उनके खिलाफ जांच व दण्डात्मक कदम उठाए गए. क्यों हो रहा है ऐसा?
जाहिर है कि इस रोग के फैलने का मुख्य कारण शुरुआत में संकेत मिलने के बावजूद अनदेखा कर देना है. हां, यही सच है. यह सब अचानक नहीं हो रहा है. वस्तुत: इसकी शुरुआत के संकेत 70 के दशक के आरंभ में मिलने शुरू हो गए थे. यह वह काल था, जब समाज के विभिन्न क्षेत्रों में मूल्यों में गिरावट स्पष्टत: परिलक्षित होने लगी थी. न्यायाधीश की निष्ठा पर गंभीर सवालिया निशान लगा जब 1982 में बहरुल इस्लाम का मामला सामने आया. पटना अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक से संबंधित एक मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. निचली अदालत और कुछ न्यायालय से होता हुआ मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा था. न्यायमूर्ति बहरुल इस्लाम, न्यायमूर्ति आर.वी. मिश्र और न्यायमूर्ति वी.डी. तुलजापुरकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की. न्यायमूर्ति बहरुल इस्लाम और न्यायमूर्ति मिश्र के बहुमत के फैसले से डॉ. जगन्नाथ मिश्र बच गए. इन दोनों न्यायाधीशों से असहमति व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति तुलजापुरकर ने अपने फैसले में कहा था कि प्रथम दृष्ट्या डॉ. मिश्र के खिलाफ मामला बनता है और उनके खिलाफ जालसाजी और भ्रष्टाचार के मुकदमे की सुनवाई होनी चाहिए. इस फैसले में तथ्यात्मक गलतियों और भ्रांतिपूर्ण मान्यताओं के आधार पर पुनर्विचार याचिका दायर हुई. इस बीच न्यायमूर्ति बहरुल इस्लाम ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया.
अब जरा गौर करें. इस्तीफे के अगले ही दिन बहरुल इस्लाम कांग्रेस(इ) में शामिल हो गए. डॉ. जगन्नाथ मिश्र इसी पार्टी में थे. बहरुल इस्लाम को तत्काल असम के बारपेटा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस(इ) का टिकट दे दिया गया. बहरुल इस्लाम का कार्यकाल छह सप्ताह बाद खत्म होना था. लेकिन उन्होंने प्रतीक्षा नहीं की. साफ है कि इस्लाम जल्दबाजी में थे. वे छह सप्ताह प्रतीक्षा भी नहीं कर सके. साफ है कि उन्होंने पहले ही असम से चुनाव लडऩे का मन बना लिया था और कांग्रेस से टिकट मिलने को सुनिश्चित कर लिया था. यह घटना तब सभी अखबारों की सुर्खियां बनी थी.
आज जब न्यायपालिका से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की खबरें सामने आ रही हैं, तब मुझे भारत के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी.एन.भगवती द्वारा 26 नवंबर 1985 को विधि दिवस के अवसर पर दिए एक भाषण के उस अंश की याद आ रही है, जिसमें उन्होंने कहा था- ''मुझे यह देखकर बहुत ही पीड़ा हुई है कि न्यायिक प्रणाली करीब-करीब ढहने के कगार पर है. ये बहुत ही कठोर शब्द हैं जो मैं इस्तेमाल कर रहा हूं, लेकिन बहुत ही व्यथित होकर मैंने ऐसा कहा है.'' अब जबकि प्राय: प्रत्येक दिन लोकतंत्र के इस तीसरे स्तंभ के लड़खड़ाने की खबरें सामने आ रही हैं. क्या यह आशा की जाए कि सभी शक-ओ-शुबहो से ऊपर हमारी न्यायपालिका 'सीज़र की पत्नी' की तरह बेदाग साबित होने के लिए तत्पर होगी! गाजियाबाद पीएफ घोटाला पूरी न्यायपालिका के लिए 'सीज़र की पत्नी' की परीक्षा सदृश ही है.

2 comments:

कमल शर्मा said...

न्‍यायाधीश को देवता माना जाता है और ये देवता अपनी आलोचना नहीं सुन सकते। लेकिन भ्रष्‍टाचार कर रहे हो तो चलेगा। अब न्‍यायाधीश से देवता की पदवी छिन लेनी चाहिए और खुद न्‍यायपालिका को दूसरो को नसीहत देने से पहले अपने को सुधारना चाहिए।

वैसे में आपसे एक बात कहना चाहूंगा कि जिस देश की स्‍कूल, कालेज, विश्‍वविद्यालय में एडमिशन डोनेशन देकर होता हो, वहां हर्षद मेहता, रामलिंगा राजू, केतन पारेख या इसी तरह के घोटाले बाज पैदा नहीं होंगे तो क्‍या होगा। एलकेजी के एडमिशन के लिए खूब पैसे देने होते हैं जिन्‍हें पिता हमेशा यह कहकर गिनवा देते हैं कि मैने तेरे लिए इतने खर्च किए तब जाकर एडमिशन मिला। मेडिकल में 30 लाख, इंजीनियर में भी इतने ही लगते हैं। जिस देश में पढ़ाई पर भ्रष्‍टाचार है वहां तो सभी स्‍तर पर होगा यह। आप इस पर एक पोस्‍ट लिखें कि अर्जुन सिंह जी उल्टा पुल्टा काम करने से पहले डोनेशन फ्री करिए पढाई। आजकल डोनेशन नहीं रिश्‍वत ली जा रही है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

न्यायपालिका भी राज्य का महत्वपूर्ण अंग है। जब राज्य का पतन होने लगता है तो न्यायपालिका कैसे बची रह सकती है। यह तो हमारे संविधान में की गई व्यवस्था का नतीजा है कि पतन के मामले में न्यायपालिका बहुत पीछे है। लेकिन जिस तरीके से न्यायपालिका को जरूरत से बहुत कम साधन सरकारें उपलब्ध करा रही है उस से उस का शीघ्रता से पतन होना सुनिश्चित है। हमारी न्यायपालिका का आकार जिस तरह से जरूरत का चौथाई रह जाने दिया गया है उस से भ्रष्टाचार, न्याय की गुणवत्ता का पतन होना स्वाभाविक था ही देरी से होने वाले न्याय का कोई अर्थ नहीं है। कुल मिला कर न्याय देश में रहा ही नहीं है। जो है वह न्याय का दिखावा मात्र है।