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Tuesday, January 13, 2009

खबरदार, सरकार ऐसी हिमाकत न करे ....!


मीडिया को अपने इशारे पर नचाने की सरकारी साजि़श पर मैं स्तब्ध हूं. क्या मनमोहन सरकार कोई निर्णय लेने के पूर्व इतिहास के पन्नों को नहीं पलटती? या वह जानबूझकर अन्जान होने का स्वांग करती है! हालांकि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. मनमोहन सिंह की दयनीय स्थिति को देखकर कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री को जानबूझकर अंधेरे में रखा जाता है. लेकिन यह उम्रदराज प्रधानमंत्री अपनी आंखों के सामने घटित घटनाओं को कैसे भूल गया? मैं बात पूर्व में मीडिया पर लगाए गए अंकुश की कर रहा हूं, ऐसे प्रयासों की कर रहा हूं.
सन् 1982 में 'बिहार प्रेस विधेयक' और सन् 1988 में केन्द्र की राजीव गांधी सरकार द्वारा प्रेस के खिलाफ लाए गए 'मानहानि विधेयक' के राष्ट्रव्यापी विरोध और उनकी मौत की घटना को क्या सरकार भूल गयी! लगता ऐसा ही है, जो उसने एक बार फिर मीडिया पर सरकारी नियंत्रण की कोशिश की है- 'काला कानून' बनाने की ओर अग्रसर है. यह ठीक है कि इस बार वह शुरुआत समाचार पत्र-पत्रिकाओं से नहीं, बल्कि टीवी चैनलों से करने जा रही है. इस प्रस्तावित 'काले कानून' के लिए उसके पास बहाने के रूप में पिछले वर्ष के अंत में मुंबई पर हुए आतंकी हमले की घटना उपलब्ध है. आतंकी हमले के कतिपय टीवी कवरेज पर न केवल आम जनता, बल्कि स्वयं मीडिया से जुड़े लोगों के बीच भी नाराज़गी थी. सरकार के सलाहकार- मूर्ख सलाहकार- उस नाराज़गी का इस्तेमाल प्रस्तावित 'काले कानून' को जायज़ ठहराने के पक्ष में करने की सोच रहे हैं. इन तत्वों को वस्तुत: मीडिया की स्वतंत्रता, विशेषकर उसकी बेबाकी रास नहीं आती. ऐसे अज्ञानी, अर्धज्ञानी तत्व, अपनी व सरकार की काली करतूतों पर परदा डाले रखने के लिए मीडिया की ज़ुबान पर ताला और आंखों पर पट्टी बंधी देखना चाहते हैं..
संभवत: यही कारण है कि उन्होंने मीडिया को एक बार फिर 'सेन्सरशिप' के दायरे में लाने की योजना बनाई है. तीन दशक पूर्व आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार प्रेस के खिलाफ 'सेन्सर' लगाने की हिमाकत कर चुकी थी. नतीजतन तब सही-सच्ची खबरों का स्थान, अफवाहों ने लेकर न केवल इंदिरा गांधी, बल्कि केन्द्र की उनकी कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका था. आज़ादी के बाद केन्द्र में पहली बार सत्ता से दूर हो कांग्रेस, विपक्ष में बैठने को मज़बूर हुई थी. 70 के दशक के मुकाबले चालू दशक, मुखर-आक्रामक मीडिया का गवाह है. केन्द्र की मिलीजुली खिचड़ी सरकार में शामिल छोटे-बड़े राजनीतिक दल व उनके नेता मीडिया की सक्रियता से हमेशा बेनकाब होते रहे हैं. अब जब, लोकसभा चुनाव सिर पर हैं, इन मंदबुद्धि नेताओं ने पहले टीवी चैनलों पर अंकुश लगाने का मन बनाया है, सरकार कानून बना कर यह सुनिश्चित करना चाह रही है कि 'नेशनल क्राइसिस' और 'इमरजेन्सी सिचुएशन' में टीवी न्यूज चैनल सिर्फ सरकार द्वारा मुहैया कराए गए 'फुटेज' ही दिखाएं. अर्थात् टीवी चैनलों के पत्रकारों की खबरों को रद्दी में डाल 'सरकारी संवाददाताओं' की खबरों को ही दिखाया जाए. टीवी चैनलों के संवाददाताओं को अविश्वसनीय बनाने और 'सरकारी संवाददाताओं' को विश्वसनीय बनाने की यह चाल हमें स्वीकार्य नहीं! हम इसका निषेध करते हैं. क्या यह आपातकाल में लगाए गए 'सेन्सर' की पुनरावृत्ति नहीं होगी? तब ऐसा ही हुआ था. टीवी चैनल (सरकारी दूरदर्शन को छोड़) तो उस समय नहीं थे, अखबारों के दफ्तरों में सरकारी नुमाइंदे बैठ खबरों की पड़ताल करते थे, उनके द्वारा स्वीकृत खबरें ही प्रकाशित होती थीं. विरोध करने वाले दंडित किए गए- अनेक संपादक व पत्रकार जेलों में ठूंस दिए गए थे. इतिहास के उन काले अध्यायों से देश परिचित है. यहां दोहराने की जरूरत नहीं. मेरी आपत्ति ताजे प्रस्तावित कानून को लेकर है. क्योंकि अगर ऐसा कानून बन जाता है, तब सरकार नए कानून के प्रावधानों को सुविधानुसार अपने पक्ष में परिभाषित कर वैसे हर जन आंदोलन, आतंकी घटनाओं, दंगे, अपहरण व बंधक आदि घटनाओं का वास्तविक प्रसारण रोक देगी, जिनसे सरकार की छवि प्रतिकूल रूप से प्रभावित होने की संभावना हो. सरकार आसानी से ऐसे मामलों को 'इमरजेन्सी सिचुएशन' निरूपित कर देगी. सरकार का यह कदम न केवल मीडिया से उसके अधिकारों को छीनना होगा, बल्कि देश को वास्तविकता की जानकारी से वंचित करना भी होगा. निश्चय ही यह लोकतंत्र व संविधान की मूल भावना को चुनौती होगी. देश इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेगा. सरकार के सलाहकार चेत जाएं. यह ठीक है कि मुंबई हमले के कवरेज के दौरान कुछ टीवी चैनलों ने गैर-जिम्मेदारी का परिचय दिया था, किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उन गलतियों को आधार बना सरकार पूरी मीडिया को अपना गुलाम बनाने की साजि़श रचे! सरकार यह न भूले कि देश के लोकतंत्र और संविधान की रक्षा का गुरुत्तर दायित्व मीडिया निभाता है, राजनीतिक दल या उनके अर्धज्ञानी नेता नहीं! भारतीय लोकतंत्र का व्यावहारिक सच यही है.
एस.एन. विनोद 13-01-09

5 comments:

कमल शर्मा said...

मीडिया पर पाबंदिया लगाना कतई उचित नहीं है। मीडिया को क्‍या करना चाहिए और क्‍या नहीं इस पर मीडिया के लोग बैठकर एक आदर्श आचार संहिता बना सकते हैं लेकिन सरकार जिस तरह हस्‍तक्षेप का प्रयास करना चाहती है उसका जमकर विरोध किया जाना चाहिए।
मीडिया खासकर इलेक्‍ट्रॉनिक में न्‍यूज के नाम पर काफी कचरा भी परोसा जा रहा है। जैसे भूत प्रेत, नाग नागिन और अपराध तो ऐसे दिया जा रहा है जैसे भारत अपराधों का महादेश है। इसके लिए आड यह ली जा रही है कि लोग यह देखना पसंद करते हैं। मैं कहता हूं कि लोग तो ब्‍लू फिल्‍में देखना ज्‍यादा पसंद करते हैं। क्‍यों नहीं टीवी चैनल वाले ब्‍लू फिल्‍में ही चला देते। इससे जहां उनके दर्शक बढ़ जाएंगे वही टीआरपी पूरी दुनिया में पहले नंबर पर पहुंच जाएगी।
विकसित देशों में पहले यह खूब कहा जाता था कि भारत सांप और मदारियों का देश है और आज जिस तरह सांप, भूतों और अपराधो की खबरों को खूब गरम मसाला लगाकर परोसा जा रहा है उससे हमारी छव‍ि में कोई खास बदलाव नहीं आएगा और अंतरराष्‍ट्रीय मंच पर हमें फिर से सांप व मदारियों का देश समझा जाएगा। इन खबरों के आधार पर यह देश आर्थिक महासत्ता या एशिया में राजनीतिक ताकत नहीं बन सकता।
टीवी चैनलों में इन दिनों एक नया रोग और आया है। दिन भर यूटयूब दिखते रहो और उनमें से सनसनी टाइप के विजुअल उठाकर टीवी पर दिखाते रहो। चाहे वे चार वर्ष पुराने हो लेकिन आज का यह कहकर दिखाओं। शायद टीवी मीडिया जनता को मूर्ख समझता है। मीडिया वालों को खुद बैठकर एक आदर्श आचार संहिता बनानी चाहिए और उस पर कडाई से अमल होना चाहिए। सरकारी हस्‍तक्षेप की हर कोशिश का मैं विरोध करता हूं।

savita verma said...

sahi kaha aapne.

राजेश अग्रवाल said...

सेंसरशिप का कड़ा विरोध होना चाहिये. देखना यह है कि पत्रकार बिरादरी एकजुट रहें. इसे इलेक्ट्रानिक मीडिया में ख़बरें पेश करने के तरीके से प्रिंट मीडिया के जर्नलिस्ट जरूर असहमत हों लेकिन सरकारी दखलंदाजी का कड़ा विरोध मिल-जुलकर किया जाये. मुम्बई हमला एक अप्रत्याशित घटना थी, यदि कोई चूक इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इसके प्रसारण में की तो उसे सुधारने का भी वादा इसके बाद किया है. कई चैनलों ने तो बड़े संयम और जवाबदेही का परिचय इस मौके पर भी दिया. आख़िर उन्हें प्रबुध्द दर्शकों की आलोचना की परवाह है. भारत में इलेक्ट्रानिक मीडिया को प्रिंट मीडिया की तरह परिपक्व होने में अब ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. अब प्रिंट के लोग इलेक्ट्रानिक में तथा इलेक्ट्रानिक की सम्पादकीय टीम प्रिंट में आ-जा रहे हैं. सरकार कोई काला कानून लाकर हस्तक्षेप करने का दुस्साहस न करे, पत्रकार हर रोज जनता की अदालत का सामना करते हैं. मीडिया की दिशा व दशा वे ही तय करेंगे न कि नौकरशाह.

anandsingh said...

aapne bilkul sahi likha hai. is tarah ke kale kanoon media ki azadi per sendh lagane ke liye hi hain jiska her media karmi ko atyant kara prativad karna hi chahiye.
anand singh
rashtriya sahara
gorakhpur

rajesh ranjan said...

sarkar chahti hai ki press me uske prawakta baithen. ye swikar nahi kiya ja sakta. safal aur sachhe loktantra ke liye ye ankush bardast nahi kiya jana chahiye, kiya bhi nahi jayega. ye sahi hai ki media ke seriousnes me kami aayi hai aur iske liye media se jure logon ko apni samiksha karni chahiye. ye jaruri bhi hai.
rajesh ranjan
chief sub editor
amar ujala
panchkula.