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Thursday, January 22, 2009

ओबामा ने नहीं, अमेरिका ने रचा इतिहास


इतिहास रचा गया! बिल्कुल ठीक! इतिहास बराक ओबामा ने रचा, इसे स्वीकार करने में मुझे संकोच है. यूं भारत के प्राय: सभी समाचार-पत्र और टेलीविज़न चैनल पिछले दो दिनों देश को शिक्षित करते देखे गए कि 'ओबामा ने इतिहास रचा.' मैं समझता हूं ये अतिरेकी उद्गार है. अति उत्साह में ऐसा ही होता है. गुब्बारे के पिचक जाने के बाद ऐसे उत्साही कलमची स्वयं ही संशोधन को आतुर हो उठेंगे. इस आकलन को चिह्नित करने में खतरा सिर्फ अकादमिक ही है. वे हमला कर सकते हैं. ऐसे खतरे को झेलने के लिए तैयार मैं अब उस व्यापक सच को रेखांकित कर देता हूं. सच यह है कि इतिहास अश्वेत ओबामा ने नहीं, श्वेत अमेरिका ने लिखा है. उस अमेरिका ने जिसमें श्वेत-आबादी 80 प्रतिशत है- अश्वेत सिर्फ 13 प्रतिशत हैं. यह वही महाशक्ति अमेरिका है, जिसके लोकतंत्र ने अभी मात्र 44 वर्ष पूर्व (1965) अश्वेतों को मत देने का अधिकार प्रदान किया. इसके पूर्व वे मताधिकार से वंचित थे. अश्वेतों की ओर से इसके लिए ओबामा के वैचारिक गुरु मार्टिन लूथर किंग ने निर्णायक लड़ाई लड़ी थी.
अश्वेत क्रांति का इतिहास लगभग 150 साल पुराना है. अश्वेतों की मांग के कारण अमेरिका गृहयुद्ध तक झेल चुका है. खून-खराबे हुए थे. अश्वेतों के खिलाफ तब बहुसंख्यक एकजुट थे. आज उन्हीं श्वेतवर्णों ने अश्वेत बराक ओबामा को अपना भविष्य निर्धारित करने का अधिकार सौंप दिया है.
सदी के महानायक के रूप में महिमामंडित कर रहे हैं- शांतिदूत के रूप में चित्रित कर रहे हैं- संकट मोचक बता रहे हैं. दोहरा दूं, ये सब अमेरिका के बहुसंख्यक श्वेत कर रहे हैं- सिर्फ 13 प्रतिशत अश्वेत नहीं! इतिहास यहीं रचा गया. खैर जब इतिहास रचा गया, तब आशाओं-अपेक्षाओं के बीज तो अंकुरित होंगे ही. एक ओबामा की 'कृपा' का आज पूरा संसार अभिलाषी है.
ओबामा ने राष्ट्रपति पदग्रहण के पश्चात बातें कुछ कही ही ऐसी हैं. अमेरिका को उन्होंने क्रिश्चियन, यहूदी, मुसलमानों और हिन्दुओं का देश घोषित किया है. निवर्तमान राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू. बुश की विदेश नीति को अस्वीकार करते हुए इराक से अमेरिकी फौजों की वापसी के संकेत दिए हैं. विश्वव्यापी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की जरूरत जताई. एक महान चिन्तक की तरह ओबामा ने बताया कि अमेरिका की विविधताओं भरी विरासत ही उनकी ताकत है. हर भाषा और संस्कृति उन्हें आकार देती है. विश्व-महाशक्ति के रूप में विश्व-शांति की दिशा में अमेरिका की भूमिका को भी उन्होंने रेखांकित किया.
हमारे भारत में मौजूद विदेशी मामलों के विशेषज्ञ 'ओबामा-उदय' को भारत के लिए हितकारी मान रहे हैं. इस बिन्दु पर सहज-जिज्ञासा यह कि क्या सचमुच अमेरिका, भारत का मित्र साबित होगा? तटस्थ विश्लेषक चूंकि अब तक इस बात पर अड़े थे कि अमेरिका कभी भी भारत का मित्र नहीं हो सकता, एक नई बहस ने जन्म ले लिया है. पाकिस्तान ने तो ओबामा के कतिपय विचारों पर अपनी आपत्ति दर्ज भी कर दी है. दक्षिण एशिया में शांति की पहली शर्त ही है भारत-पाक के बीच मित्रता! इसके पक्ष में भारत-पाकिस्तान की ओर से बड़े-बड़े वक्तव्य आते हैं. लेकिन हमारी आज़ादी और पाकिस्तान उदय के साथ ही गुम 'मित्रता' को ढूंढ़ वापस लाने की ईमानदार कोशिश कभी किसी ने की है? राजनीतिक लाभ-हानि के जोड़-घटाव में शासकों ने दुश्मनी अथवा तनाव को ही तरज़ीह दी है. अमेरिका ने इस विवाद में राजनीति से अधिक अपने आर्थिक-हित को प्राथमिकता दी. अपनी आंतरिक सुरक्षा को बड़ी चतुराई से अमेरिका ने इस विवाद के साथ जोड़ दिया. अमेरिका की यह नीति अब तक सफल रही है. ओबामा इस सचाई से अच्छी तरह परिचित हैं कि इसी अमेरिकी नीति के कारण अमेरिका पर बहुचर्चित 9/11 आतंकी हमले के बाद फिर कोई हमला नहीं हुआ. क्या अमेरिका की इस 'कूटनीति' की 'सफल यात्रा' को ओबामा विराम देने का जोखिम उठा पाएंगे? और स्पष्ट कर दूं- अमेरिका की इस 'सुरक्षा' की गारंटी दक्षिण एशिया में जारी अशांति ही है.
इराक से अमेरिकी फौजों की वापसी तो हो जाएगी, किन्तु क्या ओबामा इराक को सद्दाम हुसैन वापस कर पाएंगे? हर तरह से यह प्रमाणित हो चुका है कि इराक पर अमेरिकी हमला, सद्दाम की मौत, वहां सत्तापलट अमेरिकी 'हवस' के कारण हुई. किसी लोकतांत्रिक-क्रांति के कारण नहीं! ध्यान रहे, ओबामा के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उनके सलाहकार हमारे कश्मीर को 'समस्या' निरूपित कर चुके हैं. भारत किसी मुगालते में न रहे. यह मान कर चलें कि अश्वेत ओबामा की पहली चिन्ता श्वेत अमेरिका के हित की ही होगी. बेहतर हो- मजबूत हो रहा भारत, स्वयं को और मजबूत करे. लक्ष्य महाशक्ति का आसन हो!

4 comments:

अनूप शुक्ल said...

आगे देखते हैं क्या होता है?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इतिहास हमेशा जनता ही रचती है।

कमल शर्मा said...

अमरीकी अर्थव्‍यवस्‍था आज जिस मुशिकल हालात का सामना कर रही है ऐसे में यदि ओबामा बिल्‍कुल सादे तरीके से शपथ लेते तो अच्‍छा रहता। करोड़ों रुपए स्‍वाहा कर उन्‍होंने जो शपथ ली वह वैसे भी काम की नहीं रही ओर उन्‍हें दोबारा शपथ दिलानी पड़ी। अमरीका में रोज किसी न किसी बैंक या कंपनी के दिवालिया होने की खबरें आ रही हैं लेकिन इनके कई दिग्‍गजों ने 50 हजार डॉलर के टिकट तक खरीदें और शपथ ग्रहण समारोह की शोभा बढ़ाई। वित्तीय हालात नाजुक होने के बावजूद इस तरह का प्रदर्शन ठीक नहीं। ओबामा के सामने कई चुनौतियां है देखते हैं वे उनसे कैसे निपटते हैं। अमरीका को महामंदी में डुबने से बचाने के लिए उनके पास रुजवेल्‍ट जैसी योजनाएं हैं या नहीं, पाकिस्‍तान से वे कैसे निपटते हैं और अन्‍य देशों के साथ उनके संबंध कैसे रहते हैं यह आने वाले समय में पता चलेगा और उनका यही काम इतिहास रचेगा।

Gobar Pattee said...

भारत को किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए.देश की नीतियाँ आमतौर पर राजनीतिक नेतृत्व के बदलने से नहीं बदलते.यह हर काल में सच है कि अमेरिका भारत का मित्र नहीं हो सकता.उपरी तौर लगेगा कि वह भारत का मित्र है.दोनों के बीच संबंध भी अच्छे दिखेंगे.भारत अपनी ओर से मित्र धर्म निभाने की ईमानदारी दिखाये तो भी अमेरिका भारत का मित्र नहीं हो सकता.हाँ,वह मालिक की तरह व्यवहार करेगा.उसे जब भारत की जरुरत होगी,वह पुचकारेगा और उसकी बात मानने में थोड़ी भी ना-नूकूर किया तो आँखे भी तड़ेरेगा.
यह सही है कि अमेरिका के श्वेतों ने उदारता दिखाई है.एक अश्वेत, जो काफी दिनों तक अमेरिका में अछूत थे,की काबिलियत पर भरोसा किया.उसे मौका दिया.श्वेतों ने अश्वेतों के प्रति घृणा को त्यागने की ऐतिहासिक उदारता दिखाई.
क्या भारत में ऐसा संभव है ? किसी ओबामा(अश्वेत / अछूत)को भारत के श्वेत(सवर्ण)कभी स्वीकार करेंगे ? अछूतों की काबिलियत पर भरोसा करेंगे,उसे मौका देंगे ?
भारतीय समाज के अतीत और वर्तमान को देखकर लगता है यह दूसरे देशों में तो संभव है,परन्तु भारत में नहीं.काश,भारत के भी श्वेत अमेरिका के श्वेतों की तरह उदारमना होते.
यह भी सच है कि जब तक भारत के श्वेत अश्वेतों के प्रति उदारता नहीं दिखाएँगे तब तक भारत महाशक्ति नहीं बन सकता.
-गिरिजेश्वर