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Monday, January 26, 2009

'भविष्य' राहुल के बहाने 'वर्तमान' पर कब्जा??


प्रधानमंत्री पद के लिए आधा दर्जन से अधिक इच्छुकों की मौजूदगी के बीच शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में लगता है कि एक अलग प्रकार की खिचड़ी पक रही है. एक ऐसी खिचड़ी जिसकी सुगंध योजनाबद्ध तरीके से सोनिया गांधी के खेमे में पहुंचाई जा रही है. निगाहें और निशाने तय हैं. चतुर पवार का आज्ञाकारी खेमा योजना की सफलता को लेकर आश्वस्त है. अन्यथा पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के महासचिव डी.पी. त्रिपाठी कांग्रेस के युवा महासचिव सोनिया पुत्र राहुल गांधी को देश का वर्तमान व भविष्य निरूपित नहीं करते. याद दिला दूं कि यह वही शरद पवार हैं, जिन्होंने 1999 में सोनिया गांधी के नेतृत्व को चुनौती देते हुए विद्रोह का बिगुल बजाया था. 15 मई 1999 को कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए पवार ने सोनिया को संबोधित करते हुए कहा था, 'कांग्रेस आपके विदेशी मूल के मुद्दे पर भाजपा के प्रचार का जवाब देने में सफल नहीं हो पाई है, हमें इस बात को गंभीरता से लेना चाहिए.' पवार की इस बात को आगे बढ़ाते हुए उसी बैठक में पी.ए. संगमा ने कहा था, 'जब लोग पूछते हैं कि भारत में 98 करोड़ नागरिक होने के बावजूद कांग्रेस प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में एक भी योग्य भारतीय को क्यों नहीं खोज पाई तो हमारे पास कोई जवाब नहीं होता. मुझे लगता है कि वे सही हैं.' इसके बाद के घटनाक्रम से देश परिचित है. पवार, संगमा कांग्रेस से अलग हुए और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया. ध्यान रहे विदेशी मूल के साथ-साथ पवार समर्थक तब 'परिवारवाद' का भी विरोध कर रहे थे. ऐसे में जब पवार की पार्टी राहुल गांधी को देश का वर्तमान और भविष्य बता रही है तो क्या अकारण? बिल्कुल नहीं! त्रिपाठी के बयान पर गौर करें. राहुल में 'भविष्य' देखने वाले त्रिपाठी उसी स्वर में यह बताने से नहीं चूके कि शरद पवार में प्रधानमंत्री बनने की पूरी क्षमता है. त्रिपाठी यह भी याद दिला गए कि जब चंद्रशेखर और गुजराल मुट्ठी भर सांसदों के सहयोग से प्रधानमंत्री बन सकते थे तो पवार क्यों नहीं? इस मुकाम पर पवार खेमा अपनी योजना पर से आवरण हटाता दिख रहा है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, अर्जुन सिंह, प्रणब मुखर्जी और दिग्विजय सिंह पहले ही राहुल गांधी में प्रधानमंत्री की पात्रता के लिए आवश्यक सभी गुण देश को बता चुके हैं. यह निर्विवादित है कि कांग्रेस की इस मंडली ने शीर्ष नेतृत्व की सहमति के बाद ही राहुल का नाम उछाला है. कांग्रेस संस्कृति से परिचित लोगों को इसमें कोई अजूबा नहीं दिखेगा. स्वार्थपरक, अवसरवादी राजनीति के ऐसे किस्से आम हैं. लोगों को आश्चर्य पवार की पार्टी की इस नई पहल पर है. अचानक राकांपा को राहुल में देश का वर्तमान और भविष्य कैसे नजर आने लगा? प्रधानमंत्री बनने की पवार की महत्वाकांक्षा पहले से जगजाहिर है, लेकिन यह तो तय है कि अकेले राकांपा के बलबूते पवार कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते. उनकी पार्टी की ओर से चंद्रशेखर और इंद्रकुमार गुजराल का उद्धरण पेश करना महत्वपूर्ण है. इन दोनों को कांग्रेस का बाहर से समर्थन प्राप्त था. सच यह भी है कि कुछ महीनों के अंदर कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर इन्हें भूतपूर्व बना दिया था. कहीं शरद पवार चंद्रशेखर-गुजराल की 'गति' प्राप्त करना तो नहीं चाहते? शायद सच यही है. आसन्न लोकसभा चुनाव के संभावित परिणाम को भांपकर पवार प्रधानमंत्री बनने संबंधी अपनी अधूरी इच्छा को पूरी करना चाहते हैं. अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ तो- चुनावी पंडितों के अनुसार- कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों प्रमुख दलों के सांसदों की संख्या घटेगी. ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय दलों की शक्ति में इजाफा होगा.
वामदल, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रमुक और अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियां तब सौदेबाजी को तत्पर दिखेंगी. कांग्रेस से नाराज वामदलों पर पवार की दृष्टि लगी हुई है. मुलायम सिंह से उनके मधुर संबंध रहे हैं. मायावती, जयललिता को साधने में उन्हें दिक्कत नहीं होगी. अर्थात तीसरी शक्ति के नेता के रूप में पवार अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं. परंतु तब जरूरत पड़ेगी कांग्रेस व भाजपा में से एक के समर्थन की. कांग्रेस के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन और यूपीए का अंग होने के कारण पवार कांग्रेस का समर्थन चाहेंगे. जाहिर है राहुल गांधी को 'भविष्य' बताकर पवार 'वर्तमान' पर सौदेबाजी करेंगे. अपने राजनीतिक जीवन में पोषित स्वप्न को अल्पावधि के लिए ही सही पूरा करने को व्यग्र शरद पवार की चिंता अपनी राजनीतिक विरासत को लेकर भी है. पुत्री सुप्रिया सुले को अपने निर्वाचन क्षेत्र बारामती से चुनाव लड़वाने की घोषणा यूं ही नहीं की गई है. कोई आश्चर्य नहीं कि भविष्य में राहुल गांधी की एक विश्वसनीय सलाहकार के रूप में सुप्रिया स्थापित हो जाएं. भारतीय लोकतंत्र के इस 'रंग' पर तब आप अचंभित होंगे?

4 comments:

Udan Tashtari said...

इतने अचंभे देख चुके कि अब इम्यून हो गये है अचंभों से इसलिये सुप्रिया को एक विश्वसनीय सलाहकार के रुप में तो क्या, प्रधानमंत्री के रुप में भी देखकर अचंभित नहीं होंगे.

आपको एवं आपके परिवार को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

chandrashekhar hada said...

भाई साहिब , प्रणाम.
गणतंत्र दिवस की आपको ढेर सारी शुभकामनाएं.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर.... गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं...!

कमल शर्मा said...

शरद पवार से ज्‍यादा चालाक और मौकापरस्‍त नेता शायद ही देश में कोई हो। वे अपने लाभ के लिए किसी से भी हाथ मिला सकते हैं, दोस्‍त को दुश्‍मन ओर दुश्‍मन को दोस्‍त बनाना जानते हैं। महाराष्‍ट्र में भाजपा की दोस्‍त शिवसेना के सुप्रीमों तक पवार को प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं। शरद पवार तो श्रीखंड और भूखंड के लिए विख्‍यात रहे हैं और आज तक किसी मामले में फंसे नहीं। सीखों राजनीति करना पवार से। राहुल का हाल वे यह न कर दें कि वह वर्तमान तो दूर, भविष्‍य में कहीं मंत्री बनने लायक भी नहीं बचे। बचना राहुल भेया....।