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Monday, October 11, 2010

गोरी चमड़ी वालों की काली हरकतें!

इसमें हैरानी की क्या बात है! गोरी चमड़ी वाले विदेशी हम काले भारतीयों के साथ हमेशा ऐसा ही सलूक तो करते रहे हैं! आजादी के पहले गुलाम भारत में भी और आजादी पश्चात स्वतंत्र भारत में भी। आजादी के छह दशक बाद भी कोई दावे के साथ यह नहीं कह सकता कि हम कालों के प्रति गोरों की मानसिकता में कोई उल्लेखनीय बदलाव आया है। यह तो हमारी सहनशीलता है और संभवत: विरासत में प्राप्त संस्कृति है जो हमें जैसे को तैसा सरीखा जवाब देने से रोक देती है। लेकिन आखिर कब तक? आस्ट्रेलिया में पुलिस ने एक वीडियो टेप जारी कर प्रचारित किया कि भारतीय छात्रों को सबक सिखाने का यह एक उम्दा तरीका है। भारत के किसी भाग में फिल्माई गई उस टेप में एक ट्रेन में बिजली के करेंट से कुछ लोगों के हताहत होने के दृश्यों को दिखाया गया है। क्या यह गोरों की विकृत सोच व दंभी मानसिकता का परिचायक नहीं? आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के खिलाफ नस्लवाद के नंगे खेल को वहां के प्रधानमंत्री स्वीकार कर चुके हैं। भारत सरकार को उनकी ओर से ऐसी किसी भी पुनरावृत्ति के खिलाफ आश्वस्त किया गया था। फिर ऐसी नस्लवादी घृणा का प्रचार क्यों? इसके पूर्व अभी कुछ दिन पहले ही दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के नाम को लेकर न्यूजीलैंड के टीवी चैनल का एंकर अश्लील टिप्पणी करते देखा-सुना गया था। जब राजनयिक स्तर पर भारत की ओर से आपत्ति दर्ज की गई तब दंडस्वरूप उस एंकर से इस्तीफा ले लिया गया। क्या यह कोई सजा हुई? वीडियो टेप के मामले में भी संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अभी तक कोई गंभीर कदम नहीं उठाए गए हैं। फिर क्यों न ये गोरी चमड़ी वााले उद्दंडता की सीमा पर कर भारतीयों का अपमान करते रहें, उन्हें प्रताडि़त करते रहें? वैसे बात इतिहास की है किन्तु कठोर सत्य के रूप में हमेशा सालती रहती है कि कैसे भारतीय काले बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) को दक्षिण अफ्रीका में नस्ल के आधार पर ट्रेन के डब्बे से उठाकर बाहर फेंक दिया गया था। अत्यंत ही दु:खी मन से इस पुरानी घटना की याद आज करनी पड़ रही है। आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड की इन ताजा घटनाओं ने हमें झकझोर कर रख दिया है। हम इतने दीन-हिन-कमजोर तो नहीं कि जब चाहे कोई हमारे गालों पर तमाचे जड़ दे! बावजूद इसके अगर गोरों के मन में कुछ ऐसा एहसास है तब निश्चय ही कहीं-किसी स्तर पर हम कमजोर हैं। इसका पता लगाया जाए। आज जब भारत हर क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों के बल पर विश्व समुदाय को चुनौती दे रहा है, तब हमारे साथ अगर ऐसा व्यवहार होता है तो कारण ढूंढने ही पड़ेंगे। या तो हमारी विदेश नीति कमजोर है, हमारे राजनयिक अक्षम हैं या फिर हमारा प्रचार तंत्र सही दिशा में कार्य नहीं कर पा रहा है। इस मुद्दे पर हम मौन नहीं रह सकते। अब गोरों को यह बता ही दिया जाना चाहिए कि वे दिन लद गए जब गोरों ने हम भारतीयों को कुत्तों के समकक्ष रख छोड़ा था। आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड की घटनाएं पूरे भारत के लिए अपमानजनक हैं। क्या भारत सरकार अब भी ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति पर पूर्ण विराम सुनिश्चित करेगी?

4 comments:

lokendra singh rajput said...

bharat sarkar ne abhi tak koi pratikriya jari nahi ki hai... anya desh hote to ye apmaan sahan nahi kar pate...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बड़े लोग हैं, इसलिये कार्रवाई हो गयी. यहां रोज काली चमड़ी वाले अपने ही भाईयों की चमड़ी उधेड़ देते हैं, थानों में कत्ल कर देते हैं. सड़क पर एक सिपाही किसी की भी पीठ पर डंडा जड़कर संविधान प्रदत्त गरिमा को झाड़ देता है... जब तक हर एक नागरिक को यह गरिमा प्रदान नहीं की जाती, तब तक कुछ नहीं हो सकता. पहले अपने देशवासियों की दशा सुधारिये, विदेशियों की मजाल क्या है..

उपेन्द्र " the invincible warrior " said...

बहुत ही अच्छा विषय आपने उठाया ... मगर इन नेताओँ को अपनोँ से फुरसत मिले तब न दुनिया से लडे.


www.srijanshikhar.blogspot.com पर " क्योँ जिन्दा हो रावण "

मनुदीप यदुवंशी said...

wah !! bahut mukhar awaaa hai. aisey hi bullnad swaro ki aawashykta hai aaj desh ko. kya mujhe bhi aapke blog par yog daan karney ka mauka milsakta hai ?