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Saturday, October 9, 2010

जनजागृति- समय की पुकार!

बनवारीलाल पुरोहित की पीड़ा है कि आज का समाज इतना तटस्थ हो गया है कि वह ज्वलंत मुद्दों से भी आंखें मूंद लेता है। ऐसी राष्ट्रीय निर्लिप्तता खतरनाक है। यह स्थिति एक कमजोर राष्ट्र का लक्षण भी है। ऐसे में, जागृति आज समय की पुकार है। अंग्रेजी दैनिक 'द हितवादÓ के प्रबंध सम्पादक बनवारीलाल पुरोहित सक्रिय राजनीतिक भी हैं। उनकी इस समीचीन पीड़ा का निराकरण क्या कोई करेगा? जब उन्होंने जागृति का आह्ïवान किया तब निश्चय ही उनके जेहन में वे मुद्दे रहे होंगे जिन पर न केवल राष्ट्रीय बहस बल्कि तत्काल निर्णय लेने की जरूरत है। राम मंदिर मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ भाजपा में प्रवेश करने वाले पुरोहितजी अपनी बेबाकी के लिए भी मशहूर हैं। धर्मनिरपेक्ष भारत के स्वरूप चरित्र पर भाषण दे एक बार संसद में सत्ता पक्ष की ओर से वाहवाही लूट चुके जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के ताजा बयान ने भी पुरोहितजी को उद्वेलित किया होगा। सचमुच उमर का बयान हर दृष्टि से देश विरोधी और दुश्मन पाकिस्तान की तरफदारी करने वाला है। जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उमर यहां तक कह गये कि यह भारत और पाकिस्तान के बीच का मुद्दा है जिसमें जम्मू-कश्मीर पिस रहा है। हमारे देश का एक मुख्यमंत्री भारत विरोधी ऐसा बयान देकर अगर स्वच्छन्द विचर रहा है तब निश्चय ही भारत निद्रा अवस्था में है। उसे जागृत करना ही होगा। अब सवाल यह कि केंद्रीय सत्ता के एक भागीदार उमर अब्दुला के खिलाफ केंद्र सरकार राष्ट्रद्रोह का मामला क्यों नहीं चलाती? अगर उमर की तरह किसी और दल के किसी नेता की ओर से ऐसा बयान आया होता तो हमारे प्रधानमंत्री क्या वर्तमान की तरह मौन रहते? भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू-कश्मीर के पिसने की बात खतरनाक है। यह हमारी विदेश नीति को भी चुनौती है। सत्य से दूर तो यह है ही। जम्मू-कश्मीर के लोग अगर पिस रहे हैं तो पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादियों और जम्मू-कश्मीर सरकार की ढुलमुल नीतियों के बीच में। वहां की सरकार की अकर्मण्यता के कारण ही आज पूरा जम्मू-कश्मीर सुलग रहा है। उमर के बयान से साफ हो गया है कि पाकिस्तानी आतंकवादियों को राज्य में शरणागत बनाया गया है। मुद्दा सिर्फ एक जम्मू-कश्मीर राज्य का नहीं है। इस प्रदेश के एक हिस्से पर पाकिस्तान पहले ही कब्जा कर चुका है। पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में हमारा एक और दुश्मन देश चीन हाथ-पांव पसार रहा है। बड़ी संख्या में चीनी सैनिक और हथियार वहां पहुंच चुके हैं। सड़कों और बंकरों का निर्माण हो रहा है। ऐसी कवायद उद्देश्यहीन तो नहीं ही हो सकती। अगर हमारे शासक इसके बावजूद उमर के बयान का निहितार्थ नहीं भी समझ पा रहे हैं तो उन्हें झक मारकर जगाना ही होगा। फिर भी, नहीं जागते तो जनता को जागृत कर निष्क्रिय शासकों को बदल डालना होगा। असली जागृति की जरूरत यहीं चिन्हित होती है। शासकों की कमजोरी को तो उमर के बयान ने रेखांकित कर ही दिया है। उसने पूरे संसार को जता दिया कि भारत के वर्तमान शासकों के गालों पर चाहे जितने तमाचे मार लो, देश की सुरक्षा और अखंडता के महत्व को वे समझ नहीं सकते। केंद्र की खिचड़ी सरकार के सभी दल अपने-अपने पृथक एजेंडों की खिचड़ी पका रहे हैं। उनके एजेंडों में येन-केन-प्रकारेण धन अर्जित करना और दलों के भ्रष्ट शुभचिंतकों-समर्थकों का हित साधना भर है। अपने-अपने एजेंडों के क्रियान्वयन में ये सफल हो रहे हैं तो सिर्फ इसीलिए कि देश की आम जनता सुप्तावस्था में है। पुरोहितजी ने आह्ïवान किया है तो पहल भी करें। यह तो तय है कि जागृत भारत अपने सीने पर उमर अब्दुला सरीखे अलगाववाद और दुश्मन देश का पक्ष लेने वालों को कदमताल कभी नहीं करने देगा। उमर को अगर मैं यहां चिन्हित कर रहा हूं तो इसलिए कि उनके पिता फारूक अब्दुल्ला भी केंद्र में मंत्री हैं। और यह तथ्य भी सामने है कि इनके दादा शेख अब्दुल्ला को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने जेल भिजवा दिया था तो उनकी ऐसी ही गतिविधियों के कारण। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी को सरकार चलाने की मजबूरी हो सकती है लेकिन देशवासी अपने किसी प्रदेश को अ-भारतीय घोषित करनेवाले को भला भारत में कैसे रहने देंगे? उन्हें तो देश निकाला देना चाहिए।

1 comment:

अशोक बजाज said...

बढ़िया पोस्ट , आभार .

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