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Sunday, January 3, 2010

गलत है अभिव्यक्ति पर नियंत्रण की कोशिश !

ललाट पर शिकन लाने की जरूरत नहीं। चाहे सरकार कितना भी इनकार कर ले, निजी चैनलों पर प्रस्तावित नकेल अपरोक्ष में सेंसर की भूमिका ही निभाएगी। मीडिया की आशंका निर्मूल नहीं है। मुंबई में 26/11 हमले की अनियंत्रित मीडिया कवरेज को आधार बनाकर महाराष्ट्र सरकार निजी चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों की विषयवस्तु पर निगरानी रखने के लिए जिला स्तर पर समिति बनाकर क्या हासिल करेगी यह तो बाद की बात है। फिलहाल इसकी मंशा चैनलों को चेतावनी देने की है। शायद वह इस प्रयास से चैनलों की प्रतिक्रिया भी देखना चाहती है। लगता है इस योजना के पीछे लक्ष्य कुछ और है। नि:संदेह केंद्र सरकार भी इसके पीछे है। अगर यह सच है तब केंद्र सरकार पुरानी भूल को दोहरा रही है। समझ में नहीं आता कि पिछले दो अवसरों पर मुंह की खाने के बाद भी केंद्र सरकार फिर अपने उगले को निगलने की ओर क्यों बढ़ चली है।
मैं यह मानता हूं कि 26/11 के हमले के दौरान कतिपय निजी चैनलों ने घोर गैर-जिम्मेदाराना आचरण का परिचय दिया था, लेकिन वह सब कुछ अति उत्साह और अनजाने में हुआ था। चैनलों की नीयत में कहीं कोई खोट नहीं थी। ऐसा आरोप कोई पागल ही लगा सकता है कि चैनलों ने जान-बूझकर हमले का कुछ यूं प्रसारण किया, जिनसे आतंकवादियों को मदद मिली। आतंकवादी मदद ले गए यह ठीक है, किंतु चैनलों ने जान-बूझकर ऐसा किया, यह गलत है। इसलिए हमले को आधार बनाकर चैनलों को नियंत्रित करने की पहल अनुचित है। सरकार पहले अपनी मंशा स्पष्ट करे। मीडिया की ताकत को आंकने का यह तरीका गलत है।
सन् 1988 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी फेयर फैक्स और बोफोर्स जैसे कांडों में बुरी तरह उलझ प्रेस का निशाना बन रहे थे, तब अवसरवादी मूर्ख सलाहकारों ने उन्हें गुमराह किया। उनके परामर्श पर मानहानि विधेयक संसद में पेश कर दिया गया था। उद्देश्य प्रेस की जुबां पर ताला लगाना था। यह वह काल था जब विश्वनाथ प्रताप सिंह मंत्रिमंडल से इस्तीफा देकर 'जनमंच' के माध्यम से राजीव गांधी सरकार पर आक्रमण कर रहे थे। राजीव के अनेक नजदीकी साथ छोड़ उन्हें निशाना बना रहे थे। प्रेस में उन दिनों 'मि. क्लीन' की छवि एक भ्रष्ट शासक के रूप में परिवर्तित हो रही थी। मानहानि विधेयक लाकर प्रेस पर अंकुश लगाने की कोशिश की गई। पूरे देश में इसका विरोध हुआ। प्रेस की एकता रंग लाई और अंतत: विधेयक को वापस लेने के लिए राजीव सरकार मजबूर हो गई।
इसके पूर्व सन् 1982 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी प्रेस की ताकत को तौलने की जुर्रत की थी। उन्होंने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र को विश्वास में लिया और बिहार विधानसभा में बिहार प्रेस विधेयक पेश कर दिया गया। वस्तुत: वह विधेयक एक प्रयोग था। बिहार में जयप्रकाश आंदोलन और अपातकाल के विरोध से क्रुद्ध इंदिरा गांधी ने बिहार की जमीन से ही प्रेस की मुंह पर ताला जडऩे का प्रयोग किया था। जगन्नाथ मिश्र तो निमित्त मात्र थे। इंदिरा गांधी भी तब प्रेस को 'टेस्ट' करना चाहतीं थीं। लेकिन उनका प्रयोग प्रति-उत्पादक सिद्ध हुआ। न केवल बिहार में बल्कि पूरे देश में प्रेस ने इंदिरा शासन के खिलाफ जेहाद छेड़ दिया। बिहार में एकत्रित होकर प्रेसकर्मी सड़क पर उतर गए। साथ देने आम जनता भी सरकार के विरोध में खड़ी हो गई। इंदिरा गांधी और डा. मिश्र के पैरों तले की जमीन निकल गई। इज्जत बचाने के उपाय ढूंढे जाने लगे। रास्ता निकला- प्रेस प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की गई और अंतत: प्रेस विधेयक वापस ले लिया गया था। तब भी पराजय बिहार के मुख्यमंत्री की नहीं, देश के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हुई थी।
चूंकि महाराष्ट्र सरकार की ताजा पहल को केंद्र की इच्छापूर्ति के रूप में देखा जा रहा है, मैं चाहूंगा कि राज्य व केंद्र सरकार उपरोक्त वर्णित प्रयासों के हश्र को याद कर ले। तब तो सिर्फ प्रिंट मीडिया था, अब तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बड़ी मौजूदगी है। आम लोगों से ये 24 घंटे रू-ब-रू हैं। इनकी ताकत-प्रभाव को कोई चुनौती देने का दु:साहस नहीं करे। प्रेस और मीडिया की आजादी में संविधान प्रदत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निहित है। इसके साथ छेड़-छाड़ का अर्थ लोकतांत्रिक अधिकार को छीनने की कोशिश है। अश्लील तथा आपत्तिजनक कार्यक्रमों के प्रसारण पर निगरानी रखने के लिए केंद्र सरकार चैनल संचालकों के सहयोग से, बल्कि उनकी भागीदारी में नियमन बनाने का कदम उठा चुकी है। हालांकि इसकी भी कोई जरूरत नहीं। बेहतर हो चैनल संचालक स्वयं समाजहित में अपने लिए आचार संहिता बनाएं। यही कदम प्रभावी होगा। कानून बनाकर अभिव्यक्ति पर नियंत्रण की सोच बेवकूफी ही होगी।

1 comment:

subhash said...

arey,,,,,,,,, abhivyakti kya kewal akhbar walo ki hi hoti hai? bakee hindustani ka kya? yahan roj aam admi bhi bina kisi karan ke shoshit hota rehta hai,, us samay to ye kaha jata hai ki ye samaj ki jatilta hai, ab baat apne upar ai,,to itni sari likha padi,,,ye to shukar hai ki wo media wale thay, jis karan logo ko pata chal gya,,arey aam admi ki bhi to socho,jiske aansoo ponchhne wala koi nahi hai,,yahan media apne lie vishesh darza kyo chahta hai?