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Wednesday, January 13, 2010

वैद्यजी, सरकार और पत्रकार तो आज घनिष्ठ मित्र हैं!

पिछले दिनों झारखंड मुक्ति मोर्चा को समर्थन दे झारखंड में सरकार बनाने के कदम को अनुचित बताने वाले प्रसिद्ध पत्रकार मा.गो. वैद्य का कहना है कि सरकार और पत्रकार मित्र नहीं हो सकते। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कभी प्रवक्ता रहे वैद्य अपनी बेबाक टिप्पणी के लिए विख्यात हैं। अपने स्तंभ के माध्यम से समसामयिक विषयों पर उनकी दोटूक टिप्पणियां राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनती रही हैं। सच लिखने और सच कहने का साहस वैद्य में है। सरकार और पत्रकार के संबंध को लेकर उनकी ताजा टिप्पणी पर क्या पत्रकार बिरादरी गौर करेगी? चूंकि वैद्य की यह टिप्पणी पत्रकारों के लिए एक संदेश है, इस पर बहस होनी चाहिए। लेकिन क्या बिरादरी इस पर इमानदार मंथन के लिए तैयार होगी? अगर साहस है तो वे वैद्य के संदेश को चुनौती दें।
बुजुर्ग वैद्य ने तो सैद्धांतिक सच को रेखांकित किया है, किन्तु वे वर्तमान के सच को शब्द नहीं दे पाए। उन्हें इस सच की अवश्य जानकारी होगी कि उनके 'दर्शन' के विपरीत आज सरकार और पत्रकार मित्रता इतनी प्रगाढ़ है कि वे एक-दूसरे की जरूरतों के पूरक बन गए हैं। पत्रकार अगर सिर्फ पत्रकारिता करते और सरकार के नेता, अधिकारी राजनीतिक और लोकसेवक के रूप में दायित्व निर्वाह करते तब निश्चय ही दोनों के बीच कभी मित्रता नहीं होती। लेकिन आज का सच ये है कि पत्रकारों का एक वर्ग जिनकी संख्या बहुत अधिक है, सरकार की इच्छानुरूप उनका महिमामंडन करता है, उनकी खामियों-विफलताओं पर पर्दा डालता है और बदले में 'पारिश्रमिक' वसूलता है। यह 'पारिश्रमिक' निज अर्थ लाभ से लेकर राज्यसभा की सदस्यता तक होता है। हैसियत व उपयोगिता के अनुसार इनमें से कुछ सुविधाओं से युक्त सरकारी समीतियों की सदस्यता से संतुष्ट हो जाते हैं, कुछ धन लाभ से, कुछ दूसरों को लाभ पहुंचा धन अर्जित कर और कुछ बड़े खिलाड़ी संसद की सदस्यता प्राप्त कर। काजल की कोठरी में रहने वाले सत्ताधारी सत्ता की ओर से टुकड़े फेंक इन्हें अनुग्रहित कर देते हैं। श्री वैद्य निराश होंगे किन्तु यह सच मौजूद रहेगा कि सैद्धांतिक अपेक्षा के विपरीत आज सरकार और पत्रकार घनिष्ठ मित्र हैं।
श्री वैद्य पत्रकारिता को सरोकारों की पत्रकारिता से जोडऩे की सलाह देते हैं। ऐसा होना चाहिए। स्वयं को पत्रकार अथवा संपादक मानने वाला सामाजिक सरोकारों से दूर कैसे रह सकता है। किन्तु जब प्राथमिकताएं बदल जाएं तब? प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जे.एन. रे ऐसी टिप्पणी कर चुके हैं कि मीडिया बिक गया है और संपादक दो कौड़ी के हो गए हैं। श्री रे ने इससे भी आगे बढ़ते हुए यह भी कह डाला था कि 'पत्रकारिता वेश्यावृत्ति में तब्दील हो गई है।' जो मीडिया अपने किसी संस्थान पर राजनीतिक दलों और गुंडों के हमलों पर गला फाड़-फाड़ कर चीखता-चिल्लाता है, वही मीडिया पेशे को 'वेश्यावृत्ति' निरूपित किए जाने पर लगभग खामोश रहा। क्या यह सच की स्वीकृति नहीं थी? चूंकि झूठ के पैर नहीं होते, मीडिया श्री रे के शब्दों का अपेक्षित प्रतिरोध नहीं कर सका। ठीक इसी प्रकार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक रूप से पत्रकारों के एक वर्ग को भ्रष्ट निरूपित किया था, तब भी बिरादरी ने लगभग मौन साध लिया था। बिरादरी के मन का चोर विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
इन सब सच की मौजूदगी में क्या मा.गो. वैद्य की अपेक्षा समाचार पत्र के पन्नों में कैद होकर रह जाएगी? फैसला बिरादरी को करना है- खासकर बिरादरी के युवा सदस्यों को। उन्हें यह तय करना ही होगा कि क्या वे अपनी संतानों की नजरों में 'वेश्यावृत्ति' से अर्जित पूंजी के स्वामी दिखना चाहेंगे? फैसला कर ले बिरादरी।

1 comment:

अरूण साथी said...

बहुत खूब, पर क्या फायदा जहां से मैं देख रहा हूं कोई नजर नहीं आता। खास कर युवओं की बात करें तो उनको तो पैसे से प्यार है पत्रकारिता से नहीं, रही बात वेश्यावृति की तो बहुत लोग हे इस पेशे में जो शान से सर उठा कर और चिल्ला कर बोलते है उन्हें यही वृति पसंद है तो भला कोई कुछ कहे क्या फर्क पड़ता है।