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Wednesday, January 13, 2010

योग्यता हो संसदीय पात्रता, थियेटर की लोकप्रियता नहीं!

मुलायम भ्राता रामगोपाल यादव इन दिनों अमर सिंह के कारण सुर्खियां बटोर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के महासचिव पद से इस्तीफा दे चुके अमर सिंह को थियेटर का मैनेजर निरूपित करते हैं तो कभी पागल करार देते हैं। समाजवादी पार्टी में मुलायम परिवार के वर्चस्व और इन सभी के राजनीतिक चरित्र की जानकारी रखने वालों को कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है। लोहिया शिष्य मुलायम के दर्द की भी इन्हें कोई चिंता नहीं। वैसे बबूल का पौधा स्वयं मुलायम ने लगाया तो फिर फल के रूप में आम की अपेक्षा उन्हें करनी भी नहीं चाहिए। किन्तु इस बीच रामगोपाल यादव एक मंथन करने योग्य टिप्पणी अवश्य कर गए। अमर के समर्थन में जब अभिनेता संजय दत्त ने भी महासचिव पद से इस्तीफे की घोषणा की, तब रामगोपाल की टिप्पणी गौरतलब है। उन्होंने कहा कि ये तो थियेटर वाले हैं। उसके मैनेजर अमर जहां जाएंगे, ये लोग चले जाएंगे। इन फिल्मवालों की वजह से पार्टी को कोई फायदा नहीं हुआ है। रामगोपाल की यह टिप्पणी निश्चय ही विचारणीय है। चूंकि रामगोपाल की टिप्पणी संजय दत्त के संदर्भ में आई, पहले दो शब्द संजय पर। इस सचाई से तो कोई इंकार नहीं करेगा कि संजय दत्त पिछले लोकसभा चुनाव में भीड़ इकट्ठी करने में सफल रहे। किन्तु भीड़ को वोट के रूप में परिवर्तित नहीं कर सके। राजनीतिक रैलियों में उनकी बातें मसखरे और टपोरियों की हुआ करती थीं। सो किसी ने उनके शब्दों को गंभीरता से नहीं लिया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के कारण वे चुनाव नहीं लड़ पाए अन्यथा परिणाम से अमर सिंह को भी धक्का पहुंचता। अपने जमाने की प्रसिद्ध नायिकाएं जया बच्चन और जया प्रदा संसद में समाजवादी पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यह दोहराना ही होगा कि दोनों अमर सिंह की खोज हैं। संसद में इनकी शून्य भूमिका से स्वयं अमर भी इंकार नहीं कर सकते। फिर इन दोनों को जनप्रतिनिधि का तमगा लगाने का अधिकार कैसे? यह तो जनता और संसद के साथ धोखा है। इसकी अपराधी सिर्फ समाजवादी पार्टी नहीं, सत्ताधारी कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी है। अभिनेता, अभिनेत्रियों और खिलाडिय़ों की लोकप्रियता को भंजाते हुए संसद में सिर्फ संख्या बल बढ़ाने के उद्देश्य से इन्हें संसद में लाया जाता है। निश्चय ही यह कृत्य संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली की मूल भावना के साथ विश्वासघात है। कांग्रेस की ओर से प्रसिद्ध अभिनेत्री वैजयंती माला को संसद में भेजा गया था। सांसद के रूप में उनकी भूमिका-उपयोगिता शून्य रही। गायिका लता मंगेशकर को नामित कर संसद में लाया गया था। उन्होंने संसद में उपस्थिति की कभी जरूरत ही नहीं समझी। भारतीय जनता पार्टी की ओर से अभिनेता विनोद खन्ना और खिलाड़ी नवज्योत सिंह सिद्धू को सांसद बनाया गया, भूमिका वही शून्य। अगर कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि संसद के अंदर आसनों पर इनका कब्जा अवैध था- कानूनी अथवा तकनीकी रूप से नहीं, नैतिकता के आधार पर।
हां, कांग्रेस और भाजपा की ओर से अपवाद स्वरूप सुनील दत्त और शत्रुघ्न सिन्हा, दो ऐसी शख्सियतें संसद में पहुंचीं जो वास्तव में इसकी हकदार थीं। सुनील दत्त मुंबई में आम लोगों के बीच जाकर उनके दुख-दर्द में शरीक हुआ करते थे। पर्दे के पीछे भीड़ जुटाऊ लोकप्रियता से पृथक सुनील दत्त ने अपने कार्यों से समाज में पृथक स्थान बनाया था। 1992-93 के मुंबई दंगों के दौरान सांप्रदायिक सौहाद्र्र कायम रखने के लिए उन्होंने अपने जान की भी परवाह नहीं की थी। बगैर भेदभाव के दोनों समुदाय के दंगा पीडि़तों की उन्होंने समान रूप से मदद की थी। वे सांसद बने थे तो एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में न कि अभिनेता के रूप में।
दत्त की तरह ही भाजपा में शत्रुघ्न सिन्हा अपवाद हैं। जयप्रकाश आंदोलन के दौरान जब सिन्हा अपनी लोकप्रियता की सर्वोच्च ऊंचाई पर थे, तब वे आंदोलन में कूदे और अंत तक सक्रिय रहे। भाजपा में वे तब शामिल हुए जब पार्टी विपक्ष में थी, सत्ता में नहीं। वह अकेले ऐसे अभिनेता-नेता हैं जो भीड़ को वोट में बदलने की क्षमता रखते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें दो बार राज्यसभा में भेजा गया और अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बने। पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार सीधा चुनाव लड़ वे पटना से भारी बहुमत से विजयी हुए।
लेकिन दत्त और सिन्हा को छोड़ दें तब रामगोपाल यादव की बातों को चुनौती नहीं दी जा सकती। भारतीय संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए क्या यह जरूरी नहीं कि सभी राजनीतिक दल अभिनेता, अभिनेत्रियों व खिलाडिय़ों की लोकप्रियता को संसद में सिर्फ संख्या बल बढ़ाने के उद्देश्य से न भंजाएं। पात्रता सिर्फ योग्यता हो। पर्दे और खेल के मैदान की लोकप्रियता नहीं।

2 comments:

Suman said...

nice

Bhavesh (भावेश ) said...

अफ़सोस, आज देश की राजनीती में काबिलियित केवल इस बात की रह गई है की कौन कितनी भीड़ जुटा सकता है, किस जाती के वोट बैंक अपने पाले में ला सकता है. फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की वो व्यक्ति गुंडा हो, मवाली हो, ठग हो, अभिनेता हो या खिलाडी हो