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Saturday, January 16, 2010

अर्थलाभ, राष्ट्राभिमान, स्वाभिमान?

आस्टे्रलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों से क्रोधित शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे यह कहते हैं कि देशवासियों में, खासकर क्रिकेट खिलाडिय़ों में, स्वाभिमान और राष्ट्राभिमान बिल्कुल नहीं है, तब इस पर चिंतन जरूरी है। वैसे उनका 'आदेश' कि आस्टे्रलिया क्रिकेट टीम को मुंबई में खेलने से प्रतिबंधित कर दिया है, उनके पुराने तानाशाही रवैये को रेखांकित कर गया। एक बार फिर ठाकरे ने यह जताने की कोशिश की है कि कोई माने न माने मुंबई उनकी जागीर है। इसके पूर्व पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के खिलाफ इसी तरह का आदेश जारी कर ठाकरे पाकिस्तान को मुंबई में खेलने से रोकने में सफल हो चुके हैं ।
स्वाभिमान-राष्ट्राभिमान की विवेचना के पूर्व ठाकरे के आदेश पर गौर कर लिया जाए। बाल ठाकरे को इस तरह का आदेश देने का अधिकार कहां से मिल गया? क्या मुंबई में बाल ठाकरे का समानांतर शासन चल रहा है? उनके ऐसे आदेशों को शासन की ओर से चुनौती क्यों नहीं मिलती? और सवाल यह भी कि क्या बाल ठाकरे से अलग कोई अन्य ऐसा आदेश जारी करे तो उसे भी ठाकरे की तरह अनदेखा कर दिया जाएगा? शासन की ओर से चाहे कोई भी सफाई दी जाए, यह स्पष्ट है कि ठाकरे के ऐसे आदेशों को चूंकि सरकार की ओर से चुनौती नहीं मिलती, यह मान लिया गया है कि मुंबई में बाल ठाकरे कानून से ऊपर हैं और उनकी समानांतर सरकार चलती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक भारत के लिए और निर्वाचित महाराष्ट्र सरकार के लिए शर्मनाक है। एक संविधानेत्तर सत्ता की उदय को सरकार बर्दाश्त कैसे कर रही है? यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए अत्यंत ही खतरनाक है। अगर राज्य में कोई सरकार है तब उसे ऐसी प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना ही होगा। अन्यथा, भविष्य में शायद मुंबई अराजकता का एक ऐसा उदाहरण पेश करेगी जिससे पूरे देश में महाराष्ट्र को शर्मसार होना पड़ेगा । अभी भी वक्त है राज्य सरकार पहल करें और मुंबईवासियों को यह विश्वास दिलाए कि वहां कानून का शासन है और आगे भी रहेगा। किसी ठाकरे का शासन नहीं।
अब ठाकरे की दूसरी बात पर । क्या सचमुच हममें स्वाभिमान और राष्ट्राभिमान शेष नहीं है। ठाकरे ने यह मुद्दा उठाया है आस्टे्रलिया में भारतीयों पर हो रहे हमलों के संदर्भ में। उन्हें यह बर्दाश्त नहीं कि जिस आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले हो रहे हैं, उनकी हत्याएं हो रही हैं, उस आस्टे्रलिया के क्रिकेट खिलाडिय़ों का भारत में स्वागत हो- उन्हें भारत की जमीन पर खेलने की अनुमति दी जाए।
दरअसल, इस पर भारत सरकार को पहल करनी चाहिए। आस्टे्रलिया में भारतीयों की हो रही हत्याओं से पूरा देश आक्रोशित है। कोई आश्चर्य नहीं कि आस्टे्रलियाई खिलाडिय़ों को देख भारतीय आक्रोश फूट पड़े और कोई अनहोनी हो जाए। इतने तनावपूर्ण वातावरण में आस्ट्रेलिया को भारत आने से मना कर देना ही बेहतर होगा । भारत में सक्रिय आतंकवादी भी इस तनाव का लाभ उठाने की कोशिश कर सकते हैं। तब भारत सरकार क्या जवाब देगी? ध्यान रहे कुछ देशों में आतंकवादी हमलों के बाद स्वयं आस्टे्रलिया की टीम उन देशों में जाकर खेलने से मना कर चुकी है। यहां हम ठाकरे के साथ हैं। ठाकरे ने बिल्कुल सही ही अमिताभ बच्चन का उदाहरण दिया है । बच्चन ऐसे हमलों के विरोध में आस्ट्रेलिया में मिलने वाले एक प्रतिष्ठित सम्मान को ठुकरा चुके हैं। अगर सरकार अपनी ओर से कोई कदम नहीं उठाती तब क्या हमारे खिलाड़ी अमिताभ बच्चन की राह पर चलते हुए आस्टे्रलिया के खिलाफ खेलने से इंकार करने को तैयार हैं? शायद ठाकरे यही चाहते हैं। लेकिन अर्थलाभ को प्राथमिकता देने वाले खिलाडिय़ों से ऐसी अपेक्षा की जाए?

1 comment:

पी.सी.गोदियाल said...

हा-हा, इन ठाकरे साहब को कौन बताये की भैया , ऑस्ट्रेलिया पर बेशर्मी से उंगली उठाने से पहले थोड़ा अपने गिरेवान में भी झाँक लिया होता ! अगर तुम अपने ही देश वासियों के साथ भेदभाव कर सकते हो ! राष्ट्र भाषा के साथ भेदभाव कर सकते हो, तो ऑस्ट्रेलिया तो फिर भी दूसरे देश से आये प्राणियों के साथ ऐसा कर रहा है ! बस इन ठाकरे खान्दानियों को तो सिर्फ सुर्खिया बटोरने से मतलब है !