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Tuesday, December 8, 2009

कौन बनाएगा मुस्लिम को प्रधानमंत्री?

राहुल गांधी कह रहे हैं कि भारत में योग्यता के आधार पर कोई मुस्लिम प्रधानमंत्री बन सकता है। वे यह भी कह रहे हैं कि महात्मा गांधी उनके राजनीतिक आदर्श हैं। वे उनके अनुयायी हैं। चूंकि, इन दिनों राहुल गांधी के शब्द पार्टी और सरकार के शब्द माने जाते हैं, उन्हें गंभीरता से लिया जाएगा। शंका सिर्फ यह कि वे ऐसा कहीं अति-उत्साह में तो नहीं कह रहे हैं। इसका जवाब तो भविष्य में मिलेगा, फिलहाल बहस का मुद्दा यह कि क्या सचमुच योग्यता के आधार पर कभी कोई मुस्लिम प्रधानमंत्री बन सकेगा? महात्मा गांधी को अपना राजनीतिक आदर्श घोषित करने वाले राहुल गांधी से यह भी पूछा जाएगा कि ब्रिटिश शासन से मुक्ति के बाद महात्मा गांधी की पसंद सर्वाधिक सक्षम, सुपात्र मुस्लिम नेता मोहम्मद अली जिन्ना प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन पाए? इतिहास गवाह है कि महात्मा गांधी चाहते थे कि जिन्ना प्रधानमंत्री बनें। क्या यह बताने की जरूरत है कि अगर गांधी की इच्छानुसार जिन्ना को प्रधानमंत्री बना दिया जाता, तब न तो देश का बंटवारा होता और न ही लगभग 10 लाख हिंदू-मुस्लिमों का सांप्रदायिक दंगों में कत्ल-ए-आम होता, लेकिन तब कांग्रेस के पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित अन्य हिंदू नेता जिन्ना के नाम पर तैयार नहीं हुए थे। उन्हें देश का बंटवारा मंजूर था, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर मोहम्मद अली जिन्ना मंजूर नहीं थे। क्या राहुल गांधी को यह पता है कि देश विभाजन का फैसला कर लेने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था,''हम सिर कटाकर सिरदर्द से छुटकारा पा रहे हैं।

'' कौन था वह 'सिरदर्द।' बता दूं कि नेहरू के लिए वह सिरदर्द और कोई नहीं, जिन्ना ही थे। नतीजतन देश का टुकड़ा हुआ, हिंदू-मुसलमानों ने एक-दूसरे की गर्दनें काटीं। बंटवारे के बाद अवश्य नेहरू गांधी की पसंद बने। लेकिन, तब भी बहुमत की राय को ठेंगा दिखाते हुए, लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ छल किया गया था। युवा राहुल गांधी में अनेक संभावनाएं मौजूद हैं। देश के हर गली-कूचों में, हर वर्ग, हर संप्रदाय के बीच पहुंचकर उनकी सुध लेने वाले राहुल गांधी में नि:संदेह देश का भविष्य निहित है, ऐसे में जरूरी यह है कि वे इतिहास के पन्नों को पलटकर गांधी-नेहरू की गलतियों को रद्दी की टोकरी में फेंक दें, उनका अनुसरण करने की भूल न करें। भारत देश हमेशा लोकतांत्रिक देश रहेगा। राहुल यह न भूलें कि लोकतंत्र में किसी एक व्यक्ति की इच्छा को नहीं, 'लोक'

की इच्छा को वरीयता दी जाती है। एक व्यक्ति की इच्छा राज-तंत्र का आग्रही होता है, लोकतंत्र का नहीं। कांग्रेस का नेतृत्व जब वे कर रहे हैं, तब इसकी विवादित संस्कृति का चोला फेंक दें, इसके लिए जरूरी है कि वे चाटुकारों से दूर रहें, स्वविवेक का इस्तेमाल करें। ये चाटुकार हमेशा उन्हें भ्रमित करते रहेंगे। उत्तरप्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने जब यह कहा था कि 1992 में अगर नेहरू-गांधी परिवार का प्रधानमंत्री होता तब अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद का ढांचा नहीं गिरता। तो क्या पूरी कांग्रेस पार्टी में सिर्फ नेहरू-गांधी ही धर्म-निरपेक्ष हैं? संदेश तो यही गया था। राहुल गांधी तब यह भूल गए थे कि वे घोर सांप्रदायिक वक्तव्य दे रहे हैं। निश्चय ही चाटुकारों ने उन्हें ऐसा समझाया होगा। दूर रहें इनसे वे। ये तत्व कभी भी उन्हें गड्ढे में धकेल देंगे या आग में झोंक देंगे। कांग्रेस पार्टी को आज भी देश में, स्वतंत्रता आंदोलन के पाश्र्व के कारण, अभिभावक दल माना जाता है। ऐसे में यह अपेक्षा अनुचित कदापि नहीं कि एक अभिभावक दल का एक अभिभावक सहयोगियों से विचार-विमर्श तो करे लेकिन निर्णय स्वविवेक से ले।

1 comment:

मिहिरभोज said...

नेहरू और हिंदु..... लगता है आपका जनरल नालेज काफी कमजोर है.....