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Wednesday, December 30, 2009

अपेक्षा एक स्थिर झारखंड की!

आज जब शिबू सोरेन तीसरी बार इतिहास रचते हुए झारखंड राज्य की कमान संभाल रहे हैं तब व्यक्त दो शंकाएं गौरतलब हैं। पहली कि सोरेन को भारतीय जनता पार्टी ने समर्थन क्यों दिया? दूसरी यह कि क्या यह गठबंधन स्थायी सरकार व सुशासन दे पाएगा?
जवाब पहले सवाल का, पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद से ही झारखंड राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार होता रहा है। सभी ने षडयंत्र रच खनिज व वन संपदा में अद्वितीय इस प्रदेश को लूटा। मुझे याद है, झारखंड आंदोलन का वह काल जब आंदोलनकारी नेता गर्व के साथ दलील दिया करते थे कि राज्य बनने पर झारखंड अपने संसाधनों से देश का सर्वाधिक समृद्ध राज्य बन जाएगा। उस दावे के आधार मजबूत थे लेकिन झारखंड का दुर्भाग्य कि जिन हाथों में नेतृत्व गया उनकी प्राथमिकता लूट की रही, विकास और सुशासन को हाशिए पर रख दिया गया। पिछले छह मुख्यमंत्री चाहे जितना भी दावा कर लें, इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता है कि किसी ने भी झारखंड में विकास के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए। कारण चाहे जो भी हो राजनीतिक अस्थिरता की दुहाई देकर वे अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
झारखंड के उपरोक्त सच के आलोक में खंडित जनादेश ने एक बार फिर खतरे की घंटी बजा दी। शिबू सोरेन अपने डेढ़ दर्जन विधायकों के साथ मुख्यमंत्री पद के दावेदार बने। कांग्रेस व उसकी सहयोगी बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाले झारखंड विकास मोर्चा ने सोरेन का साथ देने से इंकार किया तो अपने स्वार्थवश कांग्रेस नेतृत्व पहले से ही सोरेन के खिलाफ था। कारण स्पष्ट है, दोहराने की जरूरत नहीं। बाबूलाल मरांडी आदिवासियों के बीच सोरेन के विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे हैं, ऐसे में वे सोरेन का साथ कैसे देते? इसके पूर्व मधु कोड़ा की सरकार और फिर राष्ट्रपति शासन से त्रस्त झारखंड ऐसा कोई खतरा लेने को तैयार नहीं था। भाजपा नेतृत्व ने प्रदेश हित में कड़ा फैसला करते हुए सोरेन को समर्थन दे दिया। 82 सदस्यीय विधानसभा में आजसू के 5 विधायकों के साथ भाजपा, झामुमो के 44 विधायकों का बहुमत राज्य को स्थिर सरकार देने में सक्षम है। भाजपा पर यह आरोप कि उसने सिर्फ सत्ता के लिए अवसरवादी निर्णय लिया है, तर्क संगत नहीं। अगर भाजपा समर्थन नहीं देती तब कि स्थिति की कल्पना कीजिए। प्रदेश राष्ट्रपति शासन के अधीन होता और पुन: चुनाव होते। निश्चय ही ऐसी अवस्था प्रदेश के हित में नहीं होती। मतदाता के साथ छल भी होता या इस बात की भी कोई गारंटी नहीं थी कि पुनर्मतदान पश्चात किसी एक दल को बहुमत मिल ही जाता। भाजपा ने जोखिम उठाया, यह ठीक है किन्तु प्रयोग के तौर पर ही सही विकास के नारे के साथ राजनीतिक स्थिरता प्रदान करने की पहल की।
जहां तक सरकार के स्थायित्व का सवाल है यह तो तय है कि गठबंधन के तीनों घटकों में समय-समय पर मनमुटाव, संघर्ष, विवाद होंगे, खींचतान भी होगी, आरोप-प्रत्यारोप के बावजूद वर्तमान सरकार दीर्घायु होगी, अल्पायु नहीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा का नेतृत्व अर्थात शिबू सोरेन कभी डगमगाए भी तो उसे संतुलित करने के लिए भाजपा और आजसू तट पर मिलेंगे। झारखंड की त्रासदी देखते हुए ये तीनों अस्थिरता की डगर पर चलने की हिम्मत नहीं कर सकते। मतदाता के विश्वास से अब जो भी खिलवाड़ करेगा। उसे फिर कोई पनाह नहीं देगा। चूंकि अगले वर्ष पड़ोसी बिहार में चुनाव होना है, भाजपा अपने नए अध्यक्ष नितिन गडकरी के घोष वाक्य 'विकास के लिए राजनीति' के मार्ग पर चलेगी और तब झारखंड मुक्ति मोर्चा और आजसू भी स्वयं को एक दूसरे से अधिक विकासोन्मुख साबित करने की होड़ शुरु कर देंगे। ऐसी स्थिति झारखंड के लिए निश्चय ही हितकारी साबित होगी। सत्ता के लालच के बावजूद अगले चुनाव को ध्यान में रखते हुए शायद ही इन तीनों में से कोई मतदाता के साथ विश्वासघात से इंकार करे। राज्य विकास की ओर अग्रसर होगा तब शिबू सोरेन का कथित स्याह अतीत भी स्वच्छ हो जाएगा।

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

44 में से 31 अपराधिक पृष्ठभूमि वाले विधायको वाली सरकार से स्थिरता की अपेक्षा तो की ही जानी चाहिये
:)

Truth or Dare said...

aaj jharkhand ki yeh halat hain kal vidharbha ki halat isse kuch alag nahi hogi,jo aap alag rajya ki mang kar rahe hain... kya haasil karnge vidharbha ke log?