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Wednesday, December 9, 2009

कोई हवा न दे सांप्रदायिक चिनगारी को!

लगता है कहीं कोई बड़ी साजिश रची जा रही है या फिर अनजाने में सत्ता पक्ष साजिश का एक किरदार बनता जा रहा है। अगर ये दोनों आशंकाएं गलत हैं तब शायद 'नियति' देश के साथ बड़ा खिलवाड़ करने जा रही है। मेरे इस आकलन का आधार अयोध्या कांड पर लिबरहान आयोग का निष्कर्ष, उसकी सिफारिश, संसद में बहस, ध्वनित 'सांप्रदायिक ताल' पर है। हर दृष्टि से रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक लिबरहान आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार कर भारत सरकार ने बड़ी भूल की है। आयोग के निष्कर्ष का समर्थन करते हुए केंद्र सरकार की ओर से गृहमंत्री पी. चिदम्बरम के इस बयान पर किसी को आश्चर्य नहीं होगा कि संघ परिवार ने विवादित ढांचे को ढहाया। लोग चकित इस बात पर हुए कि चिदम्बरम ने कांग्रेस सरकार का तो बचाव किया किंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव को गलत राजनीतिक फैसला लेने का अपराधी बना डाला। परोक्ष में उन्होंने राहुल गांधी के उस वक्तव्य की पुष्टि कर दी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बाबरी मस्जिद का ढांचा नहीं गिरता, अगर उस समय नेहरू परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री होता। क्या यह मात्र संयोग है कि जब संसद में आयोग की रिपोर्ट पर बहस चल रही थी, राहुल गांधी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित कर रहे थे। उन्हें बता रहे थे कि कोई सक्षम मुस्लिम भी देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। इस पर मैं पहले टिप्पणी कर चुका हूं। आज इतना जोडऩा चाहूंगा कि राहुल ने अनजाने में ही सही सांप्रदायिक आधार पर समाज को बांटने का काम किया है। सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को डॉ. जाकिर हुसैन, फखरूद्दीन अली अहमद और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सुशोभित कर चुके हैं। डॉ. कलाम तो उस भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार थे, जिसे कांग्रेस बार-बार सांप्रदायिक निरूपित करती रहती है। भला इससे कौन इनकार करेगा कि कोई भी सक्षम व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है? विभाजन के समय जिन्ना प्रसंग से आगे बढ़ते हुए लोग-बाग यह जानना चाहेंगे कि पिछले 60 सालों में कांग्रेस को प्रधानमंत्री पद के योग्य कोई मुस्लिम व्यक्ति कैसे नहीं मिला। क्या आज तक सभी मुस्लिम नेता सांसद कांग्रेस की नजरों में अक्षम रहे हैं। मैंने पहले कहा है कि या तो कोई साजिश रची जा रही है या फिर नियति खिलवाड़ कर रही है। संसद में बहस के दौरान भारतीय जनता पार्टी की सुषमा स्वराज ने यह कह ही दिया कि यदि आयोग की रिपोर्ट बहस का मुद्दा बना रहा तो इससे देश में दंगा भड़कने का खतरा बना रहेगा। चूंकि, अब इस बात में कोई संदेह नहीं कि लिबरहान आयोग की रिपोर्ट किसी खास मकसद से 17 वर्षों के बाद तब सार्वजनिक हुई जब देश की नई पीढ़ी अयोध्या कांड को भूल चुकी थी। अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम मिल-जुलकर हंसी-खुशी रह रहे हैं। रिपोर्ट सार्वजनिक होने का तरीका भी रहस्यमय रहा। गोपनीय रिपोर्ट संसद में पेश हो इसके पहले ही एक अखबार ने उसे प्रकाशित कर डाला। रिपोर्ट के 'लीक' होने पर सरकार की ओर से कोई सफाई नहीं आई। तथ्य और कानूनी त्रुटियों से भरपूर लिबरहान आयोग की रिपोर्ट निश्चय ही एक राजनीतिक दस्तावेज है। इस सचाई के बावजूद आग्रह है सत्ता पक्ष से और आग्रह है विपक्ष से कि वे अपनी ओर से किसी साजिश के भागीदार न बनें। अगर नियति कुछ करवाना चाहती है तब इसका मुकाबला दोनों मिलकर करें। राजनीतिक लाभ के लिए सांप्रदायिकता की चिनगारी को हवा न दें।

3 comments:

गिरिजेश राव said...

सर जी , आप पैरा बना कर क्यों नहीं लिखते ?

परमजीत बाली said...

हवा देने वाले लोग ही चूल्हे पर अपनी रोटीया सेंकते रहते हैं.....अब क्या करे..... जिसकी लाठी उस की भैंस।

Truth or Dare said...

JI HAN AAPNE THICK KAHA,PARTY KHUDKHUSI KARNAA CHAHTI HAIN