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Saturday, December 26, 2009

छेड़छाड़ ही नहीं, हत्या के अपराधी हैं 'राठौर'!

रुचिका तो अब वापस नहीं आएगी, किंतु उस मासूम की 'हत्या' में शामिल खूनी हाथों के धारक समाज में मुस्कुराते हुए कैसे विचरण कर रहे हैं? शायद बहुत कड़वा लगेे, अरुचिकर भी निरुपित किया जा सकता है, बावजूद इसके मैं विवश हूं इस टिप्पणी के लिए कि यह अवस्था शासन और समाज दोनों को 'नपुंसक' घोषित कर रहा है। रुचिका ने भले ही जहर पीकर आत्महत्या की हो, तथापि सभी समझदार इसे 'हत्या' ही मानेंगे। उसे मजबूर किया गया था अपने प्राण देने के लिए। फिर इसे हत्या की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाए? दोषी हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी.एस. राठौर को मिली सजा अदालत के लिए भी सजा के आग्रही है। इस पर लचर न्याय प्रणाली की चर्चा मैं पहले कर चुका हूं। आज अगर इस विषय को उठा रहा हूँ तो सिर्फ इसलिए कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने जिम्मेदारी से बचते हुए राजनीतिक खेल खेलने की कोशिश की है। न्यायपालिका के बाद विधायिका का उजागर यह चरित्र चीख-चीख कर सड़ी-गली व्यवस्था को पूरी तरह से बदल डालने की मांग कर रहा है। चौटाला का यह कथन कि उन्होंने राठौर को नहीं बचाया था, गलत है। झूठ बोल रहे हैं चौटाला । दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं इस बात को प्रमाणित करने के लिए कि चौटाला और हरियाणा सरकार के तंत्र ने रूचिका को आत्महत्या करने और उसके परिवार को भूमिगत होने के लिए मजबूर किया था। पूरे मामले की फिर से जांच किए जाने का निर्णय हो चुका है, लेकिन जांच तो पहले भी हुई थी। सरकारी तंत्र और जांच एजेंसियां वही हैं, जो पहले थीं। चेहरे भले ही बदल गए हों, चरित्र नहीं । यही वह चरित्र है, जिसने अनेक रूचिकाओं को प्रकाश में नहीं आने दिया। कोई स्वतंत्र, निष्पक्ष एजेंसी जांच कर ले, पता चलेगा कि रूचिका की तरह घटित सैकड़ों हजारों मामलों के कब्र बना डाल गए। यहां मीडिया की विफलता भी परिलक्षित है। हाई-प्रोफाईल मामलों पर तो कलमें चलती हैं, कैमरे उन्हें कैद कर लेते हैं किंतु समाज में प्रतिदिन राठौर सदृश हवस की शिकार होते गरीब, शोषित वर्ग की कोई सुध नहीं लेता। चूंकि वे बिकाऊ नहीं होते, मीडिया नजरें चुरा लेता है। चुनौती है उन्हें कि वे सच बोलने, सच लिखने और सच दिखाने का साहस दिखाएं। रूचिका की आत्मा अदालत से बाहर निकलते राठौर की मुस्कुराहट पर सौ-सौ आंसू बहा रही होगी। उसे शांति तभी मिलेगी जब राठौर को छेड़-छाड़ के लिए, आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का दोषी करार दे अदालत कड़ी सजा दे । नए सिरे से जांच करने वाली एजेंसी पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।

2 comments:

S B Tamare said...

सुन्दर विचार ,

रूचिका को न्याय तो मिलना ही चाहिए था फिर भी देर आये पर दुरूस्त आये / मुहीम तो छिड़ी भले ही देर से / हम आपके साथ है /

कमल शर्मा said...

रुचिका को न्‍याय मिलना चाहिए यह सही है लेकिन सबसे पहले सारे दोषियों को सजा मिलनी चाहिए जिन्‍होंने प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रुप से राठौर का साथ दिया। राठौर के जो भी विजुअल दिख रहे हैं उसमें यह नाली का कीड़ा बेशर्म होकर हंस रहा है। इसे जनता को ही भीड़ जुटाकर जूते मारने चाहिए।