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Monday, December 21, 2009

एक न्यायाधीश 'दलित' कैसे हो सकता है!

जातीयता के जहर में बुझा यह तीर इस बार सीधे राजनीति के सीने को भेद गया है। साथ ही घोर स्वार्थी राजनीति का बदरंग स्याह चेहरा भी एक बार फिर सामाजिक सौहाद्र्र को मुंह चिढ़ा रहा है। मैं बार-बार इस पीड़ा को उद्घृत करता रहा हूं कि सांप्रदायिकता से कहीं अधिक खतरनाक जातीयता है। यह एक ऐसा कैंसर है जो धीरे-धीरे लाइलाज की अवस्था में पहुंचने लगा है। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती खफा हैं कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पी.डी. दिनकरण के खिलाफ संसद में महाभियोग इसलिए लाया गया क्योंकि वे एक दलित हैं। शर्म तो खैर मायावती को आएगी नहीं, लेकिन फिर भी देश चाहेगा कि वह बेशर्मों की तरह ही सही ऐसी घोषणा कर दें कि वे और उनकी पार्टी बसपा पूर्णत: जातीय आधारित पार्टी है, देश का सामाजिक ताना-बाना चाहे छिन्न-भिन्न हो जाए, वे जातीयता और सिर्फ जातीयता करेंगी। शायद उन्हें इस बात का एहसास नहीं कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे न्याय मंदिर के एक प्रहरी दिनकरण को जातीयता के धागे में बांध उन्होंने देश की न्याय व्यवस्था को लांछित करने की कोशिश की है। न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति किसी जाति विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करता। न वह दलित होता है और न उच्चवर्गीय। न्याय की कुर्सी पर बैठा हुआ समानता व योग्यता के आधार पर न्याय करता है। उसके आदेश को ईश्वर के फैसले के रूप में मान्यता मिलती है। यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है कि मायावती के साथ-साथ छह दर्जन से अधिक सांसद भी न्यायाधीश दिनकरण के खिलाफ कार्रवाई को जातीय रंग दे रहे हैं। धिक्कार है उन पर। उन्हें जनप्रतिनिधि कहलाने का अधिकार नहीं। मामला महाभियोग के रूप में संसद में है। अपेक्षा तो यह थी कि भ्रष्टाचार का आरोप लगते ही माननीय न्यायाधीश इस्तीफा दे देंगे। लेकिन इस्तीफा तो दूर महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद न्यायिक कार्यों से वंचित दिनकरण प्रशासनिक कार्य निष्पादन में संलग्र हैं। उनके एक सहयोगी न्यायाधीश डी.वी. शैलेंद्र कुमार ने बिल्कुल ठीक ही इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है। देश की जनता तो स्तब्ध इस बात को लेकर है कि एक बार फिर संविधान में महाभियोग के प्रावधान का मजाक बनने जा रहा है। इसके पूर्व न्यायाधीश रामास्वामी के मामले में दलीय प्रतिबद्धता के आधार पर तब सत्ता पक्ष ने महाभियोग प्रस्ताव पर मतदान में अनुपस्थित रह उनकी मदद कर दी थी। संसद उन्हें दंडित नहीं कर पाया था। जब दिनकरण के खिलाफ महाभियोग का नोटिस दिया गया था, तभी मैंने आशंका प्रकट की थी कि इस मामले का भी हश्र शायद रामास्वामी सरीखा ही हो। लेकिन इस बार इसका खतरनाक पहलू जातीय सर्प का फन काढऩा है। संसद भवन की दीवारें शायद गवाह बनेंगी, जातीय आधार पर संसद में विभाजन का। महाभियोग प्रस्ताव आया है, तब सांसदगण इसका निपटारा योग्यता के आधार पर होने दें। जातीयता के बदबूदार चादर को दिनकरण का सुरक्षा कवच न बनने दें। अन्यथा देश का लोकतंत्र लांछित होगा। जातीयता और सांप्रदायिकता ऐसी प्रवृत्ति है जिस पर आरंभ में अगर अंकुश न लगा तब वह दावानल की तरह विस्तार ले लेती है। लोग अभी भूले नहीं होंगे क्रिकेट खिलाड़ी अजहरुद्दीन के मामले को। जब 'मैच फिक्सिंग' के आरोप में दंडित कर उन पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया गया था, तब प्रतिक्रिया स्वरूप उनकी टिप्पणी क्या थी? मोहम्मद अजहरुद्दीन ने तब सांप्रदायिकता का सहारा लेते हुए अपने बचाव में कहा था- चूंकि वे एक मुसलमान हैं, उन्हें फंसाया जा रहा है। विवेकशील भारत में तब उनके विचार का खरीदार कोई सामने नहीं आया था। लेकिन वही अजहरुद्दीन आज लोकसभा में सत्तारूढ़ कांग्रेस के एक सम्माननीय सदस्य हैं। यह बहस का एक स्वतंत्र विषय है किन्तु कभी न कभी कांग्रेस नेतृत्व से यह अवश्य पूछा जाएगा कि मायावती की जातीय सोच की तरह सांप्रदायिक सोच वाले अजहरुद्दीन को धर्मनिरपेक्षता का पहरूआ बताने वाली कांग्रेस ने अपने आगोश में लिया तो कैसे? प्रसंगवश, न्यायाधीश दिनकरण के मामले में मायावती की सोच का साथ कुछ कांग्रेसी सांसद भी दे रहे हैं।

2 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत ही सुन्दर और ज्वलंत मुद्दा उठाया है आपने ! हमारे देश की घृणित राजनीति का यह भी एक भयावह चेहरा है, जो आपने पापो को दबाने के लिए दलित कार्ड खेल रहा है ! और किसी भी हद तक जा सकता है !

SP Dubey said...

माननीय,
श्री एस एन विनोद ज़ी, आप के सभी लेख हम ध्यान से पढ्ते है, समसामयिक मुद्दो और उनके चीरफ़ाड को पढ कर आप की निश्पक्षता प्रसंशनीय है तथा विश्लेष्ण बहुत ही सटीक है, क्या मात्र इतने से जो परिणाम हम चाहते है वह आजयेगा कुछ और भी करना होगा परिणाम पाने के लिए गंभीरतापुर्वक बिचार करिएगा ।