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Saturday, March 27, 2010

स्वीकार्य नहीं लाचार न्यायपालिका!

नहीं! इसे स्वीकार करना सहज नहीं। देश का सर्वोच्च न्यायालय लाचार कैसे हो सकता है! संसदीय प्रणाली, संविधान और कानूनों में मौजूद अनेक छिद्रों के कारण उत्पन्न भ्रष्टाचार के दानव पर तब अंकुश कौन लगाएगा? विधायिका को संचालित करने वाले राजनेता और कार्यपालिका के वाहक अधिकारियों ने ही तो इस दानव को भोजन-पानी मुहैय्या कराया है। अब अगर न्यायपालिका की ओर से लाचारी के स्वर उभरते हैं तब देश को कौन बचा पाएगा! लोकतंत्र के इन तीन पायों को सुरक्षित-मजबूत रखने की जिम्मेदारी कोई लेगा? इन तीनों के अलावा चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता प्राप्त 'प्रेस', जिसने मीडिया का शक्ल अख्तियार कर लिया है, से अपेक्षा तो है किंतु कुछ अपवाद छोड़ इसके सदस्य भी भोंपू बन रेंगते नजर आने लगे हैं। सुविधाभोगी बन जाने के कारण ये भ्रष्टों के साथ गलबहियां नहीं कर रहे हैं? तो क्या देश समर्पण की मुद्रा में तटस्थ अपने विनाश की प्रतीक्षा करे? नहीं, यह स्थिति भी स्वीकार्य नहीं। भारतीय न्यायपालिका तुलनात्मक दृष्टि से अभी भी स्वतंत्र है, मजबूत है। उनकी ओर से यदा-कदा निकलने वाले वेदना के स्वर का संज्ञान पूरा देश ले। मीडिया में मौजूद अपवादों को सम्मान दिया जाए, मजबूत किया जाए। यह मान कर चला जाए कि अभी भी विलंब नहीं हुआ है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग के खिलाफ जांच का निर्देश दिए जाने से इनकार के कारण ऐसे सवाल खड़े हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ का आदेश न्याय संगत हो सकता है, किंतु सहज स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय का यह कहना भ्रमित करने वाला है कि याचिकाकर्ता के पास अगर मुख्यमंत्री के खिलाफ पर्याप्त कारण हैं तब वे जांच एजेंसी से संपर्क करें। न्यायालय का यह तर्क कि अगर वह मुख्यमंत्री के खिलाफ मामला चलाने का निर्देश देती है, तब वह गंभीर पूर्वाग्रह का कारण बन सकता है, तर्कसंगत नहीं है। इसके पूर्व अनेक मामलों में विभिन्न उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय योग्यता के आधार पर मामले चलाने के निर्देश दे चुके हैं। नेताओं के खिलाफ भी, संस्थाओं के खिलाफ भी। अदालतें जब हस्तक्षेप कर ऐसे जांच के आदेश देती हैं, तब प्रभावित पक्ष की ओर से पूर्वाग्रह की बातें पहले भी की जाती रहीं हैं। यह तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। पूर्वाग्रह की आशंका को आधार बना अदालतें अगर अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटती रहीं तब लोग-बाग किस दरवाजे पर दस्तक देंगे। सिक्किम के मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं। उसी प्रकार जिस प्रकार बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, और महाराष्ट्र के ए. आर. अंतुले, हिमाचल के सुखराम, झारखंड के शिबू सोरेन, गुजरात के नरेंद्र मोदी, तामिलनाडू की जयललिता व रामविलास पासवान के खिलाफ लगे थे। इन सभी के खिलाफ जांच के निर्देश विभिन्न अदालतों ने जारी किए थे। तब तो अदालतों ने पूर्वाग्रह के कोण पर विचार नहीं किए थे। आज सिक्किम के मुख्यमंत्री के मामले में अदालत पीछे हट रही है, तब उनके इस कदम पर सवालिया निशान तो लगेंगे ही। अदालतों की तटस्थता, भ्रष्टाचार के दानव को तांडव करने में मददगार साबित होगी। अदालतों की लाचारी खतरनाक रूप से देश की लाचारी बन जाएगी। और तब नैतिकता, ईमानदारी, मूल्य-सिध्दांत के साथ-साथ लोकतंत्र, संविधान, कानून सभी मटियामेट हो जाएंगे। घोर अराजकता के बीच उदित भ्रष्टाचार खुलकर अट्टाहासें लगाता दिखेगा। संसदीय प्रणाली में अहम बल्कि निर्णायक भूमिका में मौजूद राजनीतिकों के लिए चरित्र अब कोई मायने नहीं रखता। फिर भ्रष्टाचार तो पनपेगा ही। बल्कि अब तो उसने विशाल वृक्ष का रूप ले लिया है। इनपर अंकुश लगाने तथा दंडित करने वाली संस्था न्यायपालिका ने स्वयं को असहाय बताकर भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू की इस टिप्पणी पर गौर करें-'हिंदुस्तान में सब लोग भ्रष्ट हैं। ये भ्रष्टाचार कभी ठीक नहीं हो सकता। मेरा वहम था कि मैं भ्रष्ट लोगों को ठीक कर सकता हंू। अब मैं समझ गया कि भ्रष्ट लोगों को ठीक करने का कोई चारा नहीं हैं।' न्यायमूर्ति काटजू के इन शब्दों में निहित लाचारी खतरनाक है। दु:ख तो इस बात का है कि सिक्किम के मुख्यमंत्री के मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ द्वारा अपनाया गया रुख न्यायमूर्ति काटजू की लाचारी के एक कारण की पुष्टि कर गया।

3 comments:

अजित वडनेरकर said...

कुशल सर्जन की चीरफाड़ है...

सिलाई टांके की गुंजाईश भी छोड़ ही दी आपने। आपकी टैग लाइंस अच्छी लगीं। आज की पत्रकारिता इस किस्म की चीरफाड़ में बैंडेज और कैंची पेट के अंदर ही छोड़नेवाली अकुशल सर्जन बिरादरी की सहोदर लगती है।

उम्मीद है, मुझे बिसराया नहीं होगा।
सादर...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बिल्कुल खुली छूट मिल जायेगी इन भ्रष्ट नेताओं को. एजेंसियों से नाउम्मीद होकर ही तो आदमी कोर्ट के पास पहुंचता है.
बढ़िया...

अरूण साथी said...

par sach yahi hai.