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Monday, March 8, 2010

धर्मावलंबी बनें धर्मांध नहीं!

आस्था के साथ ये कैसे- कैसे घात? नैतिक पतन का ऐसा वीभत्स प्रदर्शन! धर्म और गुरु के नामों की नंगई!धर्म के नाम पर दुकान खोल 'बाबागीरी' करने वालों की एक से बढ़कर एक करतूतें सामने आ रही हैं। कोई अंतराष्ट्रीय सैक्स रैकेट चला रहा है, कोई विश्रामकक्ष में किसी अभिनेत्री के साथ रासलीला में लिप्त है तो कोई जबरिया शादी करने के लिए एक छात्रा का अपहरण करने से बाज नहीं आता। लाखों भक्तों को कथित रूप से धार्मिक उपदेश देने वाले ऐसे बाबाओं के चेहरों से नकाब उतरने के बाद पूरा समाज स्तब्ध है। लेकिन इसमें आश्चर्य की क्या बात? जब समाज धर्मावलंबी की जगह धर्मांध बन जाए तभी तो कुकुरमुत्ते की तरह ऐसे ढोंगी बाबा उदित होते हैं। ऐसा नहीं हैं कि ढोंगी बाबा पहले नहीं हुए। यह तो मीडिया की सतर्कता और आधुनिक तकनीकी है जो इन दिनों ऐसे ढोंगियों की करतूतों को सार्वजनिक कर रही है। पहले ऐसी बातें आई गई हो जाती थीं। चर्चाएं होती थीं, एक सीमित दायरे में। 1977 में इलाहाबाद में महाकुंभ लगा था। कुछ ऐसा योग बना कि मैं लगातार 15 दिनों तक उस कुंभ का साक्षी बना। तब देवराहा बाबा की बड़ी चर्चा थी। प्रयास के झूसी में उनका कैंप लगा था। मैं उन्हीं के कैंप में उनके प्रधान शिष्य के साथ ठहरा था। तब बताया गया था कि करीब 125 साल बाद ऐसेे महाकुंभ का योग बना था। चारों शंकराचार्य सहित देश के प्राय: सभी साधु-संत, साध्वियां वहां कुंभ में पहुँची थीं। माँ अमृतामयी भी थीं। जिस दिन मैं कुंभ पहँुचा था, उसी दिन आपातकाल हटाए जाने और आम चुनाव कराए जाने की घोषणा हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, संजय गांधी और प्राय: सभी छोटे- बड़े नेता कुंभ में आए थे। याद दिला दूँ, इंदिरा गांधी उन दिनों माँ अमृतामयी द्वारा दिया गया रूद्राक्ष की माला धारण करतीं थी। जब कुंभ में इंदिराजी उनसे मिलने गईं, तब अमृतामयी माँ ने उनसे वह माला वापस ले ली। इस घटना की काफी चर्चा उन दिनों पत्र- पत्रिकाओं में हुई थी। इंदिरा गांधी देवराहा बाबा का आशीर्वाद लेने भी पहुंची। बाबा ने उन्हें अनदेखा किया। प्रधान शिष्य के अनुरोध पर अनमने भाव से बाबा ने प्रसाद स्वरूप कोई फल मचान से इंदिराजी की आंचल में डाल दिया था। संजय गांधी ने बाबा से अलग से मिलने के लिए समय मांगा। बिहार के एक मंत्री विलंब रात्रि में, जब बाबा मचान के उपर अपनी कुटिया के अंदर जा चुके थे, उनसे आशीर्वाद लेने पहुँचे। मेरे अनुरोध पर प्रधान शिष्य उन्हें लेकर बाबा के मचान के नीचे पहुॅचे। मंत्रीजी की जिज्ञासा का जवाब बाबा मचान के अंदर से ही दे रहे थे। बातचीत चल ही रही थी कि बीच में ही बाबा ने अंदर से कहा- अच्छा बचवा, अब तुम लोग जाओ, उ चमरा आ रहा है। जब हम बाहर निकले तो देखे कि बाबू जगजीवन राम चले आ रहे हैं। ये उद्हरण मैं आलोच्य संदर्भं में विशेष प्रयोजन से दे रहा हूं। मैं अपना समय व्यतीत करने के लिए एक पंक्ति से प्रतिदिन कुंभ में पधारे साधु- संत, साध्वियों का साक्षात्कार लेने निकल जाता था। शाम को जब वापस कैंप लौटता था, तब बाबा के प्रधान शिष्य मुस्कुराकर पूछते थे कि कितने 'दुकान' घूम कर आए? तब चकित हो उठता था। उससे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ, जब देवराहा बाबा से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई। बाबा ने राजनीति और सिर्फ राजनीति की बातें की, धर्म की नहीं। मन में अनेक शंकाएं उठी जब बाबा के मचान के नीचे बिहार के एक निलंबित वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को देखा था। उक्त अधिकारी अपनी पत्नी की हत्या का आरोपी था। बाद में अदालत ने उसे दोषमुक्त करार दिया। एक अन्य ऐसे वरिष्ठ अधिकारी को देखा था, जो हाथ जोड़कर बाबा से एक व्यवसायी विशेष को मदद किए जाने का आदेश ग्रहण कर रहे थे। उक्त अधिकारी ने उस व्यवसायी को अनुग्रहित किया भी। इन बातों को याद करने का उद्देश्य यह कि ऐसी 'दुकानदारी' (क्षमा करेंगे यह शब्द बाबा के कैंप से ही मुझे मिले थे) कोई नई नहीं।
एक शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का बयान आया है कि ऐसे ढोंगी बाबाओं से सख्ती से निपटा जाए। एक दूसरे शंकराचार्य की टिप्पणी आई है कि कुछ ऐसे शंकराचार्य हैं, जिन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। आरोप- प्रत्यारोप के बीच का सच यह रेखांकित हुआ है कि ढोंगी बाबाओं के दुकान अगर फल-फूल रहे हैं तो धर्मांधता और समाज की निर्बल मानसिकता के कारण। ऐसी स्थिति का भरपूर फायदा ढोंगी बाबाओं ने उठाया है और उठा रहे हैं। ये सिर्फ धन ही नहीं बटोर रहे हैं, महिलाओं के शारीरिक शोषण से आगे बढ़ते हुए वेश्यावृति भी कराने लगे हैं। अगर इसे रोकना है तो पहल समाज करे। कानून तो अपना काम करेगा किंतु उसमें मौजूद छिद्र आरोपियों को संरक्षण प्रदान कर देते हैं। जरूरत है कि समाज आस्थावान हो, धर्मावलंबी हो, किंतु धर्मांध नहीं।

3 comments:

Suman said...

nice

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सार्थक.

Bhavesh (भावेश ) said...

विनोद जी मैं आपके लेख लगातार पढता हूँ और आपकी लेखनी का कायल हूँ. ये अफ़सोस और शर्मनाक सत्य हिन्दू समाज की धर्मान्धता का ही नतीजा है. धर्म को खुद पढने और समझने की बजाये आम जनता कलियुगी मायावी संतो के चक्कर में पड़ी रहती है. राजनीति की तरह धर्म भी अब सेवा न होकर व्यापार हो गया है.