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Monday, October 19, 2009

भाजपा को चाहिए मजबूत नेतृत्व!

आखिर क्या हो गया है पार्टी नेतृत्व को? धर्मांध कहते हैं कि इसे किसी की नजर लग गई है। दिल से जुड़े गंभीर सक्रिय कार्यकर्ता वर्तमान दुरवस्था के लिए पार्टी नेतृत्व को दोषी ठहरा रहे हैं। विभिन्न प्रदेशों में जी-जान से पार्टी को मजबूती प्रदान करने के लिए सक्रिय नेता गुस्से में हैं कि उनके श्रम पर पार्टी नेतृत्व पानी फेर रहा है। इसी कारण अपेक्षानुरूप फल नहीं मिल रहे हैं। बड़े नेता सार्वजनिक रूप से पार्टी की आलोचना करते देखे जा रहे हैं। लगता है उनके धीरज खत्म हो गए हैं। देश पर लगातार छह साल तक शासन करने वाली प्रमुख विपक्षी पार्टी की ऐसी दुखद स्थिति का कारण? यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि देश के अनेक राज्यों में शासन कर रही यह पार्टी बिखरी-बिखरी क्यों दिख रही है। अनुशासन और मूल्य आधारित राजनीति करने का दम भरने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का इस बिंदु पर मुंह छिपाना उनकी कायरता को रेखांकित कर रहा है। जिस पार्टी के नेताओं के शब्द कभी जनांदोलन का कारण बनते थे, उस पार्टी को आज घोर अनुशासनहीनता और मूल्यों से दूर संदिग्ध आचरण का सामना क्यों करना पड़ रहा है? जसवंत सिंह जैसे कद्दावर नेता को बर्खास्त करने वाला पार्टी नेतृत्व वसुंधरा राजे की अनुशासनहीनता और चुनौती के सामने अब तक नतमस्तक क्यों है? निर्देश-आदेश के बावजूद वसुंधरा राजस्थान विधानसभा में नेता (विपक्ष) के पद से इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं। अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, भुवनचंद खंडूरी द्वारा पूछे गए सवालों का माकूल जवाब पार्टी नहीं दे पा रही है। वसुंधरा ने तो पार्टी नेतृत्व को बिलकुल ठेंगा ही दिखा दिया है। पार्टी नेतृत्व लाचार क्यों है? पूर्व घोषित 22 से 29 अक्टूबर होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी का अचानक स्थगित कर दिया जाना क्या पार्टी नेतृत्व का मुद्दों से पलायन नहीं? इसी बैठक में वसुंधरा राजे के खिलाफ कार्रवाई की जाने की बातें कही जा रही थीं। महाराष्ट्र, हरियाणा और अरुणाचल प्रदेश के चुनाव परिणामों की समीक्षा भी होनी थी। कहीं वसुंधरा और संभावित चुनाव परिणामों से पार्टी नेतृत्व घबरा तो नहीं रहा है? अगर ऐसा है तब कमजोर और कायर पार्टी नेतृत्व को तुरंत बदल दिया जाए। राष्ट्र और समाज को समर्पित पार्टी की कमान दुर्बल हाथों में सौंपा नहीं जाना चाहिए। यह मांग समस्त लोकतंत्र प्रेमियों की है। वे चाहते हैं कि पार्टी नेतृत्व अब किसी समर्पित, कर्मठ नेता को सौंपा जाए ताकि देश के लोकतांत्रिक पन्नों में 'राष्ट्रीयता' और 'समर्पण' सुरक्षित रह सके।

3 comments:

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

विनोद जी
अब तो देश को मज़बूती देने से नीचे कुछ भी
नसीहत ठीक नहीं !

नारायण प्रसाद said...

आपके विचारों से सहमत हूँ ।

दुरावस्था ---> दुरवस्था

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi said...

सही है ,पर ऐसा वांछित व्यक्तित्व भाजपा में है ही नही. देश में दो राजनैतिक व्यक्ति हैं जो इस पद के सर्वथा योग्य हैं, परंतु दोनों ही भाजपा के बाहर हैं. संघ परिवार भी उन्हे पसन्द करता है, परंतु अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेकैया नायडू को खतरा लगता है कि यदि यह दोनों व्यक्ति आ गये तो उनका अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा. पिछले एक वर्ष से संघ नेतृत्व इनको भाजपा में लाने का प्रयास कर रहा है किंतु भाजपा का वर्तमान नेतृत्व उन्हे पार्टी में लेना ही नहीं चाहता.

लगता है भाजपा अपने पिछले रूप जनसंघ तक पहुंचने के लिये अभिशप्त है.