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Saturday, October 31, 2009

नहीं चाहिए हमें फिदा हुसैन!

भारत माता को नग्र दिखाने वाला, भगोड़ा चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन, भारत वापसी के लिए अगर बेचैन है तो इसमें न समझने लायक कोई बात नहीं है। देवी-देवताओं सहित स्वयं भारत माता के अश्लील चित्र बना करोड़ों-अरबों में खेलने वाला इस विकृत मस्तिष्क वाले भगोड़े चित्रकार की भारत वापसी के लिए भारत सरकार रास्ता सुगम क्यों कर रही है? देश के लोग यह जानना चाहते हैं। आपत्तिजनक चित्रों के कारण अनेक मामलों में वांछित फिदा हुसैन चकमा देकर पिछले 4 वर्षों से विदेश में रह रहा है। भारत की अदालतें उसे भगोड़ा घोषित कर चुकी हैं। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि उसे पकड़कर अदालतों में हाजिर करने की जगह कानून-व्यवस्था के हमारे संरक्षक उसे लालकालीन स्वागत के साथ वापस भारत लाना चाहते हैं? क्या यह अपने आपमें भारतीय न्याय प्रणाली को चुनौती नहीं है? क्या कर रही हैं हमारी एजेंसियां? फिदा हुसैन कहीं छुपकर नहीं रह रहा है। मीडिया में लगातार खबरें आती रहती हैं कि वह इंग्लैंड और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के देशों के बीच बेखौफ चक्कर काटता रहता है। भारतीय दूतावासों ने भी अपनी आंखें बंद कर रखी हैं। क्यों? भारतीय संस्कृति और हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने वाले इस शख्स के साथ नरमी बरतना दुखद है। जो शख्स भारत के घर-घर में पूज्यनीय सीता को भगवान हनुमान की पूंछ के साथ अश्लील हरकतें करते चित्र बनाए, सीता को नग्न रावण की जांघों पर बैठी दिखाए, देवी पार्वती को एक बैल के साथ रतिक्रिया में लिप्त दिखाए, मां दुर्गा को अपने शेर के साथ संयुक्त रूप से दिखाए, वह शख्स सामान्य हो ही नहीं सकता। कोई विकृत और पागल ही ऐसी कल्पना कर सकता है। भारतीय समाज इसे बर्दाश्त कैसे करे? फिदा हुसैन एक अच्छे चित्रकार हैं किन्तु अच्छी सोच के धारक नहीं। अश्लील चित्रों के लिए हिंदू देवी-देवताओं का पात्र के रूप में चयन क्या उनकी विकृत सोच को नहीं दर्शाता? ऐसा ही है। क्योंकि अपने ऐसे आपत्तिजनक चित्रों के लिए उन्होंने कभी भी मुस्लिम या अन्य धर्म के देवी-देवताओं का चयन नहीं किया। अगर वे विकृत अथवा असंतुलित मस्तिष्क के धारक नहीं हैं तब निश्चय ही वे घोर सांप्रदायिक हैं। अपने चित्रों के माध्यम से वे बहुसंख्यक हिंदू समाज की धार्मिक भावना को आहत करते हैं। दूसरे शब्दों में सांप्रदायिकता को भड़काने का काम कर रहे हैं। क्या यह कानूनन अपराध नहीं? यह एक संगीन अपराध है। फिर ऐसे व्यक्ति के लिए सरकारी स्तर पर उदार सोच क्यों? खबर है कि भारत सरकार उन्हें ससम्मान देश वापस लाना चाहती है। फिदा हुसैन इस पहल का भी मजाक उड़ाने से नहीं चूके। वे सरकार को अपनी सुरक्षा की चुनौती दे रहे हैं। भगवा खतरे का ताना-बाना बुन रहे हैं। हिमाकत तो यह कि अपनी तुलना गैलेलियो से लेकर पैब्लो निरुडा से करते हुए यह बता रहे हैं कि रचनात्मकता अनेक बार निर्वासित हुई है। भारतीय सुरक्षा तंत्र को चुनौती देते हुए वे पूछ रहे हैं कि जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की रक्षा वे नहीं कर सके तो मेरी रक्षा वे कैसे करेंगे? ऐसे व्यक्ति को ससम्मान भारत लाने के प्रति सरकार इच्छुक क्यों है? कोई जरूरत नहीं। और जब खुद फिदा हुसैन यह कह रहे हैं कि 'मैं एक भारतीय हूं, मैं इन लोगों से स्वदेश वापसी की भीख क्यों मांगूं।' बेहतर तो यह हो कि सरकार उन्हें कह दे- 'फिदा हुसैन भारत को तुम्हारी जरूरत नहीं।'

7 comments:

निशाचर said...

बिलकुल ठीक, मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. ऐसे व्यक्ति के लिए भारत में कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

मुनीश ( munish ) said...

there are already enough troubles here ! no need for him.

A. Arya said...

कांग्रेस के मोसेरे भाई है ना, कसाब और अफ़ज़ल का दिल बहलाने के लिए उसकी ज़रूरत है

PD said...

आपसे सहमत हूँ..

SP Dubey said...

देश मे सरकार होने का भ्रम है और है तो एकम अन्धी बहरी और माइनोरटी की सरकार है

BRAJNANDAN said...

Totally in agreement with your view. This is so called secularism in India.

babu123 said...

USNE KABHI APNI MAA BAHAN KI WAISE CHITRA BANAI HAI