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Wednesday, June 16, 2010

गोरी चमड़ी के समक्ष घुटने टेकते नेता!

पत्रकार, लेखक, चिंतक डॉ. वेदप्रकाश वैदिक देश की वर्तमान दुरावस्था पर दुखी हैं। उनका हृदय रो रहा है। मेरे मित्र हैं, दुखी मैं भी हूं। वे जानना चाहते हैं कि हर मौके पर, चाहे अवसर यूनियन कार्बाइड द्वारा दी गई त्रासदी का हो, डाऊ केमिकल्स का हो या परमाणु हर्जाने का हो, हमारे नेता गोरी चमड़ी के आगे घुटने क्यों टेक देते हैं? यह वही सवाल है जिसका जवाब आजाद भारत का हर व्यक्ति चाहता है। बल्कि वह व्यक्ति भी जो इस दुखद प्रक्रिया का जाने-अनजाने हिस्सा बन चुका है, हिस्सा बन रहा है। जवाब स्वयं डा. वैदिक ने दे दिया है। उनके अनुसार- ''भारत अब भी अपनी दिमागी गुलामी से मुक्त नहीं हुआ है।''
बिल्कुल ठीक। यही तो जड़ है सारी व्याधियों का। मूल्यों के क्षरण का। राजनीतिकों के चारित्रिक पतन का- भ्रष्टाचार का। प्रशासनिक पंगुपन का। रिश्तों से दूर स्वार्थ की प्रभुता का। सामाजिक सरोकारों की बलि का। देश के मुकाबले विदेशी प्रेम का। वैदिकजी ने दुख-आक्रोश प्रकट किया है भोपाल त्रासदी की जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन की 26 वर्ष पूर्व गिरफ्तारी, रिहाई और पलायन पर जारी घमासान पर। वैदिकजी हमेशा सम-सामयिक विषयों पर दोटूक टिप्पणी करते रहे हैं, माकूल संदर्भों के द्वारा देश का ज्ञान वर्धन भी। लेकिन बहुत दिनों के बाद वे गोरी चमड़ी को लेकर आक्रामक दिखे हैं। लेकिन बिल्कुल सही।
गोरी चमड़ी धारक वॉरेन एंडरसन को अमेरिका भगाने में सहायक चाहे राजीव गांधी हों, अर्जुन सिंह हों, कांग्रेस पार्टी हो या बाद के दिनों में उसके प्रत्यर्पण को लेकर शिथिलता बरतने वाली भाजपा नेतृत्व की केंद्र सरकार हो, सबके पीछे कारण वही एक है- गोरी चमड़ी के सामने नतमस्तक हो जाने की हमारी प्रवृत्ति। इसके पहले एक और गोरी चमड़ी धारक बोफोर्स कांड के मुख्य अभियुक्त ओट्टïावियो क्वात्रोच्चि को भी शासकों-प्रशासकों ने लगभग ऐसी ही परिस्थितियों में देश से बाहर निकल जाने दिया था। इतिहास के पन्नों को पलटें तब ऐसे अनेक दुखद प्रसंग सामने आ जाएंगे जब गोरी चमड़ी के सामने हमारे नेता देशहित को कुर्बान करते रहे हैं। आजादी के पहले भी ऐसा हुआ है और आजादी के बाद भी हो रहा है। मैं यह उल्लेख जानबूझकर कर रहा हूं। लोगों के दिलों में गोरी चमड़ी को लेकर अनेक सवाल मौजूद हैं। आजादी की लड़ाई के दौरान जब अंग्रेजी शासक 'फूट डालो और राज करो' की नीति पर चलते हुए देश में खून-खराबा करवा रहे थे तब भी स्वतंत्रता संग्राम के हमारे अनेक कथित बड़े नेता क्या ब्रिटिश हित नहीं साध रहे थे? भारत के पक्ष में आजादी का निर्णय हो जाने पर नेतृत्व को लेकर हमारे अनेक नेताओं की भूमिकाएं संदिग्ध रही हैं। भारत विभाजन के मसले पर भी हमारे नेताओं ने ब्रिटिश इच्छा के सामने क्या घुटने नहीं टेक दिए थे? आजादी के बाद आरंभिक वर्षों में जब देश नए भारत के निर्माण के सपने देख रहा था, हमारे नेता या तो अपना घर भर रहे थे या फिर विदेशी हित साध रहे थे। पिछले दो-ढाई दशक की घटनाएं इस संदर्भ में अत्यंत ही भयावह हैं। वैदिकजी कहते हैं कि भारतीय शासकों की चिंता भोपाल की लाशों से कहीं अधिक अमेरिकी पूंजी की थी। सो उन्होंने एंडरसन को अपना दामाद बना लिया। ऐसे में यह सोचना ही बेवकूफी है कि भारत सरकार एंडरसन को प्रत्यर्पित कर सजा दिलवाएगी। देश को आज भी अपरोक्ष में गोरी चमड़ी की नीतियां ही चला रही हैं। सामने कोई भी हो गोरी चमड़ी का सच झुठलाया नहीं जा सकता। क्या ऐसी मानसिक गुलामी से हम मुक्त नहीं हो सकते? क्या भारत पूर्णत: भारतीयों का नहीं बन सकता? संभव है। शर्त यह है कि गोरी चमड़ी के सच चाहे वह कितने भी कड़वे क्यों न हों आज की पीढ़ी को बताए जाएं। और नई पीढ़ी उनका अध्ययन-मनन कर भारत और भारतीयता को स्थापित करे। बहुभाषी, बहुसंस्कृति, बहुधर्मी भारत का एक ही रंग है और वह है भारतीयता।

6 comments:

sanjukranti said...

हम कब तक सव्वैधानिक भाषा का उपयोग करते रहेंगे. बहुत हो चुका इन हराम्खोरो
ने अपनी स्वार्थ पूर्ति के लए देश का स्वाभिमान गीरवे रख दिया है ! देश का भविष्य
अंधकारमय कर दिया है !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हर कोई अपने स्वार्थ पूरे कर रहा है. शायद इसी को स्वर्ग बनाना कहते हैं और जब नागरिक स्वर्गवासी होंगे तभी तो स्वर्ग बनेगा..

आचार्य जी said...

प्रभावशाली लेखन।

पी.सी.गोदियाल said...

खून में है , क्या करें ?

संजय बेंगाणी said...

साल्ली डीएनए में ही गुलामी घुस गई है. निकले कैसे?

ajit gupta said...

हमारे अन्‍दर स्‍वाभिमान है ही नहीं, प्रत्‍येक भारतीय स्‍वयं को कमतर और विदेशियों को उन्‍नत समझता है इसी कारण ऐसी परिस्थितियों में भी लगता है कि वे तो गल्‍ती कर ही नहीं सकते और उन्‍हें बचाने के लिए हम आतुर हो जाते हैं। जिस दिन हम सब मिलकर अपने देश के स्‍वाभिमान को जागृत कर लेंगे तब ऐसा नहीं होगा।