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Sunday, March 22, 2009

संघ परिवार में उत्पन्न दरार!


किसी भी झुंड में 'मतभेद' एक स्वस्थ सोच प्रक्रिया को रेखांकित करता है. यह एक विचार प्रधान समाज का भी द्योतक है. किन्तु 'मनभेद'? तर्क के लिए चाहे कोई कुछ भी कह ले, लेकिन यह सच अपनी जगह कायम रहता है कि इसकी जड़ में वैचारिक भेद कम, व्यक्तिगत पसंद-नापसंद आधारित कुंठाएं मजबूती से मौजूद रहती हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक पद से के. सुदर्शनजी का अचानक इस्तीफा और मोहन भागवत की इस पद पर प्रोन्नति मात्र एक खबर नहीं- एक बड़ी विस्फोटक खबर है. तीन वर्ष में एक बार होने वाली संघ की तीन दिवसीय प्रतिनिधि सभा की बैठक के बीच आए सुदर्शनजी के इस्तीफे से संघ परिवार में उत्पन्न दरार स्पष्टत: दृष्टिगोचर है. कहीं यह सुदर्शनजी की लालकृष्ण आडवाणी के प्रति नकारात्मक सोच की परिणति तो नहीं है? प्रतिनिधि सभा की बैठक के पहले दिन यह ऐलान किया गया कि प्रधानमंत्री पद के लिए आडवाणी संघ की पहली पसंद हैं. इसके बाद दूसरी बैठक के पूर्व ही सुदर्शनजी इस्तीफा दे देते हैं. संघ कार्यप्रणाली की सामान्य प्रक्रिया नहीं है यह. ये वही सुदर्शनजी हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के सत्ता में रहते मांग की थी कि प्रधानमंत्री वाजपेयी और उपप्रधानमंत्री आडवाणी दोनों इस्तीफा दे दें. सुदर्शनजी चाहते थे कि शासन की बागडोर किसी युवा को सौंप दी जाए. निश्चय ही तब कोई 'युवा चेहरा' उनके जेहन में रहा होगा. कहीं वह चेहरा नरेंद्र मोदी का तो नहीं था? उस वाकये के छह-सात साल के बाद सुदर्शनजी की मौजूदगी में आडवाणीजी को 'पहली पसंद' के रूप में पेश किया गया. कट्टर सिद्धांतवादी सुदर्शन भला इसे बर्दाश्त कैसे करते! उनके इस्तीफे पर ठीक ही किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. बैठक में बगैर नाम लिए हुए स्वयंसेवकों का आह्वान किया गया कि वे आसन्न लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में जान लगा दें. भाजपा इससे अवश्य खुश हुई होगी. आपातकाल के बाद 1977 में संपन्न चुनावों के पश्चात यह पहला अवसर है, जब संघ परिवार खुल कर भाजपा के पक्ष में खड़ा नजर आएगा. संघ का बड़ा 'नेटवर्क' और समर्पित स्वयंसेवकों का पूरा लाभ अगर भाजपा उठा पाई तब देश के राजनीतिक परिदृश्य को एक नया स्वरूप मिलेगा. चूंकि संघ परिवार अब फिर राष्ट्रीय सत्ता संघर्ष में निर्णायक भूमिका को आतुर है, उसने योजना तैयार कर ली है. सुदर्शनजी के इस्तीफे को योजना के पहले चरण के क्रियान्वयन के रूप में देखा जाना चाहिए. उनकी जगह सरसंघचालक के पद पर मोहन भागवत की नियुक्ति महत्वपूर्ण है. मुस्लिम तुष्टीकरण, जेहादी आतंकवाद और हिन्दू साधु-साध्वियों के चरित्र हनन के संबंध में मोहन भागवत के तीखे विचार नरेंद्र मोदी की आक्रामकता के पक्षधर हैं. संघ का चिंतक वर्ग इस संभावना को ध्यान में रखकर भविष्य की रणनीति तैयार करने में जुट गया है कि 15वीं लोकसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी. सरकार चाहे किसी की बने, वह अल्पायु होगी. अगले ढाई-तीन वर्षों में देश को मध्यावधि चुनाव से रूबरू होना होगा. और संभवत: वह चुनाव वर्तमान गठबंधन युग की समाप्ति लेकर आएगा. और तब प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में न मनमोहन सिंह सामने रहेंगे और न ही लालकृष्ण आडवाणी. और वह काल सुदर्शनजी की इच्छापूर्ति का काल भी होगा- क्योंकि तब उनकी पसंद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदार होंगे.

2 comments:

अक्षत विचार said...

हमेशा की तरह बारीक पड़ताल की आपने बहुत भीतर तक गये आप
thank you sir.

Suresh Chiplunkar said...

इस लेख की अन्तिम आठ पंक्तियाँ यदि सही साबित होती हैं तो वाकई देश के लिये यह अच्छा होगा…