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Saturday, March 28, 2009

लोकतंत्र के 'पापियों' का नाश करे युवा शक्ति!


लोकतंत्र को कमजोर व व्यवस्था को भ्रष्ट-पतित करने के अपराधी एक मंच पर एकत्रित हो डुगडुगी पीटने लगे हैं कि सत्ता की महारानी उनकी ही अंकशायिनी बनेगी. अगर ऐसा हो गया तब....? तब क्या, देश रूबरू होगा प्रतिदिन लोकतंत्र के साथ बलात्कार के नए-नए दृश्य से! रेखांकित कर दूं, यह एक अकेले मेरी कल्पना, मेरी चिंता नहीं है. मजबूरी, भय, स्वार्थ आदि अनेक कारण हैं जिनकी वजह से लोग अपनी चिंता व्यक्त नहीं कर पाते. कुछ अवसरवादी पाप के गंदले तालाब में पापियों के साथ गोते लगा उनके भागीदार बन जाते हैं. जूठन के रूप में कुछ मलाई पा ये गद्गद देखे जाते हैं. कुछ असहाय तटस्थ बने रहते हैं. बलात्कारी ऐसी स्थिति का फायदा उठा आगे और आगे बढ़ते चले जाते हैं. देश चेत जाए! ऐसा मौन, ऐसी तटस्थता कहीं एक बार फिर हमारे पैरों-हाथों को गुलामी की जंजीरों से जकड़ न लें. यह चेतावनी नक्कारखाने में तूती की आवाज सरीखी ही है अभी. परंतु ऐसी संभावना को एक सिरे से खारिज करने की कोई कोशिश न करे. आत्मघाती होगा ऐसा करना.
मैं अवसरवादियों की चर्चा यूं ही नहीं कर रहा. जरा गौर करें, समाजवादी पार्टी के मुलायमसिंह यादव, राष्ट्रीय जनता दल के लालूप्रसाद यादव और लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान के मिलन पर. ये तीनों प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं. फिर एक मंच पर कैसे? दरअसल ये कांग्रेस को कमजोर कर चुनाव पश्चात उसे अपने इशारों पर नचाने की सोच रहे हैं. कांग्रेस के साथ सौदेबाजी करेंगे ये. हास्यास्पद यह कि लालू कांग्रेस को यह बताने से नहीं चूक रहे हैं कि ''वे (सोनिया-मनमोहन) चैन की नींद सोएं, हम चुनाव जीत कर संप्रग सरकार बनाएंगे. और कांग्रेस या सोनियाजी, मनमोहन सिंह अथवा जिसे भी प्रधानमंत्री बनाने को कहेंगे, हम उसे ही बनाएंगे.'' क्या कांग्रेस इनके झांसे में आ जाएगी? चूंकि वह स्वयं मजबूर है, लाचार है, इस तिकड़ी को तत्काल नाराज नहीं करेगी. दक्षिण में डीएमके, एडीएमके और पीएमके क्षेत्रीयता के कवच में अलग खिचड़ी पका रही हैं. दिल्ली से इनका प्रेम 'रायसीना हिल' तक सीमित है. शेष भारत तो इनके लिए अछूत है ही. उड़ीसा में नवीन पटनायक के बीजू जनता दल ने भी स्वयं को राष्ट्रीय-हित से इतर प्रादेशिक-हित में सिमटा लिया है. पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ वामदलों का स्वार्थ सर्वविदित है. लाल किले पर 'लाल झंडा' फहराने की लालसा-पूर्ति हेतु ये दल किसी भी सीमा तक जा सकते हैं- नीति, मूल्यों, सिद्धांत का त्याग कर सकते हैं. उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के राजदल दक्षिण से भी दो कदम आगे बढ़ते हुए स्वयं को भारतीय आधे-अधूरे मन से ही मानते हैं. दोषी चाहे हमारी आंतरिक व्यवस्था अथवा केंद्र सरकार की नीति ही क्यों न हो, इन क्षेत्रों की 'सोच' का कड़वा सच यही है. रही बात जम्मू-कश्मीर की, तो वहां के लोगों को भारतीयता का विश्वास दिलाने में शासकों की विफलता सामने है.
ये सभी उद्धरण चीख-चीख कर भारत की एकता, अखंडता, सार्वभौमता और स्वतंत्रता पर मंडरा रहे खतरे की ओर इशारा कर रहे हैं. क्या हम सोए ही रहेंगे? जागना होगा, विशेषकर देश की युवा पीढ़ी को! वे न केवल देश के भाग्य निर्माता हैं, कल के शासक भी होंगे. इनके हाथ एक अवसर आया है- आम चुनाव का. राजदलों, उम्मीदवारों के अंदर झांकें. ये सभी इस पीढ़ी के मत को लेकर आशंकित मिलेंगे. यह पीढ़ी इसका फायदा उठाए, निर्णायक बने. अवसरवादियों को उनकी औकात बताने का मौका है यह. चुनाव में अपने मत का शत-प्रतिशत उपयोग करे यह पीढ़ी. स्वच्छ छवि, ईमानदार, कुशल पात्र का चयन करें- जाति, धर्म, सम्प्रदाय व कथित दलीय प्रतिबद्धता का त्याग कर. प्रतिबद्धता सिर्फ राष्ट्रहित हो. तिकड़मियों के स्वार्थ को पूरा न होने दें. गांधी, नेहरू, प्रसाद, आंबेडकर, तिलक आदि की आत्माएं तब युवा पीढ़ी को हृदय से आशीर्वाद देंगी. भारतीय लोकतंत्र को गुलाम बना ऐश करने वालों को यह युवा पीढ़ी बख्शे नहीं!
27 मार्च 2009

2 comments:

इरशाद अली said...

अच्छी जानकारी, सार्थक प्रयास।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप का यह आलेख ही असमंजस भरा है। आप खुद ही स्पष्ट नहीं कि क्या कहना चाहते हैं। इस आलेख से स्पष्ट हो रहा है कि आज जनता को राष्ट्रीय विकल्प चाहिए। लेकिन है कहाँ? लेकिन उस के बनने के पहले सभी तरह के दृश्य सामने आएँगे। उन से कैसे मुहँ मोड़ा जा सकता है? तब तक जब तक कि कोई विकल्प सामने नहीं आता है।