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Tuesday, March 31, 2009

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वरुण खतरा कैसे!


क्या नेहरू-गांधी परिवार के वरुण गांधी सचमुच राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं? सर्वेक्षण करा लें, देश वरुण के विरुद्ध ऐसे आरोप को मानने से इनकार कर देगा. संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की यह प्रतिक्रिया पूर्वाग्रही तो नहीं ही है कि ''वरुण के खिलाफ उठाया गया कदम, राजनीतिक ज्यादा है.'' कश्यप के शब्दों को चुनौती नहीं दी जा सकती. यह तो देश की कथित राजनीति है, जो सत्तारूढ़ किसी व्यक्ति विशेष अथवा किसी राजदल विशेष की पसंद के आधार पर ऐसे प्रतिशोधात्मक कदम उठाए जाते रहे हैं. 1977 में कांग्रेस व इंदिरा गांधी की पराजय के बाद जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी, तब इंदिरा गांधी और संजय गांधी के प्रति सरकार का नजरिया प्रतिशोधात्मक था. शाह जांच आयोग का गठन कर इंदिरा गांधी पर तब मुर्गी चोरी तक के घटिया आरोप लगाए गए थे. तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह, प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की इच्छा के विरुद्ध, इंदिरा गांधी को जेल भेजने की जिद पर अड़े थे. यह दीगर है कि बाद में इंदिरा गांधी की कांग्रेस के समर्थन से ही चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. अवसरवादी राजनीति के एक अत्यंत ही घृणित उदाहरण के रूप में उक्त घटना इतिहास में दर्ज है. आज उसी संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी को उत्तरप्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगा दिया है. जिन तीन कारणों को वरुण के खिलाफ रासुका के लिए आधार बनाया गया है, जरा उन पर गौर करें. पहला आरोप है कि उन्होंने इस माह के प्रथम सप्ताह में उत्तरप्रदेश के पीलीभीत जिले के 2 स्थानों पर उत्तेजक एवं भड़काऊ भाषण देकर सांप्रदायिक उन्माद पैदा करने की कोशिश की. फिर 28 मार्च को जब वे अदालत में समर्पण के लिए जा रहे थे, तब पूर्व सूचित कार्यक्रम के विपरीत उन्होंने अपना मार्ग बदल डाला था जिससे लोक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. तीसरा आरोप है कि वरुण ने न्यायालय परिसर के बाहर भड़काऊ भाषण देकर प्रशासनिक व्यवस्था को बिगाड़ा. किसी को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित करने के लिए क्या ये आरोप पर्याप्त अथवा जायज हैं? कदापि नहीं. बिल्कुल हास्यास्पद हैं ये आरोप. जिस भाषण को समाज के लिए भड़काऊ निरूपित किया जा रहा है, उसकी सचाई की जांच अभी जारी है. अदालत पहुंचने का मार्ग बदल दिए जाने से वरुण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा कैसे बन गए? अगर उस कृत्य से लोक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा भी होगा, तब भी राष्ट्रीय सुरक्षा को इससे कैसे जोड़ दिया गया? न्यायालय परिसर के बाहर भड़काऊ भाषण का आरोप भी बेतुका है. हम थोड़ा पीछे चलें, गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष और सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक भाषण की याद कर लें. सोनिया गांधी ने तब अपने भाषण में गुजरात सरकार और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 'मौत का सौदागर' निरूपित कर दिया था. क्या 'मौत के सौदागर' की व्याख्या करने की जरूरत है? अगर वरुण के शब्द राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हैं तो निश्चय ही सोनिया गांधी के वे शब्द अत्यंत ही खतरनाक थे. उनके विरुद्ध तो रासुका नहीं लगा! हां, गुजरात की जनता ने तब सोनिया को अवश्य जवाब दे दिया था- लोकतांत्रिक अपेक्षा के अनुरूप. जिन भड़काऊ भाषणों के आधार पर वरुण के खिलाफ रासुका लगाया गया है, उन मामलों में अदालत ने वरुण को जमानत दे दी है. साफ है कि अदालत ने इन आरोपों के आधार पर वरुण को जेल में रखना उचित नहीं समझा. फिर इन्हीं आरोपों के आधार पर रासुका क्यों? भारतीय लोकतंत्र के कुछ स्वार्थी तत्व एक अत्यंत ही शर्मनाक अध्याय लिखने पर उतारू हैं. व्यक्तिगत स्वार्थ, पारिवारिक कलह और सत्ता की प्रतिद्वंद्विता में किसी 'युवा भविष्य' को मटियामेट किए जाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. जो आरोप वरुण गांधी पर लगाए गए हैं, अगर वे सही भी हैं तब भी वे रासुका को आकर्षित नहीं करते. वरुण गांधी कोई खूंखार अपराधी नहीं हैं. वे आवेग-आवेश के दोषी हो सकते हैं, देश की सुरक्षा के लिए खतरा कदापि नहीं.
31 मार्च 2009

2 comments:

Sachi said...

घटिया राजनीति और ओछे लोग.
इस चुनाव में मुद्दे देख रहा हूँ, मुझे तो कुछ भी नया नहीं दिख रहा है.., समस्यायें जस की तस् हैं, भय भूख, भ्रष्टाचार हैं.. अब जय हो, भय हो, तय हो, यही सब नजर आ रहा है,,,, हाँ आग से खेलने की राजनीति हो रही है, बाद में , मैं नहीं, मैं नहीं चिल्लायेंगे... मुझे समझ में नहीं आता कि किस पार्टी को वोट देना चाहिए.. सब वही घटिया राजनीति करते हैं..
इस देश के लिए कोई उम्मीद नज़र आ रही है..

राव गुमानसिंघ said...

achi baat likhi apne..