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Wednesday, November 11, 2009

चीन भूल जाए 1962 को!

यह तो सीधे-सीधे भारत पर चीनी आक्रमण की धमकी है। भारत सरकार पूर्व की भांति इसे हल्के से नहीं ले। चीन की ओर से यह टिप्पणी कि 'भारत शायद 1962 के सबक को भूल गया है और वह फिर गलत रास्ते पर चल रहा है' ,क्या यह चेतावनी नहीं? बिल्कुल चेतावनी है! स्पष्ट है कि चीन इस बार तवांग और दलाई लामा के बहाने भारत पर आक्रमण की तैयारी में है। 1962 में चीनी सेना ने भारत पर आक्रमण कर बड़े भू-भाग पर कब्जा कर लिया था। युद्ध में भारत की अपार क्षति हुई थी। हम बुरी तरह पराजित हुए थे। हमारी सैन्य शक्ति तब नग्न हो गई थी। हमारी पोल खुल गई थी। आचार्य कृपलानी और डा. राम मनोहर लोहिया ने तब सार्वजनिक सभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु और रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन की लानत-मलामत करते हुए हार के लिए प. नेहरु की लचर विदेश नीति और कमजोर रक्षा व्यवस्था को दोषी ठहराया था। आचार्य कृपलानी ने तो यहां तक कह डाला था कि जब चीनी सेना भारत पर आक्रमण की तैयारी कर रही थी, प. नेहरु हिंदी चीनी भाई-भाई की माला जप रहे थे। भारत के आयुद्ध कारखानों में बंदूकों की जगह जूते बनाए जा रहे थे। प. नेहरु उस सदमें को बर्दाश्त नहीं कर पाए। एक पराजित प्रधानमंत्री के रुप में वे इस संसार को अलविदा कह चले गए। भारत सरकार इतिहास को भूल गलती न दोहराए।
पिछले दिनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'पीपुल्स डेली' में प्रकाशित एक आलेख में दलाई लामा की तवांग यात्रा को आधार बना भारत को उपर्युक्त चेतावनी दी गई है। जाहिर है कि चेतावनी चीन सरकार की आधिकारिक चेतावनी है। आलेख का स्वरूप तो चाल है। 1962 में चीन ने तवांग पर कब्जा कर लिया था। वह बोमडिला तक पहुंच गया था। बाद में उसने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर सेना वापस बुला ली थी। लगता है चीन अब किसी न किसी बहाने उन क्षेत्रों पर कब्जा करने को व्यग्र है। ध्यान रहे हाल के दिनों में सीमा पर चीनी सैन्य गतिविधियों की ओर भारतीय मीडिया ने बार-बार ध्यान आकृष्ट किया है। लेकिन भारत सरकार के सलाहकारों ने मीडिया पर चीन के साथ रिश्तों की संवेदनशीलता नहीं समझने का आरोप चस्पा डाला। यहां तक कह डाला कि मीडिया अपनी पठनीयता और टीआरपी बढ़ाने के लिए जान-बूझकर चीन के साथ विवादों को उछाल रहा है। यही नहीं भारतीय नौसेना के तत्कालीन प्रमुख एडमिरल सुरेश मेहता और नए वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पीवी नायक ने वक्तव्य दे डाला था कि चीनी सेना की बराबरी भारत नहीं कर सकता। आधिकारिक स्तर पर ऐसी सार्वजनिक बयानबाजी रणनीतिक व कूटनीतिक दृष्टि से अनुचित थी। ऐसे बयान सेना के साथ-साथ जनता का मनोबल गिराते हैं। खैर, चीन की ताजा चेतावनी के आलोक में अब यह जरूरी हो गया है कि भारत सीमा सुरक्षा पर कोई जोखिम न उठाए। चीनी अजगर अब फुंफकार मारने लगा है। दलाई लामा की तवांग यात्रा के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा पर भी चीनी सरकार ने आपत्ति दर्ज की थी। भारत की ओर से अब चीन को दो -टूक जवाब दे देना चाहिए। संख्याबल में चीन सैनिक व हथियार-उपकरण में भले ही आगे हो, मनोबल, समर्पण और कर्मठता में वह भारत का मुकाबला नहीं कर सकता। चीन यह अच्छी तरह समझ ले कि भारत अब 1962 का भारत नहीं है। हर क्षेत्र में मजबूत भारत अब किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम है।

3 comments:

गिरिजेश राव said...

चीन सही ही तो कह रहा है। हम ही भूले बैठे हैं।
ऐसा पड़ोसी तो अच्छा ही है - चेता तो रहा है ? कमीने पाकिस्तानी और बंगलादेशी तो इसकी जरूरत भी नहीं समझते कि लतखोरों को चेता दें ताकि पिटने की तैयारी वगैरह कर लें।
चीन जिन्दाबाद। हम तैयार हैं। लात खाने को अरुणांचल ठीक रहेगा।

MANOJ KUMAR said...

achchhi rachana.

वीरेन्द्र जैन said...

पता नहीं चल रहा कि आप- क्या कहना चाह रहे हैं चीन को अगर हमला ही करना होता तो वह इतने दिन युद्ध विराम क्यों चलने देता या किस बात का इंतज़ार करता. दलाई लामा अमेरिका के इशारों पर काम करने वाले शख्श हैं वे अपनी लड़ाई हमारे कन्धों पर डालना चाहते हैं. हमें इससे बचना चाहिये और दूसरों का मोहरा नहीं बनना चाहिये. हमारे लिए बातचीत का रास्ता ही सर्वोत्तम है।