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Monday, November 9, 2009

अनजान चेहरों ने पीटा भारत को!

खेल है, तो इसमें जीत-हार होनी ही है। एक जीतेगा, दूसरा हारेगा। कभी पहला जीतता है, दूसरा हारता है। कभी दूसरा जीतता है, पहला हारता है। ऐसा विरले ही होता है कि फैसला एकतरफा हो। कोई एक टीम ही बराबर हर मैच जीतती रहे, ऐसा नहीं होता। मैं यहां बात क्रिकेट की कर रहा हूं। पिछले विश्वकप मुकाबले में ऐसा भी हुआ है कि सबसे कमजोर आयरलैंड ने मजबूत पाकिस्तान को हरा दिया। दूसरी ओर कमजोर बांग्लादेश ने भारत को धूल चटाकर मुकाबले से ही बाहर कर दिया। उसके बाद भारतीय टीम में आमूल-चूल परिवर्तन हुए। झारखंड के महेंद्र सिंह धोनी को कप्तानी की बागडोर सौंपी गई। धोनी के नेतृत्व में भारतीय टीम ने अनेक मैच जीत भविष्य के लिए आशा की किरणें जगाई। धोनी ने स्वयं घोषणा भी की है कि उनकी नजर 2011 के विश्वकप पर टिकी है। पिछले दिनों आईसीसी रैंकिंग में कुछ घंटों के लिए ही सही भारत नंबर एक पर पहुंच भी गया। लेकिन विश्व चैम्पियन आस्ट्रलिया ने भारत की सरजमीं पर जारी सात एकदिवसीय मैच की शृंखला में भारत को गुवाहाटी में धोबिया पछाड़ देते हुए जिस प्रकार 4-2 की अजेय बढ़त ले ली, उसने धोनी एंड कंपनी पर अनेक सवालिया निशान जड़ दिए हैं। क्यों हुआ ऐसा? जो टीम इसके पहले हैदराबाद में आस्ट्रेलिया के 350 के विशाल स्कोर का पीछा करते हुए 347 तक पहुंच गई थी, वही टीम गुवाहाटी में शुरु के 10 ओवरों में ही मात्र 27 रनों के स्कोर पर 5 विकेट कैसे गवां बैठी? विकेट भी किनके- वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सचिन तेंदुलकर, सुरेश रैना और युवराज सिंह के! समझ में नहीं आता कि जिस तेंदुलकर ने अभी पिछले मैच में मात्र 141 गेंदों पर 175 रन बनाए थे, वे सिर्फ 10 रन बनाकर कैसे आउट हो गए? वैसे तेंदुलकर पर अनेक पुराने ख्यातनाम खिलाड़ी आरोप लगा रहे हैं कि हैदराबाद में भी वे एक खराब शाट खेलकर आउट हो गए। धीमी जुबान में ही सही आरोप दोहराए जा रहे हैं कि तेंदुलकर सिर्फ अपने रिकार्ड के लिए ही खेलते हैं। विश्व के सर्वश्रेष्ठ महान बल्लेबाज तेंदुलकर पर ऐसे आरोप को कोई मानने को तैयार नहीं होगा। किंतु शृंखला के खेले गए अब तक 6 मैचों में तेंदुलकर द्वारा बनाए गए क्रमश: 14, 04, 32, 40, 175 और 10 रन यह तो साबित करते ही हैं कि जारी शृंखला में अन्य बल्लेबाजों की तरह उनमें भी निरंतरता का अभाव है। कुल बनाए गए 275 रनों में से हैदराबाद के 175 रनों की पारी निकाल दें, तब 5 मैचों में 20 के औसत से उन्होंने सिर्फ 100 रन ही बनाए। अन्य खिलाडिय़ों में सहवाग ने 6 मैचों में 23 की औसत से 138, युवराज 5 मैच में 25.6 की औसत से 128, सुरेश रैना 6 मैचों में 27.6 की औसत से 166, गौतम गंभीर 5 मैचों में 31.6 की औसत से 158 रन ही बना पाए हैं। धोनी ने सर्वाधिक 6 मैच में 47.5 की औसत से 285 रन बनाए। क्या बड़े नाम वाले ऐसे अनिश्चित खिलाडिय़ों वाली टीम विश्व की नंबर-1 टीम बन सकती है? भय तो यह है कि कहीं पिछले विश्वकप की तरह भारत फिर फिसड्डी बनकर न रह जाए। गुवाहाटी की हार के बाद भारतीय टीम को सुझाव दिया जा रहा है कि उसे क्रिकेट की आईसीयू में भर्ती होकर इलाज करना चाहिए। टिप्पणी कड़ी तो है किंतु बेवजह नहीं। ध्यान रहे भारत में खेल रही आस्ट्रेलिया की वर्तमान टीम उसके दूसरे दर्जे की टीम है। उसकी मूल टीम के 7 बड़े खिलाड़ी घायल होकर बाहर बैठे हैं। लगभग सभी मशहूर गेंदबाज टीम से बाहर हैं। इसके बावजूद गुवाहाटी में भारत मात्र 170 रन बना सका? इस योग में गेंदबाज जडेजा और प्रवीण द्वारा बनाए गए 111 रन शामिल हैं। हमारे बड़े नामी बल्लेबाज क्या कर रहे थे? जिस प्रकार आस्ट्रेलिया के अनजान चेहरों ने भारत को धूल चटाया वह शर्मनाक है। आस्ट्रेलियाई टीम के हीरो बने खिलाडिय़ों के नाम भी शायद ही किसी ने सुने हों। इसके बावजूद अगर भारत की हार हुई तो सिर्फ इस कारण कि दु:खद रूप से भारतीय टीम में निरंतरता के साथ-साथ समर्पण का अभाव भी देखा गया। भारत के रणनीतिकार आत्मचिंतन करें। सीमित ओवरों के मैच में निर्णायक भूमिका बल्लेबाजों को निभाना चाहिए। यह आशा करना कि गेंदबाज मैच जिताएंगे, गलत है। गेंदबाजों को दबाव में लाने की नीति कभी कारगर नहीं होती।

1 comment:

Dipak 'Mashal' said...

Aise samay me Rahul Dravid ki kami bahut khali, jo ki in sabse behtar pradarshan karne par bhi bahar kar diye gaye...
Jai Hind...